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संसाधनों की नहीं, भरोसे की कमी से जूझ रही है दुनिया; संकट में तकनीक को हथियार बनाना बंद करें देश: पीएम मोदी

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ्रांस के एवियन में आयोजित जी7 शिखर सम्मेलन के आउटरीच सत्र में वैश्विक समुदाय को एक मजबूत संदेश देते हुए कहा कि आज दुनिया संसाधनों की कमी से नहीं, बल्कि भरोसे की कमी से जूझ रही है। ‘नई साझेदारियां बनाना और अंतरराष्ट्रीय एकजुटता को फिर से कायम करना’ विषय पर आयोजित सत्र में उन्होंने कहा कि कुछ देश अपने संकीर्ण हितों के लिए व्यापार, तकनीक और सप्लाई चेन का हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे वैश्विक स्तर पर भरोसा कमजोर हो रहा है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि आज का विश्व पहले से कहीं अधिक आपस में जुड़ा हुआ और एक-दूसरे पर निर्भर है। किसी भी देश की ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि अब केवल उसकी सीमाओं के भीतर तय नहीं होती। डेटा, पूंजी, तकनीक और लोगों की आवाजाही ने पूरी दुनिया को एक-दूसरे से जोड़ दिया है।

उन्होंने कहा कि ऐसे दौर में अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों का महत्व स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है, लेकिन कोई भी साझेदारी तभी सफल हो सकती है जब उसके केंद्र में विश्वास हो। प्रधानमंत्री ने कहा कि आज दुनिया की सबसे बड़ी रणनीतिक संपत्ति कोई खनिज, तकनीक या बाजार नहीं, बल्कि देशों के बीच का आपसी भरोसा है।

उन्होंने कहा कि दुनिया में इस बात को लेकर एक साझा भरोसा होना चाहिए कि तकनीक और सप्लाई चेन का इस्तेमाल मानवता के कल्याण के लिए किया जाएगा, न कि इन्हें किसी के खिलाफ आर्थिक या राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाएगा। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि विकास के अवसर कुछ देशों तक सीमित नहीं रहने चाहिए और वैश्विक संस्थानों को सभी देशों की आकांक्षाओं को पूरा करने में सक्षम बनना होगा।

प्रधानमंत्री ने कहा कि पिछली सदी में दो विश्व युद्धों की त्रासदी झेलने के बाद दुनिया ने शांति, स्थिरता और समृद्धि के लिए कई वैश्विक व्यवस्थाएं विकसित की थीं, जिनकी नींव विश्वास पर टिकी थी। लेकिन कई दशकों की मेहनत से तैयार किए गए इसी भरोसे को आज लगातार चोट पहुंचाई जा रही है।

उन्होंने वैश्विक महामारी का उदाहरण देते हुए कहा कि कोविड-19 के संकट ने पूरी दुनिया को एक कड़वा आईना दिखाया है। उस दौरान यह साफ हो गया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए जाने वाले एकजुटता और भरोसे के बड़े-बड़े दावे जमीनी स्तर पर कितने खोखले थे। प्रधानमंत्री ने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रोनल्ड रेगन के प्रसिद्ध कथन ‘ट्रस्ट बट वेरीफाई’ (भरोसा करो लेकिन जांचो) को आज के समय में भी बेहद प्रासंगिक बताया। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारा यह बड़ा दायित्व है कि हम इस नए युग की चुनौतियों के हिसाब से एक भरोसेमंद और नियमों पर आधारित वैश्विक व्यवस्था का निर्माण करें।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत ने हमेशा दुनिया को एक परिवार के रूप में देखा है और उसके सभी प्रयास ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ के सिद्धांत पर आधारित रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत का अनुभव बताता है कि विकास तभी सबसे प्रभावी होता है जब वह लोगों की आकांक्षाओं से जुड़ा होता है। उन्होंने बताया कि इसी सोच के साथ भारत ने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन, आपदा प्रतिरोधी बुनियादी ढांचा गठबंधन, ग्लोबल बायोफ्यूल्स अलायंस, मिशन लाइफ और ‘एक पेड़ मां के नाम’ जैसी वैश्विक पहलों को आगे बढ़ाया है। उनका उद्देश्य केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी मानवता का कल्याण है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि संकट के समय भारत ने हमेशा एक जिम्मेदार साझेदार और ‘फर्स्ट रेस्पॉन्डर’ की भूमिका निभाई है। कोविड महामारी के दौरान भारत ने 150 से अधिक देशों को दवाइयां और वैक्सीन उपलब्ध कराईं। इसके अलावा श्रीलंका में चक्रवात, अफगानिस्तान में भूकंप, मोजाम्बिक में बाढ़ और क्यूबा-जमैका में आए तूफानों के दौरान भी भारत ने ‘ह्यूमैनिटी फर्स्ट’ के सिद्धांत पर काम करते हुए सहायता पहुंचाई।

उन्होंने कहा कि भारत की विकास साझेदारियों का उद्देश्य किसी पर निर्भरता बढ़ाना नहीं, बल्कि भागीदार देशों को आत्मनिर्भर और सक्षम बनाना है। भारत क्षमता निर्माण और कौशल विकास को प्राथमिकता देता है। प्रधानमंत्री ने कहा कि किसी भी साझेदारी की असली परीक्षा इस बात में है कि हम दूसरों को अपने पैरों पर खड़ा होने में कितना सक्षम बनाते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने जी7 मंच से ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूती से उठाया। उन्होंने कहा कि विकासशील देशों को दुनिया से सहारे की नहीं, बल्कि साझेदारी की जरूरत है। वे वैश्विक विकास के लाभार्थी नहीं, बल्कि उसके बराबरी के भागीदार बनना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि अब दुनिया को दाता और प्राप्तकर्ता की पुरानी सोच से आगे बढ़ना होगा। सभी देशों को समान साझेदार के रूप में मिलकर काम करना चाहिए। विकासशील देशों के साथ आगे-पीछे नहीं, बल्कि कंधे से कंधा मिलाकर चलना होगा। साझेदारी को निर्भरता नहीं, बल्कि सम्मान और गरिमा से जोड़ना होगा।

वैश्विक संघर्षों और युद्धों पर चिंता जताते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जारी तनावों का स्थायी समाधान केवल संवाद, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए ही निकाला जा सकता है। उन्होंने पश्चिम एशिया में शांति प्रयासों में हुई प्रगति का स्वागत किया और उम्मीद जताई कि इससे क्षेत्र में स्थिरता आएगी।

प्रधानमंत्री ने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्षों से कई देशों को जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा है। होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री व्यापार प्रभावित होने से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा है। उन्होंने भारतीय नागरिकों की मौत पर भी दुख जताया और कहा कि वैश्विक समुद्री व्यापार को जोड़ने वाले नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना पूरी दुनिया की सामूहिक जिम्मेदारी है।

अपने संबोधन के अंत में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत भरोसे, साझेदारी और वैश्विक सहयोग को मजबूत करने के लिए सभी देशों के साथ मिलकर काम करने को तैयार है। उन्होंने कहा कि शांति, स्थिरता और सतत विकास का भविष्य केवल विश्वास और सहयोग की मजबूत नींव पर ही निर्मित किया जा सकता है।

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