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लाल आतंक से रेड कार्पेट तक : कभी घने जंगलों में बंदूक थामने वाली बेटियों ने बिखेरा रंग,मोदी सरकार के बुलंद इरादों ने बदली तस्वीर

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अगर इरादे बुलंद हो और सही नियत से काम किया जाए तो, इंसान असंभव लगने वाले काम को भी पूरा कर सकता है। हर मुश्किल काम आसान हो जाता है। सफलता जरूर मिलती है। ऐसा ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कर दिखाया है। उन्होंने 24 अगस्त 2024 को देश को वामपंथी उग्रवाद (नक्सलवाद) से पूरी तरह मुक्त करने के लिए 31 मार्च 2026 की समयसीमा तय की थी। उनके दृढ़ निश्चय, सुरक्षा बलों के अद्म्य साहस और मोदी सरकार की पुनर्वास नीति ने ऐसा कमाल कर दिखाया, जिसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। बड़े पैमाने पर नक्सलियों के आत्मसमर्पण के चलते लक्ष्य निर्धारित तिथि से पहले ही मार्च 2026 के अंत तक पूरा कर लिया गया, जिसके बाद देश को नक्सल मुक्त घोषित किया गया। इसका अजूबा असर और अद्भुत नजारा नेशनल हैंडलूम डे के अवसर पर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में देखने को मिला। कभी घने जंगलों में हथियार लेकर घूमने वाली बेटियों और महिलाओं ने ऐसा रंग बिखेरा, जिसे देखकर लोग हैरान रह गए। देखने वालों ने कहा कि मोदी राज में यह अद्भुत बदलाव है।  

आत्मसमर्पित नक्सली महिलाओं ने रैंप वॉक करके खींचा ध्यान
दरअसल, 7 अगस्त 2026 को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में नेशनल हैंडलूम डे (National Handloom Day 2026) के अवसर पर एक खास कार्यक्रम आयोजित किया गया था, जिसमें बस्तर की आत्मसमर्पित नक्सली महिलाओं ने रैंप वॉक (Ramp Walk) करके सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। कभी घने जंगलों में हथियार लेकर घूमने वाली ये महिलाएं जब रैंप पर उतरीं तो पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम तालियों की आवाज से गूंज उठा। इस स्वदेशी फैशन शो में उन्होंने छत्तीसगढ़ के पारंपरिक कोसा सिल्क और हाथ से बुने खूबसूरत कपड़ों को पहनकर मंच पर अपना जलवा बिखेरा। छत्तीसगढ़ के वर्तमान मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह भी उनका हौसला बढ़ाने के लिए मौजूद थे। इस अवसर पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने महिलाओं से बातचीत की और उनका उत्साह बढ़ाते हुए उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं। 

सिर्फ फैशन या हथकरघा प्रदर्शन नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का संदेश
इन महिलाओं ने मॉडल्स की तरह रैंप वॉक किया और फेमिना मिस इंडिया छत्तीसगढ़ अनुष्का सोन के साथ कदम से कदम मिलाकर रैंप पर चलीं। यह पल सिर्फ एक फैशन शो नहीं था, बल्कि बंदूक छोड़कर सम्मान और आत्मनिर्भरता की नई जिंदगी शुरू करने वाली इन महिलाओं के हौसलों की एक नई उड़ान थी। ये महिलाएं अब समाज के बीच सम्मान और आत्मविश्वास के साथ नई जिंदगी की शुरुआत कर रही हैं। रायपुर में हुआ यह कार्यक्रम सिर्फ फैशन या हथकरघा प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा। पूर्व महिला नक्सलियों की मौजूदगी ने इसे सामाजिक बदलाव का संदेश देने वाला मंच बना दिया। इस फैशन शो में शामिल बस्तर की एक बेटी ने कहा कि मुख्यमंत्री जी को बहुत बहुत धन्यवाद देती हूं कि आपने भेष-भूषा और वस्त्र का रीति रिवाज के अनुसार परफॉर्मेंस का मौका दिया। 

‘लाल आतंक से रेड कार्पेट तक’ का अद्भुत सफर 
छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में कभी नक्सली वर्दी पहनकर सरकार के खिलाफ लड़ने वाली और आत्मसमर्पण करने वाली 9 महिला नक्सलियों ने इस फैशन शो में हिस्सा लिया। इस आयोजन में सुकमा की 8 और बीजापुर की एक महिला नक्सली ने पारंपरिक हथकरघा परिधान पहनकर रैंप पर कदम रखा और बदलते बस्तर की तस्वीर पेश की। छत्तीसगढ़ के इस साल नक्सल मुक्त होने के बाद अब इनमें से कई महिलाएं सामाजिक संगठनों के साथ काम कर रही हैं। उन्हें ट्रेनिंग दी जा रही है और नए-नए हुनर सिखाए जा रहे हैं, ताकि वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकें और जिंदगी की नई शुरुआत कर सकें। हथियारों और खून-खराबे की जिंदगी को पीछे छोड़कर रैंप वॉक करती इन महिलाओं की तस्वीरें निश्चित तौर पर सुखद हैं। 

