Home समाचार UP में सपा-कांग्रेस गठबंधन पर संकट के बादल: इमरान मसूद की डेडलाइन...

UP में सपा-कांग्रेस गठबंधन पर संकट के बादल: इमरान मसूद की डेडलाइन से उठ रहे सवाल!

SHARE
Lucknow: Uttar Pradesh Chief Minister and Samajwadi Party President Akhilesh Yadav and Congress Vice President Rahul Gandhi during their road show in Lucknow on Sunday. PTI Photo by Nand Kumar(PTI1_29_2017_000257A)

यूपी चुनाव 2027में  राहुल की ‘हवा’, अखिलेश की जमीन और इमरान मसूद की चुनौती, कैसे फाइनल होगा सपा-कांग्रेस का सीट शेयरिंग फॉर्मूला?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की खींचतान अब सिर्फ सीटों की संख्या तक सीमित नहीं रह गई है। दोनों दलों के नेताओं की बयानबाजी से साफ है कि विवाद के केंद्र में राजनीतिक हिस्सेदारी, संगठनात्मक ताकत, नेतृत्व और मुस्लिम मतदाताओं के प्रतिनिधित्व जैसे कई सवाल हैं। कांग्रेस की ओर से 200 सीटों की मांग का मुद्दा उठने से लेकर सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद की सम्मानजनक हिस्सेदारी पर जोर देने तक, गठबंधन की बातचीत लगातार चर्चा में है।

कांग्रेस की उत्तर प्रदेश इकाई में इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी दिए जाने को भी इसी राजनीतिक संदर्भ में देखा जा रहा है। दूसरी तरफ, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव का जोर सीटों की संख्या के बजाय जीत की संभावना पर बताया जा रहा है। सपा के भीतर से यह तर्क सामने आता रहा है कि उत्तर प्रदेश में पार्टी का संगठन और चुनावी आधार कांग्रेस की तुलना में बड़ा है, इसलिए सीटों का बंटवारा भी इसी वास्तविकता के अनुरूप होना चाहिए।

ऐसे में सवाल है कि क्या राहुल गांधी की अगुवाई में कांग्रेस की ओर से बनाए जा रहे राजनीतिक माहौल और अखिलेश यादव के संगठनात्मक आधार को एक साथ लाकर गठबंधन का रास्ता निकाला जा सकता है? या फिर सीटों की खींचतान दोनों दलों को अलग-अलग चुनाव लड़ने की स्थिति में पहुंचा सकती है?

राहुल गांधी की ‘हवा’ और अखिलेश यादव की ‘जमीन’ का गणित

चुनाव में संगठन और राजनीतिक माहौल, दोनों की भूमिका होती है। मजबूत संगठन उम्मीदवारों को बूथ स्तर तक पहुंचने में मदद करता है, जबकि किसी मुद्दे के पक्ष में बना माहौल मतदाताओं की प्राथमिकताओं को प्रभावित कर सकता है। केवल संगठन या केवल लोकप्रियता के सहारे चुनावी सफलता सुनिश्चित नहीं होती।

2024 के लोकसभा चुनाव में संविधान और आरक्षण से जुड़े मुद्दे राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का अहम हिस्सा बने। कांग्रेस ने संविधान की रक्षा को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया, जबकि सपा ने पीडीए यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों के प्रतिनिधित्व पर जोर दिया। उत्तर प्रदेश में सपा ने 37 और कांग्रेस ने 6 लोकसभा सीटें जीतीं। दोनों दलों के गठबंधन को कुल 43 सीटें मिलीं। 

कांग्रेस इस प्रदर्शन को अपने राष्ट्रीय नेतृत्व, राहुल गांधी के अभियान और संविधान से जुड़े विमर्श की उपयोगिता के रूप में पेश कर सकती है। वहीं सपा के पास अपने संगठन, क्षेत्रीय नेतृत्व और राज्य में मिले चुनावी समर्थन का आधार है।

यही दोनों दलों के बीच सीट बंटवारे की बहस का मूल है। कांग्रेस अपनी भूमिका को केवल सीटों की संख्या से नहीं आंकना चाहती, जबकि सपा के लिए यह जरूरी है कि गठबंधन में उसे अपने बड़े संगठन और चुनावी आधार के अनुरूप हिस्सेदारी मिले।

