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अयोध्या के बाद मथुरा की बारी, बाबरी ध्वंस के दिन मथुरा की शाही मस्जिद ईदगाह में हनुमान चालीसा का पाठ और अभिषेक का ऐलान, महासभा के आगरा प्रभारी की गिरफ्तारी से हिंदुओं में रोष

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भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख मुद्दे में शामिल राम मंदिर को आज के दिन (6 दिसंबर, 1992) तीन दशक पहले बाबरी ध्वंस के साथ नई राह मिली थी। भाजपा की रथ यात्रा और कार सेवा से देशभर में अयोध्या में राम मंदिर के लिए बने अनुकूल माहौल के बाद आए कोर्ट के फैसले ने राम लला को टैंट से निकालकर भव्य मंदिर में पहुंचाया। पीएम मोदी द्वारा राम मंदिर का शिलान्यास करने के बाद अब निर्माण कार्य युद्धस्तर पर चल रहा है। राम जन्मभूमि के लिए छह दिसंबर को मिली ऐतिहासिक जीत को याद करते हुए अब अखिल भारत हिंदू महासभा ने इसी दिन मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि से सटी शाही मस्जिद ईदगाह में हनुमान चालीसा का पाठ और लड्डू गोपाल का अभिषेक करने का ऐलान किया। अभिषेक और पाठ के लिए जाते हिंदू महासभा के आगरा प्रभारी को पुलिस द्वारा गिरफ्तार करने से हिंदुओं में काफी आक्रोश है।

हिंदू पक्ष का दावा- शाही ईदगाह में मौजूद है स्वास्तिक और मंदिर होने के प्रतीक चिह्न
महासभा का दावा है कि शाही ईदगाह मस्जिद उसी जगह पर बनी है, जहां पहले कभी कृष्ण मंदिर का गर्भगृह था और गर्भगृह को तोड़कर वह मस्जिद बनायी गयी है। हिंदू पक्ष का दावा है कि शाही ईदगाह में स्वास्तिक का चिह्न, मंदिर होने के प्रतीक के साथ मस्जिद के नीचे भगवान का गर्भ गृह है। इस बीच छह दिसंबर को शाही मस्जिद ईदगाह पर हनुमान चालीसा पाठ करने के अखिल भारत हिंदू महासभा के आह्वान पर पूरा जिला अलर्ट कर दिया। ईदगाह आने जाने वाले रास्तों पर वाहनों का प्रवेश प्रतिबंधित किया गया। सुबह कांवड़ में गंगा जल लेकर श्रीकृष्ण जन्मस्थान की ओर जा रहे महासभा के आगरा जिला प्रभारी सौरभ शर्मा को पुलिस ने भूतेश्वर चौराहा से हिरासत में ले लिया। कोर्ट में याचिका दायर करने वाले पक्षकार मनीष यादव और वकील महेंद्र प्रताप सिंह का दावा है कि शाही ईदगाह में हिंदू स्थापत्य कला के सबूत मौजूद हैं। ये वैज्ञानिक सर्वे के बाद सामने आ जाएंगे।