कभी नहीं सोचा था जिंदगी में ऐसा कुछ होगा- पूर्व महिला नक्सली
घने जंगलों और मुश्किल जिंदगी से फैशन तक का यह ऐसा सफर है, जिसकी कल्पना खुद इस फैशन शो में हिस्सा लेने वाली बेटियों ने भी नहीं की थी। सुकमा के चिंतागुफा इलाके के एल्मागुंडा गांव की 22 वर्षीय पुनेम ज्योति ने अपना अनुभव शेयर करते हुए कहा, “मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरी जिंदगी में ऐसा कुछ होगा।” उन्होंने पिछले साल दिसंबर में हैदराबाद में आत्मसमर्पण किया था। ज्योति ने हिंदी और गोंडी में बात करते हुए कहा कि माओवादी आंदोलन छोड़ने के बाद उनकी जिंदगी में काफी बदलाव आया है। 28 वर्षीय एक अन्य महिला ने कहा कि उन्होंने इससे पहले कभी फैशन शो नहीं देखा था। उन्होंने अपनी पहचान जाहिर नहीं करने की शर्त पर कहा, “जब हम जंगल में थे, तब हमने ऐसी चीजें कभी नहीं देखी थीं।” महिला ने बताया कि माओवादियों के सांस्कृतिक विभाग से जुड़ी होने के कारण उन्हें दर्शकों के सामने कार्यक्रम प्रस्तुत करने का थोड़ा अनुभव था, जिससे रैंप वॉक में मदद मिली। उन्होंने कहा, “हमें खुशी है कि हिंसा छोड़ने के बाद हम शांतिपूर्ण और सम्मानजनक जिंदगी जी रहे हैं।”

गृहमंत्री अमित शाह के दृढ़ निश्चय से संभव हुआ ‘गन्स टू ग्लैमर’ का सफर 
यह बदलाव अचानक नहीं हुआ है। इसके पीछे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विकास विजन, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का दृढ़ निश्चय, सुरक्षा बलों का साहस और पुनर्वास नीति है, जिसने नक्सल प्रभावित बस्तर की तस्वीर बदल दी। यहां सुरक्षा बलों को नक्सलियों पर कार्रवाई के लिए खुली छूट दी गई। नक्सलियों के आत्मसमर्पण करने और उनके पुनर्वास के लिए नीति बनाई गई। केंद्र और राज्य सरकार ने मिलकर विकास से कोसो दूर इस क्षेत्र में विकास की नई पहल शुरू की। डर के साए में जी रहे लोगों का भरोसा जीता गया। उन्हें विश्वास दिलाया गया कि विकास बंदूक की नली से नहीं, लोकतंत्र से निकलता है। नक्सलियों के चंगुल में फंस चुकी बेटियों और महिलाओं को नया जीवन शुरू करने के लिए प्रेरित किया गया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में ऐसी बेटियों के जीवन से जुड़ी एक मार्मिक घटना का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था, “किसी नक्सली बच्ची को नेल पॉलिस देते हैं तो लगाते लगाते रो पड़ती है। उसके ट्यूटर उससे पूछते हैं, क्यों रो रही हो? बच्ची ने बताया कि पहली बार मैंने जीवन में नेल पॉलिश लगाया है। 7 साल की थी, ये (नक्सली) मुझे उठा ले गए तबसे पैंट-शर्ट और बूट में घूम रही हूं। मैंने जीवन में कभी देखा नहीं।… है किसी के पास जवाब? ये 15000 बच्चों का जीवन बर्बाद कर दिया, कौन जिम्मेदार है?”

