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Mamta के सियासी अस्तित्व की सबसे मुश्किल घड़ी, TMC में शिवसेना जैसा ‘ऑपरेशन’

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तृणमूल कांग्रेस में शिवसेना जैसा घमासान मच गया है और ममता दीदी बेहद मुश्किल में आ गई हैं। पश्चिम बंगाल के सियासी समर में वह भूचाल आ चुका है, जिसकी कल्पना शायद खुद को अजेय समझने वाली ममता बनर्जी ने कभी नहीं की होगी। तृणमूल कांग्रेस के भीतर ममता बनर्जी की हिटलरशाही के खिलाफ सुलग रही असंतोष की चिंगारी अब एक ऐसी राजनीतिक दावानल बन चुकी है, जिसने ‘दीदी’ के अभेद्य किले की बुनियाद को हिलाकर रख दिया है। नई दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के दफ्तर से बाहर निकलते बागी गुट के 10 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल और उनके नेता ऋतब्रत बनर्जी के आत्मविश्वास से भरे चेहरे इस बात की साफ गवाही दे रहे हैं कि कोलकाता से लेकर दिल्ली के गलियारों तक ममता दीदी की राजनीतिक सत्ता अब गंभीर संकट में है। यह महज एक साधारण बगावत नहीं है, बल्कि बंगाल की धरती पर महाराष्ट्र की उस सियासत की हूबहू पुनरावृत्ति है, जिसने उद्धव ठाकरे से उनकी विरासत, उनकी पार्टी और उनका चुनाव चिह्न तक छीन लिया था। आज सियासत का इतिहास खुद को कोलकाता में दोहरा रहा है और सारे समीकरण चीख-चीखकर कह रहे हैं कि ममता बनर्जी की अपनी ही पार्टी से छुट्टी होने की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है।‘मां, माटी, मानुष’ के नारे का अंत और दीदी की ढहती साख
ऋतब्रत बनर्जी का यह बयान कि “हम ही असली TMC हैं, चुनाव आयोग ने हमारी बात सुनी” महज एक राजनीतिक वक्तव्य नहीं है, बल्कि यह बंगाल की राजनीति में आ चुके नए युग की उद्घोषणा है। ‘मां, माटी, मानुष’ का जो नारा कभी बंगाल की सत्ता के शीर्ष पर ममता बनर्जी को स्थापित करने का माध्यम बना था, आज उसी नारे की आत्मा को ममता की हिटलरशाही के चलते उनके अपने ही करीबियों ने उनसे छीन लिया है। ममता बनर्जी इस समय पूरी तरह से अलग-थलग पड़ चुकी हैं। उनके पास न तो विधायकों का समर्थन बचा है, न सांसदों का संख्याबल और न ही संगठन पर वह पुरानी मजबूत पकड़। जिस तरह से उन्होंने विपक्षी एकता और राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर खुद को स्थापित करने की कोशिश की थी, उनकी वह सारी महत्वाकांक्षाएं अब ताश के पत्तों की तरह ढह चुकी हैं। चुनाव आयोग के आगामी फैसले के साथ ही बंगाल की राजनीति से ममता युग का अवसान और ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाली नई राजनीति का उदय लगभग तय हो चुका है। इतिहास गवाह है कि जब राजा अपनी प्रजा और अपने ही सिपहसालारों का विश्वास खो देता है, तो उसका साम्राज्य बिखरने में देर नहीं लगती। ममता बनर्जी आज उसी बिखराव के चौराहे पर खड़ी हैं, जहां से उनकी वापसी की राहें लगभग बंद हो चुकी हैं।‘ममता ब्रांड पॉलिटिक्स’ के अंत की पटकथा की शुरुआत
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित हार के बाद से ही पार्टी के भीतर ममता बनर्जी के तानाशाही रवैये और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली को लेकर भारी आक्रोश था। 3 जून को जब 80 में से 58 विधायकों ने ममता बनर्जी के नेतृत्व को खारिज करते हुए खुद को अलग कर लिया, तो वह ‘ममता ब्रांड पॉलिटिक्स’ के अंत की आधिकारिक पटकथा की शुरुआत थी। इसके बाद 15 जून को दिल्ली में जो हुआ, उसने ममता खेमे को पूरी तरह पंगु बना दिया। 20 सांसदों का एक साथ पार्टी छोड़कर त्रिपुरा की अनाम सी नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी (NCPI) में विलय कर लेना कोई मामूली घटना नहीं है। यह ममता बनर्जी के राष्ट्रीय और प्रांतीय दोनों स्तंभों को एक साथ ढहा देने जैसा है।महाराष्ट्र की तर्ज पर बंगाल में टीएमसी में आंतरिक विस्फोट
इस बगावत का पैटर्न पूरी तरह से ‘शिवसेना मॉडल’ पर आधारित है। विधायकों और सांसदों का यह पलायन केवल दल-बदल नहीं है, बल्कि यह पार्टी के भीतर एक नए और व्यापक जनमत का उदय है जो पुरानी लीडरशिप को पूरी तरह नकार चुका है। दरअसल, राजनीति में जब इतिहास खुद को दोहराता है, तो वह अधिक क्रूर और निर्णायक होता है। महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे ने जब शिवसेना से विद्रोह किया था, तब महाविकास अघाड़ी के सिपहसालार इसे महज कुछ विधायकों का असंतोष बता रहे थे। लेकिन कानून और संख्याबल के तराजू पर जब उस विद्रोह को तोला गया, तो उद्धव ठाकरे के हाथ से सब कुछ फिसल गया। आज तृणमूल कांग्रेस के भीतर का परिदृश्य भी बिल्कुल वैसा ही है।बागियों का संख्याबल ममता के सियासी अस्तित्व के लिए ‘डेथ वारंट’
भारतीय राजनीति में चुनाव चिह्न और पार्टी का नाम किसी भी क्षेत्रीय दल की आत्मा होते हैं। ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट ने गुरुवार दोपहर चुनाव आयोग के समक्ष जो दस्तावेज पेश किए हैं, वे ममता बनर्जी के राजनीतिक अस्तित्व के लिए डेथ वारंट साबित हो सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के सादिक अली मामले (1969) के ऐतिहासिक फैसले और चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के पैराग्राफ 15 के तहत चुनाव आयोग किसी भी दल के विभाजन के समय ‘बहुमत के सिद्धांत’ को ही सर्वोपरि मानता है। जब चुनाव आयोग किसी पार्टी के असली हकदार का फैसला करता है, तो वह मुख्य रूप से दो मोर्चों पर जांच करता है…

