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जनादेश के खिलाफ ममता की बेतुकी जिद: इस्तीफा न देने और अंतरराष्ट्रीय कोर्ट जाने की गीदड़भभकी

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पश्चिम बंगाल में करारी हार से ममता बनर्जी मानसिक रूप से भी बुरी तरह से हिल गई हैं। वह देश की पहली ऐसी मुख्यमंत्री बन गई हैं, जिसने बुरी तरह से हार से बाद इस्तीफा देने से ही इनकार कर दिया। पश्चिम बंगाल की जनता ने उन्हें और उनकी पार्टी को पूरी तरह से नकार दिया, लेकिन उनका मानसिक दिवालियापन इससे भी जाहिर है कि उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो वह ICJ यानी इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस तक जाएंगी। जबकि यह सभी जानते हैं कि ICJ संयुक्त राष्ट्र की सर्वोच्च न्यायिक संस्था है और यहां केवल संप्रभु देश यानी राष्ट्र ही किसी विवाद में पक्ष बन सकते हैं। कोई मुख्यमंत्री, राज्य सरकार या व्यक्तिगत नेता सीधे वहां याचिका दाखिल नहीं कर सकता। यानी ममता बनर्जी या कोई भी राज्य स्तरीय नेता चुनाव हार का मामला सीधे अंतरराष्ट्रीय अदालत में ले ही नहीं जा सकता। सोशल मीडिया पर भी ममता बनर्जी के इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस जाने की बात सुनते ही एक्स, फेसबुक और यूट्यूब जैसे मंचों पर लोगों ने तीखे व्यंग्य और कटाक्षों की बाढ़ ला दी। कोई पूछ रहा है कि क्या अब विधानसभा चुनावों का फैसला कोई अदालत करेगी, तो कोई तंज कस रहा है कि ममता का अगला कदम शायद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को चिट्ठी लिखना होगा। कई यूज़र्स ने इसे लोकतांत्रिक हार नहीं, मानसिक संतुलन खोने वाली प्रतिक्रिया बताया है। राजनीतिक विश्लेषकों ने भी सवाल उठाया कि एक लंबे अनुभव वाली मुख्यमंत्री को क्या अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था और भारतीय संघीय ढांचे की इतनी बुनियादी समझ भी नहीं है?

जनादेश से अधिक महत्व व्यक्तिगत अहंकार को दिया
पश्चिम बंगाल की राजनीति ने इस बार जो दृश्य देखा, वह केवल एक चुनावी हार का प्रसंग नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं की कठिन परीक्षा भी बन गया। वर्षों तक सत्ता के केंद्र में रहीं ममता बनर्जी ने जब करारी हार के बाद भी मुख्यमंत्री पद छोड़ने से इनकार किया, तो यह केवल राजनीतिक असहमति नहीं रही, बल्कि संवैधानिक परंपराओं के सामने खुली चुनौती बन गई। अक्सर देखा गया है कि चुनावों के नतीजे आते ही मुख्यमंत्री नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देकर जनादेश स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन ममता बनर्जी को तो राज्यपाल द्वारा बर्खास्त करके निकालना पड़ा है। लोकतंत्र में हार और जीत दोनों अस्थायी होती हैं, लेकिन जनादेश को स्वीकार करने की नैतिकता स्थायी मानी जाती है। यही कारण है कि भारत में दशकों से मुख्यमंत्री चुनाव परिणाम आते ही इस्तीफा देकर जनता के फैसले को सम्मान देते रहे हैं। मगर बंगाल में इस बार सत्ता से चिपके रहने की जो बेचैनी दिखाई दी, उसने ममता बनर्जी की राजनीति के उस चेहरे को उजागर कर दिया, जिसमें जनादेश से अधिक महत्व व्यक्तिगत अहंकार को दिया जाता है।

