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टेक्नोक्रांति से बदलेगा उत्तर प्रदेश: काशी से जेवर तक विकास की नई उड़ान

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काशी के आसमान में विकास की नई उड़ान, मोदी सरकार के विकास प्रयासों में जुड़ रहा एक और अध्याय। विश्व की प्राचीनतम जीवंत नगरी काशी की पहचान उसकी हजारों साल पुरानी विरासत से है, लेकिन बदलते समय के साथ शहर की तस्वीर आधुनिक बुनियादी ढांचे से भी आकार ले रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वाराणसी संसदीय क्षेत्र में पिछले वर्षों में सड़क, रेलवे, गंगा, सीवेज, पर्यटन, संस्कृति और शहरी परिवहन से जुड़ी अनेक परियोजनाओं पर काम हुआ है। इसी क्रम में कैंट से गोदौलिया के बीच बन रहा यात्री रोपवे अब निर्माण के अंतिम चरण में पहुंच गया है।

24 मार्च 2023 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस रोपवे की आधारशिला रखी थी। करीब 3.8 किलोमीटर लंबे इस रोपवे में पांच स्टेशन होंगे। इसका उद्देश्य कैंट रेलवे स्टेशन, शहर के प्रमुख इलाकों और गोदौलिया के बीच यात्रियों, पर्यटकों और श्रद्धालुओं की आवाजाही को सुगम बनाना है।

काशी में जल्द हवा में सफर

कैंट से शुरू होकर काशी विद्यापीठ, रथयात्रा और गिरजाघर होते हुए गोदौलिया तक पहुंचने वाला यह रोपवे वाराणसी के शहरी परिवहन ढांचे में एक नया विकल्प जोड़ रहा है। 29 सितंबर 2026 को अधिकारियों ने परियोजना का निरीक्षण किया। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक उस समय निर्माण करीब 94 प्रतिशत पूरा बताया गया और ट्रायल रन भी चल रहे थे। निरीक्षण के दौरान कैंट से गोदौलिया तक रोपवे केबिन में सफर कर व्यवस्थाओं को देखा गया और संचालन से पहले के कार्यों को जल्द पूरा करने के निर्देश दिए गए। यानि अब चुनौती केवल निर्माण पूरा करने की नहीं, बल्कि इसे सुरक्षित, नियमित और यात्री-अनुकूल सेवा के रूप में शुरू करने की है।

सड़क के जाम के ऊपर मिलेगा नया विकल्प

कैंट से गोदौलिया तक का इलाका वाराणसी के सबसे व्यस्त शहरी हिस्सों में शामिल है। रेलवे स्टेशन, बाजार, धार्मिक स्थल और पर्यटन गतिविधियों के कारण इस कॉरिडोर पर यातायात का दबाव बना रहता है। रोपवे का विचार इसी समस्या का एक वैकल्पिक समाधान उपलब्ध कराने से जुड़ा है। केंद्र सरकार ने 2023 में परियोजना की आधारशिला रखते समय भी इसे कैंट और गोदौलिया के बीच यातायात दबाव कम करने और यात्रियों की आवाजाही आसान बनाने से जोड़ा था। परियोजना के पूरा होने के बाद कैंट से गोदौलिया तक यात्रा समय में उल्लेखनीय कमी आने की उम्मीद है। इससे सड़क परिवहन पर निर्भरता घटाने के साथ-साथ रेलवे स्टेशन से काशी विश्वनाथ क्षेत्र की ओर जाने वाले यात्रियों को भी एक अतिरिक्त विकल्प मिल सकता है।

रोपवे बड़ी कनेक्टिविटी योजना का हिस्सा

काशी में रोपवे को केवल एक अलग परिवहन परियोजना के तौर पर देखना पर्याप्त नहीं होगा। पिछले वर्षों में वाराणसी की कनेक्टिविटी को कई स्तरों पर मजबूत करने के लिए सड़क और रेल परियोजनाओं पर काम हुआ है। 2023 में वाराणसी में 12,100 करोड़ रुपये से अधिक की विभिन्न विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया था। इनमें रेलवे लाइन का विकास, विद्युतीकरण और दोहरीकरण, वाराणसी-जौनपुर राष्ट्रीय राजमार्ग का चौड़ीकरण के साथ ही विभिन्न सड़क और घाट परियोजनाएं शामिल थीं। 

