प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार में भारतीय अर्थव्यवस्था तेज गति से डिजिटल, सुरक्षित और आधुनिक वित्तीय प्रणाली की ओर बढ़ रही है। इसी दिशा में एक और कदम आगे बढ़ाते हुए अब देश की करेंसी भी एक बड़े बदलाव की दहलीज पर खड़ी दिखाई दे रही है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा पॉलीमर (Plastic Polymer) नोटों का पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने जा रहा है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार आरबीआई सबसे पहले 10 और 20 रुपए के पॉलीमर नोटों का परीक्षण करेगा। यह प्रयोग सफल रहता है तो आने वाले वर्षों में भारत की करेंसी व्यवस्था में ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल सकता है। पीएम मोदी के नेतृत्व में पिछले एक दशक में भारतीय वित्तीय प्रणाली में अनेक संरचनात्मक परिवर्तन हुए हैं। जनधन योजना से लेकर डिजिटल भुगतान, UPI क्रांति, नकली नोटों पर नियंत्रण, नई सुरक्षा विशेषताओं वाले बैंक नोट, और अब पॉलीमर करेंसी की दिशा में बढ़ता कदम एक ऐसे भारत की तस्वीर बता रहे हैं जो अपनी वित्तीय व्यवस्था को विश्वस्तरीय बनाने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है।
पहले जानिए, क्या है पॉलीमर नोटों का प्रोजेक्ट
पॉलीमर नोट विशेष प्रकार के प्लास्टिक से तैयार किए जाते हैं। यह सामान्य प्लास्टिक नहीं बल्कि बाइ-ओरिएंटेड पॉलीप्रोपाइलीन नामक विशेष सामग्री होती है। इसी पर अत्याधुनिक सुरक्षा फीचर, प्रिंटिंग तकनीक और पारदर्शी सुरक्षा विंडो विकसित की जाती है। भारत में प्रस्तावित पायलट प्रोजेक्ट का उद्देश्य यह जानना है कि देश की जलवायु, अत्यधिक तापमान, आर्द्रता, धूल, लगातार हाथों से उपयोग और बड़े पैमाने पर नकद लेनदेन जैसी परिस्थितियों में पॉलीमर नोट कितने प्रभावी सिद्ध होते हैं। परीक्षण के दौरान इनके टिकाऊपन, सुरक्षा, लागत और आम जनता की स्वीकार्यता का व्यापक अध्ययन किया जाएगा।
पॉलीमर नोटों के चलन से करेंसी की लागत कम हो जाएगी
भारत में हालांकि यूपीआई आने के बाद से डिजिटल लेने-देने काफी तेजी से चलन में आया है। लेकिन इसके बाद भी देश नकदी-आधारित अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। क्योकि छोटे मूल्यवर्ग के नोट करोड़ों लोगों के दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बने हुए हैं। देखने में आया है कि 10 और 20 रुपए के कागजी नोट सबसे अधिक हाथ बदलते हैं। यही कारण है कि ये जल्दी फट जाते हैं, गंदे हो जाते हैं और कुछ ही समय में इन्हें वापस लेकर नए नोट छापने पड़ते हैं। आरबीआई को हर वर्ष बड़ी संख्या में पुराने नोट नष्ट कर नए नोट छापने पड़ते हैं, जिस पर हजारों करोड़ रुपये का खर्च आता है। यदि पॉलीमर नोट इन छोटे मूल्यवर्गों में अधिक समय तक चलते हैं तो यह लागत काफी कम हो सकती है।
देश में नकली नोटों के विरुद्ध लड़ाई को नई मजबूती मिलेगी