कांग्रेस की 200 सीटों की मांग और सपा का सवाल

उत्तर प्रदेश विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं। ऐसे में कांग्रेस की ओर से 200 सीटों की मांग की चर्चा ने गठबंधन की बातचीत को और जटिल बनाया है। कांग्रेस की दलील है कि भाजपा के खिलाफ विपक्षी वोटों को एकजुट करने में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण है। पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व, चुनावी मुद्दे उठाने की क्षमता और कुछ क्षेत्रों में उसका सामाजिक आधार गठबंधन को व्यापक बनाने में मदद कर सकता है।

इसके उलट सपा की चिंता उम्मीदवारों की उपलब्धता, क्षेत्रीय संगठन और सीटों पर जीत की संभावना को लेकर है। सपा के नजरिये से कांग्रेस को उतनी ही सीटें मिलनी चाहिए, जहां वह प्रभावी मुकाबला कर सके।

हालांकि उम्मीदवारों को लेकर एक-दूसरे की शर्तें स्वीकार करना भी आसान नहीं होगा। कांग्रेस अपने नेताओं को चुनाव लड़ाने का अवसर चाह सकती है, जबकि सपा अपनी मौजूदा राजनीतिक ताकत और स्थानीय समीकरणों के आधार पर सीटों का आकलन करना चाहेगी।

इमरान मसूद की नियुक्ति और कांग्रेस की नई रणनीति

सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद को उत्तर प्रदेश कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने को पार्टी के संगठनात्मक प्रयासों के संदर्भ में देखा जा रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनकी राजनीतिक पहचान है और मुस्लिम मतदाताओं के बीच भी उनका प्रभाव माना जाता है।

उनकी नियुक्ति ऐसे समय हुई है, जब सपा और कांग्रेस के बीच सीटों को लेकर सार्वजनिक बयानबाजी तेज है। मसूद ने गठबंधन को समय रहते अंतिम रूप देने की जरूरत पर जोर दिया है। उन्होंने अखिलेश यादव से बड़ा दिल दिखाने की अपील करते हुए सम्मानजनक सीट हिस्सेदारी की मांग भी रखी है।

मसूद की दलील का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कांग्रेस को केवल छोटी सहयोगी पार्टी मानकर उसकी राजनीतिक भूमिका को सीमित नहीं किया जाना चाहिए। क्योंकि विपक्षी एकता में कांग्रेस की राष्ट्रीय उपस्थिति और उसके मुद्दों को उठाने की क्षमता भी मायने रखती है।

यह रुख गठबंधन बनाए रखने की इच्छा और सीटों पर स्वतंत्र दावेदारी, दोनों को दर्शाता है। कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि वह अपनी राजनीतिक भूमिका को सीटों में बदलने की कोशिश करते हुए संगठनात्मक कमजोरियों से जुड़े सवालों का जवाब भी दे।

सपा के लिए कांग्रेस क्यों महत्वपूर्ण है?

सपा की राजनीति लंबे समय से यादव और मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन से जुड़ी रही है। हाल के वर्षों में अखिलेश यादव ने पीडीए के माध्यम से पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों को व्यापक राजनीतिक मंच पर जोड़ने की कोशिश की है।

कांग्रेस के साथ गठबंधन का महत्व इस बात में भी है कि दोनों दलों के सामाजिक आधार और राजनीतिक संदेश कुछ क्षेत्रों में एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर संविधान, सामाजिक न्याय और आरक्षण जैसे मुद्दों को उठाती है, जबकि सपा का उत्तर प्रदेश में अपना क्षेत्रीय संगठन और नेतृत्व है।

मुस्लिम मतदाताओं के प्रतिनिधित्व का सवाल

सपा-कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग की बहस के पीछे मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल भी चर्चा में है। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा विपक्षी उम्मीदवारों का समर्थन करने की रणनीति अपनाता रहा है। कई चुनावों में सपा इस समर्थन की प्रमुख लाभार्थी रही है।

सपा के भीतर और उसके आसपास मुस्लिम प्रतिनिधित्व को लेकर समय-समय पर असंतोष भी सामने आया है। आजम खान प्रकरण, सपा के वरिष्ठ नेता सलीम इकबाल शेरवानी का फरवरी 2024 में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव पद से इस्तीफा और मुस्लिम नेतृत्व की भूमिका पर विभिन्न नेताओं की टिप्पणियों ने इस बहस को चर्चा में बनाए रखा।

