
दुनिया की नजर में बदलती भारत की आर्थिक तस्वीर
भारत को लंबे समय तक एक ऐसे विकासशील देश के रूप में देखा जाता रहा है, जहां विशाल आबादी, कम प्रति व्यक्ति आय और व्यापक गरीबी आर्थिक प्रगति के रास्ते में बड़ी बाधाएं हैं। लेकिन पिछले कुछ दशकों में देश की अर्थव्यवस्था में आए बदलाव ने इस तस्वीर को काफी हद तक बदल दिया है।
दक्षिण कोरियाई अर्थशास्त्री क्युंगहून किम: लोगों के जीवन स्तर में बड़ा सुधार
दक्षिण कोरियाई अर्थशास्त्री क्युंगहून किम ने भारत की प्रगति का आकलन करते हुए इस बात पर जोर दिया है कि किसी देश की आर्थिक स्थिति को केवल उसकी मौजूदा प्रति व्यक्ति आय से नहीं मापना चाहिए। यह देखना भी जरूरी है कि वहां लोगों के जीवन स्तर में कितनी तेजी से सुधार हो रहा है और देश विकसित अर्थव्यवस्थाओं के करीब पहुंचने में कितना सफल हो रहा है।
कोरिया इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक पॉलिसी में भारत और दक्षिण एशिया टीम का नेतृत्व करने वाले किम के अनुसार, भारत की आर्थिक प्रगति को समझने के लिए पिछले दस वर्षों के बदलाव पर विशेष ध्यान देना होगा। उनका आकलन ऐसे समय में आया है, जब भारत की विकास दर, बढ़ते घरेलू बाजार और वैश्विक विनिर्माण में संभावित भूमिका को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज है।
आर्थिक स्तर पर और सशक्त बन रहा भारत
किम ने जो आंकड़े सामने रखे हैं, उनके मुताबिक वर्ष 2025 में भारत की प्रति व्यक्ति GDP 2,702 डॉलर थी। परचेजिंग पावर पैरिटी यानि PPP के आधार पर यह आंकड़ा 11,784 डॉलर था। PPP के जरिए अलग-अलग देशों में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में अंतर को ध्यान में रखकर लोगों की वास्तविक क्रय शक्ति की तुलना की जाती है।
इन आंकड़ों का महत्व इसलिए है, क्योंकि भारत की विशाल आबादी के कारण कुल GDP का आकार और आम नागरिक की औसत आर्थिक स्थिति दो अलग-अलग तस्वीरें प्रस्तुत करते हैं। देश की कुल अर्थव्यवस्था बड़ी हो सकती है, लेकिन उसका लाभ लोगों तक किस हद तक पहुंच रहा है, इसे समझने के लिए प्रति व्यक्ति आय और जीवन स्तर जैसे इंडीकेटर्स को देखना आवश्यक है।
किम के अनुसार, 1990 में भारत की प्रति व्यक्ति GDP कम आय वाले देशों के औसत से केवल 15 प्रतिशत अधिक थी। वर्ष 2025 तक यह अनुपात उस औसत के चार गुने से भी अधिक हो गया। इसी तरह, मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं के औसत के मुकाबले भारत की प्रति व्यक्ति GDP 2025 में लगभग 64 प्रतिशत तक पहुंच गई। यहां एक अहम बात समझने की है। भारत ने निम्न आय वाले देशों के मुकाबले उल्लेखनीय प्रगति की है।
भारत की आर्थिक प्रगति का एक महत्वपूर्ण पहलू गरीबी में आई कमी है। किम के अनुसार, भारत में गरीबी दर 2004 के 73 प्रतिशत से घटकर 2023 में 14 प्रतिशत रह गई। उनके आंकड़ों के मुताबिक, इस अवधि में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की संख्या में लगभग 62.7 करोड़ की कमी आई।
लगभग 140 करोड़ की आबादी वाले देश के लिए यह बदलाव बेहद महत्वपूर्ण है। गरीबी में कमी का अर्थ केवल आय में बढ़ोतरी नहीं है। इसका संबंध शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, बिजली, परिवहन और दूसरी बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच से भी है। हालांकि, इन क्षेत्रों में सुधार की गति और उसका लाभ अलग-अलग राज्यों, ग्रामीण क्षेत्रों तथा शहरी आबादी के बीच अलग हो सकता है।
यह भी ध्यान रखना होगा कि गरीबी का आकलन इस्तेमाल की गई गरीबी रेखा और क्रय शक्ति की गणना पर निर्भर करता है। इसलिए गरीबी दर में गिरावट को आर्थिक सफलता का महत्वपूर्ण संकेतक मानने के साथ-साथ रोजगार की गुणवत्ता, वास्तविक मजदूरी और परिवारों के खर्च करने की क्षमता जैसे दूसरे पहलुओं को भी देखना जरूरी है।
किम का तर्क है कि भारत की प्रगति को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि उसकी प्रति व्यक्ति आय अभी अमीर देशों से काफी कम है। असली सवाल यह है कि क्या भारत लगातार अपनी आर्थिक स्थिति सुधार रहा है। उनके आंकड़े इस दिशा में सकारात्मक बदलाव की ओर इशारा करते हैं।
‘डॉ. डूम’ को भारत से क्यों हैं बड़ी उम्मीदें?