सहानुभूति नहीं, उपहास और अविश्वास का केंद्र बनी
सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात वह बयान रहा, जिसमें ममता बनर्जी ने जरूरत पड़ने पर इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस तक जाने की बात कही। यह बयान किसी सामान्य राजनीतिक प्रतिक्रिया से कहीं आगे जाकर संवैधानिक समझ पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय यानी ICJ संयुक्त राष्ट्र की सर्वोच्च न्यायिक संस्था है, जहां केवल संप्रभु राष्ट्र आपसी विवादों में पक्ष बन सकते हैं। कोई मुख्यमंत्री, कोई राज्य सरकार या कोई व्यक्तिगत नेता वहां चुनावी हार का मुकदमा लेकर नहीं जा सकता। यह बुनियादी अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था का सामान्य ज्ञान है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या डेढ़ दशक तक मुख्यमंत्री रही चुकी ममता को इनती जानकारी भी नहीं है। या फिर जनता के बीच सहानुभूति बटोरने के लिए राजनीतिक नाटकीयता का हिस्सा था? दरअसल, जनता-जनार्दन को हार से ज्यादा वह अहंकार चुभा, जिसमें जनादेश स्वीकार करने के बजाय पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश दिखाई दे रही। यही कारण है कि सोशल मीडिया पर ममता बनर्जी की यह प्रतिक्रिया सहानुभूति नहीं, बल्कि उपहास और अविश्वास का विषय बन गई है।

हार के बाद इस्तीफा लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा
लोकतंत्र में हार के बाद समीक्षा की जाती है, आत्ममंथन होता है, लेकिन यहां तो संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास और अंतरराष्ट्रीय अदालतों की धमकी देकर एक प्रकार का राजनीतिक तमाशा खड़ा करने की कोशिश दिखाई दी। भारत की संसदीय व्यवस्था में मुख्यमंत्री का पद विधानसभा के बहुमत से चलता है, व्यक्तिगत इच्छा से नहीं। संविधान साफ कहता है कि सरकार वही चला सकती है, जिसके पास सदन का विश्वास हो। चुनाव में हार के बाद मुख्यमंत्री का इस्तीफा देना केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा है। ओडिशा में नवीन पटनायक ने हार स्वीकार करते हुए तत्काल इस्तीफा दिया था। केरल में पिनराई विजयन ने हार के बाद विपक्ष की भूमिका निभाने की बात कही। यहां तक कि अनेक राज्यों में मुख्यमंत्री चुनाव परिणाम आने के कुछ घंटों के भीतर राज्यपाल को इस्तीफा सौंप देते हैं। लेकिन बंगाल में पहली बार ऐसा दृश्य देखने को मिला, जब हार के बाद भी मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से पद छोड़ने से इनकार कर दिया।

बंगाल में लोकतंत्र बनाम ममता का ‘मैं ही राज्य हूं’ मॉडल
दरअसल, यह पूरा घटनाक्रम केवल संवैधानिक संकट नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति का परिणाम है जिसमें नेता स्वयं को व्यवस्था से ऊपर मानने लगते हैं। लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद अक्सर कुछ नेताओं को यह भ्रम हो जाता है कि राज्य और सरकार उन्हीं के व्यक्तित्व का विस्तार हैं। बंगाल में भी कुछ ऐसा ही दिखाई दिया। विडंबना यह भी है कि जो नेता वर्षों तक लोकतंत्र बचाने की बातें करते रहे, वही हार के बाद चुनाव आयोग, संवैधानिक संस्थाओं और पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाने लगे। यदि किसी चुनाव को चुनौती देनी हो तो भारत के कानून में उसके स्पष्ट रास्ते हैं। हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और चुनाव याचिका की प्रक्रिया मौजूद है। लेकिन सीधे इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस की बात करना ऐसा लगा मानो संवैधानिक बहस नहीं, बल्कि राजनीतिक संवाद को नाटकीयता में बदलने की कोशिश हो। इससे समर्थकों में भावनात्मक उत्तेजना तो पैदा की जा सकती है, लेकिन संवैधानिक गंभीरता कतई नजर नहीं आती।

आइए, अब जानते हैं कि इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस क्या है और यह कैसे काम करता है? ममता क्यों इसमें जा ही नहीं सकतीं?

