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PAK के खिलाफ जनाक्रोश, PoK अवाम में ‘विलय’ की चाहत और बढ़ी, सरहद पर ‘हमें भारत का रास्ता दो’ के नारे

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पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) की वादियों में इन दिनों जो आवाज गुंजायमान हो रही है, वह केवल बिजली, आटे, महंगाई या राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग नहीं है, बल्कि वह पाकिस्तान से आजादी की आवाज है। पीओके में लंबे समय से चले आ रहे असंतोष ने अब ऐसा मोड़ लिया है, जहां नियंत्रण रेखा की तारबंदी हटाने, पुराने रास्ते खोलने और भारत की ओर जाने की मांग सार्वजनिक प्रदर्शन का हिस्सा बन रही है। दो दिन पहले एलओसी से लगभग सात किलोमीटर दूर मंधोल में हजारों लोग जुटे और प्रदर्शनकारियों ने एक स्वर से भारत से जुड़ने की इच्छा व्यक्त की। मंधोल में उठी आवाज का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उसका राजनीतिक संदेश है। क्योंकि यह आवाज सिर्फ मंधोल से नहीं, बल्कि पीओके के अलग-अलग हिस्सों से पुरजोर अंदाज में उठने लगी है। आंदोलनकारी अब पाकिस्तान से आर-पार की लड़ाई चाहते हैं। इसलिए वे संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के बाहर भी प्रदर्शन करके ये संदेश दे रहे हैं कि पुराने रास्ते खोलो और हमें भारत से जुड़ने दो। अब यह केवल प्रशासनिक शिकायत नहीं रह गई है, बल्कि सरहदों को चीरकर शासन और जनता के बीच संबंधों पर बुनियादी सवाल बन गया है। सरहद पर गूंजते नारे बता रहे हैं कि पीओके की सामूहिक इच्छा पाकिस्तान से छुटकारा पाने की है।पीओके में चल रहे आंदोलन ने उग्र रूप धारण किया
पीओके के मंधोल में बवाल इसलिए चर्चा में है, क्योंकि यह किसी एक दिन का अचानक उभरा प्रदर्शन नहीं है। रिपोर्टों के मुताबिक आंदोलन जून माह से चल रहा है और 29 सितंबर को उसका 115वां दिन था। अब आंदोलनकारियों के सब्र का बांध टूट रहा है। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी यानी JAAC से जुड़े नेताओं ने पुंछ और मेंढर की ओर जाने वाले पुराने रास्तों को तत्काल खोलने की मांग उठाई है। यह घटनाक्रम इसलिए भी अहम है क्योंकि ताजा आंदोलन केवल भावनात्मक नारों का नहीं है। इसके पीछे पाकिस्तान से नाराजगी के साथ ही बिजली की दरों, आटे की कीमत, रोजगार, बुनियादी सुविधाओं, भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अधिकारों और संसाधनों के इस्तेमाल के पुराने सवाल भी हैं। प्रदर्शनकारियों की ओर से यह बात भी सामने आई कि जब नियंत्रण रेखा के दोनों ओर ऐतिहासिक, सामाजिक और पारिवारिक रिश्ते रहे हैं, तो अब उन्हें भारत से रिश्ते रखने पर क्यों रोका जा रहा है। बता दें कि पीओके में जून में आंदोलन के दौरान हिंसक झड़पों में कम-से-कम 24 लोगों की मौत हुई और सैकड़ों लोगों की गिरफ्तारी हुई थी। तब से इंटरनेट बंद होने, बाजारों के बंद रहने और आर्थिक गतिविधियों के ठप होने से आम नागरिकों की कठिनाइयां भी बहुत बढ़ीं हैं।

