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भारत में ‘तख्तापलट’ की विदेशी साजिश: सीआईए की तर्ज पर दिल्ली को बंधक बनाने का विफल प्रयास

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भारत वैश्विक मंच पर अपनी मजबूत अर्थव्यवस्था, कूटनीति और तकनीकी प्रगति के दम पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। वर्तमान में भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और जल्द ही तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है। वैश्विक मंदी और अनिश्चितता के दौर में भी भारत का यह तेज विकास कई विदेशी ताकतों को रास नहीं आ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में भारत न केवल विकास की पटरी पर सरपट दौड़ रहा है, बल्कि ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के जरिए रक्षा, विनिर्माण और तकनीक जैसे अहम क्षेत्रों में विदेशी निर्भरता को समाप्त कर रहा है। इससे उन पश्चिमी और विदेशी ताकतों के व्यापारिक हितों को गहरी चोट पहुंची है जो भारत को केवल एक उपभोक्ता बाजार बनाए रखना चाहते थे। इसी बौखलाहट में भारत की पूर्ण बहुमत वाली राष्ट्रवादी सरकार को अस्थिर करने के लिए अंतरराष्ट्रीय और वामपंथी तंत्र पूरी ताकत से सक्रिय हो उठा है। कभी छात्र आंदोलन तो कभी संवैधानिक स्वायत्तता के नाम पर राजधानी दिल्ली में सुनियोजित अस्थिरता फैलाने की कोशिश की जा रही है। 2026 के हालिया घटनाक्रम स्पष्ट करते हैं कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए की ‘रेजिम चेंज’ (सत्ता परिवर्तन) थ्योरी की तर्ज पर भारत में भी अराजकता का विदेशी मॉडल थोपने की साजिश रची गई, जिसे दिल्ली पुलिस के संयम और देश की सजग जनता ने पूरी तरह विफल कर दिया है।

शिक्षा से लेकर चुनाव आयोग तक: सुनियोजित विरोध का क्रम
दिल्ली के जंतर-मंतर पर पहले सीजेपी नामक संगठन के जरिए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर महीने भर चले हंगामे का मंच तैयार किया गया। इसके बाद अचानक पूरा नैरेटिव मोड़कर मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे पर केंद्रित कर दिया गया। इस पूरे क्रम में विपक्ष के प्रमुख नेताओं के साथ-साथ जर्मनी में बैठे प्रभावशाली डिजिटल क्रिएटर्स और विदेशी नैरेटिव चलाने वाले चेहरे एक साथ एक ही सुर में बोलते नजर आए। चुनावी हार से हताश पूरा विपक्षी गठबंधन इस षड्यंत्र में मुखर होकर शामिल हो गया। संवैधानिक प्रक्रियाओं का सम्मान करने के बजाय सीधे संस्थाओं के प्रमुखों को निशाना बनाना इस सुनियोजित स्क्रिप्ट का पहला चरण था।

12 अक्तूबर का सुप्रीम कोर्ट मार्च: संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव की रणनीति
जब चुनाव आयोग के बाहर किया गया प्रदर्शन जनसमर्थन जुटाने में नाकाम रहा, तो 12 अक्तूबर 2026 को राहुल गांधी के नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकालने का एलान किया गया। एसआईआर (SIR) से जुड़ी याचिकाओं पर अदालत के स्वतंत्र निर्णय की प्रतीक्षा किए बिना, सर्वोच्च न्यायिक संस्था पर दबाव बनाने का यह प्रयास सीधे तौर पर संस्थागत साख को कमजोर करने की मंशा को दर्शाता है। संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता का दावा करने वाले नेता खुद सड़कों पर उतरकर न्यायपालिका और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को बंधक बनाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

विदेशी फंडिंग और हरीश साल्वे का विस्फोटक खुलासा
देश के जाने-माने वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने इस पूरे प्रदर्शन के पीछे छिपे विदेशी हाथों और फंडिंग का बड़ा पर्दाफाश किया है। उन्होंने आगाह किया कि भारत में बांग्लादेश और नेपाल जैसी अशांति पैदा करने के लिए सुनियोजित प्रयास किए जा रहे हैं। साल्वे के अनुसार, पश्चिमी शक्तियां और अमेरिका जैसे देश भारत के तीव्र वैश्विक उदय से असहज हैं और इसीलिए भारत को अस्थिर करने के लिए ऐसे प्रायोजित विरोध प्रदर्शनों को सीधे फंडिंग और वैचारिक समर्थन दे रहे हैं। वित्त मंत्री के रुख का संदर्भ देते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि वैश्विक व्यापार वार्ताएं आगे बढ़ रही हैं, लेकिन पश्चिमी शक्तियों का यह दोहरा रवैया सत्ता परिवर्तन के मॉडल को भारत में थोपने की खतरनाक साजिश को उजागर करता है।

