28-29 सितंबर 2016 की मध्यरात्रि भारतीय सेना के विशेष बलों द्वारा नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पार जाकर आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किए जाने की ऐतिहासिक घटना को अब एक दशक पूरा हो चुका है। सर्जिकल स्ट्राइक के इस 10 वर्ष के पड़ाव ने भारत की सामरिक सोच में आए युगान्तकारी बदलाव को फिर से केंद्र में ला दिया है। जहां 2014 से पहले आतंकी हमलों के बाद भारत की प्रतिक्रिया केवल कागजी डोजियर सौंपने और कूटनीतिक गुहार लगाने तक सीमित रह जाती थी, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने ‘घर में घुसकर मारने’ का स्पष्ट सिद्धांत स्थापित किया। इस एक दशक में देश ने न केवल सीमाओं पर सैन्य निर्णायकता देखी, बल्कि राजनीति के उस दौर को भी देखा जब एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सेना का मनोबल बढ़ाने और उसे आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में निरंतर काम कर रहे हैं, वहीं कांग्रेस पार्टी सेना के शौर्य पर बार-बार सवाल उठाकर उसका मनोबल गिराने का कार्य कर रही है। राहुल गांधी ने तो यहां तक कि सर्जिकल स्ट्राइक को ‘खून की दलाली’ तक कह डाला था।
राहुल गांधी का ‘खून की दलाली’ वाला विवादित बयान
28-29 सितंबर 2016 को एलओसी पार भारतीय सेना के विशेष बलों के सफल पराक्रम के ठीक कुछ दिन बाद, 6 अक्टूबर 2016 को कांग्रेस के तत्कालीन उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने दिल्ली में अपनी ‘किसान यात्रा’ के समापन पर यह विवादित बयान दिया था। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोलते हुए कहा था कि सरकार जवानों के खून के पीछे छिपकर “खून की दलाली” कर रही है। इस बयान को देश भर में भारतीय सेना के सर्वोच्च बलिदान, शौर्य और पेशेवर साख के घोर अपमान के रूप में देखा गया, जिसकी चौतरफा तीखी निंदा हुई।
सेना के सफल ऑपरेशन पर वीडियो और सबूत मांगने की सियासत
सर्जिकल स्ट्राइक की आधिकारिक सैन्य पुष्टि के बावजूद विपक्षी दलों के नेताओं ने सेना के दावे पर अविश्वास जताया। 4 अक्टूबर 2016 को तत्कालीन कांग्रेस नेता संजय निरुपम ने सर्जिकल स्ट्राइक को “फर्जी” (फेक) बताते हुए सरकार और सेना से अभियान के ठोस सबूत सार्वजनिक करने की मांग कर दी थी। इसके साथ ही आम आदमी पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी वीडियो सबूत जारी करने की बात कही थी। भाजपा ने इसे पाकिस्तानी दुष्प्रचार को बल देने और सेना की साख पर प्रश्नचिह्न लगाने वाला कदम करार दिया।
बालाकोट एयरस्ट्राइक की विश्वसनीयता पर सवाल
पुलवामा आतंकी हमले के जवाब में 26 फरवरी 2019 को भारतीय वायुसेना द्वारा पाकिस्तान के बालाकोट स्थित आतंकी कैंपों पर किए गए हवाई हमले के बाद भी विपक्षी नेताओं ने संशय व्यक्त किया। 2 मार्च 2019 को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने खुले तौर पर केंद्र सरकार और वायुसेना से एयरस्ट्राइक के पुख्ता प्रमाण मांगे। यही नहीं, 23 जनवरी 2023 को जम्मू में ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के दौरान भी दिग्विजय सिंह ने फिर दोहराया कि सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट का कोई आधिकारिक सबूत संसद में नहीं दिया गया, जिससे एक बार फिर सेना के पराक्रम पर राजनीति का विवाद गर्माया।
ये नया भारत है, आतंकियों को ब्याज सहित जवाब मिलेगा: पीएम मोदी
पुलवामा हमले और बालाकोट स्ट्राइक पर कांग्रेस नेतृत्व के करीबी सलाहकार सैम पित्रोदा ने जब यह कहकर सेना के पराक्रम पर सवाल उठाया कि पुलवामा के लिए पूरे पाकिस्तान को दोषी ठहराना ठीक नहीं है, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष पर कड़ा प्रहार किया था। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कहा था कि सुरक्षाबलों के शौर्य पर सवाल उठाना विपक्ष की पुरानी आदत बन चुकी है और देश की जनता सेना को अपमानित करने वालों को कभी माफ नहीं करेगी। प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया पर अभियान शुरू करते हुए कहा था कि कांग्रेस आतंक का जवाब देना नहीं जानती थी, लेकिन यह ‘न्यू इंडिया’ है जो आतंकवादियों को उन्हीं की भाषा में और वह भी ब्याज सहित जवाब देना जानता है।
Opposition insults our forces time and again.
