मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इन दिनों चुनाव आयोग के कामकाज और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर राजनीतिक विवादों के केंद्र में हैं। इस विवाद की तत्काल वजह भले ही SIR और चुनाव आयोग के कथित मतभेद हों, लेकिन इस कहानी का एक दूसरा पहलू भी है। ज्ञानेश कुमार चुनाव आयोग में आने से पहले उन कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रक्रियाओं का हिस्सा रहे, जो देश की राजनीति और सार्वजनिक जीवन में बेहद संवेदनशील मुद्दे रहे हैं। ज्ञानेश कुमार का लगभग तीन दशक से अधिक लंबा प्रशासनिक करियर उन महत्वपूर्ण सरकारी जिम्मेदारियों से भरा है, जिनमें जम्मू-कश्मीर, अयोध्या, कानून निर्माण, रक्षा उत्पादन, सहकारिता और संसदीय कार्य जैसे संवेदनशील क्षेत्र शामिल रहे हैं। वह चाहे जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने की प्रक्रिया हो, जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन हो, तीन तलाक से जुड़ा कानून हो या अयोध्या मामले के बाद राम मंदिर ट्रस्ट के गठन की प्रशासनिक प्रक्रिया हो। 1988 बैच के केरल कैडर के आईएएस अधिकारी ज्ञानेश कुमार ने केरल में सब-कलेक्टर से लेकर केंद्र सरकार के सचिव तक की जिम्मेदारियां निभाईं हैं।
कांग्रेस का मुस्लिम तुष्टिकरण और ज्ञानेश के करियर के अहम अध्याय
आज की सियासत में यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि ज्ञानेश कुमार के प्रशासनिक करियर के कई अध्याय ऐसे फैसलों से जुड़े रहे हैं, जिन्हें भाजपा और उसके समर्थक लंबे समय से अपने प्रमुख वैचारिक एवं राजनीतिक एजेंडे की उपलब्धियों के रूप में देखते रहे हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस और विपक्ष इन मुद्दों को सिर्फ मुस्लिम तुष्टिकरण के नजरिए से ही देखते रहे हैं। इसलिए आज जब राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेता ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं, तो इसे केवल SIR की तकनीकी प्रक्रिया या चुनाव आयोग के मौजूदा विवाद तक सीमित करके देखना अधूरी तस्वीर होगी। विपक्ष के आरोपों और उसके राजनीतिक रुख को उसके अपने बयानों में ही परखना होगा, लेकिन इतना स्पष्ट है कि ज्ञानेश कुमार का पूर्व प्रशासनिक रिकॉर्ड 370 से लेकर अयोध्या और तीन तलाक तक, आज की राजनीतिक बहस की पृष्ठभूमि में मौजूद है।
आंतरिक असहमति चुनाव में धांधली या वोट बदलने का प्रमाण नहीं
इंडियन एक्सप्रेस की हालिया जांच रिपोर्ट ने चुनाव आयोग के भीतर SIR और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों को लेकर संस्थागत मतभेद सामने रखे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीनों में कम-से-कम 14 बार कुछ फैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की, जिनमें मतदाता पंजीकरण, मतदाता डेटाबेस और SIR से जुड़े निर्णय शामिल थे। इसी रिपोर्ट को आधार बनाकर कांग्रेस और विपक्ष अब चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं और राहुल गांधी के पुराने वोट चोरी वाले आरोपों को सही ठहराने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन यहां तथ्य और राजनीतिक निष्कर्ष को अलग रखना जरूरी है। रिपोर्ट में दर्ज आंतरिक असहमति अपने आप में चुनाव में धांधली या किसी पार्टी के पक्ष में वोट बदलने का प्रमाण नहींहै। यह आयोग के भीतर निर्णय-प्रक्रिया और अधिकारों को लेकर मतभेद का संकेत हो सकती है। ऐसे मतभेद किसी भी संस्था या आयोग की बैठकों में उनके सदस्यों के बीच हो सकते हैं। इसलिए कांग्रेस का यह निष्कर्ष कि मीडिया रिपोर्ट ने “वोट चोरी” या चुनाव परिणामों में हेरफेर को सिद्ध कर दिया, बिल्कुल गलत और नितांत मनगढ़ंत तर्क है।

आइए, जानते हैं कि किन अहम कारणों की वजह से राहुल गांधी, कांग्रेस और विपक्षी नेता मुख्य चुनाव आयुक्त से चिढ़े हुए हैं…
1.अनुच्छेद 370 के फैसले में अहम प्रशासनिक भूमिका