यदि भारत बड़े पैमाने पर पॉलीमर नोट अपनाता है तो इसका सबसे बड़ा लाभ नोटों की लंबी आयु के रूप में मिलेगा। पॉलीमर नोट के चलन से कम बार नए नोट छापने होंगे। नोटों के परिवहन, भंडारण और नष्ट करने की लागत घटेगी। इससे बैंकिंग प्रणाली पर दबाव कम होने के साथ ही छोटे मूल्यवर्ग के नोट लंबे समय तक साफ-सुथरे बने रहेंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नकली नोटों के खिलाफ लड़ाई और अधिक मजबूत हो सकती है। 10 और 20 रुपए के प्लास्टिक नोट चलन में आने से आरबीआई को प्रतिवर्ष करोड़ों नोट कम छापने पड़ेंगे। इससे सरकारी संसाधनों की बचत होगी, करेंसी प्रबंधन अधिक कुशल बनेगा और बैंकिंग प्रणाली पर दबाव कम होगा। इसके अतिरिक्त नकली नोटों के विरुद्ध लड़ाई को भी नई मजबूती मिल सकती है। राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी यह एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
कागज की तुलना में पॉलीमर नोट चलते हैं चार गुना ज्यादा
भारतीय कागजी नोट वास्तव में सामान्य कागज से नहीं बल्कि कपास आधारित विशेष कागज से बनाए जाते हैं। इसके विपरीत पॉलीमर नोट प्लास्टिक आधारित विशेष फिल्म पर तैयार किए जाते हैं। दोनों के बीच सबसे बड़ा अंतर उनके चलन के समय में है। एक कागज़ी नोट जहां सीमित अवधि तक ही उपयोगी रहता है, वहीं पॉलीमर नोट इनकी तुलना में सामान्यतः दो से चार गुना अधिक समय तक चल सकते हैं। पॉलीमर नोट पानी से खराब नहीं होते, आसानी से फटते नहीं। उन पर गंदगी कम जमती है तथा उनमें आधुनिक सुरक्षा फीचर जोड़ना अधिक आसान होता है। कई देशों का अनुभव बताता है कि अधिकांश परिस्थितियों में पॉलीमर नोट अधिक प्रभावी सिद्ध हुए हैं। हालांकि प्रारंभिक उत्पादन लागत कागजी नोटों की तुलना में अधिक होती है, लेकिन उनकी लंबी आयु इस अतिरिक्त लागत की भरपाई कर देती है।
पॉलीमर नोटों के और भी हैं बहुते से फायदे
- सबसे पहला फायदा इनका चलन अधिक समय तक होगा। कई देशों के अनुभव बताते हैं कि पॉलीमर नोट कागजी नोटों की तुलना में लगभग तीन से चार गुना अधिक समय तक चलते हैं।
- ये पानी से खराब नहीं होते। बारिश, नमी या गलती से धुल जाने पर भी इनकी गुणवत्ता बनी रहती है।
- इनमें पारदर्शी सुरक्षा विंडो, होलोग्राम और आधुनिक सुरक्षा फीचर जोड़े जा सकते हैं, जिन्हें नकली बनाना अत्यंत कठिन होता है।
- इन पर धूल और बैक्टीरिया कम टिकते हैं, जिससे स्वच्छता बेहतर रहती है। अत्यधिक गर्मी और नमी जैसी परिस्थितियों में भी ये अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करते हैं।
- इन्हें फाड़ना अपेक्षाकृत कठिन होता है। इसके अलावा बार-बार नए नोट छापने की आवश्यकता कम होने से दीर्घकाल में सरकारी खर्च घटता है।
- पर्यावरणीय दृष्टि से भी इनका जीवनचक्र अधिक टिकाऊ माना जाता है क्योंकि इन्हें कम बार बदलना पड़ता है और इनके उपयोग के बाद पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) भी संभव है।
- लंबे समय तक एक जैसी गुणवत्ता बनाए रखने से एटीएम और नोट गिनने वाली मशीनों की कार्यक्षमता बेहतर बनी रहती है।
- आधुनिक अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं के अनुरूप इनकी सुरक्षा और टिकाऊपन वित्तीय प्रणाली में जनता का विश्वास बढ़ाने में सहायक हो सकता है।

