Home केजरीवाल विशेष पंजाब की राजनीति में ‘आप’ का तेजी से बिखरता कुनबा, भाजपा की...

पंजाब की राजनीति में ‘आप’ का तेजी से बिखरता कुनबा, भाजपा की बढ़ती पकड़

SHARE

पंजाब की राजनीति में आम आदमी पार्टी जिन मुंगेरीलाल से बेशुमार सपने दिखाकर सत्ता में आई थी, वही पार्टी अब अंदरूनी टूट, नेतृत्व संकट, सत्ता विरोधी लहर और राजनीतिक पलायन की मार झेलती दिखाई दे रही है। आप के नेता को जहाज डूबने से पहले उछल-कूद कर ही रहे हैं। अब मुख्यमंत्री भगवंत मान के ही चचेरे भाई ज्ञान सिंह मान का भारतीय जनता पार्टी में शामिल होना केवल एक साधारण राजनीतिक घटना नहीं है, बल्कि यह उस गहरे असंतोष और अविश्वास का संकेत है, जो अब ‘आप’ के भीतर तेजी से फैलता जा रहा है। इसका मतलब साफ है कि आप नेतृत्व पर से अब नेताओं को ही नहीं बल्कि अपनों का भी विश्वास उठ गया है। अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी में शामिल होने की इस दौड़ से साफ संकेत मिलते हैं कि पंजाब में आम आदमी पार्टी की जमीन खिसक रही है और भाजपा अपने संगठन, रणनीति और नेतृत्व के दम पर राज्य में नई राजनीतिक धुरी बनने की तैयारी कर चुकी है। बीजेपी संगठन और कार्यकर्ता वैसे भी पश्चिम बंगाल में प्रचंड बहुमत मिलने से जोश, उत्साह और आत्मविश्वास से भरे हुए हैं।परिवार के भीतर दरार ने बढ़ाई भगवंत मान की बेचैनी
राजनीति में विरोधियों का हमला अलग बात होती है, लेकिन जब अपने ही घर से दरार की आवाज आने लगे, तो संकट कहीं अधिक गहरा माना जाता है। ज्ञान सिंह मान का भाजपा में शामिल होना मुख्यमंत्री भगवंत मान के लिए केवल राजनीतिक झटका नहीं, बल्कि व्यक्तिगत और मनोवैज्ञानिक आघात भी है। पंजाब की राजनीति में परिवार और सामाजिक रिश्तों का बड़ा प्रभाव माना जाता है। ऐसे में मुख्यमंत्री के अपने करीबी रिश्तेदार का भाजपा का दामन थामना यह संदेश दे रहा है कि ‘आप’ के भीतर भरोसे की दीवारें दरक चुकी हैं। यह बदलाव उस समय हुआ है, जब राज्य में कानून व्यवस्था, नशे, बेरोजगारी और किसानों के मुद्दों पर सरकार लगातार घिर रही है। जनता के बीच यह धारणा भी मजबूत हो रही है कि आम आदमी पार्टी ने बदलाव के नाम पर सत्ता तो हासिल कर ली, लेकिन शासन चलाने में वह पूरी तरह असफल साबित हुई।राघव चड्ढा समेत नेताओं का पलायन बना खतरे की घंटी
आम आदमी पार्टी के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि यह सिर्फ एक व्यक्ति का मामला नहीं रह गया है। इससे पहले पार्टी के कई बड़े चेहरे और सांसद भी दूरी बनाते दिखाई दिए। राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा जैसे नेताओं के भाजपा में जाने से पहले ही पार्टी के भीतर बेचैनी बढ़ा दी थी। अब लगातार हो रहे राजनीतिक बदलाव यह संकेत दे रहे हैं कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व पंजाब इकाई को संभालने में कमजोर पड़ रहा है। दरअसल, ‘आप’ की सबसे बड़ी ताकत उसका “नई राजनीति” वाला नैरेटिव था। लेकिन आज वही पार्टी अवसरवादी, गुटबाजी और नेतृत्व संघर्ष का प्रतीक बनती जा रही है। दिल्ली मॉडल का प्रचार करने वाली पार्टी पंजाब में प्रशासनिक मॉडल तक खड़ा नहीं कर सकी। परिणाम यह हुआ कि कई नेता भविष्य की राजनीति को देखते हुए सुरक्षित विकल्प तलाशने में लगे हैं।