ज्ञानेश कुमार के करियर का सबसे चर्चित अध्याय जम्मू-कश्मीर से जुड़ा है। मई 2016 में उन्हें गृह मंत्रालय के जम्मू-कश्मीर डिविजन में संयुक्त सचिव बनाया गया था। 2019 में, जब अनुच्छेद 370 से संबंधित संवैधानिक बदलाव और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ी, तब वे इसी क्षेत्र से जुड़े महत्वपूर्ण दायित्व संभाल रहे थे। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, 2019 में उन्होंने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक की ड्राफ्टिंग में भूमिका निभाई थी। इससे जम्मू-कश्मीर से धारा 370 खात्मे की जमीन तैयार हुई। इस विधेयक के जरिए तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में पुनर्गठित किया गया।
2.तीन तलाक कानून की तैयारी बनाम कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण
गृह मंत्रालय में रहते हुए ज्ञानेश कुमार का काम केवल जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं रहा था। 2019 में तीन तलाक को अपराध बनाने वाले कानून की तैयारी में भी उन्होंने अहम योगदान दिया था। फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक वे तीन तलाक संबंधी कानून की ड्राफ्टिंग से जुड़े अधिकारियों में शामिल रहे हैं। यानी एक ही दौर में वे देश के दो अत्यंत संवेदनशील विधायी और सामाजिक मुद्दों से जुड़े प्रशासनिक काम का हिस्सा रहे। कांग्रेस के लिए यह दोनों ही मुद्दे उसकी मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के खिलाफ थे।
3.अयोध्या मामले और राम मंदिर ट्रस्ट की प्रक्रिया का अहम हिस्सा
रामजन्मभूमि अयोध्या में राम लला का मंदिर दशकों से भाजपा का अहम मुद्दा रहा है। अयोध्या मामले के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राम मंदिर निर्माण की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम था श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन। 2020 में गृह मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव रहते हुए ज्ञानेश कुमार उस विशेष व्यवस्था से जुड़े थे, जिसके तहत अयोध्या मामले से संबंधित दस्तावेजों और केंद्र सरकार की जिम्मेदारियों को संभाला गया। विश्वसनीय रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने ट्रस्ट के गठन की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण प्रशासनिक भूमिका निभाई।
4. पश्चिम बंगाल चुनाव में पहली बार हिंसा-रहित, भाजपा जीती
पश्चिम बंगाल में चुनाव हमेशा ही हिंसा और बवाल से भरे हैं। लेकिन 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले ज्ञानेश कुमार ने चुनाव आयोग की ओर से हिंसा, डराने-धमकाने और चुनावी दबाव के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति घोषित की। आयोग ने व्यापक वेबकास्टिंग और सुरक्षा व्यवस्था पर जोर दिया। पश्चिम बंगाल में ज्ञानेश कुमार ने अवैध बांग्लादेशी नागरिकों के नाम हटाने और मतदाता सूची को पूरी तरह से शुद्ध किया। मतदान के बाद राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान कोई मौत और बड़े पैमाने की हिंसा नहीं हुई। शांतिपूर्ण हुए इस चुनाव भाजपा ने बहुमत प्राप्त किया, जो कांग्रेस और इंडी गठबंधन को रास नहीं आया।
5. दुनिया के सबसे बड़े चुनाव के प्रबंधन में सहभागिता की
ज्ञानेश कुमार 31 जनवरी 2024 को सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद कुमार मार्च 2024 में चुनाव आयोग के सदस्य बने। उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया में चुनाव आयोग के सदस्य के रूप में काम किया। IIT कानपुर की आधिकारिक प्रोफाइल पर भी दर्ज है कि उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े चुनाव के रूप में 2024 लोकसभा चुनाव प्रबंधन का काम पूरी कुशलता से देखा। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के फेयर इलेक्शन की बाद में अमेरिका तक ने सराहना की, लेकिन कांग्रेस और विपक्ष को इसमें भी खोट नजर आई। चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है और जहां ठोस प्रमाण हों, उनकी जांच भी होनी चाहिए। लेकिन कांग्रेस हार के कारणों की पड़ताल करते समय संगठन, नेतृत्व, स्थानीय राजनीति, गठबंधन और जनता के विरोध को नजरअंदाज करती रही है।
