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चुनाव से पहले कांग्रेस का ‘लड़ता पंजाब’, 8 कारणों से अंतर्कलह कम होने की बजाय और भड़की

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पंजाब में विधानसभा चुनाव अभी कुछ समय दूर हैं, लेकिन कांग्रेस के भीतर सत्ता, नेतृत्व और संगठन को लेकर संघर्ष अभी से खुलकर सामने आ गया है। जिस समय पार्टी को आम आदमी पार्टी के खिलाफ एकजुट होकर चुनावी रणनीति बनानी चाहिए, उसी समय उसके वरिष्ठ नेता एक-दूसरे पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठा रहे हैं। पंजाब कांग्रेस में असंतुष्ट खेमे का नेतृत्व पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा कर रहे हैं। इन नेताओं का आरोप है कि प्रदेश संगठन में फैसले एकतरफा हो रहे हैं और वर्तमान नेतृत्व पार्टी को मजबूत करने में सफल नहीं रहा है। पंजाब की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां दूसरे दलों से अधिक चुनौती कांग्रेस को अपने ही घर के भीतर से मिल रही है। हालात इतने बदतर हो रहे हैं कि कांग्रेस आलाकमान को भितरघात को सुलझाने के लिए कमेटी तक बनानी पड़ी है।सत्ता की लड़ाई से पहले ही कांग्रेसियों में परस्पर लड़ाई
पंजाब कांग्रेस आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहां उसे तय करना है कि वह 2022 की गलतियों से सीखना चाहती है या उन्हें दोहराना चाहती है। चरणजीत सिंह चन्नी, सुखजिंदर सिंह रंधावा, प्रताप सिंह बाजवा और अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग सभी अनुभवी और प्रभावशाली नेता हैं। उनकी महत्वाकांक्षा स्वाभाविक है, लेकिन पार्टी हित व्यक्तिगत दावेदारी से ऊपर होना चाहिए। तीन सदस्यीय समिति तभी सफल मानी जाएगी जब वह नेताओं को एक मंच पर लाकर सामूहिक नेतृत्व की भावना विकसित करे। अन्यथा 77 सीटों से 18 सीटों तक का सफर केवल अतीत की कहानी नहीं रहेगा, बल्कि कांग्रेस के भविष्य की भी चेतावनी बन सकता है। पंजाब की जनता एक मजबूत और एकजुट विपक्ष चाहती है, लेकिन यदि कांग्रेस अपने ही अंतर्विरोधों में उलझी रही तो सत्ता की लड़ाई शुरू होने से पहले ही वह राजनीतिक रूप से कमजोर पड़ सकती है।आइए, जानते हैं कि पंजाब में कांग्रेस में कलह की आग किन कारणों से कम होने बजाए और ज्यादा सुलग रही है…

1. पंजाब कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन की लड़ाई चरम पर
सबसे बड़ा विवाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद को लेकर है। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा का खेमा चाहता है कि विधानसभा चुनाव से पहले ही संगठन में बदलाव होना चाहिए। हाईकमान ने अपने पत्ते पूरी तरह से नहीं खोले हैं, इसके चलते कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के साथ भी कई वरिष्ठ कांग्रेसी कलह को हवा दे रहे हैं।

2. विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री चेहरे की होड़
पंजाब कांग्रेस पर यह कहावत चरितार्थ हो रही है कि घर बसा नहीं और मंगते पहले आ गए…यानि ना तो अभी चुनाव एकदम पास हैं, ना ही कांग्रेस को विधानसभा में बहुमत मिलना तय है, लेकिन सीएम बनने के लिए कांग्रेस के नेता अभी से ताल ठोंक रहे हैं। कांग्रेस में कई वरिष्ठ नेता स्वयं को मुख्यमंत्री पद का संभावित चेहरा मानते हैं। इसी महत्वाकांक्षा ने गुटबाजी को और बढ़ाया है।3. पंजाब के एक तिहाई दलित वोट बैंक की राजनीति
पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब में कांग्रेस के प्रमुख दलित चेहरे माने जाते हैं। पंजाब में लगभग एक-तिहाई आबादी अनुसूचित जाति की है। ऐसे में चन्नी खुद को संगठन और सत्ता का प्रमुख चेहरा मानते हैं। उनकी चाहत सीएम फेस बनने की भी है। इसके चलते नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा भी तेज हो रही है।