2024 में भी 13,000 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं में सड़क, रेल, विमानन, पर्यटन, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, शहरी विकास और स्वच्छता से जुड़ी योजनाएं शामिल रहीं। यानि वाराणसी में विकास का फोकस केवल शहर के भीतर की सड़कों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शहर को आसपास के क्षेत्रों और देश के दूसरे हिस्सों से जोड़ने वाले नेटवर्क पर भी रहा है।

2026 में भी बढ़ कनेक्टिविटी का दायरा

वाराणसी के लिए कनेक्टिविटी विस्तार की यह प्रक्रिया 2026 में भी जारी है।जुलाई 2026 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वाराणसी में वरुणा नदी के किनारे 43.218 किलोमीटर लंबे 6/4-लेन एलिवेटेड कॉरिडोर को मंजूरी दी। करीब 10,998 करोड़ रुपये की पूंजीगत लागत वाली इस परियोजना का उद्देश्य वाराणसी शहर के यातायात दबाव को कम करना और एनएच-31, रिंग रोड तथा शहर के प्रमुख परिवहन केंद्रों के बीच संपर्क बेहतर करना है।

एनएच-19 और वाराणसी रिंग रोड के बीच गंगा के किनारे 46.039 किलोमीटर लंबे छह-लेन ग्रीनफील्ड एलिवेटेड कॉरिडोर को भी मंजूरी दी गई है। इसकी अनुमानित पूंजीगत लागत 14,447.64 करोड़ रुपये है। 

इन परियोजनाओं के साथ रोपवे को जोड़कर देखें तो वाराणसी में शहरी और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लिए अलग-अलग माध्यमों सड़क, रेलवे और रोपवे का एक व्यापक नेटवर्क विकसित करने की दिशा दिखाई देती है। काशी के विकास में सड़क से आगे बढ़कर सार्वजनिक परिवहन पर जोर है। वाराणसी जैसे घने और ऐतिहासिक शहर में केवल सड़कें चौड़ी करना हर जगह संभव नहीं है। पुराने शहर की गलियों, धार्मिक स्थलों और बाजारों के बीच बढ़ती आबादी और पर्यटकों की संख्या के कारण सार्वजनिक परिवहन के वैकल्पिक साधनों की जरूरत भी बढ़ती है।

यही वजह है कि कैंट-गोदौलिया रोपवे को काशी के शहरी परिवहन ढांचे में महत्वपूर्ण परियोजना माना जा रहा है। केंद्र सरकार ने इसे शुरू से ही यात्रियों, श्रद्धालुओं और पर्यटकों की आवाजाही आसान बनाने वाली परियोजना के रूप में प्रस्तुत किया है। 2023 में परियोजना की आधारशिला रखते समय सरकार ने इसे कैंट स्टेशन और काशी विश्वनाथ क्षेत्र के बीच यात्रा को तेज करने और कैंट-गोदौलिया मार्ग के यातायात दबाव को कम करने से जोड़ा था। Press Information Bureau

घाट, गंगा और नमामि गंगे से जुड़ा विकास

काशी के विकास की कहानी केवल परिवहन तक सीमित नहीं है। शहर की पहचान गंगा और उसके घाटों से जुड़ी है, इसलिए बुनियादी ढांचे के साथ नदी और घाटों का विकास भी इसमें महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। 2023 में मोदी सरकार ने मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट के पुनर्विकास सहित कई घाटों से संबंधित परियोजनाओं का शिलान्यास किया था। उसी दौर में भगवानपुर में 55 एमएलडी क्षमता वाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की परियोजना भी नमामि गंगे के तहत आगे बढ़ाई गई। इसका व्यापक उद्देश्य यह है कि गंगा किनारे बसे शहर में पर्यटन और नागरिक सुविधाओं के विस्तार के साथ सीवेज प्रबंधन और नदी प्रदूषण नियंत्रण का बुनियादी ढांचा भी मजबूत हो।

