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मोदी सरकार के 12 साल: रक्षा क्षेत्र की 24 उपलब्धियां, जिन्होंने बदली भारत की रणनीतिक ताकत

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पिछले 12 वर्षों में भारत ने अपनी रक्षा क्षमता में एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक बदलाव देखा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ के विजन ने देश को महज एक खरीदार से हटाकर दुनिया के एक बड़े रक्षा उत्पादक और भरोसेमंद कूटनीतिक साझेदार के रूप में स्थापित कर दिया है। दूरदर्शी नीतियों, रिकॉर्ड बजट निवेश और बड़े नीतिगत सुधारों की बदौलत भारतीय सेनाएं आज न केवल पहले से कहीं अधिक आधुनिक और घातक हुई हैं, बल्कि देश की रक्षा कूटनीति भी नए आयाम छू रही है।

आइए, 24 प्वाइंट में जानते हैं कि कैसे इन 12 सालों में भारत के रक्षा परिदृश्य का पूरी तरह कायाकल्प हो चुका है-

1. रक्षा क्षेत्र में बदलाव का स्वर्णिम दशक
पिछले 12 वर्षों में भारत के रक्षा क्षेत्र ने एक व्यापक और संरचनात्मक परिवर्तन देखा है। यह बदलाव केवल सैन्य उपकरणों की खरीद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नीति, उत्पादन, अनुसंधान, नवाचार, निर्यात और रक्षा कूटनीति तक फैला हुआ है। आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया के विजन के तहत रक्षा क्षेत्र को देश के औद्योगिक और तकनीकी विकास का प्रमुख आधार बनाया गया। परिणामस्वरूप भारत आज एक अधिक सक्षम, आधुनिक और आत्मविश्वासी रक्षा शक्ति के रूप में उभरा है।

2. रक्षा बजट में तीन गुना से अधिक वृद्धि
राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए रक्षा बजट को लगातार बढ़ाया गया। वित्त वर्ष 2013-14 में 2.53 लाख करोड़ रुपये का बजट 2026-27 में बढ़कर 7.85 लाख करोड़ रुपये हो गया। यह वृद्धि सैन्य आधुनिकीकरण और दीर्घकालिक क्षमता निर्माण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

3. पूंजीगत व्यय से आधुनिक सैन्य क्षमता को बल
रक्षा बजट का महत्वपूर्ण हिस्सा पूंजीगत व्यय पर केंद्रित किया गया। यह वह निवेश है जिससे नए लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, मिसाइल प्रणालियां, युद्धपोत और आधुनिक सैन्य अवसंरचना तैयार होती है। 2014-15 में 94,587 करोड़ रुपये का पूंजीगत व्यय बढ़कर 2026-27 में 2.19 लाख करोड़ रुपये हो गया। इससे सेनाओं को नई पीढ़ी की क्षमताएं मिलीं और भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयारी मजबूत हुई।

4. रक्षा उत्पादन में रिकॉर्ड विस्तार
भारत का रक्षा उत्पादन पिछले दशक में नई ऊंचाइयों पर पहुंचा। 2014-15 में जहां रक्षा उत्पादन 46,429 करोड़ रुपये था, वहीं 2025-26 में यह बढ़कर 1.78 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। यह भारत के रक्षा निर्माण क्षेत्र में आई ऐतिहासिक तेजी का प्रमाण है और दिखाता है कि देश आयात-आधारित मॉडल से उत्पादन-आधारित मॉडल की ओर बढ़ चुका है।

5. पांच साल में उत्पादन में 110 प्रतिशत से अधिक उछाल
2020-21 में रक्षा उत्पादन 84,643 करोड़ रुपये था। महज पांच वर्षों में यह बढ़कर 1.78 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इस तेज वृद्धि के पीछे सरकार की स्वदेशीकरण नीति, उद्योग जगत की भागीदारी और रक्षा विनिर्माण में बढ़ता निवेश प्रमुख कारण रहे। कुल रक्षा उत्पादन में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (DPSUs) की हिस्सेदारी जहां 76 प्रतिशत रही, जबकि निजी क्षेत्र की भागीदारी 24 प्रतिशत तक पहुंच गई। यह देश के भीतर एक बेहतरीन बिजनेस इकोसिस्टम को दर्शाता है।

