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चुनाव आयोग के बयान से कांग्रेस का झूठा नैरेटिव ध्वस्त, बेनकाब हुई अराजकता की साजिश

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चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर तीनों चुनाव आयुक्तों की पूर्ण सहमति और सर्वसम्मत निर्णय की आधिकारिक पुष्टि के बाद, संवैधानिक संस्थाओं को कटघरे में खड़ा करने वाले विपक्ष के ‘वोट चोरी’ के नैरेटिव की हवा पूरी तरह निकल चुकी है। मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ छपी मीडिया रिपोर्ट के पीछे कांग्रेस द्वारा लाखों रुपये के विज्ञापनों के भुगतान का सनसनीखेज सच उजागर होने से विपक्ष अब चौतरफा घिर चुका है। 2014 के बाद से 100 से अधिक चुनाव हार चुकी कांग्रेस अपनी निरंतर चुनावी विफलता की हताशा में देश की स्वायत्त संस्थाओं पर सुनियोजित हमले कर रही है। जब जनता लोकतांत्रिक तरीके से खारिज कर देती है, तब संवैधानिक संस्थाओं की साख गिराकर अराजकता फैलाना कांग्रेस की पुरानी फितरत बन चुका है। यह समूचा घटनाक्रम साबित करता है कि कांग्रेस का असल मकसद चुनाव सुधार नहीं, बल्कि देश में संवैधानिक संकट खड़ा करना है। इसी पृष्ठभूमि में संवैधानिक संस्थाओं पर सुनियोजित हमलों को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस के खिलाफ राष्ट्रव्यापी मोर्चा खोल दिया है।

चुनाव आयोग के बयान से कांग्रेस की टूलकिट बेनकाब
चुनाव आयोग ने 26 सितंबर की पूर्ण बैठक के बाद आधिकारिक रूप से स्पष्ट किया कि एसआईआर (SIR) से जुड़ा प्रत्येक प्रशासनिक व नीतिगत निर्णय मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों डॉ. सुखबीर सिंह संधू व डॉ. विवेक जोशी की सर्वसम्मति से लिया गया था। आयोग के भीतर किसी भी मतभेद या आंतरिक असंतोष की बात पूरी तरह निराधार साबित हुई है, जिससे चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और साख पुनः पुष्ट हुई है। इसके बावजूद आयोग में ‘फूट’ का भ्रम फैलाना सीधे तौर पर उस सुनियोजित टूलकिट की पोल खोलता है, जिसका मकसद केवल संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास पैदा करना है। कांग्रेस की यह रणनीति साफ दर्शाती है कि वह स्वायत्त निकायों की प्रतिष्ठा गिराकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के लोकतंत्र की साख को बट्टा लगाने की साजिश रच रही है। विदेशी ताकतों के एजेंडे को हवा देकर घरेलू चुनावी व्यवस्था को संदिग्ध साबित करने की यह चेष्टा देशहित के सर्वथा प्रतिकूल है।

 

‘वोट चोरी नहीं, राहुल का विवेक चोरी हुआ’: फडणवीस
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने राहुल गांधी के आरोपों की धज्जियां उड़ाते हुए कहा कि कांग्रेस ‘संविधान बचाने’ का ढोंग रचकर वास्तव में देश के बुनियादी ढांचे पर प्रहार कर रही है। जब जनता नकार देती है, तो चुनाव आयोग, ईवीएम और न्यायपालिका में खोट निकालना कांग्रेस का तय ढर्रा बन चुका है। फडणवीस ने स्पष्ट किया कि यहाँ कोई वोट चोरी नहीं हुआ, बल्कि राहुल गांधी का राजनीतिक विवेक और दिमाग चोरी हो चुका है। देश की स्वायत्त संस्थाओं पर अनर्गल आरोप मढ़ना सीधे तौर पर भारत के 140 करोड़ नागरिकों के जनादेश का अनादर है। लगातार पराजयों ने कांग्रेस के नेतृत्व को इस हद तक विचलित कर दिया है कि वे अपनी कमजोरियों का आत्ममंथन करने के स्थान पर संवैधानिक संस्थाओं को ही बदनाम करने में जुट गए हैं।