हाईकोर्ट ने ईदगाह मामले में चार माह में सुनवाई पूरी करने के दिए थे निर्देश
मथुरा की शाही ईदगाह मस्जिद का मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी पहुंच चुका है। मस्जिद के विवादित परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराए जाने की मांग को लेकर याचिका दाखिल की गई थी। इस पर हाईकोर्ट ने मथुरा की जिला अदालत को 4 माह में सुनवाई पूरी कर फैसला लेने का आदेश दिया था। मथुरा की शाही ईदगाह मस्जिद के सर्वेक्षण कराए जाने और निगरानी के लिए कोर्ट कमिश्नर नियुक्त करने की मांग को लेकर मथुरा के जिला अदालत में एक साल पहले अर्जी दाखिल की गई थी। यह अर्जी भगवान श्री कृष्ण विराजमान के वाद मित्र मनीष यादव ने दाखिल की है। एक साल से ज्यादा का वक्त बीतने के बावजूद अभी तक इस अर्जी पर सुनवाई पूरी नहीं हो सकी है। सुनवाई जल्द से जल्द पूरी हो, इसकी मांग को लेकर मनीष यादव ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में पिछले दिनों अर्जी दाखिल की थी। केशवदेव मंदिर के परिसर से ईदगाह मस्जिद को हटाने के लिए 12 केस दर्ज
इस विवाद को लेकर मथुरा की स्थानीय अदालतों में 12 से ज्यादा केस फाइल हो चुके हैं। सभी याचिकाओं में एक आम मांग 13.37 एकड़ के परिसर से शाही ईदगाह मस्जिद को हटाने की है। यह मस्जिद कटरा केशव देव मंदिर के पास है। माना जाता है कि भगवान कृष्ण का जन्म इसी मंदिर परिसर में हुआ था। अन्य अपीलों में वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद की तरह ईदगाह मस्जिद का भी सर्वे कराने और वहां पूजा का अधिकार देने की मांग शामिल है। अधिवक्ता महेंद्र प्रताप सिंह का कहना है कि ईदगाह मस्जिद में स्वास्तिक, ॐ, कमल जैसे हिंदू निशान मौजूद हैं, जो इस बात का प्रमाण हैं कि पहले यहां मंदिर था।

औरंगजेब ने मंदिर तोड़कर बनवाई मस्जिद, बनारस के राजा पटनीमल ने खरीदी भूमि
इस बीच श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस ने संवेदनशील स्थानों पर पैदल गश्त की। बता दें कि जिस शाही ईदगाह मस्जिद को लेकर विवाद है, उसका निर्माण 1670 में औरंगजेब ने कराया था। माना जाता है कि इसका निर्माण एक पुराने मंदिर को तोड़कर उसकी जगह कराया गया था। इस इलाके को नजूल भूमि यानी गैर-कृषि भूमि माना जाता है। इस पर पहले मराठों और बाद में अंग्रेजों का अधिकार था। 1815 में बनारस के राजा पटनी मल ने 13.37 एकड़ की यह भूमि ईस्ट इंडिया कंपनी से नीलामी में खरीदी थी। उसी पर ईदगाह मस्जिद बनी है, जिसे भगवान कृष्ण का जन्म स्थान माना जाता है। राजा पटनी मल ने यह भूमि जुगल किशोर बिड़ला को बेच दी थी। यह पंडित मदन मोहन मालवीय, गोस्वामी गणेश दत्त और भीकेन लालजी आत्रेय के नाम पर रजिस्टर्ड हुई थी। जुगल किशोर ने एक ट्रस्ट बनाया, जिसका नाम श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट रखा। इसने कटरा केशव देव मंदिर के स्वामित्व का अधिकार हासिल कर लिया।

ज्ञानवापी की तर्ज पर ईदगाह मस्जिद में भी सर्वे और वीडियोग्राफी की मांग
दरअसल, अयोध्या में सदियों के संघर्ष के बाद भव्य-दिव्य राम मंदिर के निर्माण से हिंदू धर्मावलंबी बेहद उत्साहित है। जन-जन की आस्था के केंद्र राम का पावन धाम बनने के बाद अब नजरें काशी-मथुरा की ओर हैं। आततायी औरंगजेब ने हिंदुओं के जिन हजारों धार्मिक स्थलों के तुड़वाकर उससे मस्जिदें बनवाईं, उनमें काशी-मथुरा सबसे प्रमुख हैं। काशी में ज्ञानवापी मस्जिद में कोर्ट के आदेश पर ऑर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट ने सर्वे और वीडियोग्राफी कराई है। हालांकि इसमें मुस्लिम समुदाय ने बाधा पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन जितनी वीडियोग्राफी हो पाई उसमें कैमरामैन ने यह दावा किया है कि मस्जिद की दीवारों पर कमल के फूल और स्वास्तिक के निशान के अलावा मूर्तियों के चिन्ह भी हैं। ज्ञानवापी में सर्वे और वीडियोग्राफी होने के बाद अब श्रीकृष्ण जन्मस्थान से सटी शाही ईदगाह मस्जिद के भी सर्वे की मांग उठी थी। 

