Home समाचार जनादेश Illegal, संविधान की हत्या करने वाले कांग्रेस के फैसले Legal!

जनादेश Illegal, संविधान की हत्या करने वाले कांग्रेस के फैसले Legal!

SHARE

आज जब कांग्रेस संविधान की किताब हाथ में लेकर लोकतंत्र, चुनाव आयोग और संवैधानिक संस्थाओं को लेकर सवाल उठा रही है, तब उसके अपने शासनकाल के इतिहास पर नजर डालना भी जरूरी हो जाता है। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के लंबे शासन में ऐसे कई मौके आए, जब सरकार के फैसलों और संविधान की मूल भावना के बीच टकराव दिखाई दिया। कभी संविधान संशोधन के जरिए न्यायिक समीक्षा की सीमा बदलने की कोशिश हुई, कभी आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों और प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगे और कभी राज्यों की निर्वाचित सरकारों को अनुच्छेद 356 के तहत हटाने के फैसले अदालतों की कसौटी पर खरे नहीं उतरे। न्यायपालिका की वरिष्ठता से जुड़े विवादों से लेकर प्रधानमंत्री के चुनाव को न्यायिक चुनौती से बचाने के प्रयास तक, इन घटनाओं ने भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर गंभीर बहस को जन्म दिया।

इन घटनाओं का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इनमें से कई मामलों में अंततः न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ा। संविधान केवल राजनीतिक भाषणों का विषय नहीं है, बल्कि सत्ता में रहते हुए उसके प्रावधानों और संस्थाओं का सम्मान करने की कसौटी भी है। इसलिए जनादेश को Illegal कहने वाली कांग्रेस के खेल को समझने के साथ ही उसके शासनकाल के शर्मनाक इतिहास को भी जानना जारूरी है। 

25. आंध्र प्रदेश में मुस्लिम आरक्षण का विवाद (2004)

2004 में आंध्र प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने मुस्लिम समुदाय के कुछ सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए 5% आरक्षण की व्यवस्था की थी। आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने सितंबर 2004 में इसे रद्द कर दिया। इसके बाद सरकार ने संशोधित व्यवस्था के तहत 2007 में 14 पिछड़े मुस्लिम समूहों के लिए 4% आरक्षण लागू किया। इस व्यवस्था को भी अदालत में चुनौती मिली। इससे सरकार के आरक्षण संबंधी फैसले पर संवैधानिक और कानूनी सवाल खड़े हुए।

24. सजायाफ्ता जनप्रतिनिधियों को बचाने वाला अध्यादेश (2013)

2013 में UPA सरकार एक अध्यादेश लाई थी, जिसका उद्देश्य दोषी ठहराए गए सांसदों को तत्काल अयोग्यता से बचाना था। सुप्रीम कोर्ट ने उसी वर्ष जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8(4) को रद्द कर दिया था। राहुल गांधी ने सितंबर 2013 में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उसकी प्रति फाड़ दी। मार्च 2023 में सूरत की अदालत ने मानहानि मामले में राहुल गांधी को दो साल की सजा सुनाई। इसके बाद लोकसभा ने उन्हें सांसद पद से अयोग्य घोषित कर दिया।

23. पी.जे. थॉमस की CVC नियुक्ति रद्द (2010–11)

सितंबर 2010 में पी.जे. थॉमस को केंद्रीय सतर्कता आयुक्त नियुक्त किया गया। उनकी नियुक्ति प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने की थी। उस समय थॉमस का नाम केरल के पामोलीन आयात मामले में आरोपी के रूप में दर्ज था। इसके बावजूद उन्हें देश की शीर्ष भ्रष्टाचार-रोधी निगरानी संस्था का प्रमुख बनाया गया। मार्च 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी नियुक्ति रद्द करते हुए चयन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। इस फैसले ने संवैधानिक संस्थाओं में नियुक्तियों की पारदर्शिता और कांग्रेस सरकार की जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल उठे। 

22. नौवीं अनुसूची के जरिए न्यायिक समीक्षा से बचाने का प्रयास (2007)

1951 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने भूमि सुधार कानूनों को अदालत में चुनौती से बचाने के लिए नौवीं अनुसूची बनाई थी। बाद में इसमें सैकड़ों कानून शामिल किए गए और उन्हें न्यायिक समीक्षा से संरक्षण मिलता रहा। 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में डाले गए कानूनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला दिया। अदालत ने कहा कि अगर ऐसे कानून संविधान के मूल ढाँचे से जुड़े मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं, तो उनकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। साफ है कि कांग्रेस अपने फायदे के लिए मनमर्जी से संविधान में फेरबदल करती रही।  

21. बिहार विधानसभा का विघटन और सुप्रीम कोर्ट का फैसला (2005–06)

