कभी ‘100 फीसदी सनातनी’, कभी ‘राम बुलाएंगे तो अयोध्या जाऊंगा’, फिर निमंत्रण मिलने के बाद भी प्राण प्रतिष्ठा से दूरी और ‘सियाराम धाम’ बनाने का वादा। अखिलेश यादव की राम और अयोध्या को लेकर राजनीति में बयान और व्यवहार के बीच का अंतर लगातार दिखाई देता रहा है। 2019 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से लेकर 2024 की प्राण प्रतिष्ठा और 2026 के ‘रामधन’ वाले आरोपों तक, अखिलेश की राजनीति में राम का संदर्भ लगातार मौजूद रहा है, लेकिन उसका स्वर और सियासी इस्तेमाल समय के साथ बदलता रहा। सवाल इसलिए सिर्फ उनकी आस्था का नहीं, बल्कि उनके बदलते राजनीतिक रुख का है। जब राम सबके हैं और अखिलेश खुद को 100 फीसदी सनातनी बताते हैं, तो फिर रामलला के दर्शन और अयोध्या जाने के सवाल पर दो कदम पीछे क्यों हट जाते हैं।
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राम मंदिर के चंदे पर अखिलेश की नौटंकी
राम मंदिर को लेकर अखिलेश यादव के हालिया बयानों में सबसे अहम मुद्दा मंदिर के चढ़ावे और चंदे में कथित गड़बड़ी का रहा है। जून 2026 में उन्होंने आरोपों को लेकर न्यायिक जांच की मांग करते हुए इसे बहुत गंभीर मामला बताया था। राम मंदिर के चढ़ावे में गड़बड़ी का मुद्दा उठाने के बाद अखिलेश यादव लगातार इसे सरकार और मंदिर व्यवस्था की जवाबदेही से जोड़ते रहे। यहीं से सपा की राम मंदिर राजनीति पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। क्या राम मंदिर उसके लिए आस्था का विषय है या राजनीतिक मुद्दा। क्योंकि अयोध्या और राम अब अखिलेश की पार्टी की राजनीतिक भाषा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं।
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राजनीति के लिए रामभक्त का चोला ओढ़ लेते हैं अखिलेश
चढ़ावे में गड़बड़ी को लेकर SIT की अंतिम रिपोर्ट से यह भी सामने आया कि धन की हेराफेरी के ठोस साक्ष्य मुख्य रूप से निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित पाए गए। यह रिपोर्ट किसी व्यापक राजनीतिक साजिश या पूरे मंदिर ट्रस्ट द्वारा चंदे की चोरी के आरोपों के बिल्कुल उलट थी। लेकिन अखिलेश यादव ने अपने आरोपों से पीछे हटने के बजाय राजनीति के लिए जांच की निष्पक्षता पर ही सवाल उठाए। उन्होंने SIT को लेकर ‘Share in Theft’ और ‘सेंध इन ट्रस्ट’ जैसे तीखे तंज भी किए थे।
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चुनावी रामभक्त अखिलेश यादव!

अखिलेश यादव को यह बात अच्छे से पता है कि उत्तर प्रदेश की सत्ता का रास्ता अयोध्या से होकर जाता है। इसलिए जैसे-जैसे 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे अखिलेश की जुबान पर भी भगवान राम का नाम आने लगा है। उन्हें भगवान राम याद आने लगे हैं और वे रामभक्त का चोला ओढ़ कर जमकर राजनीति कर रहे हैं।
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यूपी चुनाव के लिए कथित चंदा चोरी पर राजनीति

