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ममता बनर्जी के अहंकार की वजह से बंगाल में कोरोना ने बरपाया कहर

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एक मुख्यमंत्री का अहंकार किस प्रकार एक राज्य को तबाह कर सकता है, राज्य के लोगों की जान आफत में डाल सकता है, इसका जीता-जागता उदाहरण है पश्चिम बंगाल। कोरोना महामारी के दौरान पश्चिम बंगाल के लोगों को अपनी अहंकारी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की हठधर्मिता का दंश झेलना पड़ रहा है। ममता बनर्जी के अड़ियल रवैया के चलते आज पश्चिम बंगाल के लोगों की जान पर बन आई है। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हर राज्य को कोरोना से लड़ाई में हर संभव मदद कर रहे हैं। पीएम मोदी के निर्देश पर केंद्र की टीमें राज्य सरकारों को कोरोना से जंग में सहायता कर रही हैं। लेकिन ममता बनर्जी ने खुद को सर्वशक्तिमान साबित करने के लिए हर मदद को या तो ठुकरा दिया है या फिर केंद्र के हर दिशानिर्देशों में अड़ंगा लगाया।

सीएम ममता बनर्जी के इसी रवैये ने पश्चिम बंगाल और खासकर कोलकाता को कोरोना हॉटस्पाट में तब्दील कर दिया है। हालत ये है कि 11 मई तक राज्य में कोरोना के करीब दो हजार मामले आ चुके हैं और 185 लोगों की कोरोना से मौत भी हो चुकी है। पिछले दस दिनों में जब से राज्य में हालात बेकाबू हुए हैं तब से ममता बनर्जी गायब सी हो गई है। 30 अप्रैल के बाद से उन्होंने न तो मीडिया से कोई बात की है और न ही वे सार्वजनिक तौर पर दिखाई दी है। इस बीच राज्य के लोगों ने ममता मिशिंग की मुहिम शुरू कर दी है। जाहिर सी बात है कि एक तरफ हर राज्य का मुख्यमंत्री रोज मीडिया के सामने आकर ताजा हालात से अवगत करा रहा है, वहीं ममता बनर्जी मीडिया से दूर हो गई हैं।

बताया जा रहा है कि राज्य में हालत इस कदर बेकाबू हो गए हैं कि राज्य में अस्पतालों के डॉक्टर पीपीई किट के लिए चिल्ला रहे हैं, मरीज शवों के बीच में पड़े हैं। प्रवासी मजदूरों को राज्य छोड़ने नहीं दिया जा रहा और बंगाली लोग घर वापस नहीं आ पा रहे हैं। अस्पताल लोगों को भर्ती नहीं कर रहे और पुलिस पर हमला किया जा रहा है। यानि हर तरफ अफरातरफी का माहौल है। महामारी फैलती जा रही है लेकिन टेस्ट की संख्या बढ़ाई नहीं जा रही है।

दरअसल शुरुआत से ही कोरोना संकट को लेकर सीएम ममता बनर्जी का रवैया बेपरवाह और संवेदनहीन रहा है। यह मार्च से अब तक उनके बयानों और उनके फैसलों से समझा जा सकता है। डालते हैं ममता बनर्जी के गैरजिम्मेदराना रवैये पर एक नजर-

कोरोना को दिल्ली हिंसा से ध्यान भटकाने की सजिश बताया
मोदी सरकार ने फरवरी में ही कोरोना से निपटने के लिए तैयारियां शुरू कर दी थीं। केंद्र की तरफ से राज्य सरकारों को दिशानिर्देश भी जारी किए जाने लगे थे। लेकिन तब 4 मार्च, 2020 को पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने इसको हलके में लेते हुए बयान दिया था कि मोदी सरकार दिल्ली हिंसा से ध्यान भटकाने के लिए देश में कोरोना वायरस का हौव्वा खड़ा कर रही है। सीएम ममत बनर्जी ने दक्षिणी दिनाजपुर में तृणमूल कांग्रेस की एक सभा में कहा कि दिल्ली में ‘खुश और स्वस्थ’ लोग हिंसा के कारण मारे गए, वायरस के कारण नहीं। आपको बता दें कि उस वक्त देश में कोरोना के 28 मामले सामने आ चुके थे।

