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दुनिया के अर्थशास्त्रियों की राय: इकोनॉमी के क्षेत्र में भारत सही दिशा में आगे बढ़ रहा है!

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भारत की आर्थिक तरक्की को लेकर अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्रियों के आकलन देश की बदलती आर्थिक तस्वीर को सामने लाने वाले हैें। दक्षिण कोरियाई अर्थशास्त्री क्युंगहून किम के आंकड़े भारत की प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि और गरीबी में आई गिरावट की ओर संकेत करते हैं। वहीं, वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट की भविष्यवाणी के लिए चर्चित अर्थशास्त्री नौरिएल रूबिनी का मानना है कि आने वाले दशकों में भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था की अगली बड़ी सफलता बन सकता है। इन दोनों विचारों को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में लागू की गई आर्थिक नीतियों के संदर्भ में देखें, तो भारत की विकास यात्रा के पीछे आर्थिक सुधारों, बुनियादी ढांचे के विस्तार, डिजिटल क्रांति और कल्याणकारी योजनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई देती है।वर्ष 2014 में सत्ता संभालने के बाद मोदी सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था को अधिक पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाने पर जोर दिया। जनधन-आधार-मोबाइल की त्रिशक्ति ने सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे नागरिकों तक पहुंचाने का आधार तैयार किया। डीबीटी के जरिए सब्सिडी और सहायता राशि सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में पहुंचने लगी। इससे बिचौलियों की भूमिका कम करने, वित्तीय समावेशन बढ़ाने और सरकारी खर्च की प्रभावशीलता सुधारने में मदद मिली।इसी तरह जीएसटी के जरिए देश के अप्रत्यक्ष कर ढांचे को एकीकृत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया। कर्ज वसूली और कारोबारी विफलताओं के समाधान के लिए व्यवस्था मजबूत करने का प्रयास किया गया। मेक इन इंडिया, पीएलआई योजनाओं और कारोबारी प्रक्रियाओं को सरल बनाने जैसे कदमों का उद्देश्य घरेलू विनिर्माण, निवेश और रोजगार सृजन को बढ़ावा देना रहा है।भारत की आर्थिक क्षमता को मजबूत करने में बुनियादी ढांचे पर बढ़ता सरकारी निवेश भी अहम है। राजमार्गों, रेलवे, हवाई अड्डों, बंदरगाहों और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क के विस्तार से आर्थिक गतिविधियों को गति देने का प्रयास हुआ है। डिजिटल इंडिया और यूपीआई ने भुगतान व्यवस्था में व्यापक बदलाव किया है। आज डिजिटल लेनदेन ने छोटे कारोबारियों, दुकानदारों और आम नागरिकों के लिए आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी के नए अवसर खोले हैं।गरीबी में कमी के संदर्भ में प्रधानमंत्री आवास योजना, आयुष्मान भारत, उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत मिशन और मुफ्त खाद्यान्न जैसी पहलों का भी उल्लेख आवश्यक है। इन योजनाओं के जरिए आवास, स्वास्थ्य, स्वच्छता, रसोई ईंधन और खाद्य सुरक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। दुनियाभर के अर्थशास्त्री भारत की भविष्य की संभावनाओं को लेकर बहुत  आशावादी हैं। भारत के पास विशाल घरेलू बाजार, युवा आबादी, तकनीकी प्रतिभा और बढ़ती उद्यमशीलता जैसे मजबूत स्तंभ हैं। अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्रियों के आकलन और आर्थिक सुधारों की दिशा मिलकर यही संकेत देते हैं कि सही नीतियों, प्रभावी क्रियान्वयन और समावेशी विकास के साथ भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका और मजबूत कर रहा है।

दुनिया की नजर में बदलती भारत की आर्थिक तस्वीर

भारत को लंबे समय तक एक ऐसे विकासशील देश के रूप में देखा जाता रहा है, जहां विशाल आबादी, कम प्रति व्यक्ति आय और व्यापक गरीबी आर्थिक प्रगति के रास्ते में बड़ी बाधाएं हैं। लेकिन पिछले कुछ दशकों में देश की अर्थव्यवस्था में आए बदलाव ने इस तस्वीर को काफी हद तक बदल दिया है।