बंगाल और केरल के नतीजे: कांग्रेस के ‘वोट चोरी’ प्रोपेगैंडा का सांख्यिकीय अंत
आंकड़े और चुनावी नतीजे खुद कांग्रेस के आधारहीन आरोपों की पोल खोलते हैं। पश्चिम बंगाल में जहां एसआईआर प्रक्रिया के तहत बड़ी संख्या में डुप्लिकेट और अमान्य नाम हटाए गए, वहां उन विधानसभा क्षेत्रों में विपक्ष यानी तृणमूल कांग्रेस ने 15 से अधिक सीटों पर जीत दर्ज की। इसी प्रकार केरल में भी इसी प्रक्रिया के तहत तैयार मतदाता सूची के आधार पर हुए चुनावों में कांग्रेस और उसके गठबंधन को सफलता मिली। यदि मतदाता सूची का पुनरीक्षण विपक्ष के खिलाफ कोई सुनियोजित साजिश था, तो इन राज्यों में गैर-भाजपा दलों की जीत कैसे संभव हुई? यह सीधा सांख्यिकीय तथ्य साबित करता है कि एसआईआर पर कांग्रेस का विलाप केवल अपनी लगातार हार पर पर्दा डालने का बहाना है। चुनावी अंकगणित जब अपनी पोल खोलने लगे, तो आरोपों की इमारत ताश के पत्तों की तरह ढह जाती है।

नेता प्रतिपक्ष के संवैधानिक पद की गरिमा का हनन
राहुल गांधी अब केवल किसी राजनीतिक दल के सांसद या नेता नहीं हैं, बल्कि वे देश की संसद में नेता प्रतिपक्ष (एलओपी) जैसे गरिमामयी और वैधानिक पद पर आसीन हैं। यह पद कैबिनेट मंत्री के समकक्ष माना जाता है, जिसका दायित्व लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं को मजबूती प्रदान करना होता है। ऐसे जिम्मेदार पद पर बैठकर बिना किसी साक्ष्य के चुनाव आयोग जैसी स्वायत्त संस्था पर ‘वोट चोरी’ और ‘फूट’ जैसे गैर-जिम्मेदाराना आरोप लगाना पद की मर्यादा को तार-तार करना है। देश के विमर्श को तथ्यहीन आरोपों से दूषित करना यह साबित करता है कि राहुल गांधी संवैधानिक दायित्व निभाने के बजाय केवल सस्ती राजनीतिक सनसनी पैदा करने में रुचि रखते हैं। संवैधानिक उत्तरदायित्व का यह खुला त्याग भारतीय संसदीय परंपराओं के लिए भी अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।

संवाद से पलायन और प्रेस वार्ता तक सीमित राजनीति
चुनाव आयोग समय-समय पर सभी मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के साथ परामर्श बैठकें आयोजित करता है, जहां चुनावी सुधारों, मतदाता सूची और तकनीकी मुद्दों पर लिखित सुझाव आमंत्रित किए जाते हैं। इसके विपरीत, कांग्रेस कभी भी इन आधिकारिक और संस्थागत मंचों पर कोई ठोस तकनीकी दस्तावेज या वैकल्पिक रूपरेखा प्रस्तुत नहीं करती। आयोग की बैठकों और वैधानिक चर्चाओं से भागकर केवल मीडिया कैमरों के सामने आकर विलाप करना यह स्पष्ट करता है कि पार्टी का उद्देश्य चुनावी व्यवस्था में सुधार लाना नहीं है। संस्थागत संवाद से दूरी बनाकर सिर्फ प्रेस वार्ताओं के जरिए भ्रम फैलाना कांग्रेस की नकारात्मक राजनीति का प्रमाण है। जब सुधार की वास्तविक प्रक्रिया में भाग लेने की हिम्मत न हो, तब केवल राजनीतिक शोर मचाना पलायनवादी सोच को दर्शाता है।