6. सहकारिता मंत्रालय में तीन नए राष्ट्रीय संस्थानों की स्थापना
इतना ही नहीं, ज्ञानेश कुमार का एक महत्वपूर्ण कार्यकाल सहकारिता मंत्रालय में सचिव के रूप में भी रहा है। उनके कार्यकाल में मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव सोसाइटीज (संशोधन) अधिनियम, 2023 के साथ तीन राष्ट्रीय सहकारी संस्थाओं, भारतीय बीज सहकारी समिति, नेशनल कोऑपरेटिव ऑर्गेनिक्स लिमिटेड और नेशनल कोऑपरेटिव एक्सपोर्ट लिमिटेड के गठन की दिशा में काम हुआ। सहकारिता मंत्रालय में रहते हुए ज्ञानेश कुमार सहारा समूह की सहकारी समितियों के जमाकर्ताओं के पैसे लौटाने की व्यवस्था से भी जुड़े रहे। 2023 में लॉन्च किए गए CRCS-सहारा रिफंड पोर्टल के जरिए पात्र जमाकर्ताओं के दावों की ऑनलाइन प्रक्रिया शुरू हुई। तत्कालीन सहकारिता सचिव ज्ञानेश कुमार सहित मंत्रालय के अधिकारियों ने रिफंड प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में काम किया।
7. SIR के बावजूद कांग्रेस और दूसरे दल कैसे बना रहे सरकार
चुनाव आयोग के अनुसार 2024 के बाद पहले चरण में बिहार में SIR हुआ, जबकि दूसरे चरण में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, गुजरात, केरल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गोवा, अंडमान-निकोबार, लक्षद्वीप और पुडुचेरी शामिल थे। यानी पहले दो चरणों में कुल 13 राज्य/केंद्रशासित प्रदेश में एसआईआर हुआ। इनमें विधानसभा चुनाव के बाद उपलब्ध तस्वीर भी महत्वपूर्ण है। 2026 में SIR वाले पांच राज्यों असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी में चुनाव हुए। असम में भाजपा 82 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी और सत्ता बरकरार रही। केरल में कांग्रेस 63 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी और कांग्रेस-नेतृत्व वाला UDF सत्ता में आया। तमिलनाडु में कांग्रेस केवल 5 सीटें जीत सकी और सरकार TVK के नेतृत्व में बनी। पश्चिम बंगाल में भाजपा ने सरकार बनाई, जबकि पुडुचेरी में AINRC सबसे बड़ी पार्टी बनी और भाजपा ने 4 सीटें जीतीं। इसलिए यह कहना कि भाजपा ने अपने हित में एसआईआर कराया या वोट काटे, बिल्कुल सटीक नहीं होगा। क्योंकि SIR वाले चुनावी राज्यों में भाजपा सिर्फ असम और पश्चिम बंगाल में सत्ता में आई। कांग्रेस ने केरल में सरकार बनाई, तमिलनाडु और पुडुचेरी में क्रमशः TVK और AINRC प्रमुख रहे। बिहार में SIR के बाद 2025 में NDA सत्ता में लौटा।
8. दशकों से कई राज्यों में कांग्रेस वापसी नहीं हुई तो क्या आयोग दोषी
अगर आज हर चुनावी हार का कारण “वोट चोरी” बताया जा रहा है, तो इस दावे को 2024 से पहले के कांग्रेस के राजनीतिक इतिहास की कसौटी पर भी परखना होगा। ज्ञानेश कुमार के चुनाव आयुक्त बनने से पहले जिन राज्यों में कांग्रेस दशकों तक सत्ता से बाहर रही, वहां की हर हार के लिए कौन जिम्मेवार है। तमिलनाडु में कांग्रेस 1967 के बाद सत्ता में नहीं लौटी। पश्चिम बंगाल में 1977 के बाद कांग्रेस की सरकार नहीं बनी। उत्तर प्रदेश में 1989 के बाद कांग्रेस सत्ता से बाहर है। गुजरात में भी 1990 के चुनाव ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। त्रिपुरा में 1993 के बाद कांग्रेस सत्ता में नहीं लौटी। ओडिशा में 2000 के बाद उसका शासन समाप्त हो गया। नागालैंड में 2003 में कांग्रेस की दस साल पुरानी सरकार चली गई और गोवा में 2012 के चुनाव के बाद कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। इन राज्यों में कांग्रेस की हार का लंबा इतिहास उस समय का है, जब न ज्ञानेश कुमार चुनाव आयुक्त थे और न आज की तरह भाजपा केंद्र की सत्ता में थी। इसलिए लोकतांत्रिक राजनीति में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या दशकों से अलग-अलग राज्यों में मतदाताओं के कांग्रेस को नकारने को ईवीएम की खामी या वोट चोरी से कैसे जोड़ा जा सकता है।
चुनाव आयोग की छवि खराब करने की सुनियोजित साजिश