4. जाट-सिख नेतृत्व बनाम दलित नेतृत्व का संतुलन
पूर्व उप मुख्यमंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा स्वयं को जाट-सिख नेता के रूप में स्थापित करने की चाहत पाले हुए हैं। उनका मानना है कि पंजाब में कांग्रेस को अगर फिर से बहुमत हासिल करना है तो जाट-सिख चेहरों को ही आगे लाना होगा। इस तनातनी के चलते भी जाट-सिख बनाम दलित नेतृत्व के विवाद की चिंगारी तेज हो रही है। यह सामाजिक समीकरण भी विवाद को प्रभावित कर रहा है।5. संगठनात्मक नियुक्तियों पर असहमति से विवाद
कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने जो संगठनात्मक नियुक्तियां की हैं, उनको लेकर भी विवाद गरमाया हुआ है। जिला अध्यक्षों, कार्यकारिणी और विभिन्न समितियों के गठन को लेकर असंतोष है। कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि उनके समर्थकों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला। इसका खामियाजा कांग्रेस को अगले विधानसभा चुनाव में भुगतेगी।

6. ‘सियासी गृहयुद्ध’ में आत्मघाती साबित होगी अंदरूनी कलह
पंजाब कांग्रेस को ‘लड़ता पंजाब’ बनाने अहम भूमिका दिल्ली नेतृत्व भी निभा रहा है। दरअसल, हाईकमान की लापरवाह कार्यशैली और तत्काल निर्णय न ले पाने की अक्षमता के चलते पंजाब में अंसतोष को हवा मिल रही है। असंतुष्ट नेता फैसलों की तत्काल समीक्षा की मांग कर रहे हैं। लेकिन लेटलतीफी के चलते पंजाब कांग्रेस प्रभारी भूपेश बघेल और असंतुष्ट नेताओं के बीच मतभेदों में इजाफा हो रहा है। पंजाब कांग्रेस में सिर फुटोव्वल की हकीकत को लेकर बघेल दिल्ली दरबार की दहलीज पर हैं।7. व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा और बयानबाजी
हर वरिष्ठ नेता आगामी विधानसभा चुनाव में अपनी भूमिका अधिक प्रभावशाली बनाना चाहता है। यही महत्वाकांक्षा सामूहिक नेतृत्व को कमजोर कर रही है। कांग्रेस नेताओं के मतभेद अब बंद कमरों तक सीमित नहीं रहे। चरणजीत सिंह चन्नी बनाम अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग हो या फिर असंतुष्ट खेमा बनाम कांग्रेस हाईकमान हो इनके एक-दूसरे के खिलाफ तीखे तेवर और तेज हो रहे हैं। मीडिया के सामने बयानबाजी से कार्यकर्ताओं में भ्रम पैदा हो रहा है और विरोधियों को हमला करने का अवसर मिल रहा है।

8. 2022 के विधानसभा चुनाव की हार का दोष किस पर
कांग्रेस हाईकमान की लेटलतीफी का यह आलम है कि पार्टी के भीतर अभी तक इस बात पर सहमति नहीं बन सकी कि 2022 की पिछली हार की असली वजह क्या थी। अलग-अलग गुट एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराते हैं। चन्नी के विरोधी उनके शासन की असफलताएं गिनाते हैं तो दूसरा गुट अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के घमासान को कांग्रेस की करारी हार की वजह बताता है। जिस समय कांग्रेस को बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करना चाहिए, उस समय ऊर्जा का बड़ा हिस्सा आंतरिक संघर्ष में खर्च हो रहा है।

पंजाब कांग्रेस की अंतर्कलह, एक-दूसरे पर दोषारोपण और हाईकमान की चुप्पी से अगले विधानसभा चुनाव पर यह संभावित 8 प्रभाव पड़ सकते हैं…