भारत का रास्ता मांगने के पीछे पाकिस्तान से नाराजगी
प्रदर्शनकारियों की ‘हमें भारत का रास्ता दो’ सुनने में एक सीधी राजनीतिक मांग लगती है, लेकिन इसके पीछे कई स्तर हैं। प्रदर्शनकारियों की शिकायतों में पाकिस्तान के प्रशासन से आर्थिक राहत और राजनीतिक अधिकारों की मांग लंबे समय से शामिल रही है। अब प्रदर्शनों में सीधे-सीधे भारत की ओर जाने वाले मार्ग खोलने की मांग सामने आना इस असंतोष को एक नए प्रतीक में बदलता दिखाई देता है। दरअसल, अब भारत का ‘साथ’ एक तरीके से पूरे पीओके के लोगों की सर्वसम्मत इच्छा बनती नजर आ रही है। पीओके लोगों की ही आवाज को आंदोलनकारी पुरजोर अंदाज में उठा रहे हैं। JAAC के 38 सूत्रीय मांगपत्र में बिजली बिलों में विभिन्न करों और अधिभार को हटाने तथा बिजली कटौती रोकने की भी मांग है। यह मांगे केवल भावनात्मक नहीं, संसाधनों पर स्थानीय हिस्सेदारी और आर्थिक न्याय से जुड़ी हैं। दरअसल, पाकिस्तान की खस्ता हालत के चलते 2023 और 2024 के आंदोलनों में भी सब्सिडी वाले गेहूं के आटे और बिजली की कीमतें प्रमुख मुद्दे बने थे। इससे साफ है कि आज का आक्रोश शून्य से पैदा नहीं हुआ। इसके पीछे की पीड़ा बहुत पुरानी है। रोजगार और आय के बीच बढ़ता अंतर किसी भी समाज में असंतोष को गहरा कर सकता है। जब मांगें सड़क से निकलकर एलओसी तक पहुंचीं
दरअसल, किसी भी राजनीतिक आंदोलन के लिए उसके विरोध का भूगोल महत्वपूर्ण होता है। मुजफ्फराबाद या रावलाकोट में प्रदर्शन का अर्थ प्रशासन के खिलाफ दबाव हो सकता है, लेकिन एलओसी के निकट जाकर पुराने रास्ते खोलने की मांग करना आंदोलन को भारत-पाकिस्तान संबंधों से भी जोड़ देता है। मंधोल की रैली इसी कारण अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देती है। यहां प्रश्न केवल यह नहीं रहा कि इस्लामाबाद या मुजफ्फराबाद सरकार क्या देगी? प्रश्न यह भी उठाया गया कि लोगों के पारंपरिक संपर्कों को कितनी देर तक सीमित रखा जाएगा और भारत का रास्ता खोलने की मांग को कब तक दबाया जाएगा। 2026 के क्षेत्रीय चुनाव भी विवाद से अछूते नहीं रहे। 12 आरक्षित विधानसभा सीटों को लेकर JAAC ने विरोध किया। चुनाव प्रक्रिया के दौरान हिंसा और सुरक्षा संबंधी परिस्थितियों के कारण राजनीतिक माहौल और अधिक तनावपूर्ण हो गया। रॉयटर्स ने जुलाई में रिपोर्ट किया कि चुनाव कई चरणों में कराए गए और कुछ क्षेत्रों में हिंसक झड़पों में मौतें हुईं।

यूएन मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन, भारत ने कहा पीओके अभिन्न अंग
पीओके का मुद्दा अब क्षेत्र की सीमाओं से बाहर भी पहुंच रहा है। सितंबर 2026 में न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर पाक अधिकृत कश्मीरी प्रवासियों के प्रदर्शन की रिपोर्ट आ रही हैं, जिसमें पीओके में मानवाधिकारों और कथित दमन की जांच की मांग की गई। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के एक सत्र में भी पाकिस्तान-प्रशासित क्षेत्र की स्थिति को लेकर गंभीर आरोप रखे गए। दूसरी ओर पीओके को लेकर भारत का आधिकारिक रुख दशकों से स्पष्ट रहा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जुलाई 2026 में कारगिल विजय दिवस के अवसर पर कहा कि पाकिस्तान के साथ यदि कभी बातचीत होती है तो वह केवल पीओके पर होगी और उन्होंने इसे भारत का अभिन्न अंग बताते हुए इसे पाकिस्तान द्वारा अवैध रूप से कब्जा किया हुआ क्षेत्र बताया था। इससे पहले जुलाई 2022 में भी राजनाथ सिंह ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि पीओके भारत का अभिन्न हिस्सा था, है और रहेगा।