हाथ में संविधान, पर अनुच्छेद 324 का खुला अपमान
राहुल गांधी द्वारा राजनीतिक रैलियों में संविधान की लाल प्रति लहराकर ‘संविधान रक्षा’ का दावा करना केवल एक दिखावा बनकर रह गया है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग को पूर्ण संवैधानिक स्वायत्तता प्रदान करता है। एक ओर संविधान की प्रति को सार्वजनिक मंचों पर आदर का प्रतीक बताना और दूसरी ओर उसी संविधान से शक्ति प्राप्त करने वाली संस्था पर अनर्गल आरोप मढ़ना कांग्रेस के राजनीतिक पाखंड को उजागर करता है। जब किसी दल के लिए संविधान केवल चुनावी हथियार बन जाए और उसकी मूल भावना का निरंतर अनादर किया जाए, तो जनता के सामने उसका दोहरा चरित्र स्पष्ट हो जाता है। संविधान की सच्ची रक्षा उसके संस्थानों के सम्मान से होती है, न कि उन्हें राजनीतिक लाभ के लिए कठघरे में खड़ा करने से।

सुप्रीम कोर्ट से वैध ठहराई जा चुकी प्रक्रिया पर अनर्गल विलाप
मतदाता सूची पुनरीक्षण और इसके प्रारूप को लेकर विपक्ष द्वारा गढ़े गए संदेहों की न्यायिक समीक्षा पहले ही पूरी हो चुकी है। विपक्षी दलों द्वारा दायर याचिकाओं पर विस्तृत सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई, 2026 को एसआईआर की पूरी प्रक्रिया और इसके वैधानिक प्रारूप को पूर्णतः वैध और संवैधानिक ठहराते हुए इसे जारी रखने की अनुमति दी थी। देश की शीर्ष अदालत की स्पष्ट न्यायिक मुहर के बावजूद इस प्रशासनिक प्रक्रिया को ‘वोट चोरी’ की संज्ञा देना सीधे तौर पर न्यायपालिका के विवेक पर सवाल उठाना है। अदालत में कानूनी तर्क हारने के बाद सार्वजनिक मंचों पर उसी प्रक्रिया को दुर्भावनापूर्ण बताना न्याय व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करने की सोची-समझी कोशिश है। जब शीर्ष अदालत के निर्णय भी विपक्ष को संतुष्ट नहीं कर पाते, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि विरोध नियमों का नहीं, बल्कि पूर्वाग्रह से ग्रस्त है।

सीईसी के खिलाफ रिपोर्ट का सच: कांग्रेस से अखबार को मिले लाखों रुपये के विज्ञापन
मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाने वाली मीडिया रिपोर्ट के पीछे अब बड़े वित्तीय खुलासे सामने आ रहे हैं। सार्वजनिक हुए दस्तावेजी तथ्यों के अनुसार, कांग्रेस पार्टी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के दौरान ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को ₹81.45 लाख से अधिक का भारी-भरकम भुगतान विज्ञापनों के नाम पर किया, जबकि उस राज्य में इस अखबार का सर्कुलेशन बेहद सीमित माना जाता है। यही नहीं, कर्नाटक चुनावों के दौरान भी इसी अखबार पर अन्य समाचार पत्रों की तुलना में असामान्य रूप से अधिक मेहरबानी दिखाई गई। वरिष्ठ अधिवक्ताओं और विश्लेषकों का सीधा आरोप है कि संवैधानिक संस्थाओं के प्रमुख को घेरने वाली यह रिपोर्ट सामान्य पत्रकारिता नहीं, बल्कि वित्तीय लेन-देन से प्रेरित एक सुनियोजित राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा थी। यह सनसनीखेज खुलासा साफ करता है कि चुनाव आयोग जैसी स्वायत्त संस्थाओं को बदनाम करने के पीछे तथ्य कम और राजनीतिक हित साधने की मंशा अधिक सक्रिय थी।

