पंजाब कांग्रेस में उठे असंतोष के बादल अब छंटने के बजाय और गहरे होते जा रहे हैं। विधानसभा चुनाव से पहले जिस तरह पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर खींचतान तेज हुई है, उसने कांग्रेस आलाकमान की संगठनात्मक क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने नाराज और बगावत का झंडा उठाने वाले नेताओं से मिलने तक ना-नुकर कर रहे हैं। नाराज नेताओं को दिल्ली दरबार से कोई समाधान न मिलने के कारण कांग्रेस में अंतर्कलह आने वाले दिनों में और ज्यादा नजर आ सकती है। दरअसल, 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले भी पंजाब कांग्रेस लगभग इसी दौर से गुजरी थी। उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू के बीच सार्वजनिक टकराव ने पार्टी को भीतर से तोड़ दिया था। आलाकमान लंबे समय तक दोनों नेताओं के बीच संतुलन नहीं बना पाया। निर्णय लेने में देरी और नेतृत्व की असमंजस की स्थिति ने कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा था। पंजाब कांग्रेस में एक बार फिर वैसे ही हालात बनते नजर आ रहे हैं।
चार धड़ों में बंटी पंजाब कांग्रेस में छिड़ा घमासान
पंजाब में कांग्रेस की राजनीति ऐसे चौराहे पर खड़ी है, जहां दूसरे दलों से अधिक चुनौती कांग्रेस को अपने ही घर के भीतर से मिल रही है। विधानसभा चुनाव में अभी कुछ समय बाकी है, लेकिन मुख्यमंत्री पद के संभावित चेहरे को लेकर कांग्रेस के चार वरिष्ठ नेता में अभी से घमासान छिड़ा हुआ है। दरअसल, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, कांग्रेस के प्रदेश प्रधान अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा और वरिष्ठ नेता प्रताप सिंह बाजवा खुद को अभी से ही मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके चलते कांग्रेस चार धड़ों में बंटी हुई नजर आ रही है। यही स्थिति कांग्रेस नेतृत्व के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय बनी है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस 2022 की अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक भूल से भी कोई सबक नहीं ले पाई? तब कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पार्टी छोड़ दी, सिद्धू भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके। सत्ता आम आदमी पार्टी के हाथों में चली गई। आज पंजाब कांग्रेस एक बार फिर लगभग उसी स्थिति में है।
भूपेश बघेल की रिपोर्ट में भी कोई निर्णायक समाधान नहीं
पार्टी हाईकमान ने गुटबाजी को नियंत्रित करने और नेताओं को एक मंच पर लाने के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल समितियां बनाकर राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को नियंत्रित किया जा सकता है? पंजाब कांग्रेस का हाल देखकर यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है। हालात इतने बदतर हो रहे हैं कि कांग्रेस आलाकमान को भितरघात को सुलझाने के लिए कमेटी तक बनानी पड़ी है। प्रदेश प्रभारी भूपेश बघेल ने बगावती नेताओं से अलग-अलग बात करके रिपोर्ट भी बनाई है, लेकिन भूपेश बघेल की रिपोर्ट भी अब तक किसी निर्णायक समाधान का रास्ता नहीं खोल सकी है।
राहुल-खरगे बगावत क्यों नहीं सुलझा पा रहे?
- नेतृत्व की स्पष्टता का अभाव- कांग्रेस अभी तक यह तय नहीं कर पा रही कि पंजाब में अंतिम राजनीतिक नेतृत्व किसके हाथ में होगा। यह असमंजस गुटबाजी को और बढ़ावा दे रहा है।
- संवाद की जगह खोखले अनुशासन पर जोर – नाराज नेताओं से राहुल और खरगे के मिलने से इनकार से राजनीतिक दृष्टि से कठोर संदेश है, लेकिन असंतोष खत्म होता बिल्कुल दिखाई नहीं दे रहा है। कई बार बातचीत ही संकट का समाधान होती है, लेकिन कांग्रेस हाईकमान बातचीत में रुचि नहीं दिखा रहा।
- क्षेत्रीय नेताओं का बढ़ता अहंकार – पंजाब कांग्रेस में कई नेता स्वयं को मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार मान रहे हैं। ऐसे में एक नेता को प्राथमिकता देने से बाकी नेताओं के असंतुष्ट होने का भी खतरा है।
- फैसलों में लगातार देरी – कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी यही रही है कि वह विवादों पर त्वरित निर्णय लेने से बचती है। जब तक फैसला आता है, तब तक नुकसान हो चुका होता है। अभी भी ऐसे ही हालात बन रहे हैं।
- हाईकमान की कमजोर पकड़ – एक समय कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व अंतिम निर्णय माना जाता था। अब कई प्रदेशों में कांग्रेस हाईकमान की पकड़ पहले जैसी मजबूत नहीं रही। पंजाब भी ऐसे राज्यों में शामिल है।
- विधानसभा चुनाव का दबाव – पंजाब में विधानसभा चुनाव अगले साल ही होने हैं। समय कम बचा है, इसलिए दबाव और ज्यादा हो रहा है। चुनाव जितना नजदीक आता जाएगा, असंतुष्ट नेता अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने की कोशिश और तेज करेंगे।