पाकिस्तान को पीओके के लोगों की जरा भी परवाह नहीं
पाकिस्तान खुद मुश्किल में फंसा है, इसलिए उसे पीओके के लोगों की जरा भी परवाह नहीं है। आज हालात यह हैं कि एक ओर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लगातार बदहाली की ओर बढ़ रही है, दूसरी ओर सियासत तो पूरी तरह से सेना और सत्ता प्रतिष्ठान के हाथों की कठपुतली बनकर रह गई है। दशकों तक आतंकवाद को विदेश नीति के औजार के रूप में इस्तेमाल करने की नीति आज उसी पाकिस्तान के लिए अभिशाप बन चुकी है। वही आतंकवाद उसके अपने घर की दीवारों को भी खोखला कर रहा है। बलूचिस्तान में अलगाववादी विद्रोह, खैबर-पख्तूनख्वा में आतंकवादी हमले, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में व्यापक जनाक्रोश और भारत के प्रति प्रेम, राजनीतिक अस्थिरता और भारी-भरकम कर्ज के पहाड़ ने उसे ऐसे खतरनाक मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां उसके सामने केवल सरकार बदलने का नहीं, बल्कि व्यवस्था बदलने का संकट खड़ा हो गया है।पाकिस्तान के लिए अभिशाप बनी उसी की आतंक की फैक्ट्री
पाकिस्तान का सबसे विवादास्पद पहलू यह रहा है कि उसने कुछ आतंकी समूहों को भारत और अफगानिस्तान के खिलाफ रणनीतिक साधन के रूप में देखा। लेकिन इतिहास का सबसे बड़ा अभिषाप भी यह है कि जिन संगठनों को कभी संपत्ति समझा गया, वही आज पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा संकट बन गए हैं। खैबर-पख्तूनख्वा और उसके आदिवासी इलाकों में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के हमले लगातार बढ़ रहे हैं। खैबर पख्तूनख्वा प्रांत का बन्नू जिला 20 जून, 2026 को भी लगातार हुए दो आतंकी बम धमाकों से दहल उठा। एक के बाद एक हुए दो धमाकों में कुल 7 लोगों की जान चली गई। पाकिस्तान की सेना को जून में ही उत्तरी वजीरिस्तान में तीन दिनों तक अभियान चलाकर 21 आतंकवादियों को मारना पड़ा। यह दर्शाता है कि आतंकवाद अब सीमा पार भेजा जाने वाला हथियार नहीं रहा, बल्कि पाकिस्तान की खुद की आंतरिक सुरक्षा को चुनौती दे रहा है।

संसाधनों की धरती बलूचिस्तान पर भी विद्रोह की आग
पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत बलूचिस्तान प्राकृतिक गैस, सोना, तांबा और समुद्री संसाधनों से समृद्ध है। ग्वादर बंदरगाह और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) को पाकिस्तान अपनी आर्थिक क्रांति की आधारशिला बताता है, लेकिन स्थानीय बलूच समूहों का लंबे समय से आरोप रहा है कि उनके क्षेत्र की संपत्ति का लाभ उन्हें नहीं मिलता। इस क्षेत्र से निकलने वाले संसाधनों का उपयोग पाकिस्तान के अन्य हिस्सों के विकास के लिए किया जाता है। इसी असंतोष ने कई दशकों से बलूच विद्रोह को जन्म दिया है। बलूचियों को पाकिस्तान में किस नजर से देखा जाता है, इसको हाल ही में आई धुरंधर सीरीज की मूवीज ने भी शानदार तरीके से दिखाया गया है। इसीलिए बलूच राष्ट्रवादी संगठन पाकिस्तान सरकार और सेना पर दमन और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाते रहे हैं।खैबर-पख्तूनख्वा: आतंकवाद का लौटता हुआ साया
पाकिस्तान का खैबर-पख्तूनख्वा प्रांत एक बार फिर आतंकवादी हिंसा की गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) जैसे संगठनों के हमले सुरक्षा बलों और आम नागरिकों दोनों को प्रभावित कर रहे हैं। विडंबना यह है कि जिन चरमपंथी समूहों को कभी क्षेत्रीय रणनीति के तहत सहन किया गया या उपयोगी माना गया, वही अब पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गए हैं। इससे वहां निवेश, रोजगार और सामान्य जनजीवन पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