प्रोटेस्ट में क्रिमिनल और दिल्ली पुलिस पर हमला
छात्र आंदोलन के नाम पर शुरू हुआ यह जमावड़ा अब असामाजिक और आपराधिक तत्वों की ढाल बन चुका है, जिसका दर्द दिल्ली पुलिस के जवानों और उनके परिवारों ने बयां किया है। ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों के सिर फोड़े गए, उनकी वर्दियां खून से लथपथ हुईं, फिर भी उल्टे पुलिस को ही कटघरे में खड़ा करने का प्रपंच रचा गया। वास्तविकता यह है कि सीजेपी जैसे संगठन अब छात्रों के नाम पर हिस्ट्रीशीटरों और पॉक्सो (POCSO) के गंभीर आरोपियों को बचाने की ढाल बन चुके हैं। ऐसे में यह सवाल सीधे जनता के सामने है कि वे कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाले सुरक्षाबलों के साथ खड़े हैं या अपराधियों को संरक्षण देने वाले इस इकोसिस्टम के साथ।

प्रोटेस्ट की निगरानी के लिए विदेशी चेहरे: जमीन पर टूलकिट का क्रियान्वयन
यह पूरा उपद्रव न केवल विदेशी फंडिंग पर आधारित है, बल्कि इसकी जमीनी निगरानी के लिए भी संदिग्ध लोगों को तैनात किया गया है। दिल्ली की सड़कों पर चल रहे इस प्रदर्शन में संदिग्ध विदेशी तत्व भी प्रत्यक्ष तौर पर मौजूद दिखे, जो पूरे घटनाक्रम को समझने, वीडियो रिकॉर्ड करने और अपने अंतरराष्ट्रीय आकाओं को जमीनी रिपोर्ट भेजने का काम कर रहे हैं। इसके साथ ही प्रदर्शनकारियों द्वारा ‘कलर रेवोल्यूशन’ का वैश्विक प्रतीक माने जाने वाले ‘वन पीस पाइरेट्स’ के चिन्हों का इस्तेमाल किया गया। यह साबित करता है कि यह कोई स्वतःस्फूर्त जनआंदोलन नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय टूलकिट के तहत संचालित सुनियोजित अभियान है।

सत्ता लोलुपता में जुटे ‘आस्तीन के सांप’ और विपक्षी अवसरवाद
इस पूरे षड्यंत्र में सबसे चिंताजनक पहलू देश के भीतर मौजूद वे तत्व हैं जो सत्ता के लालच में देशहित को दांव पर लगाने से भी नहीं चूक रहे। असल समस्या सिर्फ बाहरी ताकतें नहीं, बल्कि घर के वे मीर जाफर और आस्तीन के सांप हैं जो धन और कुर्सी की भूख में अपने ही घर में आग लगाने को तैयार बैठे हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त तो केवल एक बहाना हैं, असली एजेंडा देश में अराजकता फैलाना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही सचेत किया था कि वैश्विक संकट और युद्ध के दौर में भी कांग्रेस और उसका इकोसिस्टम भारत विरोधी ताकतों की बोली बोल रहा है। ऐसी ही विध्वंसक सोच रखने वालों को प्रधानमंत्री ने “दिमागी नक्सल” करार दिया था, जो चुनावी प्रक्रिया से बाहर होकर पिछले दरवाजे से अराजकता के सहारे सत्ता हथियाने का सपना देख रहे हैं।

पुलिस का पेशेवर संयम और जागरूक जनता की दो टूक प्रतिक्रिया
इस विदेशी मॉडल की अगली रणनीति राजधानी में जानबूझकर उकसावे की कार्रवाई कर पुलिस लाठीचार्ज या किसी अप्रिय घटना को अंजाम देना था, ताकि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत को बदनाम किया जा सके। लेकिन दिल्ली पुलिस के कड़े अनुशासन और पेशेवर संयम ने उपद्रवियों की हर उकसावे की कोशिश को विफल कर दिया। दूसरी ओर, नवरात्रि और त्योहारों के व्यस्त कारोबारी माहौल में आम व्यापारियों और नागरिकों ने दिल्ली की सड़कों को बंधक बनाने के इस प्रयास को पूरी तरह नकार दिया है। भारत की छवि धूमिल करने निकले इन तत्वों की पूरी पटकथा अब देश की जागरूक जनता के सामने बेनकाब हो चुकी है।

परिपक्व लोकतंत्र के सामने धराशायी हुआ षड्यंत्र
विदेशी ताकतों और उनके घरेलू सहयोगियों द्वारा भारत में अशांति पैदा करने का हर दांव अब पूरी तरह नाकाम साबित हो चुका है। भारत का लोकतंत्र करोड़ों नागरिकों के अटूट विश्वास और सुदृढ़ संवैधानिक संस्थाओं पर टिका है, जिसे सोशल मीडिया टूलकिट, विदेशी फंडिंग या संस्थाओं पर दबाव डालकर नहीं हिलाया जा सकता। सरकार ने जहां कूटनीतिक, प्रशासनिक और कानूनी स्तर पर पूर्ण नियंत्रण बनाए रखा है, वहीं देश की जनता ने भी विभाजनकारी और देश विरोधी ताकतों को कड़ा संदेश दे दिया है।

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