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बिहार विधानसभा भवन का शताब्दी उत्सव और देश की आजादी का अमृत महोत्सव एक ही समय होना संयोग नहीं बल्कि सार्थक संदेश है : पीएम मोदी  

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज यानि मंगलवार को बिहार विधानसभा शताब्दी समारोह के समापन कार्यक्रम के दौरान शताब्दी स्मृति स्तंभ का लोकार्पण किया। इस अवसर पर अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा कि बिहार विधानसभा का अपना एक इतिहास रहा है और यहां विधानसभा भवन में एक से एक, बड़े और साहसिक निर्णय लिए गए हैं। पीएम मोदी ने कहा कि बिहार विधानसभा भवन का ये शताब्दी उत्सव एक ऐसे समय में हो रहा है जब देश अपनी आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। विधानसभा भवन के 100 साल और देश की आज़ादी के 75 साल, ये केवल समय का संयोग नहीं है। इस संयोग का साझा अतीत भी है, और सार्थक संदेश भी हैं। एक ओर बिहार में चंपारण सत्याग्रह जैसे आंदोलन हुए तो वहीं इस धरती ने भारत को लोकतन्त्र के संस्कार और आदर्श पर चलने का रास्ता भी दिखाया। दशकों से हमें ये बताने की कोशिश होती रही है कि भारत को लोकतन्त्र विदेशी हुकूमत और विदेशी सोच के कारण मिला है। आजादी के पहले इसी विधानसभा से गवर्नर सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा जी ने स्वदेशी उद्योगों को प्रोत्साहित करने, स्वदेशी चरखा को अपनाने की अपील की थी। आज़ादी के बाद इसी विधानसभा में जमींदारी उन्मूलन अधिनियम पास हुआ।

कई महान व्यक्तित्वों की आवाज का साक्षी है यह परिसर

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आज जब मैं आपसे इस परिसर में, विधानसभा भवन के बारे में बात कर रहा हूं, तो ये भी सोच रहा हूं कि बीते 100 वर्ष में ये भवन, ये परिसर कितने ही महान व्यक्तित्वों की आवाज का साक्षी रहा है। मैं नाम लेने लगूंगा तो समय कम पड़ जाएगा, लेकिन इस इमारत ने इतिहास के रचयिताओं को भी देखा है और खुद भी इतिहास का निर्माण किया है। कहते हैं वाणी की ऊर्जा कभी कभी समाप्त नहीं होती।इस ऐतिहासिक भवन में कही गई बातें, बिहार के उत्थान से जुड़े संकल्प, एक ऊर्जा बनकर आज भी उपस्थित हैं। भारत में लोकतन्त्र की अवधारणा उतनी ही प्राचीन है जितना प्राचीन ये राष्ट्र है, जितनी प्राचीन हमारी संस्कृति है।

इस भवन से बिहार की चेतना जुड़ी है

प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार की अतीत और गौरव की चर्चा करते हुए कहा कि इस भवन के इतिहास से बिहार की वो चेतना जुड़ी है जिसने गुलामी के कालखंड में भी अपने जनतांत्रिक मूल्यों को समाप्त नहीं होने दिया। इसके निर्माण के साथ और उसके बाद जो घटनाक्रम जुड़ा हुआ है, वो हमें बार-बार याद करना चाहिए। किस तरह ‘श्रीकृष्ण सिंह जी ने, श्री बाबू’ ने अंग्रेजों के सामने शर्त रखी थी कि वो सरकार तभी बनाएंगे जब ब्रिटिश हुकूमत निर्वाचित सरकार के कामकाज में दखल नहीं देगी। कैसे द्वितीय विश्व युद्ध में भारत की सहमति के बिना देश को झोंकने के खिलाफ श्री बाबू जी की सरकार ने इस्तीफा दे दिया, ये आप सभी भली-भांति जानते हैं। इस घटनाक्रम ने सदैव इस संदेश का संचार किया कि बिहार, लोकतंत्र के खिलाफ कभी कुछ स्वीकार नहीं कर सकता।

21वीं सदी में तेजी से बदल रही है दुनिया

लोकतंत्र और आजादी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आजादी का अमृत महोत्सव और बिहार विधानसभा के 100 वर्ष का ये ऐतिहासिक अवसर हम सभी के लिए, प्रत्येक जनप्रतिनिधि के लिए आत्म-विवेचना और आत्मनिरीक्षण का भी संदेश लेकर आया है। हम अपने लोकतन्त्र को जितना मजबूत करेंगे, उतनी ही मजबूती हमारी आज़ादी को मिलेगी, हमारे अधिकारों को मिलेगी। आज 21वीं सदी में दुनिया तेजी से बदल रही है। नई जरूरतों के हिसाब से भारत के लोगों की, हमारे युवाओं की आशाएँ अपेक्षाएँ भी बढ़ रही हैं। हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं को इसके हिसाब से तेज गति से कार्य करना पड़ेगा। आज जब हम आज़ादी के 75वें साल में एक नए भारत के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहे हैं, तो इन संकल्पों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी हमारी संसद और विधानसभाओं पर भी है। इसके लिए हमें ईमानदारी और निष्ठा से दिन रात मेहनत करने की जरूरत है। देश के सांसद के रूप में, राज्य के विधायक के रूप में हमारी ये भी ज़िम्मेदारी है कि हम लोकतंत्र के सामने आ रही हर चुनौती को मिलकर हराएं। पक्ष विपक्ष के भेद से ऊपर उठकर, देश के लिए, देशहित के लिए हमारी आवाज़ एकजुट होनी चाहिए। जनता से जुड़े विषयों पर सदन सकारात्मक संवाद का केंद्र बने, सकारात्मक कार्यों के लिए हमारी आवाज़ उतनी ही बुलंद दिखे, इस दिशा में ही हमें निरंतर आगे बढ़ना है। हमारे आचरण से ही हमारे देश की लोकतान्त्रिक परिपक्वता प्रदर्शित होती है। इसलिए, दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र के साथ साथ हमें दुनिया के सबसे परिपक्व लोकतन्त्र के रूप में भी खुद को आगे बढ़ाना है।

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