मानसून सत्र के पूरे 19-20 दिनों में सपा की सियासत राम मंदिर के चढ़ावे में कथित आरोपों को इर्द-गिर्द घूमती रही। संसद में हंगामा, बाहर प्रदर्शन और सरकार पर हमले, अखिलेश की पार्टी ने लगातार इस मुद्दे को हवा दी।
और फिर सत्र खत्म होते ही प्रदर्शन से जुटाई गई रकम को कनॉट प्लेस के हनुमान मंदिर में चढ़ाना बताता है कि मामला सिर्फ संसद में विरोध तक सीमित नहीं था। यह 2027 की चुनावी राजनीति में अयोध्या और राम के मुद्दे से जुड़ने की सपा की कोशिश भी है। यानि जिस राम मंदिर से दूरी दिखाने वाली राजनीति की सपा की छवि रही, उसी राम मंदिर को पार्टी अब चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश में जुटी है।
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राम-हनुमान के नाम पर अखिलेश की राजनीति
अखिलेश यादव ने सपा कार्यालय में भगवान राम और हनुमान का किरदार निभाने वाले कलाकारों को ₹51-51 हजार देकर सम्मानित किया। इसे उन्होंने कलाकारों के सम्मान के साथ-साथ भाजपा पर निशाना साधने से जोड़ा।

लेकिन सवाल यह है कि जिस राम और हनुमान के नाम पर अखिलेश आज सम्मान और संवेदना की राजनीति कर रहे हैं, क्या उनकी यह आस्था सिर्फ राजनीतिक मंच तक सीमित है? सपा कार्यालय में राम-हनुमान के कलाकारों का सम्मान करना आसान है, लेकिन अयोध्या जाकर रामलला के दर्शन करना उन्हें मुश्किल लगता है। साफ है कि अखिलेश की पार्टी भगवान राम और हनुमान के नाम पर राजनीति की रोटियां सेंकने में जुटी है।
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‘चंदा चोरी’ से ‘रामधन की चोरी’ तक
अगस्त 2026 में विधानसभा सत्र से पहले अखिलेश ने ‘चंदा चोरी’ को ‘रामधन में चोरी’ कहना शुरू कर दिया और कहा कि ‘रामधन की चोरी’ को न भगवान माफ करेंगे, न जनता।

साफ है कि अखिलेश इस मामले का राजनीतिक निष्कर्ष निकालने की जल्दबाजी में है, ताकि उन्हें चुनाव में इसका फायदा मिल सके। यह अखिलेश की राजनीतिक रामभक्ति का सीधा सबूत है।
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एक तरफ राजनीति दूसरी ओर ‘सियाराम धाम’ का वादा

दिलचस्प यह है कि राम मंदिर के चंदे को लेकर विवाद के बीच ही जून 2026 में अखिलेश यादव ने सत्ता में आने पर अयोध्या को ‘सियाराम धाम’ के रूप में विकसित करने का वादा किया। उन्होंने इसे श्रद्धा और ईमानदारी से जुड़ा संकल्प बताया। यानि एक तरफ मंदिर व्यवस्था पर चंदे को लेकर तीखे आरोप और दूसरी तरफ अयोध्या को धार्मिक नगरी के रूप में विकसित करने का राजनीतिक वादा। इन दोनों बयानों को साथ रखकर अखिलेश की बदली हुई राम राजनीति को समझा जा सकता है।
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100% हिन्दू और सनातनी होने का झूठा दावा
जनवरी 2024 में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा से ठीक पहले अखिलेश यादव से अयोध्या जाने को लेकर सवाल किया गया था। तब उन्होंने कहा था कि ‘हम लोग 100% हिन्दू और सनातन परंपरा को मानते हैं।’

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि भगवान का निमंत्रण कोई नहीं देता और ‘जब राम बुलाएंगे तो मैं अयोध्या चला जाऊंगा।’ सवाल है कि अगर अखिलेश खुद को 100 फीसदी सनातनी बताते हैं, तो क्या राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा में शामिल नहीं होने का फैसला धार्मिक आस्था थी या फिर इसके पीछे कोई राजनीतिक रणनीति थी?
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पहले कहा राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का नहीं मिला निमंत्रण
राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह को लेकर अखिलेश यादव ने निमंत्रण को लेकर विवाद शुरू किया। जनवरी 2024 में उन्होंने दावा किया था कि उन्हें राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह का निमंत्रण नहीं मिला है।