6. रक्षा निर्यात में 5500 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि
भारतीय रक्षा इतिहास का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट इसका निर्यात है। वित्त वर्ष 2013-14 में जहां भारत महज 686 करोड़ रुपये का रक्षा निर्यात करता था, वहीं वित्त वर्ष 2025-26 में यह आंकड़ा रिकॉर्ड 38,424 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। यह वृद्धि भारत को रक्षा आयातक की पहचान से आगे बढ़ाकर रक्षा निर्यातक राष्ट्र के रूप में स्थापित करती है। रक्षा निर्यात में तेज वृद्धि को देखते हुए सरकार ने 2029 तक 50,000 करोड़ रुपये के निर्यात का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। यह भारत को वैश्विक रक्षा विनिर्माण और सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण केंद्र बनाने की दिशा में बड़ा कदम है।

7. दुनिया के 80 से अधिक देशों में ‘मेड इन इंडिया’ का डंका
आज भारत के स्वदेशी रक्षा उत्पादों को दुनिया भर के 80 से ज्यादा देशों में निर्यात किया जा रहा है। इसमें मिसाइल प्रणालियां, रक्षा उपकरण, प्लेटफॉर्म और विभिन्न सैन्य तकनीकें शामिल हैं। निर्यात करने वाली भारतीय कंपनियों की संख्या भी बढ़कर 145 हो गई है। यह भारतीय तकनीक, गुणवत्ता और विश्वसनीयता पर बढ़ते वैश्विक भरोसे का प्रमाण है।

8. डीएपी 2020 ने बदली रक्षा खरीद की तस्वीर
रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) 2020 ने खरीद प्रणाली को अधिक पारदर्शी, सरल और प्रभावी बनाया। इस नीति का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि स्वदेशी कंपनियों को रक्षा खरीद में अधिक अवसर मिले और घरेलू विनिर्माण को प्राथमिकता मिली। इनसे प्राइवेट सेक्टर और एमएसएमई (MSME) के लिए सेना के साथ काम करने के दरवाजे पूरी तरह खुल गए।

9. डीपीएम 2025 से बढ़ी दक्षता
रक्षा खरीद नियमावली (DPM) 2025 ने प्रक्रियाओं को और अधिक व्यवस्थित किया। इससे खरीद निर्णयों में तेजी आई और रक्षा परियोजनाओं के क्रियान्वयन में सुधार हुआ। इस सुधार ने उद्योग जगत और रक्षा प्रतिष्ठानों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया।

10. स्वदेशीकरण सूचियों ने आयात पर निर्भरता घटाई
सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियों के जरिए अनेक रक्षा उपकरणों और प्रणालियों के आयात पर रोक लगाई गई। इससे भारतीय उद्योगों को घरेलू स्तर पर उत्पादन के अवसर मिले और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिला। रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत डीआरडीओ द्वारा डिजाइन और भारतीय उद्योगों द्वारा निर्मित 6 लाख करोड़ रुपये से अधिक की प्रणालियों को मंजूरी दी है, जिसमें 97 तेजस लड़ाकू विमान और 156 प्रचंड हेलीकॉप्टर शामिल हैं।

11. अनुसंधान एवं विकास पर दोगुने से अधिक निवेश
देश के भीतर अत्याधुनिक सैन्य तकनीकों को विकसित करने के लिए आरएंडडी (R&D) बजट को 112 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ाया गया है। यह आवंटन वित्त वर्ष 2014-15 के 13,716.14 करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2026-27 में 29,100.25 करोड़ रुपये के पार पहुंच चुका है। यह भविष्य की तकनीकों, उन्नत हथियार प्रणालियों और स्वदेशी अनुसंधान को गति देने के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ।

12. आरएंडडी में स्टार्टअप्स और उद्योगों की एंट्री
नवाचार को बढ़ावा देने के लिए साल 2022-23 में सरकार ने एक क्रांतिकारी फैसला लेते हुए रक्षा अनुसंधान बजट का 25 प्रतिशत हिस्सा निजी उद्योगों, स्टार्टअप्स और शिक्षण संस्थानों के लिए खोल दिया, जिस पर साल 2024 में 1,757 करोड़ रुपये खर्च भी किए गए। इस कदम ने रक्षा अनुसंधान को केवल सरकारी प्रयोगशालाओं तक सीमित न रखकर एक सहयोगात्मक मॉडल में बदल दिया। इससे रक्षा अनुसंधान का दायरा बढ़ा और नवाचार को नई गति मिली।

13. आईडेक्स बना रक्षा नवाचार का इंजन
रक्षा उत्कृष्टता के लिए नवाचार (iDEX) कार्यक्रम ने स्टार्टअप्स और एमएसएमई को रक्षा क्षेत्र से जोड़ने का बड़ा काम किया। मार्च 2026 तक 676 स्टार्टअप्स और नवोन्मेषक इस पहल से जुड़े, जबकि 551 डिजाइन एवं विकास अनुबंधों पर हस्ताक्षर हुए। इस योजना ने देश के छोटे-छोटे नवोन्मेषकों और एमएसएमई को सेना की जरूरतों के लिए सीधे उन्नत डिजाइन तैयार करने का शानदार मंच दिया है।