भारत के साथ संबंध रखने और साथ जाने पर जोर
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में भी हालात बदतर होने लगे हैं। स्थानीय संगठनों और आम नागरिकों ने सड़कों पर उतरकर आर्थिक राहत और राजनीतिक अधिकारों की मांग की है। वास्तव में पीओके में हालात यह हैं कि अब कुछ समूह अधिक स्वायत्तता और अधिकारों की मांग पर जोर दे रहे हैं, जबकि बहुत से लोग भारत के साथ बेहतर संबंध रखने, उसके साथ जाने या अन्य राजनीतिक विकल्पों की बात करते हैं। इन आंदोलनों ने यह अवश्य स्पष्ट किया है कि वहां शासन व्यवस्था और आर्थिक स्थिति को लेकर व्यापक असंतोष निरंतर बढ़ रहा है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान में भी आर्थिक कठिनाइयों और अधिकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर समय-समय पर बड़े विरोध प्रदर्शन हुए हैं। इसी के चलते कराकोरम हाईवे जैसे रणनीतिक मार्गों को भी हजारों प्रदर्शनकारियों ने अवरुद्ध किया, जिससे पाकिस्तान-चीन व्यापार मार्ग प्रभावित हुआ।

एक भूगोल, दो तस्वीरें: J&K और PoK की तुलना
1947 के विभाजन की त्रासदी यह भी रही कि एक ही सांस्कृतिक और भौगोलिक विरासत वाले क्षेत्रों की विकास यात्रा अलग-अलग दिशाओं में चली गई। भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में पहले ही काफी विकास हुआ है, लेकिन धारा 370 के खात्मे के बाद तो सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यटन, तकनीक और आधारभूत संरचना के सभी क्षेत्रों में बड़े निवेश हुए हैं। दूसरी ओर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के क्षेत्रों में विकास, रोजगार और आधारभूत सुविधाओं की बदतर हालात और कमी को लेकर लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं। दोनों क्षेत्रों के विकास में जमीन-आसमान का अंतर भी पीओके में बहस का विषय रही है। भारत के विकास मॉडल के सामने पीओके कहीं नहीं ठहरता। यही वजह है कि PoK के कई हिस्सों में आर्थिक अवसरों और बुनियादी सुविधाओं की कमी को लेकर स्थानीय असंतोष बार-बार सामने आता है।पीओके में स्थित है हमारी शारदा पीठ की सांस्कृतिक विरासत
हमारी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहरों में शामिल शारदा पीठ पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित है। हिंदू परंपरा में इसे ज्ञान की देवी सरस्वती से जुड़ा महत्वपूर्ण तीर्थ माना जाता है। भारत में कई नेताओं और सांस्कृतिक संगठनों ने समय-समय पर इसके दर्शन खोलने और संरक्षण को लेकर अपनी इच्छा व्यक्त की है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी इस ऐतिहासिक विरासत के महत्व पर अपनी बात रख चुके हैं। उन्होंने कहा है कि ऐसा कैसे संभव है कि बाबा अमरनाथ शिव के रूप में हमारे साथ हैं तो मां शारदा की शक्तिपीठ LOC के दूसरी तरफ कैसे रह सकती है? कश्मीरी पंडितों की कुलदेवी मां शारदा की इस पीठ पर हिंदू देवी सरस्‍वती का मंदिर है, जिन्‍हें शारदा भी कहा जाता है।

अब भारतीय संविधान और कानून के हिसाब से समझिए
• भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 के अनुसार भारत एक संघ है, जिसमें राज्य और केंद्र शासित प्रदेश हैं। जम्मू और कश्मीर, जिसमें पीओके भी शामिल है, भारतीय संघ का अभिन्न हिस्सा है। भारतीय संसद ने 1994 में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें कहा गया था कि पाकिस्तान के कब्जे में कश्मीर का जो हिस्सा (POK) है वो भारत का हिस्सा है और इसे वापस लिया जाएगा।
• भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 के अनुसार, आप जन्म से, वंशानुगत आधार पर और रजिस्ट्रेशन के माध्यम से भारत की नागरिकता प्राप्त की जा सकती है। भारतीय संविधान के मुताबिक, पीओके के लोग पहले से ही भारत के नागरिक माने जाते हैं, क्योंकि भारतीय संविधान जम्मू और कश्मीर, जिसमें पीओके भी शामिल है, के सभी निवासियों को भारतीय नागरिक मानता है।
• PoK की जनता का सबसे बड़ा आरोप यह है कि पाकिस्तान ने इस क्षेत्र को कभी भी विकास की मुख्यधारा में शामिल ही नहीं किया। प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर होने के बावजूद यहां उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर अत्यंत सीमित हैं। परिणामस्वरूप युवाओं में निराशा और असंतोष बढ़ने के साथ-साथ भारत में विलय की चाहत नजर आने लगी है।
• पाकिस्तान पर विजय के 23वें कारगिल दिवस पर जम्मू में केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) भारत का अभिन्न अंग है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर, भारत का अभिन्न हिस्सा था, भारत का हिस्सा है और हमेशा-हमेशा रहेगा।

