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प्रणब मुखर्जी: कांग्रेस ने ठुकराया, मोदी सरकार ने अमर बनाया

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कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठतम नेताओं में शुमार रहे पूर्व राष्ट्रपति दिवंगत प्रणब मुखर्जी (प्रणब दा) को लेकर एक बार फिर राजनीतिक घमासान चरम पर पहुंच गया है। दरअसल, इन दिनों सोशल मीडिया पर एक समाचार तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें यह दावा किया गया है कि जिस कांग्रेस पार्टी को प्रणब मुखर्जी ने अपने जीवन के पांच दशक (50 साल) समर्पित कर दिए, उसी पार्टी ने उनके अंतिम वर्षों में उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपमान और उपेक्षा दी। वहीं दूसरी ओर, वैचारिक रूप से धुर विरोधी होने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार ने हमेशा प्रणब दा को ऐतिहासिक सम्मान और गौरव दिया। 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रणब मुखर्जी देश की सियासत में कांग्रेस के सबसे बड़े संकटमोचक थे, लेकिन गांधी परिवार और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ उनके संबंध हमेशा तनावपूर्ण रहे। विशेषकर सोनिया गांधी के दौर में, कई ऐतिहासिक मौकों पर यह साफ दिखा कि प्रणब दा की वरिष्ठता और योग्यता को संगठन के भीतर जानबूझकर किनारे लगाया गया। इसी बीच, केंद्र सरकार द्वारा राजघाट परिसर स्थित ‘राष्ट्रीय स्मृति स्थल’ पर प्रणब दा की समाधि के निर्माण को हरी झंडी दिए जाने की ताजा खबर ने इस सियासी बहस को एक नया मोड़ दे दिया है, जिसे भाजपा समर्थक मोदी सरकार के सम्मानपूर्ण दृष्टिकोण के रूप में देख रहे हैं।

प्रणब मुखर्जी की विरासत को अमर बनाने की दिशा में उठाया गया यह कदम एक और ऐतिहासिक रिकॉर्ड दर्ज करने जा रहा है। प्रणब मुखर्जी पश्चिम बंगाल की धरती से आने वाले देश के पहले ऐसे शीर्ष राजनेता होंगे, जिनकी समाधि को दिल्ली के प्रतिष्ठित राजघाट परिसर में स्थान दिया जाएगा। केंद्र सरकार के आधिकारिक दिशानिर्देशों के तहत उनका यह स्मारक ‘राष्ट्रीय स्मृति स्थल’ परिसर में विकसित किया जा रहा है, जो देश के पूर्व राष्ट्रपतियों, उपराष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों जैसी महान विभूतियों की स्मृतियों को संजोने के लिए आरक्षित है।

गौरतलब है कि कांग्रेस के शासनकाल के दौरान राष्ट्रीय नेताओं के लिए अलग-अलग समाधियां बनाने की इस गौरवमयी परंपरा पर पूरी तरह रोक लगा दी गई थी। लेकिन बाद में, सत्ता में आई भाजपा नीत केंद्र सरकार ने इस रूढ़ि को तोड़ते हुए पूर्व प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव और भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी के भव्य स्मारकों का निर्माण करवाया, और अब इसी कड़ी में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की समाधि को भी आधिकारिक स्वीकृति दे दी गई है। महात्मा गांधी के पावन स्मारक से शुरू हुआ यह पूरा राजघाट और उससे सटे स्मारकों का ऐतिहासिक परिसर लगभग 245 एकड़ के विशाल भूभाग में फैला हुआ है, जहाँ अब बंगाल के इस महान सपूत की यादें भी हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाएंगी।

राष्ट्रीय स्मृति स्थल पर बनेगी प्रणब दा की समाधि: केंद्र सरकार की मंजूरी
मोदी सरकार द्वारा प्रणब दा की विरासत को सहेजने की दिशा में एक और बड़ा फैसला सामने आया है। केंद्र सरकार ने पूर्व राष्ट्रपति एवं भारत रत्न प्रणब मुखर्जी की समाधि के निर्माण को आधिकारिक मंजूरी दे दी है। यह समाधि दिल्ली के राजघाट परिसर स्थित प्रतिष्ठित ‘राष्ट्रीय स्मृति स्थल’ में बनाई जाएगी, जहां देश के महान सपूतों की स्मृतियों को संजोया जाता है। गौरतलब है कि प्रणब मुखर्जी का 31 अगस्त 2020 को 84 वर्ष की आयु में निधन हो गया था।