उन्होंने कहा था कि उन्हें न तो व्यक्तिगत रूप से और न ही कूरियर के जरिए निमंत्रण मिला। उन्होंने यहां तक कहा था कि अगर निमंत्रण भेजे जाने का दावा है तो कूरियर की रसीद दिखाई जानी चाहिए। लेकिन अगले दिन ही पूरा मामला पलट गया।
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अगले दिन कहा, समारोह का निमंत्रण मिल गया
13 जनवरी 2024 को ही अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर बताया कि उन्हें राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह का निमंत्रण मिल गया है।

उन्होंने राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को पत्र लिखकर निमंत्रण के लिए धन्यवाद दिया और कहा कि वह प्राण प्रतिष्ठा समारोह के बाद परिवार के साथ राम मंदिर आएंगे।
यानि पूरा मामला इस प्रकार रहा-
पहला बयान: प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम का निमंत्रण नहीं मिला।
बाद में क्या हुआ: निमंत्रण मिलने की पुष्टि।
वादा-प्राण प्रतिष्ठा के बाद परिवार के साथ जाएंगे।
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प्राण प्रतिष्ठा में नहीं गए, बाद में जाने का वादा किया

निमंत्रण मिलने के बाद भी अखिलेश यादव 22 जनवरी 2024 के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल नहीं हुए। उनका कहना था कि वह प्राण प्रतिष्ठा के बाद परिवार के साथ राम मंदिर जाएंगे। उन्होंने कार्यक्रम से दूरी बनाए रखी।लेकिन एक सवाल बार बार सामने आता है- तमाम दावों और वादों के बाद भी वे रामलला के दर्शन कब करेंगे?
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2024 में राम के नाम पर अखिलेश की अलग राजनीति
राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के समय अखिलेश यादव ने बीजेपी पर राम के नाम का राजनीतिक इस्तेमाल करने का आरोप लगाया था। उनका तर्क था कि भगवान राम किसी एक पार्टी के नहीं हैं, राम सबके हैं। राम के नाम पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।

लेकिन यहीं एक विरोधाभास भी सामने आया। एक तरफ अखिलेश बीजेपी पर राम मंदिर को राजनीतिक कार्यक्रम बनाने का आरोप लगा रहे थे। दूसरी तरफ वह खुद राम, सनातन और अयोध्या का उल्लेख अपने राजनीतिक भाषणों में लगातार करते रहे।
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उत्तर प्रदेश के बाकी विधायक अयोध्या पहुंचे, SP ने दूरी बनाई
फरवरी 2024 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के विधायक और विधान परिषद सदस्य अयोध्या गए। लेकिन समाजवादी पार्टी के विधायक इस यात्रा में शामिल नहीं हुए।