भारत का चुनाव आयोग दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में निष्पक्ष चुनावों के संचालन के लिए जाना जाता है। लेकिन चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संस्थाओं पर बार-बार सवाल उठाना और विभिन्न मंचों पर भारतीय चुनावी प्रणाली को कटघरे में खड़ा करने से देश के लोकतंत्र की साख को नुकसान पहुंचाता है। इस तरह देश की करोड़ों जनता द्वारा निर्वाचित सरकार और पूरी चुनाव प्रक्रिया को अवैध बताना जनादेश का अपमान है। अपनी राजनीतिक हार स्वीकार करने के बजाय जनता में भ्रम और अविश्वास फैलाने से देश में असंतोष बढ़ सकता है, जिससे लोकतांत्रिक स्थिरता को खतरा उत्पन्न हो सकता है और अराजकता पैदा हो सकती है। लेकिन अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए राहुल गांधी चुनाव आयोगी की विश्वसनीयता खत्म कर भारतीय लोकतंत्र की हत्या करने के मिशन पर काम कर रहे हैं।
दोनों चुनाव आयुक्तों ने जो मुद्दे उठाए हैं, उनमें से ज्यादातर वही हैं, जो SIR के बाहर पहले से उठ रहे थे. लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अपने साथियों की चिंताओं को दूर करने की कोशिश नहीं की.
जानिए इंवेस्टिगेशन पर क्या कहता है इंडियन एक्सप्रेस का सम्पादकीय. pic.twitter.com/K5jfQ9hanQ
— Indian Express Hindi (@IEhindi) September 24, 2026
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट और EC पर राहुल के सवाल
चुनाव आयुक्तों को लेकर सामने आई द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पर विपक्षी नेताओं ने सवाल उठाए। राहुल गांधी ने कथित मतभेद की रिपोर्ट को आधार बनाकर एक बार फिर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग खासकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्च खोल दिया। आंतरिक मतभेदों की रिपोर्टों का हवाला देते हुए राहुल गांधी ने आयोग के कामकाज की निष्पक्षता पर सवाल उठाए। गुरुवार (24 सितंबर) की शाम को राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार से इस्तीफे की मांग की। इस दौरान उन्होंने ज्ञानेश कुमार को सरकारी गवाह बन जाने की सलाह दी। राहुल गांधी ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश ने वोट चोरी की है। वे देशद्रोही हैं। मैंने उनकी नियुक्ति का विरोध किया था, लेकिन सरकार ने मेरी बात नहीं मानी।
ज्ञानेश कुमार को अपने गलत कामों के नतीजे समझने चाहिए।
उनके दोनों जूनियर अधिकारियों ने बहुत अच्छा काम किया है। उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से ‘वोट चोरी’ की बात स्वीकार कर ली है।
मैं ज्ञानेश कुमार को सलाह दूंगा कि वे सरकारी गवाह बनें और असली गद्दारों का पर्दाफाश करें।
— राहुल गांधी… pic.twitter.com/N9qcHjqvTe
— Sandeep Khasa (@SamKhasa_) September 24, 2026
पत्रकारों के सवालों ने राहुल गांधी की खोली पोल
राहुल गांधी ने गुरुवार (24 सितंबर) को दिल्ली के इंदिरा भवन में एक 55 मिनट का प्रेजेंटेशन दिया। इस प्रेजेंटेशन का शीर्षक ‘Destroyers of Democracy’ था। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री शाह समेत 19 लोगों की तस्वीरें दिखाईं। उन्होंने कहा कि यह सभी लोकतंत्र को खत्म कर रहे हैं। राहुल ने कहा कि लोकतंत्र को खत्म करने वालों को सजा मिलनी चाहिए। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की जांच होनी चाहिए। राहुल ने अमित शाह का वह वीडियो दिखाया, जिसमें उन्होंने भाजपा की 14 से 30 साल तक सरकार रहने की बात कही थी। इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी का ‘400 पार’ वाला बयान दिखाया। लेकिन प्रेजेंटेशन के आखिर में सवाल और जवाब का दौर चला, जिसमें पत्रकारों के तीखे सवालों ने ‘लोकतंत्र की हत्या’ के मिशन पर निकले राहुल गांधी की पोल खोल दी।
LIVE: Press Conference | Indira Bhawan, New Delhi https://t.co/knirJWJju9
— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) September 24, 2026
वोट चोरी मामले में राहुल ने इंदिरा गांधी को किया बेनकाब
सवाल नंबर 1: राहुल जी आपने कहा कि पिछले तीन वर्षों से इस इश्यू को उठा रहे हैं, वोट चोरी को लेकर नए नए खुलासे भी हो रहे हैं। तो आपको कब और क्यों महसूस हुआ कि वोट चोरी की जा रही है?