‘अगर वोट चोरी तो बायकाट क्यों नहीं?’: पत्रकार के एक सवाल पर असहज होकर भागे राहुल गांधी
एक तरफ जहां विपक्षी दल चुनाव आयोग, मतदाता सूची और मतदान प्रक्रिया पर लगातार सवाल खड़े कर जनता के बीच अविश्वास पैदा करने की कोशिश करते हैं, वहीं दूसरी तरफ जब इस पर सीधा और तार्किक सवाल पूछा जाता है तो विपक्ष के पास कोई ठोस जवाब नहीं होता। प्रेस वार्ता के दौरान पत्रकार रोहिणी सिंह ने जब राहुल गांधी से दो टूक सवाल किया— “अगर वाकई में वोट चोरी हो रही है और निष्पक्ष चुनाव नहीं हो रहे हैं, तो फिर आप और आपकी पार्टी इन चुनावों का पूरी तरह बायकाट (बहिष्कार) क्यों नहीं कर देते?”—तो इस सवाल पर राहुल गांधी पूरी तरह असहज नजर आए। वे सवाल का सीधा जवाब देने के बजाय “थैंक यू, थैंक यू” कहकर प्रेस वार्ता से किनारा करते दिखे। यह घटना दर्शाती है कि विपक्ष का विरोध केवल राजनीतिक विमर्श खड़ा करने तक सीमित रहता है, जबकि जमीनी हकीकत और तर्कों के सामने उनके आरोप टिक नहीं पाते।

फॉर्म-6 में फेरबदल का झूठ बेनकाब: मूल फॉर्म में नहीं हुआ कोई बदलाव
कांग्रेस द्वारा मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर यह भ्रामक दावा भी फैलाया गया कि चुनाव आयोग ने गुपचुप तरीके से वैधानिक फॉर्म-6 में बदलाव कर दिया है। चुनाव आयोग और भाजपा नेताओं ने स्पष्ट किया कि मूल फॉर्म-6 में कोई भी फेरबदल नहीं किया गया था। वास्तविकता यह है कि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मतदाताओं की प्रविष्टियों के सटीक सत्यापन के लिए केवल एक अलग घोषणा-पत्र ‘एनेक्सचर-डी’ जोड़ा गया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह नियमानुकूल और वैध ठहराया था। नियमों की बुनियादी समझ के बिना तकनीकी प्रक्रिया को तोड़-मरोड़ कर पेश करना यह साबित करता है कि कांग्रेस केवल झूठ के आधार पर जनता में सनसनी फैलाना चाहती थी। वैधानिक सुधारों को षड्यंत्र का रूप देकर पेश करना मतदाताओं को डराने और भड़काने का निकृष्ट प्रयास है।

अधिकारी के डेपुटेशन पत्र को ‘नीतिगत बगावत’ बताकर गढ़ा गया फर्जी नैरेटिव
कांग्रेस और कुछ मीडिया रिपोर्टों में जिस पत्राचार के हवाले से चुनाव आयुक्तों के बीच ‘विद्रोह’ का ढिंढोरा पीटा गया, उसकी असलियत पूरी तरह प्रशासनिक निकली। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि कैबिनेट सचिव को भेजा गया वह पत्र एसआईआर की नीति या किसी चुनावी प्रक्रिया से जुड़ा ही नहीं था, बल्कि वह आयोग में प्रतिनियुक्ति (डेपुटेशन) पर आए एक प्रशासनिक अधिकारी के सेवा संबंधी कामकाज का सामान्य पत्राचार था। एक नियमित प्रशासनिक और सेवा संबंधी फाइल को चुनाव प्रक्रिया में ‘नीतिगत फूट’ और ‘बगावत’ के रूप में प्रचारित करना कांग्रेस की समझ और नीयत दोनों की पोल खोलता है। सामान्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं को आंतरिक फूट की कहानी बनाकर परोसना इस बात का प्रमाण है कि कांग्रेस का सूचना तंत्र केवल अफवाहों पर टिका है।

जब सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को बताया था ‘पिंजरे में बंद तोता’
कांग्रेस शासनकाल में स्वायत्त संस्थाओं के राजनीतिक दुरुपयोग और उनकी स्वतंत्रता को कुचलने का सबसे बड़ा ऐतिहासिक प्रमाण सुप्रीम कोर्ट की वह तीखी टिप्पणी है, जो आज भी कांग्रेस का पीछा करती है। 2013 में यूपीए सरकार के दौरान कोयला आवंटन घोटाले की सुनवाई करते हुए देश की शीर्ष अदालत ने सीबीआई को ‘पिंजरे में बंद तोता’ करार दिया था, जो सिर्फ अपने राजनीतिक आकाओं की बोली बोलता था। अदालत ने यह टिप्पणी तब की थी जब सरकारी मंत्रियों और अधिकारियों द्वारा सीबीआई की जांच रिपोर्ट में मनमाने बदलाव किए गए थे। जिस दल ने अपने लंबे शासनकाल में देश की शीर्ष जांच एजेंसियों को राजनीतिक हथियार बनाकर उनकी साख नष्ट कर दी थी, उसका आज चुनाव आयोग जैसी निष्पक्ष संस्था की स्वायत्तता पर उपदेश देना सबसे बड़ा राजनीतिक ढोंग है।