14. अदिति योजना से भविष्य की तकनीकों को बढ़ावा
नवाचार की सफलता को और आगे ले जाते हुए अदिति योजना के लिए 750 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया। इसका उद्देश्य उभरती और अत्याधुनिक रक्षा तकनीकों को विकसित करना है। यह योजना भविष्य के युद्धक्षेत्र की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।

15. डीआरडीओ ने निभाई परिवर्तन की केंद्रीय भूमिका
स्वदेशी तकनीकों के परीक्षण को पारदर्शी बनाने के लिए रक्षा मंत्रालय ने स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) तैयार किए हैं। इसके तहत डीआरडीओ ने उन्नत तकनीकों के विकास, परीक्षण और उद्योगों के साथ साझेदारी में महत्वपूर्ण योगदान दिया। डीआरडीओ की 24 प्रयोगशालाओं के विश्वस्तरीय परीक्षण अवसंरचना को ‘डिफेंस टेस्टिंग पोर्टल’ पर लाइव करके स्टार्टअप्स के लिए सुलभ बना दिया गया है। 24 प्रयोगशालाओं की परीक्षण सुविधाएं निजी उद्योगों और स्टार्टअप्स के लिए खोलना इसी दिशा का बड़ा कदम रहा।

16. डीआईए-सीओई (DIA-COE) का मजबूत नेटवर्क
देशभर के शिक्षण संस्थानों और उद्योगों के साथ मिलकर भविष्य की तकनीक विकसित करने के लिए 15 ‘डीआरडीओ इंडस्ट्री-एकेडेमिया सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ स्थापित किए गए हैं। ये केंद्र लगभग 82 चिह्नित संवेदनशील क्षेत्रों में ट्रांसलेशनल रिसर्च को आगे बढ़ा रहे हैं। तकनीकी आत्मनिर्भरता के लिए डीआरडीओ ने पांच ‘यंग साइंटिस्ट्स लैबोरेटरीज’ बनाई हैं और छठी 2026 में प्रस्तावित है। इसके साथ ही हर साल 3,500 से अधिक इंजीनियर्स को पेड अप्रेंटिसशिप और इंटर्नशिप के जरिए देश के रक्षा तंत्र से सीधे जोड़ा जा रहा है।

17. डीसीपीपी मॉडल से उद्योगों को नई ताकत
डीआरडीओ ने निजी उद्योगों को साथ लेकर चलने के लिए डीसीपीपी मॉडल अपनाया है। मार्च 2026 तक 134 कंपनियां प्रोडक्शन एजेंसी के रूप में जुड़ चुकी हैं, 2,180 तकनीकी हस्तांतरण समझौते हुए हैं। इसके अलावा 2,780 से अधिक बौद्धिक संपदा अधिकार भारतीय उद्योगों को उपलब्ध कराए गए, जिससे उत्पादन क्षमता में तेजी आई।

18. टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड बना गेमचेंजर
टीडीएफ योजना के तहत स्टार्टअप्स और एमएसएमई को प्रति परियोजना 50 करोड़ रुपये तक की सहायता दी जा रही है। इस वित्तीय सहायता देने वाले टीडीएफ के बजट में 500 करोड़ रुपये का अतिरिक्त इजाफा किया गया है। जून 2026 तक इस योजना के तहत 334 करोड़ रुपये की लागत वाली 80 महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर तेजी से काम चल रहा है। इस योजना ने डीप-टेक और रक्षा स्टार्टअप्स को नई ऊर्जा दी।

19. रक्षा उद्योग का अभूतपूर्व विस्तार
आज भारत में 16 रक्षा सार्वजनिक उपक्रम, लगभग 500 लाइसेंस प्राप्त रक्षा कंपनियां और 17,000 से अधिक एमएसएमई रक्षा इकोसिस्टम का हिस्सा हैं। 2015 में 258 रक्षा लाइसेंस थे, जो 2026 तक बढ़कर 834 हो गए। यह रक्षा विनिर्माण के लोकतंत्रीकरण और निजी भागीदारी की सफलता को दर्शाता है।