तबलीगी जमात के लोगों की जांच नहीं कराई
मार्च के आखिर में तबलीगी जमात का विस्फोट हो चुका था और देशभर में तबलीगियों ने कोरोना फैला दिया था। पश्चिम बंगाल में भी बड़ी संख्या में दिल्ली के मरकज से जुड़े लोग पहुंचे थे, लेकिन आरोप है कि ममता बनर्जी ने जानबूझ कर उनका टेस्ट नहीं कराया और कोरोना का संक्रमण फैलने दिया।

लॉकडाउन के दौरान विशेष इलाकों में दी गई छूट
ममता बनर्जी को हर वक्त सिर्फ अपने वोटबैंक की चिंता होती है। इसलिए कोरोना संकट के दौरान भी उन्होंने लोगों की जान की चिंता नहीं की। बताया जा रहा है कि लॉकडाउन-1 के दौरान ममता सरकार ने फूल मंडी, पान और मिठाई की दुनाकों को खोलने की अनुमति दी और केंद्र के निर्देशों को ठेंगा दिखाया। ममता सरकार की इसी ढील की वजह से बंगाल में अप्रैल के दूसरे हफ्ते तक कोरोना मरीजों की संख्या सौ के पार पहुंच गई थी। इतना ही नहीं राज्य में धार्मिक आयोजनों को भी छूट दी जा रही है। बाद में केंद्र सरकार ने सख्त रवैया दिखाया तब राज्य प्रशासन होश में आया।

कोरोना से मरने वालों के आंकड़े जारी करने से रोका
पूरे देश की तरह ही पश्चिम बंगाल में भी कोरोना पीड़ितों की संख्या बढ़ती जा रही थी, लेकिन ममता बनर्जी की सरकार इससे बेपरवाह बनी रही। ममता बनर्जी ने केंद्रीय गाइडलाइन्स को भी फॉलो नहीं किया। ममता बनर्जी की मनमानी के चलते वहां कोरोना पीड़ितों की मौत होने लगी, तब राज्य सरकार ने अस्पतालों को निर्देश दिए कि बिना विशेष कमेटी को बताए मृतकों की संख्या नहीं बताई जाए। दरअसल ममता सरकार ने कोविड-19 से मरने वालों की संख्या बताने के लिए एक विशेष कमेटी का गठन किया था। आरोप लगे की इस कमेटी ने कई मरीजों की मौत की वजह कोरोना-19 नहीं बताई, बल्कि असलियत छिपाई। इस तरह राज्य में कोरोना मरीजों की संख्या में जमकर फर्जीवाड़ा किया गया।

केंद्र की टीम का ममता ने किया विरोध
कोरोना संक्रमण की हालत विकराल होने की खबरों के बीच केंद्र सरकार की टीम 21 अप्रैल, 2020 को पश्चिम बंगाल जायजा लेने पहुंची कि वहां लॉकडाउन के नियमों का पालन हो रहा है या नहीं। लेकिन इससे ममता बनर्जी का गुस्सा आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने कहा कि बिना उनकी इजाजत के केंद्रीय टीम राज्य में कैसे आ गई? उन्होंने कहा कि वे कोरोना की रोकथाम में लगी है, ऐसे में केंद्रीय टीम की कोई जरूरत नहीं है।

डॉक्टरों ने ममता को चिट्ठी लिखकर आंकड़े पर संदेह जताया
आम लोगों को ही नहीं डॉक्टरों को भी ममता सरकार के आंकड़ों पर विश्वास नहीं है। 23 अप्रैल, 2020 को पश्चिम बंगाल से बाहर रह रहे बंगाली डॉक्टरों और मेडिकल प्रोफेशनलों में राज्य की स्थितियों को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट देखने के बाद कोरोना वायरस के खिलाफ पश्चिम बंगाल में जारी लड़ाई को लेकर संदेह जताया। इन मेडिकल प्रोफेशनलों ने राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को खुली चिट्ठी लिखकर गुजारिश की कि मानवता के नाम पर कोरोना से संबंधित आंकड़ों में किसी तरह की हेरफेर न की जाए, नहीं तो प्रदेश को इसका बहुत ही गंभीर परिणाम भुगतना पड़ सकता है।