I appeal to my fellow Indians- question Opposition leaders on their statements.
Tell them- 130 crore Indians will not forgive or forget the Opposition for their antics.
India stands firmly with our forces. #JantaMaafNahiKaregi https://t.co/rwpFKMMeHY
— Narendra Modi (@narendramodi) March 22, 2019
डोकलाम विवाद के समय राहुल गांधी की चीनी राजदूत से बैठक
जब 2017 में भारत और चीन की सेनाएं डोकलाम पठार पर आमने-सामने डटी हुई थीं, उस अत्यंत संवेदनशील और नाजुक दौर में 8 जुलाई 2017 को राहुल गांधी ने चीनी राजदूत लुओ झाओहुई से मुलाकात की थी। प्रारंभ में कांग्रेस पार्टी ने इस खबर को पूरी तरह खारिज करते हुए ‘फेक न्यूज’ बताया, किंतु चीनी दूतावास द्वारा सोशल मीडिया पर इस बैठक का विवरण जारी किए जाने के बाद कांग्रेस को विवश होकर स्वीकार करना पड़ा कि यह बैठक हुई थी। सीमा पर भारतीय जवानों के कड़े पहरे के बीच विपक्षी नेता की इस गोपनीय कूटनीतिक गतिविधि पर भाजपा ने गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सवाल उठाए थे।
गलवान संघर्ष और भारतीय क्षेत्र पर विपक्ष के बेबुनियाद आरोप
15 जून 2020 को पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में चीनी पीएलए सैनिकों के साथ हुए हिंसक संघर्ष में भारतीय सेना के 20 वीर जवानों ने मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया और चीनी पक्ष को भारी क्षति पहुंचाई। देश जब अपने शहीदों के अदम्य साहस को नमन कर रहा था, तब राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व ने लगातार यह आरोप लगाकर सेना के शौर्य को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया कि चीन ने भारत की जमीन पर कब्जा कर लिया है। भाजपा ने इसे सेना के जवानों के सर्वोच्च बलिदान का अपमान और राष्ट्रीय मनोबल को चोट पहुंचाने वाला दुष्प्रचार बताया।
वैश्विक कूटनीति में बदलाव और भारत के ‘राइट टू सेल्फ डिफेंस’ को मान्यता
सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद वैश्विक पटल पर भारत के कूटनीतिक प्रभाव में ऐतिहासिक परिवर्तन देखा गया। 2016 से पहले जहां पश्चिमी देश भारत को केवल संयम बरतने की नसीहत देते थे, वहीं इन निर्णायक कार्रवाइयों के बाद अमेरिका, फ्रांस और रूस सहित दुनिया के प्रमुख देशों ने आतंकवाद के विरुद्ध भारत के आत्मरक्षा के अधिकार (राइट टू सेल्फ डिफेंस) का खुलकर समर्थन किया। सीमा पार आतंकी ढांचे पर भारत के सटीक प्रहारों और निरंतर कूटनीतिक दबाव का ही परिणाम रहा कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग-थलग पड़ा और उसे वर्षों तक एफएटीएफ (FATF) की निगरानी सूची में बने रहना पड़ा।
जम्मू-कश्मीर के जमीनी हालात: पत्थरबाजी और हड़तालों के दौर से रिकॉर्ड शांति और विकास तक
2016 की सर्जिकल स्ट्राइक ने घाटी में सीमा पार से संचालित होने वाले आतंकी तंत्र की कमर तोड़ने की मजबूत नींव रखी थी। 2019 में अनुच्छेद 370 के निरसन के बाद सुरक्षा एजेंसियों की सक्रिय कार्रवाई से घुसपैठ और आतंकी घटनाओं में भारी गिरावट दर्ज की गई। पूर्ववर्ती दौर में जहां घाटी आए दिन पाकिस्तान प्रायोजित पत्थरबाजी, बंद और हिंसक प्रदर्शनों से पंगु हो जाती थी, वहीं आज जम्मू-कश्मीर में सामान्य जनजीवन, रिकॉर्ड पर्यटन और युवाओं के लिए नए रोजगार अवसरों का नया युग स्थापित हुआ है।
2012 में सेना की खस्ताहाली: जनरल वीके सिंह की चिट्ठी ने खोली थी पोल
मोदी सरकार से पहले सेना की उपेक्षा का सबसे बड़ा प्रमाण 12 मार्च 2012 को तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखी गई पांच पन्नों की गोपनीय चिट्ठी से मिला था। मीडिया में सामने आई इस चिट्ठी में जनरल सिंह ने साफ लिखा था कि सेना की स्थिति अत्यंत कमजोर है और गोला-बारूद लगभग न के बराबर है। उन्होंने आगाह किया था कि टैंकों का गोला-बारूद खत्म हो चुका है, हवाई सुरक्षा उपकरण अप्रचलित हो चुके हैं और पैदल सेना के पास जरूरी हथियारों का भारी अभाव है। उन्होंने लिखा था कि रक्षा मंत्रालय के स्तर पर तैयारियों में भारी ‘खोखलापन’ है, जिससे किसी बड़े हमले की स्थिति में देश की सुरक्षा की गारंटी सेना नहीं ले सकती। यह पत्र यूपीए सरकार के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति उदासीनता का सबसे बड़ा दस्तावेज बन गया था।

