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टीएमसी के बाद अब उद्धव ठाकरे की ‘सेना’ में टूट, संजय राउत के बिगड़े बोल

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देश में विपक्ष की सियासत इस समय दलबदल और राजनीतिक पुनर्गठन के एक अभूतपूर्व दौर से गुजर रही है। संसद से लेकर राज्यों के सियासी गलियारों तक, क्षेत्रीय दलों के भीतर मची भगदड़ ने भारतीय दलबदल विरोधी कानून की गलियों और राजनीतिक शुचिता के दावों को एक बार फिर कटघरे में खड़ा कर दिया है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 लोकसभा सांसदों के दूसरी छोटी पार्टी में विलय के बाद अब महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव गुट) के 6 सांसदों की बगावत सुर्खियों में है। इसको लेकर शिवसेना सांसद संजय राउत तो गालीगलौज तक पर उतर आए हैं। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में भी समाजवादी पार्टी के कुनबे में टूट की सुगबुगाहट आ रही है। ये महज छिटपुट सियासी घटनाएं नहीं हैं, बल्कि ये देश के राजनीतिक परिदृश्य में आ रहे एक गहरे ढांचागत बदलाव का संकेत हैं। यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि मजबूत दिखाई देने वाले क्षेत्रीय क्षत्रपों के किले भी अब अंदरूनी अंतर्विरोधों और एनडीए की राष्ट्रवादी राजनीति के आकर्षण के कारण ढह रहे हैं।ममता के किले में बड़ी सेंध: टीएमसी सांसदों का विलय
इस पूरे राजनीतिक भूचाल की शुरुआत पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद से हुई, जहां भाजपा ने टीएमसी को रोंदकर सरकार बनाई। विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर का असंतोष ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा। टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 ने एक साथ पार्टी आलाकमान के खिलाफ बगावत कर दी। दलबदल विरोधी कानून की अयोग्यता से बचने के लिए इन बागी सांसदों ने एक कम प्रसिद्ध, पंजीकृत दल ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) में अपने पूरे गुट का विलय कर दिया। लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर केंद्र की सत्तारूढ़ एनडीए सरकार को समर्थन देने का यह फैसला केवल एक तकनीकी विलय नहीं है, बल्कि ममता बनर्जी के एकछत्र नेतृत्व को दी गई अब तक की सबसे बड़ी चुनौती है। एनडीए के पाले में 20 सांसदों के खड़े हो जाने से यह साफ हो गया है कि टीएमसी सियासत के दिन अब पूरी तरह लद गए हैं। इस टूट ने संसद में ममता बनर्जी की ताकत को बेहद सीमित कर दिया है।

उद्धव गुट को एक और झटका: शिवसेना की बगावत
दूसरी ओर महाराष्ट्र की सियासत में शिवसेना (यूबीटी) का संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है। पहले विधानसभा और अब लोकसभा स्तर पर पार्टी को एक और करारे झटके का सामना करना पड़ा है। पार्टी के छह प्रमुख सांसदों, संजय जाधव, संजय देशमुख, नागेश पाटिल, ओमराजे निंबालकर, भाऊसाहेब वाकचौरे और संजय दीना के बागी रुख ने उद्धव ठाकरे खेमे की रीढ़ तोड़ दी है। इस टूट ने पार्टी नेतृत्व की उस संगठनात्मक पकड़ पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसके लिए कभी बाल ठाकरे की शिवसेना जानी जाती थी।हताशा से भरे सांसद संजय राउत गाली गलौज पर उतरे
शिवसेना उद्धव गुट के इन सांसदों के गुट ने अभी किस पार्टी में विलय किया है, यह तो साफ नहीं हुआ है, लेकिन इस बिखराव की तल्खी तब खुलकर सामने आ गई जब पार्टी के मुख्य प्रवक्ता संजय राउत प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपना आपा खो बैठे। संजय राउत ने बागी सांसदों के खिलाफ अभद्र भाषा तथा गाली-गलौज पर उतर आए। राउत का यह गुस्सा और तीखे आरोप दरअसल उस लाचारी और हताशा को दर्शाते हैं, जो एक समय महाराष्ट्र की सत्ता के केंद्र रहे दल के भीतर अपनी जमीन खिसकने के कारण पैदा हुई है। गाली-गलौज की यह राजनीति बताती है कि संवाद के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं।

 

समाजवादी पार्टी पर भी मंडरा रहे हैं बड़ी टूट के बादल
संसद के इस दलबदल चक्र की तपिश अब देश के सबसे बड़े राजनीतिक सूबे उत्तर प्रदेश तक पहुंच चुकी है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के प्रमुख ओमप्रकाश राजभर के इस सनसनीखेज दावे ने यूपी की सियासत में खलबली मचा दी है कि समाजवादी पार्टी के 25 से 26 सांसद पार्टी छोड़ने की तैयारी में हैं और उनके भीतर गहरी फूट पड़ चुकी है। राजनीति में इस तरह के दावों को अक्सर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की रणनीति माना जाता है। समाजवादी पार्टी के लोकसभा में 37 और राज्यसभा में चार सांसद हैं। ऐसे में 25 सांसदों के टूटने की खबरों से पार्टी में हड़कंप की स्थिति बन गई है और सांसदों को रोकने के रणनीति बनाई जा रही है।‘सपा के सांसद टूटने को तैयार हैं, हम तोड़ नहीं रहे हैं’
इस बीच उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के बयान ने इस चर्चा को हवा दे दी है। मौर्य का यह कहना कि’सपा के सांसद टूटने को तैयार हैं, हम तोड़ नहीं रहे हैं’, दरअसल सपा के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान की ओर इशारा करता है। यह बयान दिखाता है कि सत्ता पक्ष विपक्ष के किलों में लगी दरारों को भांप चुका है और केवल सही वक्त का इंतजार कर रहा है। अखिलेश यादव के लिए अपने इस बड़े कुनबे को एकजुट रखना आने वाले दिनों में सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