इस स्मारक को आकार देने के लिए वर्ष 2026 में दिल्ली शहरी कला आयोग (DUAC) ने मूल प्रारूप में कुछ विशिष्ट डिजाइन संबंधी संशोधन सुझाए थे, जिसके बाद केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (CPWD) ने अपना संशोधित प्राथमिक प्रस्ताव DUAC को सौंप दिया है और आगे की प्रक्रिया युद्ध स्तर पर चल रही है। फिलहाल विभाग समाधि के लिए बनाए गए ट्रस्ट से बजट मिलने का इंतजार कर रहा है ताकि निर्माण कार्य को जल्द से जल्द पूरा किया जा सके। इससे यह साफ है कि एक गैर-कांग्रेसी सरकार ही इस दिग्गज नेता की विरासत को अमर बनाने का काम कर रही है।

भारत रत्न पुरस्कार: जब मोदी सरकार ने कांग्रेस को सिखाया ‘राजधर्म’
साल 2019 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक अभूतपूर्व फैसला लेते हुए धुर कांग्रेसी रहे प्रणब मुखर्जी को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा, तो इसने पूरे देश को चौंका दिया था। भाजपा इस ताज़ा बहस में इसे अपनी ‘राष्ट्र-प्रथम’ नीति के सबसे बड़े उदाहरण के रूप में पेश कर रही है। पार्टी प्रवक्ताओं का कहना है कि कांग्रेस ने दशकों तक केवल एक ही परिवार के लोगों को सर्वोच्च सम्मानों से नवाजा और प्रणब दा जैसे कद्दावर देशभक्त को हमेशा पीछे धकेला, जबकि मोदी सरकार ने दल की सीमा लांघकर राष्ट्र निर्माण में योगदान देने वाले सपूत का असली मूल्यांकन किया।

प्रणब दा की आखिरी किताब: सोनिया-राहुल की नाकामी का सच लिखने पर हुए थे दरकिनार!
प्रणब मुखर्जी की मरणोपरांत प्रकाशित हुई किताब The Presidential Years ने कांग्रेस के भीतर के अंतर्विरोधों को पूरी तरह से बेनकाब कर दिया था। इस किताब में प्रणब दा ने खुलकर लिखा था कि साल 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की करारी हार के लिए सोनिया गांधी का कमजोर नेतृत्व और राहुल गांधी का अहंकार पूरी तरह जिम्मेदार था। भाजपा आज इस ताजा विवाद में इन पन्नों का हवाला देकर यह साबित कर रही है कि गांधी परिवार की गलतियों पर सच का आईना दिखाने के कारण ही कांग्रेस आलाकमान उनसे चिढ़ा हुआ था और यही वजह थी कि पार्टी में उनका लगातार अपमान किया गया।

प्रणब मुखर्जी का ‘नागपुर दौरा’: कांग्रेस के विरोध की दीवार तोड़ी, बीजेपी-संघ ने सराहा बड़प्पन
साल 2018 में जब प्रणब मुखर्जी ने कांग्रेस के कड़े विरोध और चेतावनियों के बावजूद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के नागपुर मुख्यालय में मुख्य अतिथि बनने का निमंत्रण स्वीकार किया, तो कांग्रेस के भीतर भूचाल आ गया था। कई कांग्रेसी नेताओं ने उन्हें ‘गद्दार’ तक घोषित करने की कोशिश की थी। लेकिन इसके विपरीत, पीएम मोदी और अमित शाह ने प्रणब दा के इस कदम की सराहना करते हुए इसे भारतीय लोकतंत्र की सबसे खूबसूरत और सहिष्णु परंपरा बताया। यह घटना आज भी इस बात का सबसे बड़ा सबूत मानी जाती है कि कांग्रेस वैचारिक रूप से कितनी संकीर्ण है, जबकि भाजपा विरोधी विचारों का भी दिल से सम्मान करती है।

1984 और 2004 का ऐतिहासिक धोखा: जब-जब पीएम की बारी आई, तब-तब कांग्रेस ने काटा प्रणब दा का पत्ता
राजनीतिक इतिहास गवाह है कि प्रणब मुखर्जी आधुनिक भारत के सबसे योग्य और सक्षम प्रधानमंत्री साबित हो सकते थे। लेकिन वफादारी के नाम पर कांग्रेस ने उनके साथ दो बार ऐतिहासिक छल किया। पहली बार 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद और दूसरी बार 2004 में यूपीए की जीत के बाद, प्रणब दा प्रधानमंत्री पद के सबसे स्वाभाविक और वरिष्ठ दावेदार थे। लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने दोनों बार उनकी योग्यता को लात मारकर क्रमशः राजीव गांधी और डॉ. मनमोहन सिंह को कुर्सी पर बिठाया। भाजपा आज इसी काले इतिहास को जनता के सामने रखकर कांग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र पर करारा प्रहार कर रही है।

 

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