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झटका नंबर 10: ममता को छोड़ BJP में शामिल हुए TMC के 3 बड़े चेहरे

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पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अब एक ऐसे चौराहे पर खड़ी हैं जहां उनकी राजनीति और संघर्ष क्षमता की सबसे कठिन और असली परीक्षा हो रही है। एक तरफ वह बंगाल की सड़कों पर खिसक चुके अपने जनाधार को पाने की जद्दोजहद में हैं, वहीं दूसरी तरफ उनको पार्टी को पूरी तरह से बिखरने से बचाना है। दरअसल, राज्य की राजनीति में कभी ‘अजेय’ मानी जाने वाली बनर्जी को एक के बाद एक इतने झटके लग रहे हैं कि उनका उबरना मुश्किल हो रहा है। विधानसभा चुनावों में मिली करारी हार ने न केवल उनके राजनीतिक रसूख को गहरा धक्का पहुंचाया, बल्कि पार्टी के भीतर एक अभूतपूर्व असंतोष और बिखराव को भी उजागर कर दिया। तृणमूल कांग्रेस में लगातार होते दोफाड़ और वरिष्ठ नेताओं की बगावत ने ममता के सांगठनिक नियंत्रण को पूरी तरह से हिला कर रख दिया है। अब तीन पूर्व सांसद बीजेपी में चले गए हैं। यदि वे जल्द ही सांगठनिक ढांचे को दुरुस्त नहीं करतीं, तो 440 करोड़ रुपये की वित्तीय नाकेबंदी और आंतरिक कलह के बीच तृणमूल कांग्रेस का अस्तित्व इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह सकता है। बंगाल की राजनीति की ‘दीदी’ इस चक्रव्यूह को तोड़ पाती है या नहीं, यह आने वाले दिनों के उनके संयम और फैसलों पर निर्भर करेगा।

आइए, जान लेते हैं कि टीएमसी की उल्टी पड़ी सियासत में पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को इससे पहले कौन-कौनसे झटके लग चुके हैं…

झटका नंबर 10: TMC के तीन पूर्व सांसदों ने छोड़ा ममता का साथ
तृणमूल कांग्रेस के तीन पूर्व सांसदों ने भी ममता बनर्जी की कार्यशैली के चलते उनको बाय-बाय बोल दिया है। तीनों पूर्व सांसद बीजेपी में शामिल हो गए हैं। पूर्व सांसद सुष्मिता देव, सुखेंदु शेखर राय और प्रकाश चिक बराइक ने बीजेपी के साल्ट लेक ऑफिस में ‘कमल’ (BJP) का दामन थाम लिया। वे बंगाल बीजेपी अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य की मौजूदगी में पार्टी में शामिल हुए। ये तीनों पहले तृणमूल कांग्रेस की ओर से राज्यसभा सांसद रह चुके हैं। राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद उन्होंने अपनी राज्यसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। समिक भट्टाचार्य ने कहा कि ये तीनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में भरोसे और बंगाल के विकास की चाहत के कारण बीजेपी में शामिल हो रहे हैं। बंगाल बीजेपी के अध्यक्ष भट्टाचार्य ने कहा कि इस समय सुखेंदु शेखर रॉय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बराइक की एकमात्र पहचान बीजेपी कार्यकर्ताओं की है।झटका नंबर 9: 440 करोड़ रु. पर ईडी की वित्तीय नाकेबंदी