1.विधायी विंग में बहुमत: बागी गुट के पास विधानसभा में 80 में से 58 विधायकों का खुला समर्थन है। यह संख्या कुल विधायकों का 72.5 प्रतिशत है, जो कि दल-बदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) के तहत आवश्यक दो-तिहाई (66.6%) के आंकड़े से कहीं अधिक है। यही कारण है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष ने बिना किसी कानूनी अड़चन के ऋतब्रत बनर्जी को ‘नेता प्रतिपक्ष’ के रूप में मान्यता दे दी है।
2.सांगठनिक विंग में कब्जा: बागी गुट ने 22 जून को कोलकाता में एक विशेष सत्र बुलाकर ममता बनर्जी को अध्यक्ष पद से हटाकर नई राष्ट्रीय कार्य समिति (NWC) और नए सांगठनिक ढांचे का गठन किया। इस नई कार्यकारिणी के दस्तावेज आयोग को सौंपकर उन्होंने संगठन पर भी अपना दावा मजबूत कर लिया है।

तीनों रणनीतिक मोहरे इस समय ऋतब्रत बनर्जी के पास
दरअसल, जिन अचूक तथ्यों के आधार पर चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र में शिवसेना सुप्रीमो रहे उद्धव ठाकरे को दरकिनार कर एकनाथ शिंदे गुट को ‘असली शिवसेना’ माना और ‘तीर-कमान’ चिह्न सौंपा था, वे सारे के सारे अकाट्य तथ्य इस समय तृणमूल कांग्रेस के बागी गुट के पक्ष में खड़े हैं। विधायकों का दो-तिहाई से अधिक बहुमत, सांसदों का भारी बहुमत से अलग होना और संगठन के भीतर समानांतर तख्तापलट, ये तीनों रणनीतिक मोहरे इस समय ऋतब्रत बनर्जी के पास हैं। ऐसे में चुनाव आयोग के पास बागी गुट के दावे को स्वीकार करने और उन्हें ही ‘असली टीएमसी’ मानने के अलावा कोई विधिक विकल्प नजर नहीं आता।ममता दीदी की छुट्टी लगभग तय, टीएमसी (एम) ही सहारा
इस आक्रामक राजनीतिक बिसात का सबसे कड़वा सच यह है कि ममता बनर्जी अपनी हिटलरशाही, अहंकार और परिवारवाद के चलते ‘तृणमूल कांग्रेस’ से बेदखल होने की कगार पर खड़ी हैं। जब चुनाव आयोग बागी गुट को असली टीएमसी घोषित कर देगा और घास और ‘जोड़ा फूल’ (ट्विन फ्लावर्स) का चुनाव चिह्न उन्हें सौंप देगा, तब ममता बनर्जी के पास अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए केवल एक ही रास्ता बचेगा- एक नई राजनीतिक पार्टी का गठन। राजनीतिक विश्लेषकों और अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि इस स्थिति में ममता बनर्जी को ‘तृणमूल कांग्रेस (ममता)’ यानी TMC (M) नाम से नया दल बना सकती हैं। लेकिन एक नई पार्टी बनाना और उसके लिए एक नए, अपरिचित चुनाव चिह्न के साथ जनता के बीच जाना किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है। जिस ‘जोड़ा फूल’ के सिंबल पर बंगाल की जनता दशकों से मुहर लगाती आई है, उसका छिन जाना ममता बनर्जी के कैडर को मानसिक और सांगठनिक रूप से तोड़कर रख देगा। ममता बनर्जी के लिए यह स्थिति बेहद अपमानजनक और राजनीतिक रूप से आत्मघाती होगी।