अब तक 10 बार बस्तर का दौरा कर चुके हैं गृह मंत्री अमित शाह
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 10 बार बस्तर का दौरा कर चुके हैं। पहला दौरा बीजापुर-सुकमा बॉर्डर तरेम में हुए बड़े नक्सली हमले के बाद वे स्थिति का जायजा लेने और शहीदों को श्रद्धांजलि देने जगदलपुर और बासागुड़ा कैंप पहुंचे थे। उसके बाद छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2023, उसके बाद 2024 में लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने बस्तर का दौरा किया था। मार्च 2023 में बस्तर के करनपुर कैंप में आयोजित 84वें सीआरपीएफ स्थापना दिवस समारोह में शामिल होने पहुंचे थे। वर्ष 2024 के दौरान उन्होंने भाजपा प्रत्याशियों के पक्ष में प्रचार करने के लिए जगदलपुर और कोंडागांव में विशाल जनसभाओं को संबोधित किया था। अक्टूबर 2025 विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा के ऐतिहासिक ‘मुरिया दरबार’ रस्म में शामिल होने वाले वे देश के पहले केंद्रीय गृहमंत्री बने। दिसंबर 2025 में जगदलपुर में आयोजित बस्तर ओलंपिक के समापन समारोह को संबोधित करने पहुंचे। फरवरी 2026 बस्तर संस्कृति के संरक्षण से जुड़े प्रसिद्ध बस्तर पंडुम महोत्सव के समापन समारोह में बतौर मुख्य अतिथि शामिल होने जगदलपुर पहुंचे थे। दसवीं बार 18 मई, 2026 को दो दिवसीय बस्तर दौरे पर पहुंचे। उन्होंने आसना में स्थित बादल अकादमी और नेतानार में आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लिया।

गृह मंत्री अमित शाह ने नक्सल विरोधी अभियानों में लगे जवानों का बढ़ाया हौसला
दिसंबर 2024 के मध्य में छत्तीसगढ़ दौरे के दौरान, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बस्तर और रायपुर का दौरा किया था। इस दौरान उन्होंने बस्तर ओलंपिक के समापन समारोह में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने नक्सल हिंसा से पीड़ित परिवारों व सुरक्षाकर्मियों से मुलाकात कर उनका हौसला बढ़ाया। वाम उग्रवाद (नक्सलवाद) से निपटने के लिए सुरक्षा बलों की रणनीतियों और अभियानों की उच्च स्तरीय समीक्षा की। उन्होंने कहा कि जो चाहिए लिखकर दे दो… डरना मत। इसमें कोई डिसिप्लिन नहीं होता है… मैं कहता हूं। जो चीज चाहिए वो लिखकर दे दो। सबका प्रयास करेंगे।

नक्सलवाद के खिलाफ अभियान में शहीद हुए वीर जवानों को नमन
‘उजर बस्तर’ कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे अमित शाह ने कहा था कि जबतक बस्तर का संपूर्ण विकास नहीं होता हम चैन से नहीं बैठेंगे। अमित शाह ने नक्सलवाद के खिलाफ लड़ी गई लड़ाई में शहीद हुए वीर जवानों को भी नमन किया। शाह ने कहा कि बिना सुरक्षाबलों की मेहतन के ये मुकाम पाना मुश्किल था। शाह ने कहा कि मुख्य रूप से डीआरजी और कोबरा बटालियन ने माओवाद के खिलाफ लंबी चली लड़ाई में बड़ी भूमिका अदा की है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता है। नक्सल उन्मूलन सहित बस्तर के विकास को लेकर केंद्र की मोदी सरकार का विशेष फोकस बस्तर की ओर है। बस्तर की धरती पर अमित शाह ने कहा कि आज हम गर्व से कह सकते हैं कि भारत अब नक्सल मुक्त हो चुका है। उन्होंने बस्तर के विकास की प्रतिबद्धता को दोहराया और कहा कि बिना बस्तर के विकास के देश का विकास संभव नहीं है। अमित शाह ने कहा कि बस्तर में हम बुनियादी सुविधाओं को डेवलप करने का काम कर रहे हैं। ‘शहीद वीर गुंडाधुर सेवा डेरा’ नक्सल प्रभावित बस्तर जो एक जमाने में था, वो नक्सल मुक्त विकसित बस्तर बनाने का एक बहुत बड़ा जरिया बनेगा। गौरतलब है कि ‘शहीद वीर गुंडाधुर सेवा डेरा’ बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद के खात्मे के बाद सुरक्षा कैंपों को विकास केंद्रों में बदलने की एक नई पहल है। 