इन घटनाओं को मुस्लिम मतदाताओं के व्यापक स्तर पर सपा से दूर जाने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। लेकिन इससे यह जरूर स्पष्ट होता है कि मुस्लिम प्रतिनिधित्व, राजनीतिक हिस्सेदारी और नेतृत्व को लेकर बहस मौजूद है।

कांग्रेस के लिए यही एक संभावित राजनीतिक अवसर है। इमरान मसूद जैसे नेता के माध्यम से पार्टी मुस्लिम समाज के कुछ वर्गों के बीच अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान को मजबूत करने की कोशिश कर सकती है। लेकिन यह अवसर कितना व्यापक है, इसका आकलन केवल नेताओं के बयानों से नहीं किया जा सकता।

सपा की मुस्लिम राजनीति पर उठते सवाल

अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा की मुस्लिम राजनीति पर सवाल कोई नई बात नहीं है। 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों ने तत्कालीन सपा सरकार की कानून-व्यवस्था और सांप्रदायिक हिंसा से निपटने की क्षमता को लेकर गंभीर बहस पैदा की थी। दंगों में 60 से अधिक लोगों की मौत हुई और बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए। इस घटना के बाद सपा सरकार की आलोचना हुई और मुस्लिम समुदाय के कुछ प्रभावशाली चेहरों ने भी नेतृत्व से जवाब मांगा।

इसी तरह आजम खान और सपा नेतृत्व के संबंधों को लेकर भी समय-समय पर विवाद सामने आए। उनके समर्थकों और कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने आरोप लगाया कि मुश्किल समय में पार्टी ने उनके साथ पर्याप्त मजबूती से खड़े होने का संदेश नहीं दिया। दूसरी तरफ, सपा नेतृत्व के समर्थक पार्टी के व्यापक राजनीतिक और कानूनी संदर्भों की ओर ध्यान दिलाते रहे हैं।

2024 में सलीम शेरवानी के इस्तीफे ने मुस्लिम प्रतिनिधित्व पर चर्चा को फिर तेज किया। उन्होंने पार्टी के भीतर मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक हिस्सेदारी और नेतृत्व के रवैये पर सवाल उठाए थे।

इन घटनाओं का महत्व यह है कि सपा के मुस्लिम आधार को लेकर बहस केवल बाहरी राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं रही। पार्टी के भीतर और उससे जुड़े कुछ नेताओं ने भी अपनी चिंताएं सार्वजनिक की हैं।

फिर भी, किसी नेता की नाराजगी और पूरे समुदाय के मतदान व्यवहार में बदलाव के बीच अंतर करना जरूरी है। उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में किसी एक बयान से व्यापक सामाजिक समूह की राजनीतिक दिशा तय नहीं होती।

अखिलेश की पार्टी का वादा और राजनीतिक भरोसे की बहस

समाजवादी पार्टी की मुस्लिम राजनीति पर चर्चा करते समय चुनावी वादों और उनके क्रियान्वयन का सवाल भी उठता है। 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले मुस्लिम समुदाय को आबादी के अनुपात में आरक्षण देने की घोषणा राजनीतिक बहस का हिस्सा बनी थी। उस समय इसे करीब 18 प्रतिशत आरक्षण के वादे के रूप में भी प्रचारित किया गया।

हालांकि इस तरह के आरक्षण को लागू करने के लिए संवैधानिक प्रावधानों और कानूनी सीमाओं से जुड़े सवाल महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए चुनावी घोषणा और उसके लागू होने की संभावना को एक ही बात नहीं माना जा सकता।

अल्पसंख्यक कल्याण, छात्रवृत्ति, शिक्षा और सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे भी मुस्लिम मतदाताओं के राजनीतिक विमर्श में शामिल रहे हैं। 

सपा के लिए यह बहस इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबे समय से मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन को उसकी राजनीति का अहम हिस्सा माना जाता रहा है। कांग्रेस के लिए यह अवसर हो सकता है कि वह प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय के सवालों पर अपना कार्यक्रम सामने रखे।

क्या कांग्रेस सपा के मुस्लिम आधार में सेंध लगा सकती है?