  1. वरिष्ठ नेताओं के बीच कलह से कार्यकर्ताओं का मनोबल कमजोर होगा। जब शीर्ष नेता ही विभाजित होंगे, तो बूथ स्तर तक संदेश नकारात्मक ही जाएगा।
  2. किसी भी पार्टी के एकजुट न होने से मतदाताओं में भ्रम पैदा होता है। मतदाता स्थिर नेतृत्व वाली पार्टी को प्राथमिकता देते हैं। यही वजह के कि भाजपा की सरकारें न सिर्फ नए राज्यों में बन रही हैं, बल्कि पुरानी भी रिपीट हो रही हैं।
  3. पंजाब में AAP सरकार की विफलताओं और कांग्रेस नेताओं के मतभेदों का लाभ भाजपा को मिलेगा। भाजपा को पंजाब में विस्तार का अवसर मिलेगा। कांग्रेस की कमजोरी विपक्षी दलों के लिए राजनीतिक अवसर बन सकती है।
  4. कांग्रेस में वर्तमान में जिस तरह की खेमेबाजी दिख रही है, उससे साफ लगता है कि चुनाव में उम्मीदवार चयन में विवाद और बढ़ सकता है। यदि गुटबाजी जारी रही तो टिकट वितरण भी संघर्ष का कारण बन सकता है।
  5. एकजुटता के अभाव में कांग्रेस का पंजाब में चुनावी अभियान कमजोर पड़ेगा। साझा मुद्दों की बजाय कांग्रेस के आंतरिक विवाद ज्यादा सुर्खियां बनेंगे। ऐसे विवादों का परिणाम कांग्रेस पिछले चुनाव में देख चुकी है, लेकिन इससे कोई सबक नहीं लिया है।
  6. परस्पर दोषारोपण से दलित और पारंपरिक कांग्रेस वोट में बिखराव संभव है। यदि नेतृत्व को लेकर असमंजस बना रहा तो वोटों का ध्रुवीकरण हो सकता है। इसके साथ ही संसाधनों का बंटवारा प्रभावित होगा और संगठन की ऊर्जा चुनाव के बजाय गुटीय राजनीति में खर्च होगी।
  7. कांग्रेस के बीच गुटबाजी जारी रही तो हाईकमान की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठेंगे। क्योंकि ऐसे हालात में त्वरित निर्णय लेना हाईकमान की जिम्मेदारी है। यदि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के बीच विवाद लंबा चला तो संगठनात्मक अनुशासन कमजोर दिखाई देगा।
  8. ऐसे हालात में कांग्रेस का सत्ता में वापसी का लक्ष्य कठिन होता जाएगा। किसी भी चुनाव में मजबूत संगठन और एकजुट नेतृत्व सबसे बड़ी ताकत होता है। यदि संगठन ही कमजोर हो जाए। कार्यकर्ता हतोत्साहित हो जाएं तो सत्ता तक पहुंचना कठिन हो जाता है।

कांग्रेस की कलह से पंजाब में भाजपा का होगा विस्तार
पंजाब कांग्रेस आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती विरोधी दल नहीं, बल्कि उसकी अपनी आंतरिक राजनीति बनती जा रही है। यदि हाईकमान समय रहते असंतुष्ट नेताओं को साथ लेकर संगठनात्मक संतुलन स्थापित नहीं करता, तो यह कलह चुनावी मैदान में कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी बन सकती है। इसका फायदा निश्चित रूप से भाजपा को पंजाब में अपने विस्तार में मिलेगा। इतिहास गवाह है कि चुनाव केवल जनसमर्थन से नहीं, बल्कि संगठनात्मक एकता, स्पष्ट नेतृत्व और अनुशासित रणनीति से भी जीते जाते हैं। यह तीनों न केवल भाजपा की ताकत हैं, बल्कि बूथ लेवल तक इसका संगठन भी पूरी तरह से सक्रिय है। हाल में पश्चिम बंगाल के चुनाव में यह देखने को भी मिला है। पंजाब कांग्रेस के सामने आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह पहले खुद को एकजुट कर पाएगी, या फिर उसकी सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी उसकी अपनी अंदरूनी कलह ही साबित होगी?

 

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