ममता ने खुद मानी बंगाल में लाखों मरीजों की बात!
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या को छिपा रही हैं। लेकिन न्यूज एजेंसी के 27 अप्रैल, 2020 के एक ट्वीट से यह आशंका ज्यादा गहरी हो गई है कि पश्चिम बंगाल में कोरोना मरीजों की संख्या लाखों में हो सकती है। समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कहना है कि हमने एक निर्णय लिया है, अगर किसी व्यक्ति को कोरोना पॉजिटिव पाया जाता है और उसके पास अपने निवास पर खुद को आइसोलेट करने की जगह है तो वह शख्स खुद को क्वारंटाइन कर सकता है। लाखों लाख लोगों को क्वारंटीन नहीं किया जा सकता है, सरकारी की अपनी सीमाएं हैं।

कोरोना की सच्चाई सामने लाने वाले पत्रकारों को ममता की धमकी
पश्चिम बंगाल में कानून का राज नहीं बल्कि ममता बनर्जी की मनमर्जी चलती है। राज्य में कोरोना संक्रमण की सच्चाई बताने वाली खबरों को दिखाने और छापने वाले मीडिया संस्थानों और पत्रकारों से भी ममता बनर्जी नाराज हो गई। 30 अप्रैल, 2020 को ममता बनर्जी ने पत्रकारों को ढंग से बर्ताव करने की सलाह देते हुए उन्हें चेतावनती दी थी। ममता बनर्जी ने कहा था कि अगर वे सही से बर्ताव नहीं करते, तो उन पर वे आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत केस कर सकती हैं। इसके अलावा उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि वे कोरोना वायरस के प्रकोप के दौरान पत्रकार भाजपा के लिए प्रचार कर रहे हैं। ममता बनर्जी ने कहा था, “मेरा मीडिया से एक अनुरोध है। जब कोई घटना होती है, तो आप सरकार की प्रतिक्रिया लेने की जहमत नहीं उठाते। बल्कि भाजपा की सुनकर एक तरफा, नकारात्मक और विनाशकारी वायरस वाहक बन जाते हैं।” इसके बाद उन्होंने मीडिया को कहा, “वर्तमान में हम आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत, कार्रवाई शुरू कर सकते हैं। लेकिन हम नहीं कर रहे, क्योंकि बंगाल की संस्कृति है; हम मानवता में विश्वास करते हैं। सहिष्णुता हमारा धर्म है। ”

ममता ने लगाया राज्यपाल पर सत्ता हड़पने का आरोप
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 3 मई, 2020 को राज्यपाल जगदीप धनखड़ पर आरोप लगाया कि वह कोरोना वायरस संकट के दौरान ‘सत्ता हड़पने’ की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनके और राज्य मंत्रियों एवं अधिकारियों के खिलाफ राज्यपाल के बयानों को ‘अपमानजनक’ करार दिया जा सकता है। जाहिर है कि इससे पहले राज्यपाल ने सीएम ममता बनर्जी दो पत्र भेजे थे, जिसके बाद ममता ने यह तीखी टिप्पणी की। दरअसल, कोविड-19 के प्रसार के प्रति पश्चिम बंगाल सरकार की प्रतिक्रिया के मद्देनजर राजभवन और राज्य सचिवालय के बीच तकरार चल रही है।

रबींद्र जयंती पर ममता का खुद के गीत बजाने का फरमान!
पश्चिम बंगाल में कोरोना महामारी का प्रकोप बढ़ता जा रहा है, लेकिन ऐसे में भी राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपनी प्रचार-प्रसार में लगी है। कोई भी मौका हो वे सरकारी मशीनरी को अपने प्रचार में लगाने से नहीं चूकती हैं। 7 मई, 2020 को गुरुदेव रबींद्र नाथ टैगोर की जयंती के अवसर पर ममता सरकार ने अजीबो-गरीब फरमान जारी किया। राज्य सरकार के निर्देश पर पुलिस ने शहरों के अलग-अलग रिहायशी इलाके और हाउसिंग कॉम्प्लेक्स में अनिवार्य रूप से ममता बनर्जी के गीत बजाए जाने का आदेश जारी किया।

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