संवैधानिक मर्यादाओं को दरकिनार करने का पुराना इतिहास
स्वायत्त संस्थाओं पर दबाव बनाना और प्रतिकूल फैसलों पर उन्हें कटघरे में खड़ा करना किसी एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पुरानी राजनीतिक कार्यशैली का हिस्सा रहा है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) द्वारा 2जी स्पेक्ट्रम और कोयला आवंटन में उजागर की गई वित्तीय अनियमितताओं की रिपोर्टों को खारिज करना और तब ‘जीरो लॉस’ का बेतुका तर्क गढ़ना इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। इसी तरह, राफेल सौदे और पेगासस जैसे संवेदनशील मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा क्लीन चिट दिए जाने के बावजूद न्यायिक प्रक्रिया पर अविश्वास जताना और मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव तक लाने का दुस्साहस करना संस्थागत मर्यादाओं के हनन को दर्शाता है। जब-जब संवैधानिक पीठ या जांच एजेंसियां भ्रष्टाचार और नीतिगत अनियमितताओं पर सख्त रुख अपनाती हैं, तभी उन पर राजनीतिक दुर्भावना का आरोप मढ़ दिया जाता है।

‘झूठ फैलाओ और कोर्ट में माफी मांगो’: राहुल गांधी का पुराना राजनीतिक ढर्रा
सार्वजनिक जीवन में बिना किसी साक्ष्य के सनसनीखेज आरोप लगाना और कानूनी शिकंजा कसते ही अदालत में बिना शर्त माफी मांग लेना राहुल गांधी की पहचान बन चुका है। ‘चौकीदार चोर है’ का झूठा नारा गढ़ने के बाद सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर माफी मांगना हो या विभिन्न मानहानि मामलों में अदालतों के चक्कर काटना, यह राजनीतिक कार्यशैली का स्थायी हिस्सा बन चुका है। चुनाव आयोग और मतदाता सूची पर ‘वोट चोरी’ के आधारहीन दावों की उम्र भी बहुत कम है। जब यह मामला तथ्यात्मक और कानूनी कसौटी पर परखा जाएगा, तो राहुल गांधी को एक बार फिर अपने बयानों से पीछे हटकर देश और अदालत के सामने माफी मांगने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। यह आदत दर्शाती है कि कांग्रेस नेतृत्व केवल तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए देश की गरिमा दांव पर लगाता है।

ईवीएम से लेकर वीवीपीएटी तक: अदालत में हर बार मात खाने के बाद नए बहाने की तलाश
चुनाव आयोग पर वर्तमान हमला दरअसल न्यायपालिका में लगातार खारिज हो चुके पुराने बहानों का ही नया संस्करण है। जब-जब चुनाव परिणाम अनुकूल नहीं आए, कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने पहले इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की तकनीकी विश्वसनीयता पर झूठे संदेह पैदा किए। इसके बाद वीवीपीएटी पर्चियों के शत-प्रतिशत मिलान की मांग को लेकर शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया गया, जहां विस्तृत तकनीकी परीक्षणों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सभी याचिकाओं को खारिज कर चुनावी शुचिता पर मुहर लगाई। जब तकनीकी और न्यायिक मोर्चे पर झूठ टिक नहीं पाया, तब पराजय के नए बहाने तलाशते हुए मतदाता सूची और चुनाव आयुक्तों के आंतरिक कामकाज को लेकर ‘विद्रोह’ का फर्जी नैरेटिव गढ़ा गया। यह पराजयवादी मानसिकता हर विफलता के बाद एक नया बलि का बकरा ढूंढने का प्रयास करती है।