- विपक्ष को मिल रहा अवसर – आम आदमी पार्टी एंटी इन्कंबेंसी की लहर पर सवार है। अकाली दल से पंजाब की जनता पहले ही नाराज है। ऐसे में भाजपा को कांग्रेस की इस अंदरूनी लड़ाई का राजनीतिक लाभ मिलेगा।
- कार्यकर्ताओं का मनोबल कमजोर – राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल बगावत रोकना नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं और नेताओं का भरोसा फिर से जीतना है। राजनीति में चुनाव केवल विपक्ष से नहीं, अपने घर को संभालकर भी जीते जाते हैं।

चन्नी खुद को मानते हैं पंजाब का सबसे बड़ा दलित चेहरा
पंजाब कांग्रेस पर यह कहावत चरितार्थ हो रही है कि घर बसा नहीं और मंगते पहले आ गए…यानि ना तो अभी चुनाव एकदम पास हैं, ना ही कांग्रेस को विधानसभा में बहुमत मिलना तय है, लेकिन सीएम बनने के लिए कांग्रेस के नेता अभी से ताल ठोंक रहे हैं। सबसे पहले बात पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की। चन्नी पंजाब के पहले दलित मुख्यमंत्री रहे हैं और राज्य की लगभग एक-तिहाई दलित आबादी के बीच उनकी पहचान मानी जाती है। कांग्रेस नेतृत्व ने 2021 में उन्हें मुख्यमंत्री बनाकर सामाजिक संतुलन साधने का प्रयास किया था। हालांकि इसका परिणाम कांग्रेस के खिलाफ ही आया। आज भी चन्नी अपने कथित सामाजिक आधार और जनसंपर्क शैली के कारण स्वयं को मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार मानते हैं। उनकी कोशिश है कि कांग्रेस दलित मतदाताओं को फिर से अपने साथ जोड़ सके।
रंधावा को परंपरागत सिख वोट बैंक पर पकड़ का भरोसा
दूसरी ओर सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा कांग्रेस के अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं। वे पंजाब सरकार में उपमुख्यमंत्री और गृह मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद संभाल चुके हैं। संगठन और प्रशासन दोनों पर उनकी पकड़ मानी जाती है। वे राजस्थान के भी प्रभारी रह चुके हैं। रंधावा लंबे समय से कांग्रेस के परंपरागत सिख वोट बैंक और ग्रामीण क्षेत्रों में असर रखते हैं। यही कारण है कि वे स्वयं को मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
नेता प्रतिपक्ष प्रताप बाजवा खुद को संकटमोचक बता रहे
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रताप सिंह बाजवा भी कम मजबूती से अपना दावा नहीं ठोंक रहे हैं। बाजवा वर्तमान में पंजाब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं और लंबे समय से कांग्रेस संगठन के महत्वपूर्ण चेहरों में शामिल रहे हैं। उनके पास संसदीय राजनीति और संगठनात्मक अनुभव दोनों हैं। पार्टी के भीतर उनका अपना समर्थक वर्ग है और वे स्वयं को कांग्रेस के संकटमोचक नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। विपक्ष के नेता होने के नाते उन्हें लगातार मीडिया में स्थान भी मिलता है, जिससे उनकी दावेदारी और मजबूत दिखाई देती है।

प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर को अपनी आक्रामक शैली पर विश्वास
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग वर्तमान में पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत बनाते की कमान संभाल रहे हैं। पार्टी संगठन की कमान उनके हाथ में है और वे लगातार पार्टी को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहे हैं। युवा नेतृत्व की छवि, आक्रामक राजनीतिक शैली और संगठन पर पकड़ उन्हें मुख्यमंत्री पद की संभावित दौड़ में बनाए हुए है। प्रदेश अध्यक्ष होने के कारण स्वाभाविक रूप से उनका राजनीतिक कद भी बढ़ा है।
जिम्मेदारियां बड़ी, लेकिन महत्वाकांक्षाएं उससे भी बड़ी
इन चारों नेताओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सभी के पास संगठनात्मक या प्रशासनिक अनुभव है। चन्नी पूर्व मुख्यमंत्री हैं, रंधावा पूर्व उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं, बाजवा विधानसभा में विपक्ष का नेतृत्व कर रहे हैं और राजा वड़िंग प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं। यानी पार्टी के लगभग सभी प्रमुख पद इन नेताओं के पास हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब संगठन को मजबूत करने के बजाय नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा अधिक दिखाई देने लगती है। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जनता को एकजुट विकल्प नहीं दिख रहा है। यदि हर नेता स्वयं को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बताने लगे तो कार्यकर्ताओं के बीच भी भ्रम पैदा होता है। परिणामस्वरूप संगठनात्मक ऊर्जा चुनावी तैयारी में लगने के बजाय आंतरिक खींचतान में खर्च होने लगती है।