रुद्राक्ष से काशी विश्वनाथ धाम तक सुविधाओं का विस्तार

वाराणसी में आधुनिक बुनियादी ढांचे का एक दूसरा पहलू सांस्कृतिक और पर्यटन सुविधाओं का विकास है। रुद्राक्ष अंतरराष्ट्रीय सहयोग एवं कन्वेंशन सेंटर ने बड़े सांस्कृतिक और सम्मेलन आयोजनों के लिए आधुनिक मंच उपलब्ध कराया है। वहीं काशी विश्वनाथ धाम के विकास ने धार्मिक पर्यटन के लिए सुविधाओं और यात्री प्रबंधन की संरचना को नया रूप दिया है।

प्रधानमंत्री ने स्वयं वाराणसी के विकास को लेकर काशी की प्राचीन विरासत और आधुनिक शहरी सुविधाओं को साथ लेकर चलने की बात कही है। 2024 के एक संबोधन में उन्होंने काशी विश्वनाथ धाम, रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर, रिंग रोड और आधुनिक रोपवे को शहर के बदलते बुनियादी ढांचे के उदाहरण के तौर पर गिनाया था। 

बनारसी बुनकर और स्थानीय अर्थव्यवस्था

काशी का विकास केवल यात्री सुविधाओं तक सीमित नहीं है। बनारसी साड़ी, हैंडलूम और हस्तशिल्प शहर की अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं। 2024 में केंद्र सरकार की ओर से वाराणसी में सिल्क फैब्रिक प्रिंटिंग कॉमन फैसिलिटी सेंटर सहित ऐसी परियोजनाओं को आगे बढ़ाया गया, जिनका उद्देश्य स्थानीय उद्योगों और बुनकरों को आधुनिक सुविधाओं से जोड़ना है। उसी अवसर पर कर्कियांव में कृषि-आधारित प्रसंस्करण और बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाएं भी सामने आईं। इससे काशी के विकास का एक और आयाम सामने आता है, पर्यटन और बुनियादी ढांचे के साथ स्थानीय उत्पादन तथा रोजगार से जुड़े क्षेत्रों को मजबूत करना।

रिंग रोड और हाईवे से मजबूत हुआ क्षेत्रीय संपर्क

वाराणसी के आसपास के क्षेत्रों के साथ बेहतर सड़क संपर्क भी पिछले वर्षों की विकास परियोजनाओं का प्रमुख हिस्सा रहा है। रिंग रोड, राष्ट्रीय राजमार्गों के चौड़ीकरण और विभिन्न पुलों और फ्लाईओवर की परियोजनाओं का उद्देश्य शहर के भीतर यातायात दबाव कम करने के साथ बाहरी क्षेत्रों से आने वाले यातायात को बेहतर मार्ग उपलब्ध कराना है। 2025 में भी वाराणसी में सड़क संपर्क से जुड़ी कई परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास हुआ, जिनमें रिंग रोड-सारनाथ सड़क पुल, शहर के प्रमुख चौराहों पर फ्लाईओवर और बाबतपुर क्षेत्र में हाईवे अंडरपास जैसी परियोजनाएं शामिल थीं।

रेलवे नेटवर्क भी विकास की अहम कड़ी

वाराणसी देश के प्रमुख धार्मिक और पर्यटन केंद्रों में है, इसलिए रेलवे इसकी कनेक्टिविटी का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। रेलवे लाइनों के विद्युतीकरण और दोहरीकरण से लेकर स्टेशनों के आधुनिकीकरण तक कई स्तरों पर काम हुआ है। 2023 में वाराणसी से जुड़े रेलवे विकास कार्यों के साथ डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन-सोननगर खंड का लोकार्पण भी हुआ था। इसी नेटवर्क से जुड़कर कैंट रेलवे स्टेशन से शुरू होने वाला रोपवे एक अलग प्रकार की कनेक्टिविटी उपलब्ध करा सकता है।

काशी से जेवर तक विकास की नई गाथा

उत्तर प्रदेश तेजी से अपनी आर्थिक पहचान बदल रहा है। कभी दूसरे राज्यों और देशों से आने वाले उत्पादों का बड़ा बाजार माना जाने वाला प्रदेश अब विनिर्माण, सूचना प्रौद्योगिकी, इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर उद्योग के क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है। काशी से जेवर और लखनऊ से नोएडा तक फैली विकास की यह यात्रा प्रदेश को उपभोक्ता से उत्पादक राज्य बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