राहुल गांधी: देखिए, फील मैं आपको बताता हूं। जब मैं 7 साल का था, 1977 में इंदिरा गांधी पीएम थीं। हर कोई जानता था, खुद उनको भी पता की वह हार जाएंगी। महसूस हो जाता है कि आप हार जाएंगे। आपकी फीलिंग एक बार गलत हो सकती है, दो बार गलत नहीं हो सकती। दो-तीन चुनाव ऐसे थे जब हम टेक्निकली देख रहे थे। धीरे-धीरे वोट चोरी का शक बढ़ने लगा। फिर हम उस पर काम करने लगे।
रिपोर्टर – आपको कैसे पता वोट चोरी हो रही है
राहुल गांधी – देखिए मेरे पास कोई सबूत तो नहीं है लेकिन मुझे फीलिंग है कि वोट चोरी हो रहा है 🤡अब इस नशेड़ी की फिलिंग से देश चलेगा..😆🤣🤣😆 pic.twitter.com/LfOQSKoOLC
— 🇮🇳Jitendra pratap singh🇮🇳 (@jpsin1) September 24, 2026
सड़कों पर उतरने के सवाल पर बरगलाने लगे राहुल गांधी
सवाल नंबर 2: आपने कहा कि ज्ञानेश कुमार को तुरंत हटाया जाना चाहिए। इस्तीफा होना चाहिए। अपने अप्रूवर (गवाह) की सलाह दी है। अगर उन्होंने आपकी सलाह नहीं मानी तो क्या आप सड़कों पर उतरेंगे? जिस तरह आप सीजेपी आंदोलन के दौरान उतरे थे।
राहुल गांधी: देखिए, जैसे मैंने पहले कहा कि ये जो सिचुएशन है। ये हिन्दुस्तान में पहले कभी नहीं हुआ है। हम नई जगह पहुंच गए हैं। ये जो चेन टूटी है। ये हिन्दुस्तान की मॉडर्न हिस्ट्री में कभी नहीं टूटी है। हमने अचानक पाया कि देश में वोट, कानून, संस्था और संविधान के बीच की कड़ी टूट गई है। सबको पता है कि सिस्टम डैमेज हो चुका है।
राहुल गांधी झूठ फैलाने में माहिर हैं लेकिन जब इनसे प्लान मांगा जाता है तो यह चूहे की तरह छुप जाते हैं।
पत्रकारों के तीखे सवालों का सामना करने की इनकी औकात नहीं है इसलिए यह स्क्रिप्टेड रटन चालू कर देते हैं।
नया इलाका और टूटा हुआ सिस्टम चिल्लाना इस बात की पुष्टि करता है कि यह पूरी… pic.twitter.com/vjGyCdjjv3— रेखा चौबे (@Tiwari_1oct) September 24, 2026
चुनावों के बहिष्कार के सवाल पर बुरे फंसे राहुल गांधी
सवाल नंबर 3: क्या कोई ऐसा वक्त आएगा जब आप चुनावों का बहिष्कार करेंगे?
