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कांग्रेस की 10 साल की नाकामी पर भारी मोदी डिप्लोमेसी, ऑस्ट्रेलिया से ऐतिहासिक यूरेनियम डील

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वैश्विक कूटनीति (Global Diplomacy) ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारत के हक में नया इतिहास रच दिया है। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुआ ऐतिहासिक यूरेनियम सप्लाई समझौता पीएम मोदी की रणनीतिक सोच, दूरदर्शिता और मजबूत विदेश नीति का एक बेजोड़ उदाहरण है। यह वही ऑस्ट्रेलिया है, जिसने साल 2010 में कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के दौरान भारत को रणनीतिक ईंधन यानी यूरेनियम देने से साफ इनकार कर दिया था। उस वक्त भारत द्वारा परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर न करने का तकनीकी हवाला देकर तत्कालीन ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया था, जिससे देश का न्यूक्लियर प्रोग्राम लंबे समय तक कूटनीतिक बेरुखी का शिकार रहा।

साल 2014 के बाद वैश्विक परिदृश्य पर उभरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी व्यक्तिगत केमिस्ट्री, दृढ़ कूटनीतिक कौशल और ‘नेशन फर्स्ट’ के संकल्प से दशकों पुराने इस गतिरोध को हमेशा के लिए खत्म कर दिया। पीएम मोदी ने अपनी प्रभावशाली डिप्लोमेसी के जरिए ऑस्ट्रेलिया को यह भरोसा दिलाया कि भारत एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति है। इस बेहद सफल कूटनीतिक प्रयास के परिणामस्वरूप हुए नए समझौते के तहत अब ऑस्ट्रेलिया से बड़े पैमाने पर भारत को शांतिपूर्ण और असैन्य कार्यों (Civilian Nuclear Program) के लिए लंबे समय तक निर्बाध यूरेनियम का निर्यात किया जा सकेगा, जो भारत के भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़ बनेगा।

यह ऐतिहासिक समझौता भारत के क्लीन एनर्जी (स्वच्छ ऊर्जा) लक्ष्यों और ‘विकसित भारत 2047’ के भव्य विजन को साकार करने के लिए एक बड़ा गेम-चेंजर साबित होने वाला है। दुनिया का लगभग 28 प्रतिशत यूरेनियम भंडार अकेले ऑस्ट्रेलिया के सीने में दफन है, जिस पर अब भारत का कूटनीतिक हक मजबूत हुआ है। भारत ने साल 2047 तक 100 गीगावाट न्यूक्लियर पावर क्षमता स्थापित करने का एक बेहद महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है, ताकि देश के करीब 6-7 करोड़ भारतीय परिवारों और उद्योगों को चौबीसों घंटे निर्बाध और प्रदूषण मुक्त बिजली की सप्लाई सुनिश्चित की जा सके।

कांग्रेस शासन के दौरान जहां भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परमाणु ईंधन के लिए कड़े प्रतिबंधों, कूटनीतिक असफलताओं और वैश्विक अलगाव का सामना कर रहा था, वहीं मोदी सरकार ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के कड़े सुरक्षा मानकों के दायरे में रहते हुए ऑस्ट्रेलिया को इस ऐतिहासिक डील के लिए राजी कर लिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलियाई पीएम एंथनी अल्बनीज की इस साझा व ऐतिहासिक पहल ने न केवल भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता का रास्ता साफ किया है, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत के बढ़ते दबदबे, कूटनीतिक संप्रभुता और महाशक्ति के रूप में उभरते कद को भी पूरी दुनिया के सामने मजबूती से साबित कर दिया है।

चाबहार पोर्ट: जो काम 10 साल में कांग्रेस नहीं कर पाई, उसे मोदी सरकार ने कर दिखाया
कांग्रेस की नाकामी (फाइलों में अटका प्रोजेक्ट): ईरान का रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह (Chabahar Port) भारत के लिए लंबे समय से गेम-चेंजर माना जा रहा था। साल 2012 में कांग्रेस सरकार के दौरान इस पर कुछ त्रिपक्षीय बैठकें भी हुई थीं, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के कड़े रुख के डर, फंड की कमी और कूटनीतिक इच्छाशक्ति के भारी अभाव के कारण कांग्रेस के 10 सालों के शासन में यह प्रोजेक्ट कभी फाइलों से बाहर नहीं निकल पाया। कांग्रेस सरकार की इस हिचकिचाहट के चलते यह प्रोजेक्ट बरसों तक अधर में लटका रहा, जिससे भारत मध्य एशिया में अपनी मजबूत रणनीतिक पहुंच बनाने से चूकता रहा।

पीएम मोदी ने किया संभव: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक दबावों और अमेरिका के कड़े प्रतिबंधों की धमकियों की परवाह न करते हुए अपनी स्वतंत्र और मजबूत कूटनीति का परिचय दिया। पीएम मोदी की दृढ़ इच्छाशक्ति के चलते भारत ने ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह के संचालन के लिए 10 साल का ऐतिहासिक दीर्घकालिक समझौता हासिल कर दिखाया। मोदी सरकार ने इस प्रोजेक्ट को अमलीजामा पहनाकर पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट और चीन के ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (घेरेबंदी की नीति) को सीधी चुनौती दी है। यह कूटनीतिक जीत अब भारत को पाकिस्तान को बाईपास करते हुए मध्य एशिया, अफगानिस्तान और यूरोप तक सीधे व्यापार का एक नया, सुरक्षित और स्वतंत्र कॉरिडोर प्रदान करती है।