रिकार्ड रक्षा उत्पादन और निर्यात में आत्मनिर्भर भारत का परचम
विपक्ष के अविश्वास भरे बयानों और पुरानी सरकारों की उपेक्षा के विपरीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश का रक्षा क्षेत्र ऐतिहासिक बदलाव का साक्षी बना है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का वार्षिक रक्षा उत्पादन 1.78 लाख करोड़ रुपये के ऐतिहासिक आंकड़े पर पहुंच गया है। वहीं, वर्ष 2013-14 में मात्र 686 करोड़ रुपये का होने वाला रक्षा निर्यात 2025-26 में बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया है। यह उछाल प्रमाणित करता है कि भारत अब रक्षा आयातक की लाचारी से निकलकर वैश्विक निर्यातक शक्ति बन चुका है।
अत्याधुनिक सैन्य साजो-सामान और हथियारों से सेना का सशक्तिकरण
सीमा पर तैनात जवानों की सुरक्षा और मारक क्षमता बढ़ाने के लिए मोदी सरकार ने अत्याधुनिक तकनीक उपलब्ध कराने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। राफेल जैसे अत्याधुनिक 4.5 पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की तैनाती, स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान तेजस, देश में निर्मित पहला स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत, दुनिया की सबसे सटीक एस-400 वायु रक्षा मिसाइल प्रणाली और अचूक मार करने वाले पिनाका रॉकेट सिस्टम के माध्यम से सेना की तीनों शाखाओं को आधुनिक तकनीक और अभेद्य सुरक्षा कवच से लैस किया गया है।
सीमावर्ती बुनियादी ढांचे का अभूतपूर्व विकास और सामरिक कनेक्टिविटी
रणनीतिक मोर्चों पर भारतीय सेना की त्वरित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए चीन और पाकिस्तान से लगती सीमाओं पर सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) ने रिकॉर्ड निर्माण कार्य किए हैं। हर मौसम में खुली रहने वाली सामरिक सुरंगों (जैसे अटल टनल, सेला टनल), मजबूत पुलों और आधुनिक ऑल-वेदर सड़कों का व्यापक नेटवर्क तैयार किया गया है। इस मजबूत बुनियादी ढांचे के चलते अब भारी तोपों, टैंकों और सैन्य दस्तों की अग्रिम चौकियों तक पहुंच कुछ ही घंटों में संभव हो गई है, जिसने भारत की रक्षात्मक स्थिति को अत्यंत सुदृढ़ बनाया है।
सैनिक कल्याण, वन रैंक वन पेंशन और ऐतिहासिक संरचनात्मक सुधार
मोदी सरकार ने सीमा पर डटे सैनिकों के सम्मान और प्रशासनिक मजबूती के लिए दशकों से रुके निर्णयों को धरातल पर उतारा। चार दशक से अधिक समय से लंबित पूर्व सैनिकों की ‘वन रैंक वन पेंशन’ (ओआरओपी) की मांग को पूरा कर उनके सम्मान को पुनर्स्थापित किया गया। इसके साथ ही सेना की तीनों शाखाओं के बीच बेहतर सामंजस्य और संयुक्त कार्रवाई के लिए देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) पद का सृजन किया गया, जिससे थियेटर कमान की दिशा में स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े सैन्य सुधार को गति मिली।
निर्णायक नेतृत्व और सेना के शौर्य पर अटूट विश्वास
सर्जिकल स्ट्राइक के 10 वर्ष पूरे होने पर यह स्पष्ट संदेश रेखांकित हुआ है कि भारत की सुरक्षा नीति अब रक्षात्मक मजबूरी से निकलकर सक्रिय प्रतिक्रिया और आत्मनिर्भरता के युग में प्रवेश कर चुकी है। जब-जब राजनीतिक कारणों से देश के सैनिकों के पराक्रम पर सवाल उठाए गए या उनसे सबूत मांगे गए, देश की जनता ने सेना के साथ खड़े होकर उन दावों को खारिज किया। 1.78 लाख करोड़ रुपये के घरेलू रक्षा उत्पादन और 38,424 करोड़ रुपये के रक्षा निर्यात ने यह सिद्ध कर दिया है कि मोदी सरकार में सेना केवल सीमा पर सुरक्षित नहीं है, बल्कि आधुनिक संसाधनों और स्पष्ट राजनीतिक संकल्प के साथ हर चुनौती का मुंहतोड़ जवाब देने में पूरी तरह सक्षम है।