क्या इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में जा सकती है ममता
कानूनी तौर पर देखा जाए तो किसी राज्य के चुनावी नतीजों को इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में चुनौती देना संभव नहीं है। इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (ICJ) संयुक्त राष्ट्र की सर्वोच्च न्यायिक संस्था है और यहां केवल संप्रभु देश यानी राष्ट्र ही किसी विवाद में पक्ष बन सकते हैं। कोई मुख्यमंत्री, राज्य सरकार या व्यक्तिगत नेता सीधे वहां याचिका दाखिल नहीं कर सकता। यानी ममता बनर्जी या कोई भी राज्य स्तरीय नेता चुनाव हार का मामला सीधे अंतरराष्ट्रीय अदालत में नहीं ले जा सकता।

इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में सुनवाई कैसे होती है?
इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस दुनिया की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय कोर्ट मानी जाती है। इसकी स्थापना 1945 में हुई थी और इसका मुख्यालय द हेग के पीस पैलेस में स्थित है। इसे अक्सर ‘वर्ल्ड कोर्ट’ भी कहा जाता है। यह कोर्ट देशों के बीच कानूनी विवाद सुलझाने का काम करती है। ICJ संयुक्त राष्ट्र के छह प्रमुख अंगों में से एक है, यहां आम नागरिक, नेता या राज्य सरकारें सीधे केस नहीं कर सकतीं, बल्कि सिर्फ संप्रभु देश ही मामला लेकर आ सकते हैं। इस कोर्ट में कुल 15 जज होते हैं, जिन्हें 9 साल के लिए चुना जाता है। इन जजों का चुनाव यूनाइटेड नेशंस की जनरल असेंबली और सिक्योरिटी काउंसिल करती है। जब कोई देश किसी दूसरे देश के खिलाफ मामला दर्ज करता है, तो दोनों पक्ष कोर्ट में अपने लिखित दस्तावेज और कानूनी दलीलें पेश करते हैं। इसके बाद खुली कोर्ट में सुनवाई होती है, जहां दोनों देशों के एजेंट, वकील या कभी-कभी बड़े नेता भी अपनी बात रखते हैं। सुनवाई पूरी होने के बाद जज बंद कमरे में विचार-विमर्श करते हैं।

फैसला कौन करता है और कितना असर होता है?
सुनवाई के बाद अंत में 15 जजों की बेंच मामले पर फैसला सुनाती है। ICJ का फैसला आखिरी माना जाता है और इसके खिलाफ अपील नहीं की जा सकती। कोर्ट दो तरह के मामलों की सुनवाई करती है पहला, देशों के बीच विवाद और दूसरा, संयुक्त राष्ट्र के अंगों द्वारा बोली गई कानूनी सलाह। अगर कोई देश फैसले को नहीं मानता, तो मामला यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल तक जा सकता है। यही वजह है कि ICJ को दुनिया में शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून बनाने रखने वाली सबसे अहम कोर्ट माना जाता है। इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस यानी ICJ के फैसले कानूनी रूप से संबंधित देशों के लिए करार माने जाते हैं, यानी जिन देशों के बीच विवाद पर फैसला आता है, उन्हें उसे सौंपना होता है।

भारत जाधव केस में पाक के खिलाफ गया था ICJ
इसका बड़ा उदाहरण भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव का मामला है, जिसमें भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ ICJ का दरवाजा खटखटाया था। अब्दुलकावी अहमद यूसुफ की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के बाद जाधव की फांसी पर रोक निरंतर रखी और पाकिस्तान को प्रवर्तन का आदेश दिया था। हालांकि ICJ के पास अपना फैसला लागू करने के लिए कोई पुलिस या कार्यकारी शक्ति नहीं होती, इसलिए अगर कोई देश फैसला नहीं मानता, तो मामला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद तक जा सकता है। इसलिए ICJ का फैसला जरूरी तो होता है, लेकिन उसका पालन पूरी तरह से संबंधित देशों की राजनीतिक और कूटनीतिक इच्छा पर भी निर्भर करता है।

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