दक्षिण कोरियाई अर्थशास्त्री क्युंगहून किम: लोगों के जीवन स्तर में बड़ा सुधार

दक्षिण कोरियाई अर्थशास्त्री क्युंगहून किम ने भारत की प्रगति का आकलन करते हुए इस बात पर जोर दिया है कि किसी देश की आर्थिक स्थिति को केवल उसकी मौजूदा प्रति व्यक्ति आय से नहीं मापना चाहिए। यह देखना भी जरूरी है कि वहां लोगों के जीवन स्तर में कितनी तेजी से सुधार हो रहा है और देश विकसित अर्थव्यवस्थाओं के करीब पहुंचने में कितना सफल हो रहा है।

कोरिया इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक पॉलिसी में भारत और दक्षिण एशिया टीम का नेतृत्व करने वाले किम के अनुसार, भारत की आर्थिक प्रगति को समझने के लिए पिछले दस वर्षों के बदलाव पर विशेष ध्यान देना होगा।  उनका आकलन ऐसे समय में आया है, जब भारत की विकास दर, बढ़ते घरेलू बाजार और वैश्विक विनिर्माण में संभावित भूमिका को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज है।

आर्थिक स्तर पर और सशक्त बन रहा भारत 

किम ने जो आंकड़े सामने रखे हैं, उनके मुताबिक वर्ष 2025 में भारत की प्रति व्यक्ति GDP 2,702 डॉलर थी। परचेजिंग पावर पैरिटी यानि PPP के आधार पर यह आंकड़ा 11,784 डॉलर था। PPP के जरिए अलग-अलग देशों में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में अंतर को ध्यान में रखकर लोगों की वास्तविक क्रय शक्ति की तुलना की जाती है।

इन आंकड़ों का महत्व इसलिए है, क्योंकि भारत की विशाल आबादी के कारण कुल GDP का आकार और आम नागरिक की औसत आर्थिक स्थिति दो अलग-अलग तस्वीरें प्रस्तुत करते हैं। देश की कुल अर्थव्यवस्था बड़ी हो सकती है, लेकिन उसका लाभ लोगों तक किस हद तक पहुंच रहा है, इसे समझने के लिए प्रति व्यक्ति आय और जीवन स्तर जैसे इंडीकेटर्स को देखना आवश्यक है।

किम के अनुसार, 1990 में भारत की प्रति व्यक्ति GDP कम आय वाले देशों के औसत से केवल 15 प्रतिशत अधिक थी। वर्ष 2025 तक यह अनुपात उस औसत के चार गुने से भी अधिक हो गया। इसी तरह, मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं के औसत के मुकाबले भारत की प्रति व्यक्ति GDP 2025 में लगभग 64 प्रतिशत तक पहुंच गई। यहां एक अहम बात समझने की है। भारत ने निम्न आय वाले देशों के मुकाबले उल्लेखनीय प्रगति की है। 

गरीबी में गिरावट, आर्थिक बदलाव का सबसे बड़ा संकेत

भारत की आर्थिक प्रगति का एक महत्वपूर्ण पहलू गरीबी में आई कमी है। किम के अनुसार, भारत में गरीबी दर 2004 के 73 प्रतिशत से घटकर 2023 में 14 प्रतिशत रह गई। उनके आंकड़ों के मुताबिक, इस अवधि में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की संख्या में लगभग 62.7 करोड़ की कमी आई।

लगभग 140 करोड़ की आबादी वाले देश के लिए यह बदलाव बेहद महत्वपूर्ण है। गरीबी में कमी का अर्थ केवल आय में बढ़ोतरी नहीं है। इसका संबंध शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, बिजली, परिवहन और दूसरी बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच से भी है। हालांकि, इन क्षेत्रों में सुधार की गति और उसका लाभ अलग-अलग राज्यों, ग्रामीण क्षेत्रों तथा शहरी आबादी के बीच अलग हो सकता है।

यह भी ध्यान रखना होगा कि गरीबी का आकलन इस्तेमाल की गई गरीबी रेखा और क्रय शक्ति की गणना पर निर्भर करता है। इसलिए गरीबी दर में गिरावट को आर्थिक सफलता का महत्वपूर्ण संकेतक मानने के साथ-साथ रोजगार की गुणवत्ता, वास्तविक मजदूरी और परिवारों के खर्च करने की क्षमता जैसे दूसरे पहलुओं को भी देखना जरूरी है।

किम का तर्क है कि भारत की प्रगति को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि उसकी प्रति व्यक्ति आय अभी अमीर देशों से काफी कम है। असली सवाल यह है कि क्या भारत लगातार अपनी आर्थिक स्थिति सुधार रहा है। उनके आंकड़े इस दिशा में सकारात्मक बदलाव की ओर इशारा करते हैं।

‘डॉ. डूम’ को भारत से क्यों हैं बड़ी उम्मीदें?