2005 में बिहार में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के बाद तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह की रिपोर्ट के आधार पर विधानसभा भंग कर दी गई। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, जहां अदालत ने विधानसभा भंग करने के राष्ट्रपति के फैसले को असंवैधानिक करार दिया। मामले में अदालत ने संवैधानिक प्रक्रिया और राज्यपाल की भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। यह फैसला आज भी संविधान के संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक जनादेश से जुड़े प्रमुख संवैधानिक मामलों में गिना जाता है। घटना ने यह सवाल भी उठाया कि बहुमत का परीक्षण सदन के भीतर होने से पहले ही विधानसभा भंग करने का केंद्र की कांग्रेस सरकार का फैसला कितना उचित था।

20. असम का IMDT Act रद्द (2005)

1983 में असम में अवैध प्रवासियों की पहचान के लिए Illegal Migrants (Determination by Tribunals) Act बनाया गया था। इसके तहत किसी व्यक्ति को विदेशी साबित करने की जिम्मेदारी शिकायतकर्ता पर थी। 12 जुलाई 2005 को सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को असंवैधानिक घोषित कर दिया। अदालत ने माना कि यह व्यवस्था अवैध प्रवासियों की पहचान और निष्कासन के लिए प्रभावी नहीं थी। साफ है कि कांग्रेस की मंशा घुसपौठियों को देश के निकालने के बदले, इस मामले में कानूनी पैंतरे अपनाकर संरक्षण देने की थी। 

19. झारखंड में सरकार गठन का विवाद (2005)

2005 के झारखंड विधानसभा चुनाव के बाद त्रिशंकु विधानसभा बनी, लेकिन सरकार गठन को लेकर तत्कालीन राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी की भूमिका पर सवाल उठे। उन्होंने सबसे बड़े गठबंधन को पहले अवसर देने के बजाय शिबू सोरेन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। सोरेन सदन में बहुमत साबित नहीं कर पाए और कुछ ही दिनों में मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा। इसके बाद अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में सरकार बनी। पूरे घटनाक्रम ने राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका, बहुमत के परीक्षण और कांग्रेस नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के रवैये को लेकर गंभीर राजनीतिक बहस को जन्म दिया।

18. झारखंड में मधु कोड़ा सरकार का गठन (2006)

2006 में निर्दलीय विधायक मधु कोड़ा के मुख्यमंत्री बनने से झारखंड की राजनीति में सत्ता समीकरणों को लेकर नई बहस छिड़ी। कोड़ा को कांग्रेस, झारखंड मुक्ति मोर्चा और अन्य दलों का समर्थन मिला, जिससे बिना किसी बड़े दल के नेतृत्व के सरकार का गठन हुआ। कांग्रेस के समर्थन से एक निर्दलीय विधायक का मुख्यमंत्री बनना उस समय सत्ता के लिए कांग्रेस की शर्मनाक राजनीति का एक बड़ा उदाहरण है। इसने दल-बदल, राजनीतिक समर्थन और सरकार गठन में सिद्धांतों बनाम सत्ता-समीकरणों को लेकर सवाल खड़े किए। 

17. एयरवेव्स पर सरकारी नियंत्रण को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला (1995)

1995 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एयरवेव्स सार्वजनिक संपत्ति हैं और उनका इस्तेमाल व्यापक जनहित में होना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि प्रसारण माध्यम पर सरकार का एकाधिकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विचारों की विविधता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हो सकता। उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और दूरदर्शन एवं आकाशवाणी के जरिए प्रसारण पर सरकारी नियंत्रण की व्यवस्था थी। इस फैसले से कांग्रेस के इस रवैया का पता चलता है कि कांग्रेस संविधान और नियम-कायदों को अपनी पार्टी की जागीर समझती है। 

16. गिरधर गोमांग और वाजपेयी सरकार का विश्वास मत (1999)

17 अप्रैल 1999 को लोकसभा में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के विश्वास मत के दौरान ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री गिरधर गोमांग ने मतदान किया। इस मतदान में सरकार एक वोट से गिर गई। बाद में इस बात को लेकर संवैधानिक और राजनीतिक बहस हुई कि मुख्यमंत्री रहते हुए लोकसभा सदस्य के रूप में उनका मतदान किस संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

15. एस.आर. बोम्मई और राष्ट्रपति शासन का मामला (1989)

1989 में कर्नाटक की एस.आर. बोम्मई सरकार के बहुमत पर सवाल उठाते हुए तत्कालीन राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की। उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और राज्य सरकार को हटाने के फैसले ने अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जिसने 1994 के ऐतिहासिक फैसले में राष्ट्रपति शासन लगाने की शक्ति पर महत्वपूर्ण संवैधानिक सीमाएं तय कीं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी सरकार के बहुमत का फैसला राजभवन की रिपोर्ट के बजाय विधानसभा के पटल पर होना चाहिए। 