स्वस्थ प्रशासनिक संवाद को ‘विद्रोह’ बताने का बचकाना राजनीतिक हथकंडा
चुनाव आयोग एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय है, जहाँ फाइलों पर अधिकारियों और आयुक्तों की टिप्पणियां, विमर्श और तकनीकी आपत्तियां एक सामान्य व स्वस्थ प्रशासनिक प्रक्रिया का अभिन्न अंग हैं। किसी भी संस्था में नीतिगत निर्णयों से पहले होने वाले इस आवश्यक आंतरिक संवाद को एक मीडिया रिपोर्ट के सहारे ‘आंतरिक विद्रोह’ और ‘फूट’ का नाम देना राजनीतिक अपरिपक्वता को दर्शाता है। आयोग ने आधिकारिक रूप से स्पष्ट किया कि सभी अंतिम आदेश पूर्ण विचार-विमर्श के बाद तीनों आयुक्तों की सर्वसम्मति से ही जारी हुए हैं। संस्थागत प्रक्रियाओं की सामान्य कार्यशैली को साजिश का रूप देकर सनसनी फैलाना कांग्रेस के हताश प्रचार तंत्र का प्रमाण है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विचार-विमर्श को कमजोरी नहीं, बल्कि संस्थागत मजबूती का आधार माना जाता है।

फर्जी वोटरों की सफाई पर प्रहार से घबराई कांग्रेस
मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) एक पूर्णतः वैधानिक और तकनीकी प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य फर्जी, दोहरी प्रविष्टि वाले और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाकर सूची को शत-प्रतिशत शुद्ध बनाना है। जब भी चुनावी तंत्र को पारदर्शी और त्रुटिहीन बनाने की दिशा में कड़े कदम उठाए जाते हैं, अवैध और डुप्लिकेट नामों के कटने से चुनावी समीकरण बिगड़ने का भय खड़ा हो जाता है। यही कारण है कि एक विशुद्ध प्रशासनिक और तकनीकी सुधार को राजनीतिक रंग देकर विवाद खड़ा करने का प्रयास किया गया। फर्जी मतदाताओं के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की मंशा रखने वाले दलों को मतदाता सूची का यह शुद्धिकरण रास नहीं आ रहा है, इसलिए इसे ‘वोट चोरी’ का भ्रामक नाम दिया जा रहा है। मतदाता सूची की पारदर्शिता दरअसल वास्तविक मतदाताओं के अधिकारों की सबसे बड़ी गारंटी है।

कानूनी प्रक्रिया से दूरी और केवल मीडिया में सनसनी फैलाने की रणनीति
मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होती है, जिसके तहत ड्राफ्ट रोल सभी पंजीकृत राजनीतिक दलों को औपचारिक रूप से सौंपे जाते हैं। कानून के अनुसार, किसी भी दल को यदि किसी नाम पर आपत्ति हो तो वह अपने बूथ लेवल एजेंट (बीएलए) के माध्यम से निर्धारित प्रपत्र भरकर आधिकारिक दावा दर्ज करा सकता है। कांग्रेस ने इस वैधानिक और संस्थागत रास्ते का उपयोग करने के बजाय सीधे मीडिया कैमरों के सामने आकर आधारहीन आरोप मढ़े। यह रवैया स्पष्ट करता है कि पार्टी का उद्देश्य मतदाता सूची को दुरुस्त कराना नहीं, बल्कि केवल राजनीतिक विवाद और सनसनी पैदा कर देश में संवैधानिक गतिरोध दिखाना था। जमीनी कार्यप्रणाली से बचकर केवल मंचों से शोर मचाना गैर-जिम्मेदाराना राजनीति का सबसे बड़ा लक्षण है।

लाखों निष्पक्ष सरकारी कर्मचारियों और जमीनी तंत्र का अपमान
मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण का कार्य चुनाव आयोग दिल्ली के दफ्तर में बैठकर नहीं करता, बल्कि राज्यों के लाखों प्राथमिक शिक्षक, पटवारी, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) घर-घर जाकर इस कठिन दायित्व को निभाते हैं। बिना किसी साक्ष्य के ‘वोट चोरी’ और ‘फर्जी सूची’ का शोर मचाना वास्तव में उन लाखों निष्पक्ष कर्मचारियों के पसीने और ईमानदारी पर लांछन लगाना है। अपने प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन करने वाले इन जमीनी कर्मियों की निष्ठा पर सवाल उठाकर कांग्रेस ने यह दिखा दिया है कि अपनी चुनावी हताशा में वह देश के पूरे प्रशासनिक ढांचे की साख दांव पर लगाने को तैयार है। कर्तव्यनिष्ठ कर्मियों के आत्मसम्मान को राजनीतिक मोहरा बनाना किसी भी राष्ट्रीय दल के लिए अत्यंत निंदनीय है।