20. रक्षा औद्योगिक गलियारों से मिला नया आधार
उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु रक्षा औद्योगिक कॉरिडोर ने क्षेत्रीय औद्योगिक विकास को नई गति दी। क्षेत्रीय विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए बने दोनों डिफेंस कॉरिडोर्स निवेश के नए हब बन गए हैं। अप्रैल 2026 तक उत्तर प्रदेश कॉरिडोर में 42,057 करोड़ रुपये और तमिलनाडु कॉरिडोर में 32,699 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव आकर्षित हुए, जिससे लाखों रोजगार पैदा हो रहे हैं।

21. अंतरिक्ष और मिसाइल शक्ति में ऐतिहासिक छलांग
27 मार्च 2019 को भारत ने मिशन शक्ति के जरिए एंटी-सैटेलाइट क्षमता का सफल प्रदर्शन किया। इसके साथ भारत उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल हो गया जो अंतरिक्ष में दुश्मन उपग्रहों को निष्क्रिय करने की क्षमता रखते हैं। भारत ने मार्च 2024 में ‘मिशन दिव्यास्त्र’ के तहत मल्टीपल वॉरहेड मिसाइल का सफल परीक्षण किया। वहीं जनवरी 2026 में डीआरडीओ ने स्क्रैमजेट कंबस्टर का सफल ग्राउंड टेस्ट कर हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक में बड़ी बढ़त हासिल की है।

22. AI से हाइपरसोनिक तक, भविष्य की जंग की तैयारी
भारत ने रक्षा क्षेत्र के लिए 75 एआई आधारित तकनीकों का विकास किया है। इनमें निगरानी, साइबर सुरक्षा, लॉजिस्टिक्स और युद्धक्षेत्र सहायता जैसी क्षमताएं शामिल हैं। हैदराबाद में स्थापित हाइपरसोनिक विंड टनल सुविधा और अगली पीढ़ी की मिसाइल प्रणालियां भविष्य की सैन्य तकनीकों में भारत की बढ़ती क्षमता को दर्शाती हैं।

23. स्वदेशी प्लेटफॉर्म बने आत्मनिर्भरता के प्रतीक
वायुसेना की रीढ़ बन चुके स्वदेशी तेजस लड़ाकू विमान, प्रचंड हेलीकॉप्टर, अर्जुन एमके-1ए टैंक, आकाश मिसाइल प्रणाली, ब्रह्मोस मिसाइल और एंटी-ड्रोन सिस्टम जैसे प्लेटफॉर्म भारत की बढ़ती रक्षा क्षमता के प्रतीक बनकर उभरे हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इन स्वदेशी प्रणालियों ने परिचालन क्षमता को मजबूत समर्थन प्रदान किया। साथ ही 75 से ज्यादा एआई (AI) आधारित मिलिट्री प्रणालियां तैनात की गईं।

24. रक्षा कूटनीति से बढ़ी भारत की वैश्विक ताकत
पिछले दशक में भारत की रक्षा कूटनीति ने नई ऊंचाइयां हासिल कीं। अमेरिका के साथ LEMOA, COMCASA और BECA जैसे समझौतों ने सामरिक सहयोग को मजबूत किया। फ्रांस के साथ राफेल विमानों और स्कॉर्पीन पनडुब्बियों पर सहयोग बढ़ा, जबकि रूस के साथ एस-400 प्रणाली और सैन्य-तकनीकी साझेदारी जारी रही। जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूएई के साथ रक्षा संबंधों को नई दिशा मिली। क्वाड, एससीओ, एडीएमएम-प्लस और हिंद-प्रशांत सहयोग के मंचों पर भारत की सक्रिय भूमिका ने उसे एक विश्वसनीय सुरक्षा साझेदार और क्षेत्रीय स्थिरता के महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में स्थापित किया।

पिछले 12 वर्षों की रक्षा यात्रा केवल सैन्य आधुनिकीकरण की कहानी नहीं है। यह उस भारत की कहानी है जिसने आत्मनिर्भरता को नीति, नवाचार को शक्ति और साझेदारी को रणनीतिक अवसर में बदला। रक्षा बजट में वृद्धि, रिकॉर्ड उत्पादन, तेजी से बढ़ते निर्यात, स्टार्टअप्स की भागीदारी, अत्याधुनिक तकनीकों का विकास और वैश्विक रक्षा कूटनीति—इन सभी ने मिलकर एक ऐसे रक्षा इकोसिस्टम की नींव रखी है जो विकसित भारत 2047 के सपने को सुरक्षा, सामर्थ्य और आत्मविश्वास प्रदान करेगा। आज भारत केवल वैश्विक सुरक्षा परिवर्तनों पर प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं, बल्कि उन्हें आकार देने वाली एक उभरती हुई रणनीतिक शक्ति के रूप में सामने आ रहा है।

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