राहुल गांधी: धन्यवाद, धन्यवाद…मैं Distraction में नहीं जाऊंगा। मैं ध्यान भटकाने वाली चीज़ों से बचता हूं। बहुत बहुत धन्यवाद…।
राहुल की बोलती बंद
सवाल था “अगर वोट चोरी हो रही है तो आप चुनाव का बहिष्कार क्यों नहीं कर रहे हो” pic.twitter.com/bj2gXoeN30
— Ms.Bhumi (@ibmindia20) September 25, 2026
DU और PU छात्र संघ चुनावों में जेन-जी का राहुल को जवाब
सवाल नंबर 4: राहुल जी आपने कहा कि वोट डिस्ट्रॉय हो रहे हैं। एक प्रोसेस चल रहा है SIR, उस प्रोसेस में एक तरफ जहां करोड़ों लोग बाहर हो रहे हैं, वहीं जेन-जी के लिए अपना नाम जुड़वाना मुश्किल हो रहा है। रजिस्ट्रेशन में दिक्कत आ रही है। तो उसपर आप क्या कहेंगे।
राहुल गांधी: भाजपा को पता है कि जेन-जी इनके खिलाफ आवाज उठा रहे हैं और वो उन्हें वोट नहीं देना चाहते। वो हो रहा हैं। लेकिन एक और खतरनाक चीज हो गई है कि चुनाव आयोग का वोटर लिस्ट से कंट्रोल खत्म हो गया है। उसकी विश्वसनीयता खत्म हो गई है। वे भी इसे मान भी रहे हैं। और मुझे उनके बीच आपस की बातचीत की जानकारी है।
इन्हें पता है कि Gen Z इन्हें वोट नहीं देगा, और ऐसा ही हो भी रहा है- राहुल गांधी..#RahulGandhi #congress #Gyaneshkumar #EC #votechori @INCIndia @RahulGandhi pic.twitter.com/rmUsUAFyae
— News Muni (@newswalemuni) September 24, 2026
यह पहली बार नहीं है, जब राहुल गांधी वोट चोरी के मुद्दे पर घिरे हों, इससे पहले भी कई बार पत्रकारों के सवालों ने उनके लोकतंत्र की हत्या के मिशन को उजागर किया है…
वोट चोरी के मामले में कोर्ट जाने के सवाल पर फंसे राहुल गांधी
सवाल नंबर 5 : सर, आपने कहा कि आपके पास पुख्ता सबूत है। ब्लैक और ह्वाइट सबूत है। तो क्या चुनाव आयोग अभी जवाब नहीं देता है तो कोर्ट का रूख करेंगे। क्या ये विकल्प है आपके पास, जाएंगे ?
राहुल गांधी: देखिए, मैंने कहा कि मेरा काम एक विपक्ष के नेता के रूप में नॉर्मल सिचुएशन में मेरा काम ऑपोजिशन का रोल है। सरकार पर प्रेसर डालने का रोल है। मेरा काम हिन्दुस्तान के लोकतंत्र को बचाने का नहीं है। मैं वो काम कर रहा हूं। स्टेज पर मैं वो काम कर रहा हूं।
24 घंटे वोट चोरी , वोट चोरी चिल्लाउंगा लेकिन सुप्रीम कोर्ट नहीं जाऊंगा ….
गजब का टोपी बाज है पप्पू पिछतीस 😂😂 pic.twitter.com/CzqHwC9mdp
— Singh’am (@ASD24X7) September 25, 2026
SIR के दौरान एक भी आपत्ति नहीं उठाने पर फंसे राहुल
सवाल नंबर 6: आप लगातार वोट चोरी का खुलासा कर रहे हैं। पर इसके जो नतीजे हैं उसमें देखने को मिल रहा है कि एसआईआर दर एसआईआर और जो बिहार का एसआईआर हुआ उसमें अगस्त से लेकर अक्टूबर तक का समय हमारे पास उपलब्ध था। क्या कारण था कि एक भी जो आपत्ति है इस दौरान नहीं उठाई गई और आप जिस तरह से कह रहे हैं कि ये लोकतंत्र के लिए खतरा है। तो वोट चोरी रुकेगी कैसे?
राहुल गांधी: मैम, वोटर लिस्ट की निष्ठा (सटीकता) बनाए रखना राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी नहीं है। अगर वोटर लिस्ट गलत है, तो यह मेरी समस्या नहीं है। यह चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वह वोटर लिस्ट की निष्ठा की गारंटी दे। मैं जाकर कह सकता हूँ कि मुझे लगता है यह गलत है, मुझे लगता है वह गलत है। लेकिन अंतिम अथॉरिटी चुनाव आयोग ही है।
रिपोर्टर के ये पूछने पर कि बिहार का SIR जब हुआ तो अगस्त से लेकर अक्टूबर तक एक भी आपत्ति क्यों नहीं उठाई गई?
राहुल गांधी कहते हैं कि अगर वोटर लिस्ट में गलती है तो ये मेरी समस्या नहीं है।
जब ये आपकी समस्या है ही नहीं तो फिर बेबुनियाद आरोप लगाने की आवश्यकता ही क्यों है? pic.twitter.com/syDBlsOL7I
— Political Kida (@PoliticalKida) November 5, 2025