14. शाहबानो मामले के बाद कानून (1985–1986)

1985 में सुप्रीम कोर्ट ने शाह बानो मामले में तलाकशुदा मुस्लिम महिला के गुजारा भत्ते के अधिकार को मान्यता दी। इसके बाद राजीव गांधी सरकार ने 1986 में Muslim Women (Protection of Rights on Divorce) Act पारित किया और शाह बानो फैसले के प्रभाव को सीमित करने का प्रयास किया। इस पूरे घटनाक्रम ने न्यायपालिका के फैसले, संसद की कानून बनाने की शक्ति और तत्कालीन कांग्रेस सरकार के राजनीतिक रवैये के बीच संबंध को लेकर लंबी संवैधानिक बहस को जन्म दिया।

13. हरियाणा में सरकार गठन का विवाद (1982)

1982 के हरियाणा विधानसभा चुनाव के बाद देवीलाल के नेतृत्व वाले गठबंधन ने बहुमत का दावा किया, लेकिन तत्कालीन राज्यपाल जी.डी. तापसे ने भजनलाल को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और राज्यपाल के इस फैसले को लेकर केंद्र के राजनीतिक प्रभाव के आरोप सामने आए। चुनावी जनादेश के बावजूद सरकार गठन के इस घटनाक्रम से कांग्रेस की नीयत पर सवाल उठते रहे  हरियाणा का यह मामला कांग्रेस के शासनकाल में राज्यपाल के पद की निष्पक्षता को लेकर उठे विवादों का एक और उदाहरण है। 

12. न्यायपालिका में वरिष्ठता की परंपरा का उल्लंघन (1977)

1977 में एच.आर. खन्ना से वरिष्ठता में नीचे होने के बावजूद एम.एच. बेग को मुख्य न्यायाधीश बनाया गया। यह नियुक्ति उस दौर में न्यायपालिका की स्वतंत्रता और वरिष्ठता की परंपरा को लेकर बहस का विषय बनी।

11. 42वां संविधान संशोधन (1976)

1976 में आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने 42वां संविधान संशोधन पारित किया, जिसे संविधान के सबसे व्यापक संशोधनों में गिना जाता है। इसके जरिए प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़े गए तथा ‘राष्ट्र की एकता’ को ‘राष्ट्र की एकता और अखंडता’ किया गया। इसी संशोधन से लोकसभा और विधानसभा का कार्यकाल पांच से बढ़ाकर छह वर्ष किया गया। संशोधन में केंद्र और संसद की शक्तियों को बढ़ाने तथा न्यायिक समीक्षा की भूमिका सीमित करने वाले कई प्रावधान भी शामिल किए गए। आपातकाल की पृष्ठभूमि में किए गए इन बदलावों ने सत्ता के केंद्रीकरण और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर बहस को जन्म दिया।

10. आपातकाल और मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध (1975–1977)

25 जून 1975 को राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल घोषित किया। इसके बाद विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं, प्रेस सेंसरशिप लागू हुई और नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक प्रतिबंध लगे। आपातकाल करीब 21 महीने चला और मार्च 1977 में समाप्त हुआ।

09. इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द और उसके बाद आपातकाल (1975)

12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा गांधी के 1971 के रायबरेली चुनाव को अमान्य घोषित किया। अदालत ने चुनाव में सरकारी अधिकारियों के इस्तेमाल से जुड़े आरोपों को स्वीकार किया। इंदिरा गांधी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। 24 जून को अंतरिम राहत मिली, लेकिन लोकसभा में मतदान के अधिकार पर रोक बनी रही। इसके अगले दिन देश में आपातकाल घोषित कर दिया गया।

08. प्रधानमंत्री के चुनाव को न्यायिक चुनौती से बचाने की कोशिश (1975)

आपातकाल के दौरान 39वां संविधान संशोधन किया गया। इसके तहत प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव से जुड़े विवादों के न्यायिक परीक्षण को विशेष तरीके से सीमित किया गया। संशोधन की पृष्ठभूमि में इलाहाबाद हाई कोर्ट का इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द करने वाला फैसला भी था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित प्रावधानों की संवैधानिक सीमाओं पर फैसला दिया।

07. न्यायपालिका की वरिष्ठता परंपरा का उल्लंघन (1973)

25 अप्रैल 1973 को ए.एन. रे को भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया, जबकि उनसे पहले तीन वरिष्ठ जज, जे.एम. शेलट, के.एस. हेगड़े और ए.एन. ग्रोवर थे। यह नियुक्ति Kesavananda Bharati फैसले के तुरंत बाद हुई और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर व्यापक बहस का कारण बनी। सुप्रीम कोर्ट ने Kesavananda Bharati मामले में संविधान की मूल संरचना के सिद्धांत को स्थापित किया था।