 

काशी में तीन बार मंदिर को तोड़कर बनाई गई ज्ञानवापी मस्जिद
वाराणसी के काशी विश्वनाथ और ज्ञानवापी मस्जिद में श्रृंगार गौरी की पूजा को लेकर कोर्ट में याचिका दायर हुई थी। श्रृंगार गौरी का पूजन करने के लिए 5 महिलाओं ने अधिकार मांगा था। लोक चर्चा है कि औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर को तुड़वाकर ज्ञानवापी मस्जिद बनवाई थी। ऐतिहासिक दस्तावेजों को देखें तो इनके निर्माण और पुनर्निर्माण से जुड़ी कई कहानियां हैं। हिस्ट्री डिपार्टमेंट के सीनियर प्रोफेसर डॉ. राजीव श्रीवास्तव के मुताबिक विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर ज्ञानवापी मस्जिद के निर्माण से जुड़ी बहुत सारी मान्यताएं हैं। एक मान्यता है कि काशी विश्वनाथ मंदिर को 1194 में मोहम्मद गोरी ने तुड़वाया था। इसके बाद 14वीं सदी में जौनपुर के शासक मो. शाह ने मंदिर के एक बड़े हिस्से को तुड़वाकर ज्ञानवापी मस्जिद बनवाई।अकबर के नौ रत्न राजा टोडरमल ने काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण दोबारा करवाया
इसके बाद साल 1585 में अकबर के नौ रत्नों में एक राजा टोडरमल ने काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण दोबारा करवाया। इसके बाद 18 अप्रैल 1669 को औरंगजेब ने एक फरमान जारी किया। इसमें काशी विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त करने का आदेश दिया गया। इसके बाद अगस्त 1669 में ऐलान किया गया कि मंदिर को पूरी तरह से तोड़ मस्जिद को उसकी जगह तामील कर दिया गया है। औरंगजेब के इस फरमान की कॉपी कोलकाता की एशिया-टिक लाइब्रेरी में आज भी रखी है। औरंगजेब के समय के लेखक साकी मुस्तइद खां ने भी अपनी किताब ‘मासीदे आलमगिरी’ में इस फरमान का जिक्र किया है।

ज्ञानवापी मस्जिद की पश्चिम दीवार पर कमल का फूल, नंदी की मूर्ति और स्वास्तिक के निशान भी
काबिले गौर है कि पिछले दिनों वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद में अदालत के आदेश पर सर्वे करने वाली टीम के साथ गए कैमरामैन ने बड़ा दावा किया है। उनके अनुसार, मस्जिद पर कमल के निशान हैं। दीवार पर स्वास्तिक के निशान हैं, दीवारों पर मूर्तियां उकेरी गई हैं। सर्वे उस दावे के आधार पर किया जा रहा है, जिसमें हिंदू पक्ष के एक वर्ग का मानना है कि बनारस में औरंगजेब ने काशी विश्वानाथ मंदिर को तोड़कर और उसके अवशेषों के जरिए ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण कराया था। जिसके आधार पर कोर्ट ने वीडियोग्राफी के साथ सर्वे के आदेश दिए थे। कोर्ट के आदेश पर परिसर के श्रृंगार गौरी और विग्रहों का सर्वे किया जाना है। टाइम्स नाउ नवभारत पर ज्ञानवापी मस्जिद के अंदर सर्वे करने वाली टीम के कैमरामैन ने बड़ा दावा किया है। कैमरामैन गणेश शर्मा का दावा है कि उन्होंने मस्जिद की दीवार पर स्वास्तिक के निशान देखे हैं। गणेश शर्मा के मुताबिक परिक्रमा करते वक्त उन्होंने नंदी की मूर्ति भी देखी है। गणेश शर्मा ने मस्जिद के दीवारों पर हिंदू धर्म से जुड़े प्रतीक चिन्हों को देखने का दावा किया। सुप्रीम कोर्ट के वकील विष्णु ने भी दावे को सही ठहराया है। श्रृंगार गौरी के पास आकृतियां भी हैं।

 

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