अखिलेश यादव ने भी निमंत्रण स्वीकार नहीं किया। साफ है कि अयोध्या जाने का अवसर सामने आया तो अखिलेश की पार्टी ने दूरी बना ली। सवाल है कि अखिलेश रामलला के दर्शन करने वाले थे तो विधानसभा की अयोध्या यात्रा में शामिल क्यों नहीं हुए?
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अब ‘राम बुलाएंगे’ से ‘केदारेश्वर धाम पूरा होगा’ तक
आज भी ये सवाल बना हुआ है कि अखिलेश यादव खुद राम मंदिर कब जाएंगे? जुलाई 2026 में जब उनसे राम मंदिर जाने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वह केदारेश्वर धाम का निर्माण पूरा होने के बाद राम मंदिर जाएंगे। भगवान राम के मंदिर को लेकर उनकी आस्था पर सवाल राजनीतिक हित साधने के लिए दिए गए उनके बयानों से भी खड़ा होता है।
2024 में उनका बयान था—
‘जब राम बुलाएंगे तो मैं अयोध्या चला जाऊंगा।’
फिर निमंत्रण मिलने के बाद उन्होंने कहा-
प्राण प्रतिष्ठा के बाद परिवार के साथ मंदिर जाएंगे।
लेकिन 2026 में उनका बयान आया-
केदारेश्वर धाम का निर्माण पूरा होने के बाद राम मंदिर जाएंगे।
दोनों बयानों के बीच करीब ढाई साल का अंतर है।
लेकिन सवाल है कि 2024 का वादा अब तक पूरा क्यों नहीं हुआ?
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अखिलेश की रामभक्ति पर क्या हैं सवाल ?
पहला सवाल: अगर वह खुद को 100 फीसदी सनातनी बताते हैं तो राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा से दूरी क्यों?
दूसरा सवाल: निमंत्रण नहीं मिलने की बात कहने के बाद निमंत्रण मिलने की पुष्टि क्यों करनी पड़ी?
तीसरा सवाल: प्राण प्रतिष्ठा के बाद परिवार के साथ राम मंदिर जाने का वादा अब तक पूरा क्यों नहीं हुआ?
चौथा सवाल: पार्टी के वरिष्ठ नेता राम मंदिर पर विवादित टिप्पणी करते हैं तो पार्टी नेतृत्व का रुख क्या है?
पांचवां सवाल: 2024 में राम मंदिर के राजनीतिक इस्तेमाल का विरोध करने वाले अखिलेश 2026 में अयोध्या को ‘सियाराम धाम’ बनाने का राजनीतिक वादा क्यों कर रहे हैं?
छठा सवाल: अगर राम सबके हैं तो क्या समाजवादी पार्टी की राजनीति में राम और अयोध्या को अब पहले से ज्यादा जगह मिल रही है?
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राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी राजनीति

राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी उन्होंने दिल खोल कर स्वागत नहीं किया। ‘राम मंदिर’ पर फैसले का स्वागत करने के बजाय संयमित भाषा में उन्होंने लिखा: ‘जो फैसले फासलों को घटाते हैं, वो इंसा को बेहतर इंसान बनाते हैं।”

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सु्प्रीम कोर्ट के फैसले से बदली अखिलेश की राजनीति
सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले तक अखिलेश यादव ने कभी सार्वजनिक रूप से नहीं माना कि प्रभु श्री राम लला का जन्म उसी अयोध्या में उसी स्थान पर हुआ था। लेकिन सु्प्रीम कोर्ट के फैसला का उन्होंने विरोध नहीं किया, बल्कि सामाजिक सद्भाव पर बल दिया। इससे यह संकेत मिला कि पार्टी अब न्यायालय के निर्णय के बाद नए धार्मिक और राजनीतिक यथार्थ को स्वीकारने के लिए मजबूर हो रही है।

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प्रभु श्रीराम को लेकर अखिलेश की बात पर भरोसा नहीं
पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की प्रभु श्रीराम की पूजा को लेकर आस्था पर उनके अपने बयान ही सवाल खड़े करते हैं। इस मुद्दे पर उनके इतने यू-टर्न हैं कि खुद उनके बयानों में ही विरोधाभास नजर आता है। एक इंटरव्यू में कहा- ‘हम पूजा करते हैं, दिखावा नहीं करते।’ अब इस खबर को देखिए-

अब सवाल यही है- अखिलेश यादव के किस बयान पर भरोसा किया जाए? और किस पर नहीं।
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भगवान राम समाजवादियों के हैं-अखिलेश यादव
एक ओर तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलवाई, मुलायम सिंह यादव ने बाद में भी इस कार्रवाई को सही ठहराया था। दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या फैसले के बाद दिसंबर 2020 में अखिलेश यादव का बयान चर्चा में आया- ‘भगवान राम समाजवादियों के भी हैं।’