06. 25वां संविधान संशोधन और संपत्ति अधिकार (1971–1973)

25वें संविधान संशोधन ने संपत्ति के अधिकार और राज्य की नीति के कुछ निर्देशात्मक सिद्धांतों के बीच संतुलन को बदलने का प्रयास किया। इसके बाद Kesavananda Bharati मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संसद की संशोधन शक्ति की सीमा तय करते हुए कहा कि संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं किया जा सकता। यह फैसला भारतीय संवैधानिक इतिहास में न्यायिक समीक्षा और संसद की शक्ति के संबंध में महत्वपूर्ण माना जाता है।

05. संविधान संशोधन और आपातकाल की न्यायिक समीक्षा (1975)

1975 में आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने 38वां संविधान संशोधन किया। इसके जरिए राष्ट्रपति और राज्यपाल की ‘संतुष्टि’ से जुड़े कुछ फैसलों को अदालत में चुनौती देने की संभावना सीमित करने का प्रयास किया गया। संशोधन ने आपातकाल और अध्यादेश जैसे मामलों में कार्यपालिका के फैसलों को न्यायिक समीक्षा से बचाने वाले प्रावधान भी जोड़े। यह बदलाव ऐसे समय किया गया, जब देश में आपातकाल लागू था और नागरिक स्वतंत्रताओं पर पहले ही कई प्रतिबंध लगाए जा चुके थे। 

04. 100 से अधिक बार राष्ट्रपति शासन का इस्तेमाल

उपलब्ध संसदीय और संवैधानिक रिकॉर्ड के अनुसार, कांग्रेस के केंद्रीय शासन के विभिन्न दौरों में राष्ट्रपति शासन का इस्तेमाल 100 से अधिक बार हुआ। यह आंकड़ा अपने आप में उस दौर में केंद्र और राज्यों के बीच राजनीतिक संबंधों तथा कांग्रेस की सरकारों द्वारा अनुच्छेद 356 के दुरूपयोग को सामने लाता है। 

03. अनुच्छेद 356 का दुरूपयोग

आजादी के बाद अनुच्छेद 356 के तहत राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाने का प्रावधान कई बार इस्तेमाल हुआ। कांग्रेस के लंबे शासनकाल में इसका इस्तेमाल बड़ी संख्या में किया गया और विभिन्न राज्यों की निर्वाचित सरकारों को इस प्रावधान के जरिए हटाया गया।

02. केरल की कम्युनिस्ट सरकार की बर्खास्तगी (1959)

31 जुलाई 1959 को जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने केरल की ईएमएस नंबूदरीपाद सरकार को बर्खास्त कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया। यह फैसला अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल को लेकर भारतीय राजनीति के शुरुआती बड़े विवादों में शामिल रहा।

01. पहला संविधान संशोधन (1951)

1951 में जवाहरलाल नेहरू सरकार ने पहला संविधान संशोधन किया। इसके जरिए मौलिक अधिकारों, विशेषकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ‘उचित प्रतिबंधों’ से जुड़े प्रावधान बदले गए। भूमि सुधार कानूनों को न्यायिक चुनौती से बचाने के लिए नौवीं अनुसूची भी जोड़ी गई। संविधान लागू होने के करीब 15 महीने के भीतर हुए इस व्यापक संशोधन को लेकर संसद और न्यायपालिका की शक्तियों एवं मौलिक अधिकारों की सीमा पर बहस हुई।

कांग्रेस के शासनकाल की इन घटनाओं को एक साथ देखने पर भारतीय लोकतंत्र का ऐसा अध्याय सामने आया है, जिसमें संविधान में किए गए बदलावों और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने के प्रयासों पर गंभीर सवाल उठते हैं।

इसलिए आज जब कांग्रेस संविधान की रक्षा की बात करती है और उसे लेकर सवाल उठाती है, तो उसके सामने उसके अपने शासनकाल का यह इतिहास भी खड़ा दिखाई देता है। संविधान किसी राजनीतिक दल की जागीर नहीं है और न ही उसे राजनीतिक सुविधा के अनुसार इस्तेमाल किया जा सकता है।

इतिहास के ये पन्ने कांग्रेस के आज के संवैधानिक दावों और उसके शासनकाल में लिए गए फैसलों के बीच के अंतर को सामने रखते हैं। ऐसे में ‘संविधान खतरे में है’ जैसे राजनीतिक नैरेटिव पर भी सवाल उठना है। 

देश के लोग कांग्रेस के इस खेल को अच्छी तरह समझते हैं। संविधान और लोकतंत्र के नाम पर किए जाने वाले कांग्रेस के राजनीतिक तमाशों और वास्तविक शासन-व्यवहार के बीच अंतर उसपर लोगों के भरोसे को आज भी कम कर रहा है। 

Leave a Reply