मतदाता सूची पर भ्रम फैलाना करोड़ों नागरिकों के मताधिकार का अनादर
एसआईआर जैसी पारदर्शी तकनीकी प्रक्रिया पर झूठे आरोप मढ़ना देश के जागरूक मतदाताओं के विवेक पर सवाल खड़ा करना है। जब नियमों के अनुरूप प्रत्येक नागरिक के वोट की शुचिता सुनिश्चित की जा रही हो, तब ‘वोट चोरी’ का नैरेटिव गढ़ना उन करोड़ों मतदाताओं का सीधा अपमान है जो भीषण गर्मी और कतारों में खड़े होकर अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं। मतदाताओं की निष्ठा पर संदेह उत्पन्न कर अपनी हार का ठीकरा चुनावी व्यवस्था पर फोड़ना किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं है। जनता द्वारा दिए गए स्पष्ट जनादेश को नकारना और चुनावी व्यवस्था को संदिग्ध बताना वास्तव में लोकतंत्र के सबसे बड़े हितधारक यानी आम नागरिक का तिरस्कार है। जनमत का आदर करना ही लोकतंत्र की प्रथम शर्त है, जिसे कांग्रेस बार-बार भूल जाती है।

जीत पर जश्न, हार पर संस्थाओं को कटघरे में खड़ा करने का दोहरा चरित्र
चुनावी नतीजे खुद कांग्रेस के दोहरे मापदंड को उजागर करते हैं। कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश में जीत मिलने पर यही चुनाव आयोग, यही प्रशासनिक मशीनरी और यही मतदाता सूची पूरी तरह निष्पक्ष मान ली जाती है। इसके विपरीत, जहां भी पराजय हाथ लगती है, वहां तुरंत ‘लोकतंत्र खतरे में है’ और ‘वोट चोरी’ का नैरेटिव गढ़ दिया जाता है। संवैधानिक प्रक्रियाओं के प्रति यह सुविधावादी दृष्टिकोण किसी भी राजनीतिक दल के नीतिगत दिवालियापन का स्पष्ट प्रमाण है। जब विजय अपनी होती है तो संस्थाएं महान हो जाती हैं, लेकिन पराजय मिलते ही उन्हीं संस्थाओं को कठघरे में खड़ा करना कांग्रेस के पाखंड और अवसरवादिता को बेनकाब करता है। यह दोहरा मापदंड जनता के सामने अब पूरी तरह उजागर हो चुका है।

संवैधानिक संस्थाओं को पंगु बनाकर कम्युनिस्ट अराजकता थोपने की साजिश
संवैधानिक संस्थाओं की साख पर बार-बार चोट करने का यह ढर्रा एक गहरे और खतरनाक वैचारिक डिजाइन का हिस्सा है। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा निर्मित संविधान ने चुनाव आयोग, न्यायपालिका, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक और रिजर्व बैंक जैसी स्वायत्त संस्थाओं को लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ बनाया था। इन सभी संस्थाओं को एक-एक कर जनता की नजरों में अविश्वसनीय बनाकर अंततः देश की संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था से नागरिकों का भरोसा डिगाने का प्रयास किया जा रहा है। संस्थागत शून्यता पैदा करके देश को अराजकता और कम्युनिस्ट शैली की राजनीतिक अस्थिरता की ओर धकेलने का यह षड्यंत्र भारत के संप्रभु ढांचे के लिए गंभीर चुनौती है। यह साजिश केवल सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि पूरे संवैधानिक ढांचे को कमजोर करने की चेष्टा है।