कमजोर पड़ता क्षत्रपों का नेतृत्व और केंद्रीय सत्ता का आकर्षण
इन तीनों राज्यों के घटनाक्रमों को अगर एक सूत्र में पिरोकर देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि भारत के क्षेत्रीय दल इस समय एक बड़े अस्तित्व के संकट से गुजर रहे हैं। जब तक ये दल सत्ता में रहते हैं या मजबूत दिखते हैं, तब तक इनका अंतर्विरोध दबा रहता है। लेकिन जैसे ही चुनावी हार या राजनीतिक दबाव बढ़ता है, वैसे ही सांसदों और विधायकों का मोहभंग होने लगता है। टीएमसी, शिवसेना और सपा जैसी पार्टियों का ढांचा अक्सर एक ही परिवार या व्यक्ति के इर्द-गिर्द केंद्रित होता है। ऐसे में जब जमीनी स्तर पर नेतृत्व कमजोर पड़ता है, तो महत्वाकांक्षी नेताओं को अपना राजनीतिक भविष्य असुरक्षित लगने लगता है। केंद्रीय सत्ता का संरक्षण और उसके साथ मिलने वाले लाभ इन सांसदों को अपनी मूल पार्टी की विचारधारा को छोड़ने के लिए मजबूर कर देते हैं।

क्षेत्रीय राजनीतिक दल आत्ममंथन करें कि ऐसी नौबत क्यों आई
संजय राउत के बयानों और विपक्ष के अन्य नेताओं की प्रतिक्रियाओं से यह भी साफ है कि विपक्ष की राजनीति में अब गरिमापूर्ण संवाद के लिए कोई जगह नहीं बची है। जब कोई नेता या सांसदों का समूह पार्टी छोड़ता है, तो नेतृत्व को आत्ममंथन करना चाहिए कि आखिर ऐसी नौबत क्यों आई। इसके विपरीत, बागी नेताओं को गद्दार घोषित करना, उनके खिलाफ अमर्यादित भाषा का प्रयोग करना और व्यक्तिगत कीचड़ उछालना अब एक आम चलन बन गया है। यह रवैया राजनीतिक विमर्श के गिरते स्तर को दिखाता है। लोकतंत्र में असहमति और दलबदल की एक कानूनी प्रक्रिया है, लेकिन उसे निजी दुश्मनी और गाली-गलौज के स्तर पर ले जाना देश की लोकतांत्रिक परंपराओं को कमजोर करता है।

दलों ने आंतरिक लोकतंत्र नहीं सुधारा तो भविष्य और चुनौतीपूर्ण
क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का यह खेल उस आम मतदाता के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात है, जो किसी पार्टी की विचारधारा, उसके घोषणापत्र और उसके नेता का चेहरा देखकर अपना वोट देता है। जब चुनाव जीतने के बाद वही जनप्रतिनिधि निजी स्वार्थ या दबाव में आकर विरोधी खेमे में शामिल हो जाता है, तो जनता की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आस्था कम होने लगती है। टीएमसी, शिवसेना और संभावित रूप से सपा के भीतर चल रहा यह घटनाक्रम यह चेतावनी है कि यदि राजनीतिक दलों ने अपनी अंदरूनी लोकतांत्रिक व्यवस्था को नहीं सुधारा और जनमत का सम्मान नहीं किया, तो उनके लिए आने वाला भविष्य और चुनौतीपूर्ण होगा। सत्ता पाना महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक मर्यादाओं की कीमत पर पाई गई सत्ता लंबे समय तक अपनी साख नहीं बचा सकती।

क्या है दलबदल विरोधी कानून का लक्ष्मण रेखा
भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत लागू दलबदल विरोधी कानून मूल रूप से निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के स्वार्थी पाला-बदल को रोकने के लिए बनाया गया था, जिसके तहत यदि कोई सांसद या विधायक स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ता है या सदन में व्हिप (पार्टी निर्देश) के उल्लंघन में मतदान करता है, तो उसकी सदन की सदस्यता तुरंत समाप्त की जा सकती है; हालांकि, इस कानून की सबसे बड़ी कानूनी खिड़की इसके ‘विभाजन और विलय’ संबंधी प्रावधानों में छिपी है, जिसके मुताबिक यदि किसी दल के कुल निर्वाचित सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्य एक साथ मिलकर एक अलग गुट बनाते हैं और किसी अन्य पंजीकृत राजनीतिक दल में अपने गुट का आधिकारिक रूप से विलय कर लेते हैं, तो उन पर दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता की कार्रवाई लागू नहीं होती और उनकी सांसदी या विधायकी पूरी तरह सुरक्षित रहती है। जैसा कि हाल ही में टीएमसी के 20 सांसदों ने किया।

 

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