कैसे नक्सल मुक्त हुआ बस्तर, कैसे बदली तस्वीर ? 
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा में चर्चा के दौरान बस्तर को नक्सल मुक्त होने की घोषणा की थी। इस दौरान उन्होंने कहा था, “आज बस्तर से नक्सलवाद लगभग लगभग समाप्त हो चुका है। बस्तर के अंदर हर गांव में स्कूल बनाने की मुहिम चली। बस्तर के अंदर हर गांव में राशन की दुकान खोलने की मुहिम चली। हर तहसील पंचायत में पीएससी सीएससी बने। इनके आधार कार्ड बने, राशन कार्ड बने, 5 किलो अनाज मिल रहा है। गैस के चूल्हे वितरित होते जा रहे हैं। मैं इतना ही पूछना चाहता हूं नक्सलवाद की जो लोग यहां पर वकीलात कर रहे थे उनको कि यह 70 से अब तक क्यों नहीं मिला? पूरे देश को तो 2014 में नरेन्द्र मोदी जी की सरकार आने के बाद देश के हर गरीब को घर मिला गैस मिला। शुद्ध पीने का पानी मिला। 5 लाख तक का बीमा मिला। प्रति व्यक्ति प्रतिमाह पांच किलो अनाज मुफ्त मिला। ये बस्तर वाले क्यों छूट गए थे? मैं इसलिए कहना चाहता हूं मान्यवर कि सत्य को झुठलाया जा रहा है। ये बस्तर वाले इसलिए छूट गए थे कि वहां लाल आतंक का परछाया था इसलिए वहां विकास नहीं पहुंचा था। आज परछाई हट गई है और बस्तर विकसित हो रहा है।”

बस्तर को नक्सल मुक्त बनाने में कुछ तिथियों का बड़ा महत्व- अमित शाह
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह प्वाइंट जीरो यानी बस्तर का दौरा किया। उन्होंने नक्सल विरोधी अभियान का मार्गदर्शन किया। उन्होंने बस्तर में कहा कि हम सबके लिए यह बड़ा आनंद का विषय है कि बस्तर नक्सल मुक्त हो गया है। मित्रों, इसमें कुछ तिथियों का बहुत बड़ा महत्व है,

  • ” पहली तिथि दिसंबर 2023 : यहां भाजपा सरकार बनने के तुरंत बाद हमने बस्तर में बचे हुए नक्सलवाद को समाप्त करने के लिए फिर से कवायद की।
  • दूसरी तिथि 24 अगस्त 2024 : जब सभी राज्यों की डीजी की बैठक करने के बाद यह घोषणा की गई कि 31 मार्च 2026 को यह देश को हम नक्सलवाद के आतंक से मुक्त कर देंगे।
  • तीसरी तिथि 31 मार्च 2026 : सुरक्षा बलों के पराक्रम साहस और उनके बलिदान के कारण 31 मार्च 2026 की जो तिथि तय हुई थी उसके पहले देश से नक्सलवाद का संपूर्ण उन्मूलन हो चुका है।
  • और चौथी तिथि 19 मई 2026 : इसका भी बहुत महत्व है। क्योंकि 19 मई 2026 की यह तिथि है कि जहां से नक्सल प्रभावी क्षेत्र में संपूर्ण विकास की परिकल्पना को लॉन्च किया जा रहा है।”

मैं राजनीति के अंदर संवेदनशीलता के साथ काम करने वाल व्यक्ति-अमित शाह
बस्तर दौरे के समय केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था, “आज नेतानार गांव में जब शहीद गुंडादूर के नाम से वीर शहीद गुंडादूर सेवा डेरा का उद्घाटन किया, वहां आदिवासी भाइयों और बहनों के चेहरे पर आशा की किरण देखी। मैं राजनीति के अंदर संवेदनशीलता के साथ काम करने वाल व्यक्ति हूं। लाखों की सभा में भाषण देकर जितना आत्मसंतोष नहीं मिलता है, उससे भी ज्यादा आत्मसंतोष मुझे आज नेतानार गांव के 400 भाइयों और बहनों के बीच मिला है। एक बच्ची के मुंह से “हम बच गए” ये वाक्य चलते चलते सुनकर कितना आनंद होता है, जिसका शब्दों में वर्णनन करना बहुत कठिन है।”

भारत में अब नक्सल हिंसा प्रभावित जिले नहीं हैं: गृह मंत्रालय
देश के आंतरिक सुरक्षा इतिहास में 15 अप्रैल 2026 ऐतिहासिक तारीख के रूप में दर्ज हो गई। केंद्रीय गृह मंत्रालय (एमएचए) ने नौ राज्यों को आधिकारिक पत्र भेजकर सूचित किया कि देश में अब कोई भी जिला नक्सल हिंसा प्रभावित श्रेणी में नहीं है। 1967 में पश्चिम बंगाल की नक्सलबाड़ी से शुरू हुए सशस्त्र विद्रोह के साये से भारत आधिकारिक तौर पर बाहर निकल आया है। गृह मंत्रालय ने कहा, देश का नक्सल हिंसा से मुक्त होना ऐतिहासिक उपलब्धि है, जो केंद्र और राज्यों के निरंतर समन्वय से संभव हुई है। मंत्रालय के अनुसार अब किसी भी जिले को नक्सल प्रभावित नहीं माना जाएगा।