पश्चिम बंगाल के अभेद्य दुर्ग में सैंध लगाने से बढ़ा आत्मविश्वास
भारतीय जनता पार्टी लंबे समय तक पंजाब में अकाली दल की सहयोगी पार्टी के रूप में सीमित भूमिका में रही। लेकिन अब पश्चिम बंगाल जैसे अभेद्य दुर्ग में सैंध लगाने के बाद मिले आत्मविश्वास से भाजपा ने पंजाब में भी स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति बनने का स्पष्ट लक्ष्य तय कर लिया है। केंद्र सरकार की योजनाओं, राष्ट्रीय सुरक्षा, सिख समुदाय से संवाद और हिंदू-सिख एकता के मुद्दों को लेकर भाजपा ने पंजाब में नई रणनीतिक जमीन तैयार करनी शुरू कर दी है। बीजेपी की बहुत बड़ी मदद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जमीनी स्तर पर बैठकें करके कर रहा है। वह लोगों को बता रहा है कि इस सरहदी इलाके में राष्ट्रवादी पार्टी का सत्ता संभालना कितना जरूरी है।पंजाब में भाजपा की नई रणनीति ने बदला समीकरण
भाजपा का थिंक टैंक यह समझ चुका है कि पंजाब में केवल पारंपरिक राजनीति से काम नहीं चलेगा। इसलिए पार्टी लगातार प्रभावशाली चेहरों, सामाजिक संगठनों और क्षेत्रीय नेताओं को अपने साथ जोड़ने में लगी है। ज्ञान सिंह मान का भाजपा में शामिल होना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि अब पंजाब में मुकाबला केवल कांग्रेस और ‘आप’ के बीच नहीं रहेगा, बल्कि भाजपा निर्णायक ताकत बनकर उभरेगी। भाजपा ने बिहार और पश्चिम बंगाल में हुए पिछले दो विधानसभा चुनावों में इस सोच को सच साबित करके भी दिखाया है। पश्चिम बंगाल में तो उसे ऐतिहासिक जनादेश मिला है।गैंगस्टर संस्कृति, ड्रग्स और आर्थिक संकट से बढ़ा जनाक्रोश
पंजाब में आम आदमी पार्टी ने भ्रष्टाचार खत्म करने, नशे पर लगाम लगाने और रोजगार देने के बड़े वादे किए थे। लेकिन जमीनी हालात इसके उलट दिखाई देते हैं। राज्य में कानून व्यवस्था को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। गैंगस्टर संस्कृति, ड्रग्स नेटवर्क और आर्थिक संकट जैसी समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। किसानों की नाराजगी भी सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर सरकार अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को ही एकजुट नहीं रख पा रही, तो वह राज्य को स्थिर नेतृत्व कैसे दे पाएगी? यही कारण है कि जनता के बीच आप पार्टी की विश्वसनीयता लगातार कमजोर हो रही है।

पीएम मोदी की लोकप्रियता से भाजपा के लिए बड़ा अवसर
पश्चिम बंगाल के बाद पंजाब की राजनीति में यह बदलाव भाजपा के लिए बड़ा अवसर लेकर आया है। पार्टी अब केवल शहरी सीटों तक सीमित रहने के बजाय ग्रामीण और किसान क्षेत्रों में भी अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश कर रही है। केंद्र सरकार की योजनाओं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता को आधार बनाकर भाजपा पंजाब में नया सामाजिक और राजनीतिक समीकरण खड़ा करने में जुटी है। मोदी सरकार ने करतारपुर कॉरिडोर से लेकर वीर बाल दिवस तक सिख समुदाय के लिए कई बड़े काम किए हैं। भाजपा को यह भी फायदा मिल रहा है कि कांग्रेस यहां भी गुटबाजी से जूझ रही है और आम आदमी पार्टी सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रही है। ऐसे में भाजपा खुद को एक स्थिर, संगठित, सुशासन और राष्ट्रीय दृष्टिकोण वाली पार्टी के रूप में प्रस्तुत कर रही है।चुनाव से पहले बदल सकता है पंजाब का राजनीतिक नक्शा
अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले पंजाब की राजनीति में अभी और बड़े उलटफेर देखने को मिल सकते हैं। आम आदमी पार्टी के भीतर बढ़ती अस्थिरता और भाजपा की आक्रामक रणनीति यह संकेत दे रही है कि राज्य में राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। राघव चड्ढा समेत सांसदों का और अब ज्ञान सिंह मान का भाजपा में शामिल होना केवल एक शुरुआत माना जा रहा है। यह सिलसिला जारी रहने वाला है। इससे आने वाले समय में ‘आप’ को अपने ही नेताओं और कार्यकर्ताओं को संभालना मुश्किल हो सकता है। पंजाब की जनता भी अब केवल नारों और प्रचार से आगे बढ़कर ठोस शासन और स्थिर नेतृत्व चाहती है। यही वजह है कि भाजपा इस राजनीतिक खालीपन को भरने के लिए पूरी ताकत झोंक चुकी है।

Leave a Reply