भारत की आर्थिक संभावनाओं पर सकारात्मक नजरिया रखने वाले दूसरे प्रमुख अर्थशास्त्री नौरिएल रूबिनी हैं। उन्हें दुनिया भर में ‘डॉ. डूम’ के नाम से जाना जाता है। यह उपनाम उन्हें इसलिए मिला क्योंकि उन्होंने 2006 में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संकट की आशंका जताई थी, जबकि उस समय बाजार में काफी आशावाद था।
रूबिनी ने अमेरिकी आवास बाजार में बढ़ते जोखिम, कमजोर कर्ज मानकों और परिवारों पर बढ़ते कर्ज की समस्या की ओर ध्यान दिलाया था। वर्ष 2008 में अमेरिकी वित्तीय संकट गहराया और उसका असर दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ा। इस संकट से पहले दी गई उनकी चेतावनी ने उन्हें वैश्विक अर्थशास्त्र की चर्चित हस्तियों में शामिल कर दिया।
अब रूबिनी भारत को एक बड़ी आर्थिक सफलता की कहानी के रूप में देखते हैं। उनका मानना है कि आने वाले कुछ दशक भारत के लिए वैसे ही महत्वपूर्ण हो सकते हैं, जैसे पिछले कुछ दशक चीन की आर्थिक उन्नति के लिए रहे हैं।
यह तुलना अपने आप में बड़ी है। चीन ने मैन्युफैक्चरिंग, निर्यात, बुनियादी ढांचे और ग्लोबल सप्लाई चेन में अपनी मजबूत स्थिति के दम पर आर्थिक विकास की लंबी छलांग लगाई। भारत के सामने भी ऐसा अवसर है।
भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों से खुल सकते हैं नए रास्ते
रूबिनी की भारत को लेकर उम्मीदों का एक बड़ा आधार अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंध हैं। उनके मुताबिक, अमेरिका को यह समझना होगा कि भारत के साथ मजबूत आर्थिक रिश्ते दोनों देशों के हित में हैं। उन्हें उम्मीद है कि महंगाई और आम अमेरिकी उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति से जुड़ी चिंताओं के कारण अमेरिकी नीति-निर्माता टैरिफ को लेकर अधिक व्यावहारिक रुख अपना सकते हैं।
अमेरिका के लिए भारत एक बड़ा उपभोक्ता बाजार है। दूसरी ओर, अमेरिकी कंपनियों के पास भारत के डिजिटल बुनियादी ढांचे, ऊर्जा, विनिर्माण और तेजी से विकसित हो रही उपभोक्ता अर्थव्यवस्था में निवेश के अवसर हैं। अप्रैल से अगस्त की अवधि में अमेरिका को भारत का निर्यात 42.79 अरब डॉलर रहा, जबकि पिछले वर्ष की समान अवधि में यह 40.39 अरब डॉलर था।
क्या भारत की विकास दर 8 प्रतिशत से ऊपर जा सकती है?
रूबिनी का मानना है कि भारत में विकास दर 8 प्रतिशत से भी ऊपर जाने की क्षमता है, बशर्ते देश जरूरी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाए। भारत के पास इस लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने के लिए कई महत्वपूर्ण आधार हैं। इनमें बड़ा घरेलू बाजार, युवा शक्ति, तकनीकी प्रतिभा, डिजिटल भुगतान का विस्तार, बुनियादी ढांचे में निवेश और सेवाओं के क्षेत्र में मजबूत उपस्थिति शामिल हैं। इन क्षमताओं का बेहतर उपयोग किया जाए तो निवेश, प्रोडक्शन और रोजगार में वृद्धि हो सकती है।
आर्थिक सफलता का असली पैमाना क्या होगा?
क्युंगहून किम और नौरिएल रूबिनी के विचारों को साथ रखकर देखें तो दोनों एक महत्वपूर्ण बिंदु पर मिलते हैं। भारत की आर्थिक संभावनाओं को केवल उसकी मौजूदा आय या आज की चुनौतियों के आधार पर नहीं आंकना चाहिए। यह भी देखना चाहिए कि देश किस दिशा में बढ़ रहा है और अपनी क्षमता का इस्तेमाल कितनी प्रभावी तरीके से कर रहा है।
किम के आंकड़े पिछले दशकों में प्रति व्यक्ति GDP में सुधार और गरीबी में कमी की ओर संकेत करते हैं। वहीं, रूबिनी का आकलन भारत की भविष्य की संभावनाओं, व्यापारिक अवसरों और सुधारों के महत्व पर जोर देता है। एक आर्थिक बदलाव को समझाता है, जबकि दूसरा भविष्य में उपलब्ध अवसरों की ओर ध्यान खींचता है।