यहीं से सवाल उठा कि जिस राम मंदिर आंदोलन और अयोध्या की राजनीति से समाजवादी पार्टी का अतीत इतने गहरे टकराव से जुड़ा रहा, उसी दौर में अखिलेश यादव को यह स्पष्ट करने की जरूरत क्यों पड़ी कि भगवान राम समाजवादियों के भी हैं?
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भगवान कृष्ण के सपने और सरकार बनने का दावा
2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने दावा किया था कि भगवान श्रीकृष्ण उन्हें हर रात सपने में दिखाई देते हैं और कहते हैं कि प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने जा रही है।

इसी बयान में अखिलेश यादव ने यह भी कहा था कि समाजवाद का रास्ता ही रामराज्य का रास्ता है। यानि चुनावी राजनीति के बीच उन्होंने अपने राजनीतिक विचारों को भगवान कृष्ण और रामराज्य के संदर्भ से जोड़ने का प्रयास किया।
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पत्थऱ की मूर्ति में आज के बाद प्राण आ जाएंगे

2 जनवरी 2024 को अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर भी अखिलेश यादव तंज करने में पीछे नहीं रहे। उन्होंने कहा कि प्राण प्रतिष्ठा के बाद पत्थर की मूर्ति भगवान का रूप ले लेगी। उन्होंने कहा कि अब लोग उस प्रतिमा को भगवान के भाव से देखेंगे और उनकी साधना करेंगे।
अखिलेश ने भगवान राम के दिखाए रास्ते पर चलने की बात भी कही।
उन्होंने राम को ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ बताते हुए उनके आदर्शों का उल्लेख किया। साथ ही उन्होंने रामराज्य की कल्पना का जिक्र किया, जिसमें गरीब और दुखी न रहें। हालांकि, अखिलेश यादव स्वयं प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल नहीं हुए थे।
रामभक्ति या राजनीति: 01
अयोध्या के विकास में भी रोड़े डालने की कोशिश

2023 में अयोध्या के चौदह कोसी परिक्रमा मार्ग के चौड़ीकरण को लेकर अखिलेश यादव ने योगी सरकार पर निशाना साधा था। उन्होंने आरोप लगाया कि दुकानों और मकानों के मालिकों को उचित मुआवजा दिए बिना उजाड़ा जा रहा है। अखिलेश ने कहा कि राम मंदिर निर्माण के लिए जिनकी जमीनें-मकान लिए जा रहे हैं, उन्हें पर्याप्त मुआवजा क्यों नहीं दिया जा रहा।

उन्होंने दावा किया कि सपा सरकार बनने पर अयोध्या में जमीनों की अवैध रजिस्ट्रियों की जांच कराई जाएगी।
अखिलेश यादव की पिछले वर्षों की राजनीति को देखें तो राम और अयोध्या उनसे कभी पूरी तरह दूर नहीं हुए। फर्क सिर्फ इतना रहा कि कभी खुद को सनातनी बताया गया, कभी ‘राम बुलाएंगे’ का इंतजार रहा, कभी मंदिर जाने का वादा हुआ और अब अयोध्या को ‘सियाराम धाम’ बनाने का दावा किया जा रहा है। यही बदलते बयान उनकी राम राजनीति पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करते हैं।
सवाल यह नहीं कि अखिलेश की भगवान राम में आस्था है या नहीं। सवाल यह है कि उनके दावे और सार्वजनिक आचरण में कितनी अंतर है। अगर राम सबके हैं, अगर खुद को 100 फीसदी सनातनी बताया जाता है और अगर अयोध्या को धार्मिक आस्था का केंद्र मानकर उसके विकास का वादा किया जाता है, तो फिर रामलला के दर्शन से बार-बार दूरी और बदलते हुए तर्कों को कैसे समझा जाए? अखिलेश यादव की राम राजनीति पर उठ रहे सवाल इसी विरोधाभास से निकलते हैं।