आईटी निर्यात में ऐतिहासिक उपलब्धि

उत्तर प्रदेश की तकनीकी प्रगति का सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण आईटी और आईटीईएस क्षेत्र का निर्यात है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में प्रदेश का आईटी-आईटीईएस निर्यात बढ़कर 1,01,970 करोड़ रुपये पहुंच गया, जो पहली बार एक लाख करोड़ रुपये के पार है। वर्ष 2020-21 में यह आंकड़ा 48,004 करोड़ रुपये था। पांच वर्षों में लगभग 112 प्रतिशत की वृद्धि प्रदेश की तकनीकी क्षमताओं और आर्थिक गतिविधियों में आए बदलाव को दर्शाती है।

लखनऊ और नोएडा जैसे शहर इस विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। लखनऊ में आईबीएम, जेनपैक्ट और टेलीपरफॉर्मेंस जैसी कंपनियों की मौजूदगी युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा कर रही है। वहीं, एचसीएल आईटी सिटी के दूसरे चरण में लगभग 500 करोड़ रुपये के निवेश से करीब छह हजार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होने की उम्मीद है। इससे युवाओं को अपने ही प्रदेश में बेहतर करियर बनाने का अवसर मिलेगा।

इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर उद्योग का विस्तार

इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण उत्तर प्रदेश की विकास यात्रा का एक और महत्वपूर्ण अध्याय है। प्रदेश देश के मोबाइल फोन उत्पादन में लगभग 60 प्रतिशत और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट उत्पादन में करीब 55 प्रतिशत हिस्सेदारी का दावा करता है। इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात भी लगभग 3,800 करोड़ रुपये से बढ़कर 45 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। वर्ष 2030 तक इसे दो लाख करोड़ रुपये करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

जेवर में प्रस्तावित चिप इकाई और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण परियोजनाएं इस बदलाव को गति दे रही हैं। एचसीएल-फॉक्सकॉन की लगभग 3,706 करोड़ रुपये की चिप परियोजना से प्रदेश में अत्याधुनिक तकनीक और औद्योगिक निवेश को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। इसके साथ ही, डेटा सेंटर और स्टार्टअप क्षेत्र का विस्तार उत्तर प्रदेश को डिजिटल अर्थव्यवस्था का प्रमुख केंद्र बनाने की संभावनाएं मजबूत करता है।

लखनऊ बनेगा नई तकनीक का केंद्र

राजधानी लखनऊ को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), सेमीकंडक्टर, साइबर सुरक्षा और कंप्यूटिंग तकनीक के केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना है। इसके अंतर्गत 50 विश्वस्तरीय एआई स्टार्टअप स्थापित करने की महत्वाकांक्षा भी शामिल है। प्रदेश में 24 हजार से अधिक स्टार्टअप और आठ यूनिकॉर्न का उल्लेख उभरते उद्यमशीलता परिवेश को दर्शाता है।सरकार का लक्ष्य अगले चार वर्षों में आईटी-आईटीईएस निर्यात को 2.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचाना है।

जापान के साथ साझेदारी और भविष्य की संभावनाएं

काशी के रुद्राक्ष अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटर में जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की स्मृति में बने आबे मेमोरियल कॉरिडोर का उद्घाटन भारत-जापान संबंधों के महत्व को रेखांकित करता है। दूसरी ओर, यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण क्षेत्र में 500 एकड़ में जापान सिटी विकसित करने की योजना औद्योगिक सहयोग को नई दिशा दे सकती है। जापान और सिंगापुर की यात्रा के दौरान लगभग 2.5 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव मिलने की बात भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है।

उत्तर प्रदेश की टेक्नोक्रांति केवल नए कारखानों और आईटी पार्कों के निर्माण तक सीमित नहीं है। यह रोजगार, कौशल, नवाचार और आर्थिक आत्मनिर्भरता से जुड़ा व्यापक परिवर्तन है। काशी की सांस्कृतिक विरासत, लखनऊ की तकनीकी महत्वाकांक्षा और जेवर के औद्योगिक विस्तार का समन्वय प्रदेश को नई पहचान दे रहा है। साफ है कि उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय ही नहीं, वैश्विक तकनीकी अर्थव्यवस्था में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए तैयार है। 

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