एक तरफ जहां ममता की पार्टी टीएमसी आंतरिक कलह और सांगठनिक बिखराव के झटकों से जूझ रही है, वहीं दूसरी तरफ केंद्रीय जांच एजेंसियों के शिकंजे ने ममता बनर्जी की मुश्किलें कई गुना बढ़ा दी हैं। प्रवर्तन निदेशालय ने धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत एक बड़ी कार्रवाई करते हुए तृणमूल कांग्रेस के तीन बैंक खातों में जमा करीब 440 करोड़ रुपये के बैंक डिपॉजिट को फ्रीज कर दिया है। कोलकाता पुलिस द्वारा पहले ही इन खातों पर लगाई गई रोक के बाद केंद्रीय एजेंसी का यह वित्तीय प्रहार पार्टी के लिए एक तगड़ा झटका है, क्योंकि इससे पार्टी का पूरा चुनावी ‘वार चेस्ट’ और फंड ठप हो गया है। कलकत्ता उच्च न्यायालय से भी इस कार्रवाई के खिलाफ तत्काल राहत न मिलना इस बात का संकेत है कि ममता बनर्जी के लिए कानूनी राह भी आसान नहीं होने वाली है। चुनावी हार, अपनों की बगावत और वित्तीय नाकेबंदी के इस त्रिकोणीय संकट ने ममता बनर्जी को एक ऐसे चक्रव्यूह में ला खड़ा किया है, जहां से निकलने का रास्ता फिलहाल बेहद धुंधला दिखाई दे रहा है।झटका नंबर 8: धन शोधन में ममता-अभिषेक से पूछताछ की तैयारी
ममता बनर्जी और उनके सहयोगियों को उम्मीद थी कि वे इस वित्तीय कार्रवाई के खिलाफ न्यायपालिका से तत्काल राहत पा लेंगे। लेकिन कलकत्ता उच्च न्यायालय ने इस खाते को फ्रीज करने के आदेश पर तत्काल रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया, जिससे ममता बनर्जी की कानूनी मुश्किलें और अधिक जटिल हो गई हैं। अदालत द्वारा अंतरिम राहत न मिलने से ईडी को अपनी जांच का दायरा बढ़ाने और धन शोधन (Money Laundering) के ट्रेल को खंगालने का पूरा मौका मिल गया है। सूत्रों के मुताबिक, आने वाले दिनों में जांच एजेंसी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व, जिसमें खुद ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी शामिल हैं, से पूछताछ की तैयारी कर रही है। यह कानूनी शिकंजा ममता के लिए राजनीतिक रूप से बेहद नुकसानदेह साबित हो रहा है, क्योंकि वे अब जनता के बीच विक्टिम कार्ड (पीड़ित कार्ड) खेलने की स्थिति में भी नहीं दिख रही हैं।झटका नंबर 7: नेता प्रतिपक्ष में ऋतब्रत बनर्जी को मान्यता
टीएमसी की आंतरिक राजनीति के बीच विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के मुद्दे ने एक नया मोड़ ले लिया। विधानसभा अध्यक्ष रथिन बोस द्वारा बागी टीएमसी विधायक ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता देने के फैसले को चुनौती दी गई, लेकिन हाई कोर्ट ने इस फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। इस घटनाक्रम ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है। विरोधी दल इसे टीएमसी के अंदर बढ़ती असहमति का संकेत बता रहे हैं, जबकि पार्टी इसे राजनीतिक साजिश के रूप में प्रस्तुत कर रही है। लेकिन इतना तय है कि इस विवाद ने ममता बनर्जी के खिलाफ एक नया राजनीतिक मोर्चा खोल दिया है।

