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कुर्सी बचाने में लगे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का गृह जिला ही मनरेगा में राज्य में सबसे पिछड़ा, गरीबों को नहीं मिला रोजगार

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मुख्यमंत्री के गृह जिले जोधपुर में हालात सबसे ज्यादा बदतर
सवाल जब कुर्सी बचाने का हो तो सारे जतन किए जाते हैं और यदि यह कुर्सी मुख्यमंत्री की हो अपनी जिम्मेदारी, अपने काम सभी गौण हो जाते हैं। राजस्थान में गहलोत-पायलट की लड़ाई में ऐसा ही हो रहा है। गरीबों, मजदूरों, श्रमिकों और वंचितों को रोजगार दिलाने वाली सबसे बड़ी योजना महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) मुख्यमंत्री के गृह जिले जोधपुर में ही प्रदेश में सबसे पिछड़ी हुई है।सियासी लड़ाई की भेंट चढ़ गया मनरेगा का लक्ष्य
इसके चलते बेरोजगारों का रोजगार गारंटी का सपना पूरा नहीं हो पा रहा है। दरअसल, जिस कोरोनाकाल में ग्रामीण मजदूरों को रोजगार की सबसे ज्यादा आवश्यकता थी, वह समय तो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट की सियासी लड़ाई की भेंट चढ़ गया। कांग्रेस आलाकमान के अपनी मांगें मनवाने के लिए दिल्ली तक बगावत करने के बाद भी पायलट के हाथ कुछ नहीं लगा। मुख्यमंत्री की कुर्सी तो बची रही, लेकिन इसके लिए राज्य की जनता को नुकसान झेलना पड़ा।

प्रदेश में 873 पंचायतों में गरीबों को सरकार नहीं दे रही रोजगार
अपने किस्सा कुर्सी का अभियान में बिजी राज्य के मुख्यमंत्री का गृह जिला जोधपुर ग्रामीण इलाकों में मजदूरों को रोजगार दिलाने में पिछड़ गया है। एक चौंकाने वाली रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान की 873 ग्राम पंचायतों में मजदूरों-श्रमिकों को रोजगार दिलाने की शून्य उपलब्धि रही। यानी इन पंचायतों के हजारों जरूरतमंद लोगों में के किसी को रोजगार नहीं मिल पाया. भले ही योजना के नाम में रोजगार गारंटी शामिल हो।

जोधपुर में प्रदेश की सबसे ज्यादा 125 पंचायतों में काम नहीं
मनरेगा में रोजगार न दे पाने में सबसे बुरी स्थिति खुद मुख्यमंत्री के गृह जिले जोधपुर की रही। अपने जिले की ओर ध्यान न दे पाने के कारण जोधपुर पूरे राज्य में पिछड़ गया। जोधपुर में प्रदेश की सबसे ज्यादा 125 पंचायतों में मजदूरों-श्रमिकों को रोजगार दिलाने की शून्य उपलब्धि रही। कोरोना की आपद स्थिति में गरीब मनरेगा से रोजगार मिलने की बाट देखते रहे, लेकिन न तो जनप्रतिनिधि और न ही किसी अधिकारी को इन पर दया आई।कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और मंत्रियों के जिलों में भी नहीं मिला रोजगार
जोधपुर के बाद शून्य नियोजन के मामले में करौली का नंबर आता है, यहां पर 94 पंचायतों में और कैबिनेट मंत्री बीडी कल्ला के बीकानेर में 93 पंचायत में एक भी मजदूर-श्रमिक को काम नहीं मिला है। इसके अलावा दौसा में 80, राजस्व मंत्री हरीश चौधरी के जिले बाड़मेर में 68, प्रतापगढ़ में 51, पूर्व मंत्री विश्वेंद्र सिंह के जिले भरतपुर में 48, भीलवाड़ा में 46, राजधानी जयपुर और अलवर में 35-35 और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और शिक्षा राज्य मंत्री के जिले में 30 ग्राम पंचायतों में एक भी गरीब को रोजगार नहीं मिला है।

मनरेगा यानी गरीब परिवार को 100 दिन काम की गारंटी

•मनरेगा का सबसे बड़ा उद्देश्य ग्रामीण विकास और रोजगार के दोहरे लक्ष्य को प्राप्त करना है।
•ग्रामीण अंचल में निवास करने वाले गरीब व कमजोर आय वर्ग के परिवारों को 100 दिनों की रोजगार प्रदान करना है ताकि वे अपनी आजीविका चला सकें।
•विकास कार्य के साथ साथ आर्थिक मजबूती प्रदान करना।
•ग्राम पंचायत स्तर पर रोजगार प्रदान करना जिससे रोजगार हेतु अन्य शहरों में होने वाले पलायन को रोका जा सकें।
•आजीविका को मजबूत करना और गरीब परिवारों की आय में वृद्धि करना।
•मनरेगा योजना का उद्देश्य समाज के कमजोर वर्ग को भी मुख्य धारा में सम्मिलित करना है।
•पंचायती राज प्रतिष्ठानों को और मजबूत करना।

 

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