हालांकि, सुरक्षा और विकास की निरंतरता बनाए रखने के लिए नई व्यवस्था लागू की गई है। छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड समेत विभिन्न राज्यों के 37 जिलों को इस श्रेणी में रखा गया है। ये क्षेत्र हिंसा मुक्त हैं, पर यहां पुनः विद्रोह पनपने से रोकने के लिए विकास कार्यों को गति दी जाएगी। झारखंड का पश्चिमी सिंहभूम देश का एकमात्र ऐसा जिला घोषित किया गया है, जहां कैडर समाप्त हो चुके हैं, लेकिन भविष्य की सुरक्षा के लिहाज से निगरानी जरूरी है।

मारे गए 30 से अधिक नक्सलवादी, गिरफ्तारियों और आत्मसमर्पणों में तेज़ वृद्धि
ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट, ऑपरेशन ऑक्टोपस, ऑपरेशन डबल बुल, ऑपरेशन थंडरस्टॉर्म, ऑपरेशन भीमबर्ग और ऑपरेशन चक्रबंधा सहित सिलसिलेवार और समन्वित अभियानों ने प्रभावित क्षेत्रों में माओवादी नेटवर्क को काफी कमजोर कर दिया। इनमें से ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट एक महत्वपूर्ण सफलता के रूप में उभरा, जिसने एक प्रमुख माओवादी गढ़ को ध्वस्त किया, जिसमें 30 से अधिक माओवादियों के मारे जाने की सूचना मिली, तथा इसके परिणामस्वरूप गिरफ्तारियों और इनामी नक्सलियों के आत्मसमर्पणों में तेज़ वृद्धि हुई। ऑपरेशन डबल बुल के परिणामस्वरूप गुमला, लोहरदगा और लातेहार जिले नक्सल-मुक्त घोषित हुए। सम्मिलित रूप से, इन अभियानों ने लंबे समय से प्रभावित क्षेत्रों में सरकार की उपस्थिति को पुनः स्थापित किया, उग्रवादी प्रभाव को कम किया और बेहतर सुरक्षा, सुशासन तथा विकासात्मक पहलों के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ तैयार कीं।

2004 से 2014 तक का दशक नक्सलवाद के इतिहास का सबसे हिंसक दौर
वामपंथी उग्रवाद (नक्सलवाद) की शुरुआत वर्ष 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी विद्रोह से हुई, जो माओवादी विचारधारा और सशस्त्र क्रांति के सिद्धांत से प्रेरित था। इसका मार्गदर्शक सिद्धांत सरल और हिंसक था : सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। नक्सलियों के लगभग 92 प्रतिशत हथियार सीधे पुलिस के शस्त्रागारों से लूटे गए थे। समय के साथ, 2004 में कई उग्रवादी संगठनों का सीपीआई (माओवादी) में विलय हो गया, जिससे यह भारत की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती बन गया। वर्ष 2004 से वर्ष 2014 तक का दशक वामपंथी उग्रवाद के इतिहास का सबसे हिंसक दौर था। वर्ष 2010 में हिंसा अपने चरम पर थी, जब एक ही साल में 1,936 घटनाएं और 720 नागरिकों की मौते दर्ज की गईं। पूरे दशक में 17,542 हिंसक घटनाएं हुईं, सुरक्षा बलों के 1,913 जवान शहीद हुए और 5,019 नागरिकों ने अपनी जान गंवाई।

पी. चिदंबरम- नक्सलियों से हथियार डालने के लिए नहीं कहेंगे, क्योंकि वे ऐसा नहीं करेंगे
कांग्रेस के राज में नक्सलवादी घटनाएं बढ़ रही थी। सरकार इन पर काबू पाने में नाकाम साबित हो रही थी। कांग्रेस सरकार की ढुलमुल नीति और निश्चय की कमी ने इस समस्या को देश की आंतरिक सुरक्ष के लिए काफी गंभीर बना दिया था। तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने वर्ष 2009-2010 के दौरान नक्सलियों/माओवादियों के संदर्भ में यह कहा था कि यदि वे हिंसा का रास्ता छोड़ दें (हिंसा रोक दें), तो सरकार उनसे किसी भी मुद्दे पर बातचीत करने के लिए तैयार है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि वे उनसे तुरंत हथियार डालने के लिए नहीं कह रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि वे ऐसा नहीं करेंगे, बल्कि उनकी मुख्य शर्त हिंसा और रक्तपात को रोकने की थी।

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