झटका नंबर 6: महागठबंधन में कमजोर पड़ती दावेदारी
राष्ट्रीय राजनीति में ममता बनर्जी लंबे समय से स्वयं को विपक्ष की सबसे प्रभावशाली नेताओं में स्थापित करने की कोशिश करती रही हैं। कांग्रेस की लगातार चुनावी पराजयों और राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर उठते सवालों के बीच यह माना जा रहा था कि यदि ममता बनर्जी एक बार फिर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत दर्ज करती हैं, तो वे विपक्षी महागठबंधन में अधिक निर्णायक भूमिका की दावेदारी कर सकती हैं। लेकिन बगावत से टीएमसी को विधानसभा और लोकसभा दोनों स्तरों पर राजनीतिक नुकसान हुआ है। इसलिए विपक्षी गठबंधन में ममता बनर्जी की दावेदारी भी स्वाभाविक रूप से कमजोर पड़ गई है। राष्ट्रीय राजनीति में नेतृत्व केवल व्यक्तिगत लोकप्रियता से नहीं, बल्कि चुनावी सफलता, संगठन की मजबूती और सांसदों की संख्या से तय होता है। इसी कारण पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के लिए राजनीतिक लड़ाई अब केवल राज्य तक ही सीमित रह गई है।

झटका नंबर 5: सुरक्षा अधिकारी की भी हुई वापसी 
ममता बनर्जी की सुरक्षा में लगभग दो दशक से तैनात रहे उनके निजी सुरक्षा अधिकारी को हटाकर मूल विभाग में वापस भेजे जाने की घटना ने भी राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं को जन्म दिया है। हालांकि प्रशासनिक स्तर पर अधिकारियों के तबादले और तैनाती में बदलाव सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा माने जाते हैं, लेकिन जब किसी नेता के साथ लंबे समय तक जुड़े अधिकारी को हटाया जाता है तो राजनीतिक हलकों में इसके विभिन्न अर्थ निकाले जाने लगते हैं। विपक्ष इस घटनाक्रम को भी ममता के बदलते राजनीतिक माहौल से जोड़कर देख रहा है।झटका नंबर 4: भ्रष्टाचार और एजेंसियों के शिकंजे से मुश्किलें
विधानसभा चुनाव में मिली राजनीतिक चुनौती के बाद टीएमसी की परेशानियां केवल संगठनात्मक टूट तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और अन्य मामलों में उसके कई वरिष्ठ नेताओं पर कार्रवाई ने भी पार्टी की मुश्किलें बढ़ा दीं। पूर्व खाद्य मंत्री ज्योतिप्रिय मलिक पहले से ही कथित राशन वितरण घोटाले में जांच एजेंसियों के शिकंजे का सामना कर रहे हैं, वहीं पूर्व मंत्री सुजीत बोस को नगर निकाय भर्ती से जुड़े कथित घोटाले की जांच में कार्रवाई का सामना करना पड़ा। टीएमसी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री मदन मित्र के आवास पर भी नगर निकाय भर्ती मामले में जांच एजेंसियों की छापेमारी हुई। इसके अलावा भांगर विस्फोट मामले में टीएमसी के प्रभावशाली नेता एवं पूर्व विधायक सौकत मोल्ला की गिरफ्तारी तथा स्थानीय निकायों से जुड़े कई नेताओं पर हुई कार्रवाई ने पार्टी की छवि को और झटका दिया। एक समय विपक्ष पर आक्रामक रहने वाली तृणमूल कांग्रेस अब राजनीतिक चुनौतियों के साथ-साथ भ्रष्टाचार के आरोपों और कानूनी लड़ाइयों के दबाव से भी जूझती दिखाई दे रही है।

झटका नंबर 3: सांसदों की टूट ने बढ़ाई बनर्जी की बेचैनी
विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर का असंतोष ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा। टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 ने एक साथ पार्टी आलाकमान के खिलाफ बगावत कर दी। दलबदल विरोधी कानून की अयोग्यता से बचने के लिए इन बागी सांसदों ने एक कम प्रसिद्ध, पंजीकृत दल ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) में अपने पूरे गुट का विलय कर दिया। लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर केंद्र की सत्तारूढ़ एनडीए सरकार को समर्थन देने का यह फैसला केवल एक तकनीकी विलय नहीं है, बल्कि ममता बनर्जी के एकछत्र नेतृत्व को दी गई अब तक की सबसे बड़ी चुनौती है। एनडीए के पाले में 20 सांसदों के खड़े हो जाने से यह साफ हो गया है कि टीएमसी सियासत के दिन अब पूरी तरह लद गए हैं। इस टूट ने संसद में ममता बनर्जी की ताकत को बेहद सीमित कर दिया है।

झटका नंबर 2: विधायकों की नाराजगी और अंतर्कलह 
किसी भी क्षेत्रीय दल की मजबूती उसके विधायकों और जमीनी नेतृत्व पर निर्भर करती है। बंगाल में टीएमसी के भीतर कई बार नेताओं के बीच मतभेद और गुटीय राजनीति की खबरें सामने आती रही हैं। जब पार्टी के भीतर ही नेतृत्व को लेकर मतभेद सार्वजनिक होने लगें तो यह किसी भी राजनीतिक संगठन के लिए चिंता का विषय बन जाता है। ममता बनर्जी की टीएमसी ने विधानसभा चुनाव 2026 में केवल 80 विधायक ही जीते थे। इसमें से भी 58 विधायक ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट के साथ खड़े हुए और विधानसभा स्पीकर को पत्र देकर उन्हें अपना नेता घोषित करने की मांग की। यह टीएमसी विधायक दल का लगभग 72.5% हिस्सा था। बनर्जी अब नेता प्रतिपक्ष बन गए हैं।

झटका नंबर 1: करारी चुनावी पराजय ने बढ़ाई चिंता
ममता बनर्जी की राजनीति का आधार हमेशा उनकी जनसभाओं में दिखाई देने वाला जनसमर्थन और चुनावी सफलता रही है। लेकिन हाल के राजनीतिक संघर्षों में टीएमसी को कई मोर्चों पर विपक्ष की कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। विपक्ष लगातार यह दावा करता रहा है कि बंगाल में ममता सरकार के खिलाफ माहौल बन रहा है और आगामी चुनावों में टीएमसी की राह आसान नहीं होगी। विधानसभा चुनाव में विपक्ष की बात सौ फीसदी सच साबित हुई। बीजेपी ने टीएमसी को लगभग रौंदते हुए पश्चिम बंगाल में अपनी शानदार सरकार बनाई। करीब डेढ़ दशक के बाद ममता बनर्जी सत्ताविहीन हो गई हैं।

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