पाक में आर्थिक संकट: IMF की बैसाखियों पर खड़ा राष्ट्र
आतंकवाद के साए के बीच पाकिस्तान की आर्थिक कहानी भी उतनी ही चिंताजनक है। बार-बार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के दरवाजे पर दस्तक देना उसकी आर्थिक नीतियों की विफलता को दर्शाता है। पाकिस्तान के आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार मार्च 2025 तक देश का सार्वजनिक कर्ज लगभग 76 लाख करोड़ पाकिस्तानी रुपये तक पहुंच गया था। इसके अलावा लगभग 87 अरब अमेरिकी डॉलर का बाहरी कर्ज भी था। पाक में वैश्विक संकट के चलते हाल के वर्षों में महंगाई भी बढ़ी है। यहां की अर्थव्यवस्था अब भी IMF की कठोर शर्तों, बिजली दरों में वृद्धि और कर सुधारों के दबाव में है। देश को बार-बार राहत पैकेजों की आवश्यकता पड़ रही है और ऊर्जा क्षेत्र का संकट अभी भी उसकी सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल है। स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि पेट्रोल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन हुए हैं।पाक की राजनीति में सेना का वर्चस्व और लोकतंत्र का संकट
पाकिस्तान के इतिहास का एक स्थायी सच यह भी रहा है कि वहां सत्ता के दो केंद्र हमेशा मौजूद रहे हैं। एक निर्वाचित सरकार और दूसरा सैन्य प्रतिष्ठान। कई प्रधानमंत्रियों की सत्ता से विदाई और राजनीतिक दलों के बीच लगातार संघर्ष इस बात को दर्शाते हैं कि पाकिस्तान में लोकतांत्रिक संस्थाएं अभी भी पूरी तरह स्वतंत्र और मजबूत नहीं हो पाई हैं। इमरान खान की गिरफ्तारी के बाद उत्पन्न राजनीतिक तनाव और उनके समर्थकों तथा सुरक्षा एजेंसियों के बीच टकराव ने यह स्पष्ट कर दिया कि पाकिस्तान की राजनीति केवल चुनावों से संचालित नहीं होती, बल्कि सेना और सत्ता प्रतिष्ठान की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण बनी रहती है।

भारत के लिए क्या हैं रणनीतिक अवसर
• पाकिस्तान के भीतर पैदा हुए संकट भारत के लिए केवल राजनीतिक घटनाक्रम नहीं हैं, बल्कि क्षेत्रीय रणनीति के दृष्टिकोण से बेहद अहम भी हैं। पहला लाभ यह है कि पाकिस्तान की सेना और सुरक्षा तंत्र को अब अपनी आंतरिक समस्याओं बलूचिस्तान, खैबर-पख्तूनख्वा, पीओके और आतंकी हिंसा पर अधिक संसाधन खर्च करने पड़ रहे हैं।
• दूसरा बड़ा बदलाव यह है कि ऑपरेशन सिंदूर ने भारत की नई सुरक्षा नीति का संकेत दिया है कि सीमा पार आतंकवादी हमलों का जवाब केवल कूटनीतिक विरोध तक सीमित नहीं रहेगा। इस ऑपरेशन में केवल 25 मिनट में लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों से जुड़े नौ अड्डे को नेस्तनाबूत किया गया। साथ ही लगभग 100 आतंकवादी मार गिराए।
• तीसरा लाभ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की आतंकवाद से जुड़ी छवि को लेकर बढ़ती आलोचना के रूप में दिखाई देता है। अब वैश्विक परिदृश्य में पाक की छवि आतंकी राष्ट्र या आतकं को संरक्षण देने वाली बन गई है।
• हालांकि किसी भी परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसी की अस्थिरता भारत के लिए पूरी तरह लाभकारी नहीं मानी जा सकती, क्योंकि इससे सीमा सुरक्षा, शरणार्थी संकट और क्षेत्रीय अस्थिरता जैसी नई चुनौतियां भी उत्पन्न हो सकती हैं।

 

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