41 साल पुराना भारत-बांग्लादेश सीमा विवाद सुलझा, जो कांग्रेस के लिए था ‘नामुमकिन’
कांग्रेस की कूटनीतिक नाकामी: भारत और बांग्लादेश के बीच एन्क्लेव (Enclaves) की अदला-बदली और सीमा विवाद का मुद्दा 1974 के ‘मुजीब-इंदिरा समझौते’ के समय से लंबित था। मनमोहन सिंह सरकार ने साल 2011 में इस दिशा में आगे बढ़ने की कोशिश की और ढाका का दौरा भी किया, लेकिन कूटनीतिक सूझबूझ की कमी और घरेलू राजनीति में आम सहमति न बना पाने के कारण कांग्रेस इस ऐतिहासिक विधेयक को संसद से पास कराना तो दूर, पेश तक नहीं करा सकी। कांग्रेस की इस कूटनीतिक बेरुखी के कारण दोनों देशों के रिश्ते सालों तक अधर में लटके रहे और सीमावर्ती इलाकों में सुरक्षा व घुसपैठ की गंभीर चुनौतियां बनी रहीं।

पीएम मोदी की कूटनीतिक महारत: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2014 में सत्ता संभालते ही अपनी ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति के तहत इस दशकों पुराने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे को प्राथमिकता दी। पीएम मोदी ने अपनी मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए न केवल मुख्य विपक्षी दलों को राजी किया, बल्कि ममता बनर्जी सहित सीमावर्ती राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भी कूटनीतिक विश्वास में लिया। नतीजा यह हुआ कि साल 2015 में संसद के दोनों सदनों ने सर्वसम्मति से 119वां संविधान संशोधन विधेयक पारित कर दिया। इस ऐतिहासिक समझौते के तहत 41 साल पुराना जटिल सीमा विवाद हमेशा के लिए सुलझ गया, करीब 50 हजार से अधिक बेघर लोगों को नागरिकता मिली और भारत-बांग्लादेश संबंधों में एक नए स्वर्णिम अध्याय की शुरुआत हुई। इसे आज वैश्विक कूटनीति (Global Diplomacy) के इतिहास में सीमाओं के शांतिपूर्ण पुनर्निर्धारण की सबसे बड़ी मिसाल माना जाता है।

फ्रांस के साथ ‘मेक इन इंडिया’ राफेल फाइटर जेट डील: वायुसेना की दशकों पुरानी कमी दूर हुई
कांग्रेस की नाकामी: भारतीय वायुसेना की ताकत बढ़ाने के लिए 126 लड़ाकू विमानों की खरीद प्रक्रिया (MRCA) कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के दौरान साल 2007 में शुरू की गई थी। लेकिन ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (ToT) और कीमत के मोर्चे पर कूटनीतिक गतिरोध के कारण कांग्रेस सरकार 7 सालों तक इस बेहद महत्वपूर्ण रक्षा सौदे को फाइनल नहीं कर पाई। कूटनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण यह संवेदनशील रक्षा सौदा फाइलों में ही दबा रहा, जिससे वायुसेना के बेड़े में लड़ाकू विमानों की संख्या लगातार कम होती गई और राष्ट्रीय सुरक्षा के सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया।

पीएम मोदी ने किया संभव: साल 2014 में सत्ता संभालते ही पीएम मोदी ने राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। उन्होंने जटिल कूटनीतिक प्रक्रियाओं को दरकिनार कर सीधे फ्रांस सरकार के साथ ‘गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट’ (G2G) बातचीत का रास्ता चुना। प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत कूटनीति के चलते पहले 36 राफेल विमानों की आपातकालीन सीधी खरीद सुनिश्चित की गई, और अब रक्षा मंत्रालय द्वारा 114 और ‘मेक इन इंडिया’ राफेल विमानों के ऐतिहासिक सौदे को मंजूरी दे दी गई है। यह ऐतिहासिक रक्षा सौदा न केवल देश में ही रक्षा उत्पादन को बढ़ावा दे रहा है, बल्कि चीन और पाकिस्तान जैसी सीमाओं पर भारत की वायु शक्ति को अजेय बना चुका है।

यूएई के साथ ‘लोकल करेंसी ट्रेड’ समझौता: आर्थिक कूटनीति से डॉलर की निर्भरता को चुनौती
कांग्रेस के समय की स्थिति: खाड़ी देशों, विशेषकर संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के साथ कांग्रेस सरकार के संबंध केवल कच्चे तेल के आयात और पारंपरिक द्विपक्षीय व्यापार तक ही सीमित थे। वैश्विक व्यापार में डॉलर के दबदबे को चुनौती देने या भारतीय रुपये को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूत करने के लिए कांग्रेस सरकार के पास न तो कोई स्पष्ट आर्थिक कूटनीति थी और न ही कोई कड़ा रणनीतिक विजन। इसके कारण भारत का विदेशी मुद्रा भंडार हमेशा डॉलर के उतार-चढ़ाव और वैश्विक आर्थिक झटकों के प्रति संवेदनशील बना रहा।

पीएम मोदी ने किया संभव: पीएम मोदी ने खाड़ी देशों के साथ भारत के संबंधों को पारंपरिक स्तर से ऊपर उठाकर एक गहरा रणनीतिक मोड़ दिया। पीएम मोदी और यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की मजबूत कूटनीतिक केमिस्ट्री के चलते दोनों देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं (रुपया और दिरहम) में सीधे व्यापार करने का ऐतिहासिक समझौता (Local Currency Settlement System) हुआ। इसके साथ ही भारत के ‘UPI’ को यूएई के ‘IPP’ पेमेंट सिस्टम से जोड़ा गया। इस गेम-चेंजर आर्थिक कूटनीति के कारण अब भारत बिना डॉलर के सीधे रुपये में व्यापार कर पा रहा है, जिससे देश के करोड़ों डॉलर के रिजर्व की बचत हो रही है और वैश्विक वित्तीय मंच पर भारतीय रुपये का दबदबा तेजी से बढ़ रहा है।

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