दुनिया के यह देश पहले से अपना रहे हैं पॉलीमर नोट
दुनिया में पॉलीमर नोटों का इतिहास लगभग चार दशक पुराना है। सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया ने 1988 में अपनी द्विशताब्दी के अवसर पर पहला पॉलीमर बैंक नोट जारी किया। बाद में उसने पूरी श्रृंखला को पॉलीमर में बदल दिया। इसके बाद न्यूजीलैंड ने 1999 में पॉलीमर नोट अपनाए। इसी साल रोमानिया ने भी अपने बैंक नोट पॉलीमर में जारी किए। वियतनाम ने 2003 से उच्च मूल्यवर्ग के पॉलीमर नोट जारी करने शुरू किए। ब्रुनेई ने 2004 में पॉलीमर नोट अपनाए। कनाडा ने 2011 से 2013 के बीच अपनी पूरी करेंसी श्रृंखला पॉलीमर में परिवर्तित कर दी। यूनाइटेड किंगडम ने 2016 से क्रमशः £5, £10, £20 और £50 के पॉलीमर नोट जारी किए। इसके अलावा मालदीव, सिंगापुर, मलेशिया, पापुआ न्यू गिनी, नाइजीरिया, मेक्सिको, चिली सहित कई देशों ने विभिन्न मूल्यवर्गों में पॉलीमर नोट अपनाए हैं।
मोदी सरकार की आधुनिकीकरण नीतियों के साथ यह भी नई पहल
मोदी सरकार में भारत ने वित्तीय क्षेत्र में अनेक तकनीकी सुधार देखे हैं। डिजिटल भुगतान का वैश्विक मॉडल बन चुका UPI, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT), जनधन खातों का व्यापक विस्तार, आधार आधारित सत्यापन, डिजिटल रुपया (CBDC) के पायलट और आधुनिक सुरक्षा विशेषताओं वाले बैंक नोट, और अब इन सबके बीच पॉलीमर नोटों का परीक्षण भी वित्तीय अवसंरचना को आधुनिक बनाने की व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा माना जा सकता है। पॉलीमर नोटों का परिचालन निर्णय तकनीकी रूप से भारतीय रिजर्व बैंक का विषय है, किंतु व्यापक आर्थिक आधुनिकीकरण, वित्तीय समावेशन और नकदी प्रबंधन को अधिक सक्षम बनाने की दिशा में केंद्र सरकार की नीतियों के साथ यह पहल भी सामंजस्य रखती है।
सुरक्षा विशेषताओं वाली एक नई मुद्रा संस्कृति की ओर भारत
भारत ने समय-समय पर अपनी मुद्रा प्रणाली में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए हैं। सुरक्षा विशेषताओं वाले महात्मा गांधी श्रृंखला के नए नोट, नकदी प्रबंधन की नई व्यवस्था और अब पॉलीमर नोटों का संभावित आगमन इस क्रम की अगली कड़ी हो सकता है। यदि आरबीआई का पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है तो आने वाले वर्षों में भारतीय नागरिकों के हाथों में अधिक टिकाऊ, अधिक सुरक्षित और अधिक आधुनिक बैंक नोट होंगे। यह केवल नोट बदलने का प्रयोग नहीं होगा, बल्कि बदलती अर्थव्यवस्था की बदलती सोच का प्रतीक होगा। विश्व की अग्रणी इकोनॉमी में भारत भी अपने अनुभव और आवश्यकताओं के अनुरूप कदम बढ़ा रहा है। आधुनिक तकनीक, वित्तीय दक्षता और सुरक्षा को एक साथ जोड़ने वाली यह पहल भारतीय मुद्रा व्यवस्था को नई पहचान दे सकती है। यही कारण है कि पॉलीमर नोटों का यह पायलट प्रोजेक्ट केवल एक तकनीकी परीक्षण नहीं, बल्कि भविष्य की भारतीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण संकेत भी माना जा रहा है।