आपातकाल की मानसिकता और विदेशी नैरेटिव से साख गिराने का षड्यंत्र
स्वायत्त संवैधानिक निकायों को अपनी मर्जी के अनुसार चलाने और उन पर दबाव बनाने की प्रवृत्ति पुरानी ‘इमरजेंसी मानसिकता’ का ही परिचायक है। घरेलू चुनावी मैदान में लगातार शिकस्त मिलने के बाद वैश्विक मंचों पर जाकर भारत के चुनावी तंत्र और लोकतांत्रिक साख पर सवाल उठाना एक खतरनाक चलन है। विदेशी नैरेटिव के सहारे भारत की संप्रभु व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कठघरे में खड़ा करना सीधे तौर पर देश की लोकतांत्रिक स्थिरता को नुकसान पहुँचाने का प्रयास है। देश के जनादेश को पचा न पाने की स्थिति में बाहरी ताकतों और विदेशी मंचों का सहारा लेकर भारतीय लोकतंत्र की वैधता पर सवाल उठाना देशद्रोह जैसी मानसिकता को दर्शाता है। यह देश की संप्रभुता के साथ सीधे खिलवाड़ करने जैसा है।

संवैधानिक संस्थाओं की साख गिराकर सड़क पर अराजकता पैदा करने का प्रयास
चुनावी प्रक्रिया और संवैधानिक निकायों की निष्पक्षता पर लगातार प्रहार करने की रणनीति का सीधा उद्देश्य प्रशासनिक व्यवस्था में गतिरोध उत्पन्न करना है। जब लोकतांत्रिक जनादेश को स्वाभाविक रूप से स्वीकार नहीं किया जाता, तब संस्थागत अविश्वास का वातावरण बनाकर समर्थकों को भड़काने और व्यवस्था को पंगु करने की जमीन तैयार की जाती है। यह दृष्टिकोण केवल एक संस्था पर प्रहार नहीं, बल्कि समूचे लोकतांत्रिक ताने-बाने को अस्थिर करने का खतरनाक मंसूबा है। जनता में संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करके चुनावी परिणामों को सड़क की लड़ाई में बदलने की यह कोशिश देश की आंतरिक सुरक्षा और शांति के लिए एक बड़ा खतरा है। चुनावी हार का प्रतिशोध सड़कों पर अराजकता फैलाकर नहीं लिया जा सकता।

100 से अधिक चुनावी हार का प्रतिशोध और संवैधानिक अराजकता की साजिश
आंकड़े गवाह हैं कि 2014 के बाद से कांग्रेस देश भर में 100 से अधिक लोकसभा और विधानसभा चुनाव हार चुकी है। लगातार मिलती पराजयों की इस हताशा ने अब संस्थागत अविश्वास पैदा करने की खतरनाक दिशा ले ली है। जनादेश को स्वीकार करने के बजाय संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर कीचड़ उछालना लोकतांत्रिक मर्यादाओं का खुला उल्लंघन है, जिसके लिए देश के सामने जवाबदेही तय होनी चाहिए और बिना शर्त सार्वजनिक माफी मांगी जानी चाहिए। चुनावी राजनीति में जय-पराजय सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन हार के प्रतिशोध में देश के संवैधानिक स्तंभों को ही ढहाने की चेष्टा किसी भी लोकतांत्रिक समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकती। अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बचाने के लिए देश के गौरव को दांव पर लगाना अक्षम्य है।

झूठ की राजनीति का अंत और लोकतांत्रिक मर्यादा की जीत
चुनाव आयोग की आधिकारिक स्पष्टता ने साबित कर दिया है कि पूरा विवाद केवल भ्रम और आधारहीन दावों पर खड़ा किया गया था। देश की जनता अब नकारात्मक राजनीति और संवैधानिक संस्थाओं को दुर्बल करने के प्रयासों को स्वीकार करने के मूड में नहीं है। चुनावी मैदान में पराजित होकर संस्थाओं की साख पर हमला बोलना लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है। जनादेश का सम्मान किए बिना और वास्तविक आत्ममंथन से भागकर कोई भी दल अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस नहीं पा सकता। अंततः सत्य और संवैधानिक मर्यादाओं की विजय हुई है और सुनियोजित झूठ की राजनीति का एक बार फिर देश के सामने पर्दाफाश हो चुका है।

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