भारत की आर्थिक संभावनाओं पर सकारात्मक नजरिया रखने वाले दूसरे प्रमुख अर्थशास्त्री नौरिएल रूबिनी हैं। उन्हें दुनिया भर में ‘डॉ. डूम’ के नाम से जाना जाता है। यह उपनाम उन्हें इसलिए मिला क्योंकि उन्होंने 2006 में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संकट की आशंका जताई थी, जबकि उस समय बाजार में काफी आशावाद था।

रूबिनी ने अमेरिकी आवास बाजार में बढ़ते जोखिम, कमजोर कर्ज मानकों और परिवारों पर बढ़ते कर्ज की समस्या की ओर ध्यान दिलाया था। वर्ष 2008 में अमेरिकी वित्तीय संकट गहराया और उसका असर दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ा। इस संकट से पहले दी गई उनकी चेतावनी ने उन्हें वैश्विक अर्थशास्त्र की चर्चित हस्तियों में शामिल कर दिया।

अब रूबिनी भारत को एक बड़ी आर्थिक सफलता की कहानी के रूप में देखते हैं। उनका मानना है कि आने वाले कुछ दशक भारत के लिए वैसे ही महत्वपूर्ण हो सकते हैं, जैसे पिछले कुछ दशक चीन की आर्थिक उन्नति के लिए रहे हैं।

यह तुलना अपने आप में बड़ी है। चीन ने मैन्युफैक्चरिंग, निर्यात, बुनियादी ढांचे और  ग्लोबल सप्लाई चेन में अपनी मजबूत स्थिति के दम पर आर्थिक विकास की लंबी छलांग लगाई। भारत के सामने भी ऐसा अवसर है। 

भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों से खुल सकते हैं नए रास्ते

रूबिनी की भारत को लेकर उम्मीदों का एक बड़ा आधार अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंध हैं। उनके मुताबिक, अमेरिका को यह समझना होगा कि भारत के साथ मजबूत आर्थिक रिश्ते दोनों देशों के हित में हैं। उन्हें उम्मीद है कि महंगाई और आम अमेरिकी उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति से जुड़ी चिंताओं के कारण अमेरिकी नीति-निर्माता टैरिफ को लेकर अधिक व्यावहारिक रुख अपना सकते हैं।

अमेरिका के लिए भारत एक बड़ा उपभोक्ता बाजार है। दूसरी ओर, अमेरिकी कंपनियों के पास भारत के डिजिटल बुनियादी ढांचे, ऊर्जा, विनिर्माण और तेजी से विकसित हो रही उपभोक्ता अर्थव्यवस्था में निवेश के अवसर हैं। अप्रैल से अगस्त की अवधि में अमेरिका को भारत का निर्यात 42.79 अरब डॉलर रहा, जबकि पिछले वर्ष की समान अवधि में यह 40.39 अरब डॉलर था।

क्या भारत की विकास दर 8 प्रतिशत से ऊपर जा सकती है?

रूबिनी का मानना है कि भारत में विकास दर 8 प्रतिशत से भी ऊपर जाने की क्षमता है, बशर्ते देश जरूरी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाए। भारत के पास इस लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने के लिए कई महत्वपूर्ण आधार हैं। इनमें बड़ा घरेलू बाजार, युवा शक्ति, तकनीकी प्रतिभा, डिजिटल भुगतान का विस्तार, बुनियादी ढांचे में निवेश और सेवाओं के क्षेत्र में मजबूत उपस्थिति शामिल हैं। इन क्षमताओं का बेहतर उपयोग किया जाए तो निवेश, प्रोडक्शन  और रोजगार में वृद्धि हो सकती है।

आर्थिक सफलता का असली पैमाना क्या होगा?

क्युंगहून किम और नौरिएल रूबिनी के विचारों को साथ रखकर देखें तो दोनों एक महत्वपूर्ण बिंदु पर मिलते हैं। भारत की आर्थिक संभावनाओं को केवल उसकी मौजूदा आय या आज की चुनौतियों के आधार पर नहीं आंकना चाहिए। यह भी देखना चाहिए कि देश किस दिशा में बढ़ रहा है और अपनी क्षमता का इस्तेमाल कितनी प्रभावी तरीके से कर रहा है।

किम के आंकड़े पिछले दशकों में प्रति व्यक्ति GDP में सुधार और गरीबी में कमी की ओर संकेत करते हैं। वहीं, रूबिनी का आकलन भारत की भविष्य की संभावनाओं, व्यापारिक अवसरों और सुधारों के महत्व पर जोर देता है। एक आर्थिक बदलाव को समझाता है, जबकि दूसरा भविष्य में उपलब्ध अवसरों की ओर ध्यान खींचता है।