अहंकार, विश्वासघात और पतन: बगावत की टाइमलाइन
असली तथ्य तो यह है कि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस का यह किला एक दिन में नहीं ढहा है। विधानसभा चुनाव से पहले ही पार्टी के भीतर असंतोष का जो ज्वालामुखी सुलग रहा था, वह चुनाव में करारी शिकस्त के बाद पिछले दो महीने में सिलसिलेवार तरीके से फट रहा है। इस पूरे महा-विद्रोह की टाइमलाइन इस प्रकार है…

  • 4 मई (विधानसभा चुनाव के नतीजे): पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की करारी और ऐतिहासिक हार हुई। हार का ठीकरा ममता बनर्जी के तानाशाही रवैये और अभिषेक बनर्जी की त्रुटिपूर्ण चुनावी रणनीति पर फूटा। वरिष्ठ नेताओं और जमीन से जुड़े विधायकों की अनदेखी शुरू हुई, जिससे आंतरिक गुटबाजी चरम पर पहुंच गई।
    3 जून (विधायकों का विद्रोह): बगावत का पहला और सबसे घातक विस्फोट हुआ। टीएमसी के कुल 80 विधायकों में से 58 विधायकों ने सामूहिक बैठक की और ममता बनर्जी के नेतृत्व के प्रति अविश्वास जताते हुए खुद को आधिकारिक तौर पर मूल पार्टी से अलग कर लिया। इस गुट ने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुना।
    8 जून (विधायिका में वैधानिक कब्जा): बागी गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने 58 विधायकों के हस्ताक्षर वाला समर्थन पत्र पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष को सौंपा। कानूनी बाध्यताओं और स्पष्ट दो-तिहाई बहुमत को देखते हुए विधानसभा अध्यक्ष ने ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में ‘नेता प्रतिपक्ष’ के रूप में वैधानिक मान्यता दे दी, जिससे ममता बनर्जी का विधायी नियंत्रण समाप्त हो गया।
    15 जून (सांसदों का पलायन और विलय): ममता बनर्जी को दूसरा बड़ा झटका दिल्ली और पूर्वोत्तर से लगा। टीएमसी के 20 लोकसभा और राज्यसभा सांसदों ने एकमुश्त पार्टी छोड़ दी। कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए इन सभी 20 सांसदों ने त्रिपुरा की सक्रिय पार्टी ‘नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी’ (NCPI) में अपना पूर्ण विलय कर लिया। इस कदम ने ममता बनर्जी की राष्ट्रीय पार्टी की हैसियत और संसद में उनके रसूख को पूरी तरह मटियामेट कर दिया।
    22 जून (सांगठनिक तख्तापलट): बागी गुट ने कोलकाता में पार्टी के असंतुष्ट पदाधिकारियों, जिला अध्यक्षों और डेलिगेट्स का एक ‘विशेष राष्ट्रीय सत्र’ बुलाया। इस सत्र में सर्वसम्मति से ममता बनर्जी और उनकी पुरानी कोर कमेटी को भंग कर दिया गया। एक नई राष्ट्रीय कार्य समिति (NWC) का गठन किया गया और ऋतब्रत बनर्जी को सांगठनिक मोर्चे पर भी सर्वेसर्वा चुन लिया गया।
    2 जुलाई (चुनाव आयोग में दावा): ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में बागी गुट का 10 सदस्यीय हाई-प्रोफाइल प्रतिनिधिमंडल नई दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मिला। बागी गुट ने विधायकों और सांगठनिक पदाधिकारियों के बहुमत के अकाट्य दस्तावेज, 22 जून के सांगठनिक बदलावों की मिनट्स कॉपी और कानूनी हलफनामे सौंपकर टीएमसी नाम और चुनाव चिह्न पर अपना अंतिम व आधिकारिक दावा ठोक दिया।

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