स्वीडिश अर्थशास्त्री डेनियल वाल्डेनस्ट्रॉम: सही दिशा में भारत  
भारत की आर्थिक संभावनाओं पर अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्रियों की सकारात्मक राय केवल किम और रूबिनी तक सीमित नहीं है। विभिन्न देशों के अर्थशास्त्रियों ने भी भारत की प्रगति की सराहना की है। स्वीडिश अर्थशास्त्री डेनियल वाल्डेनस्ट्रॉम ने कहा कि भारत विकासोन्मुख नीतियों के जरिए प्रभावशाली प्रगति कर रहा है। उनके अनुसार, आर्थिक विस्तार को व्यापक सामाजिक लाभ में बदलने की भारत के पास अच्छी संभावनाएं हैं। विकास पर लगातार ध्यान देने से शिक्षा, बुनियादी ढांचे और जीवन स्तर में सुधार हो सकता है।
ज्यां-क्लोद त्रिशे: बैंक ऑफ फ्रांस के पूर्व गवर्नर
यूरोपीय केंद्रीय बैंक के पूर्व अध्यक्ष और बैंक ऑफ फ्रांस के पूर्व गवर्नर ज्यां-क्लोद त्रिशे ने भी भारत की प्रगति की सराहना की। उन्होंने भारत को उभरती दुनिया के प्रमुख देशों में शामिल बताते हुए कहा कि उसे इसी दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। वहीं, फ्रांसीसी अर्थशास्त्री ज्यां-पियरे लांदू ने भारत-फ्रांस साझेदारी और वैश्विक चुनौतियों से निपटने में भारत की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।
चीनी अर्थशास्त्री झांग लीकिंग: भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत
चीन के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर झांग लीकिंग ने भारतीय अर्थव्यवस्था को गतिशील और मजबूत बताया। उनके अनुसार, भारत वैश्विक आर्थिक विकास के प्रमुख आकर्षणों में शामिल हो चुका है। इन विचारों से साफ होता है कि भारत को लेकर अंतरराष्ट्रीय चर्चा अब केवल उसकी विकास दर तक सीमित नहीं है। निवेश, वैश्विक व्यापार, सामाजिक विकास और अंतरराष्ट्रीय नेतृत्व में उसकी भूमिका भी इस चर्चा का हिस्सा बन रही है।

मोदी सरकार की आर्थिक नीतियां और विकास यात्रा
अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्रियों की सकारात्मक राय भारत की आर्थिक प्रगति को वैश्विक स्तर पर मिल रही मान्यता का संकेत है। पिछले वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था में हुए बदलावों, बुनियादी ढांचे के विस्तार, डिजिटल अर्थव्यवस्था के विकास और कारोबारी माहौल को बेहतर बनाने के प्रयासों ने देश की विकास यात्रा को नई दिशा दी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने आर्थिक सुधारों, वित्तीय समावेशन, विनिर्माण को प्रोत्साहन और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार को अपनी नीतियों का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है।
रोजगार और युवाओं के लिए अवसर बढ़ाना प्राथमिकता
भारत की आर्थिक प्रगति को स्थायी बनाने के लिए रोजगार सृजन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। मेक इन इंडिया, पीएलआई योजनाओं, स्टार्टअप इंडिया और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का उद्देश्य निवेश और उत्पादन को प्रोत्साहित करना है। मोदी सरकार की डिजिटल इंडिया और कौशल विकास से जुड़ी पहलों से तकनीकी पहुंच और प्रशिक्षण के अवसर बढ़ाने में मदद मिल रही है। इसी प्रकार, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच, सरकारी स्कूलों में अच्छी पढ़ाई, निर्बाध बिजली और आधुनिक परिवहन उत्पादकता बढ़ाने में मददगार बन रहे हैं। आयुष्मान भारत जैसी स्वास्थ्य योजनाएं भी लोगों के जीवन को आसान बना रही हैं। भारत की इकोनॉमी को लेकर अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्रियों की सकारात्मक टिप्पणियों को मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों के संदर्भ में देखा जा सकता है। आज मोदी सरकार की आर्थिक नीतियां भारत को समृद्धि की दिशा में तेजी से आगे ले जा रही हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की बढ़ती भूमिका एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जिससे विकसित भारत के संकल्प को भी एक नई ऊर्जा मिल रही है। 

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