कांग्रेस के सामने एक तरफ राष्ट्रीय नेतृत्व और अपने मुद्दों को लेकर राजनीतिक सक्रियता बढ़ाने का अवसर है, तो दूसरी तरफ प्रदेश स्तर पर संगठन मजबूत करने की चुनौती भी है। इमरान मसूद की भूमिका इस प्रयास का एक हिस्सा हो सकती है, लेकिन किसी एक नेता की नियुक्ति को पूरे प्रदेश में सामाजिक समर्थन के बदलाव का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

सपा के पास राज्य में अपना संगठन, स्थापित नेतृत्व और पिछली विधानसभा तथा लोकसभा चुनावों का अनुभव है। पार्टी के लिए चुनौती यह होगी कि वह अपने सामाजिक गठबंधन को बनाए रखते हुए सहयोगी दलों के साथ सीटों का ऐसा बंटवारा करे, जिससे स्थानीय स्तर पर मतों का विभाजन कम हो।

अगर कांग्रेस गठबंधन में रहती है, तो वह मुस्लिम, दलित, ब्राह्मण और दूसरे सामाजिक समूहों के बीच अपनी भूमिका को लेकर अधिक हिस्सेदारी की मांग कर सकती है। लेकिन इन समूहों का समर्थन हासिल करना स्थानीय परिस्थितियों और उम्मीदवारों पर भी निर्भर करेगा।

2017 का अनुभव: सीटों पर देरी से दोनों दलों को क्या सबक मिला?

सपा और कांग्रेस पहले भी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में साथ उतर चुके हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में दोनों दलों के बीच सीटों को लेकर बातचीत आखिरी चरण तक खिंची थी। उस चुनाव में सपा ने कांग्रेस को 105 सीटें देने की घोषणा की थी, जबकि कांग्रेस ने 114 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे।

गठबंधन को चुनाव में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। सपा ने 47 सीटें और कांग्रेस ने 7 सीटें जीती थीं। 2017 का अनुभव यह दिखाता है कि सीट बंटवारे पर अस्पष्टता उम्मीदवारों की तैयारी और संगठनात्मक तालमेल को प्रभावित कर सकती है। 2027 के लिए दोनों दलों के सामने यही व्यावहारिक सवाल है। सीटों पर सहमति जितनी देर से बनेगी, उम्मीदवारों और कार्यकर्ताओं के लिए साझा रणनीति लागू करना उतना ही कठिन हो सकता है।

सीट शेयरिंग का व्यावहारिक फॉर्मूला क्या हो सकता है?

सपा और कांग्रेस के बीच समझौते के लिए केवल यह तय करना पर्याप्त नहीं होगा कि किस दल को कितनी सीटें मिलेंगी। सीटों की गुणवत्ता, उम्मीदवारों की उपलब्धता और क्षेत्रीय संतुलन पर भी सहमति बनानी होगी।

अक्टूबर की समय-सीमा और गठबंधन का भविष्य

इमरान मसूद ने अक्टूबर तक गठबंधन को अंतिम रूप देने की जरूरत पर जोर दिया है। इसे राजनीतिक दबाव और चुनावी तैयारियों के लिए समय की मांग के रूप में देखा जा सकता है। कांग्रेस चाहती है कि उम्मीदवारों और संगठन को तैयारी के लिए पर्याप्त समय मिले। सपा की प्राथमिकता सीटवार जीत की संभावना और अपने संगठनात्मक आधार के अनुरूप हिस्सेदारी तय करना है। दोनों दलों के हितों में कुछ समानताएं हैं, लेकिन सीटों के बंटवारे को लेकर टकराव साफ दिखाई देता है। ऐसे में समझौते का रास्ता बातचीत, सीटवार आंकड़ों और राजनीतिक प्राथमिकताओं के बीच संतुलन से ही निकल सकता है।

अगर गठबंधन बनता है, तो भी दोनों दलों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पूरी तरह समाप्त नहीं होगी। उन्हें अपने-अपने संगठन और सामाजिक आधार को मजबूत करने की कोशिश जारी रखनी होगी। अगर गठबंधन नहीं बनता, तो दोनों को अलग-अलग चुनाव लड़ने की रणनीति तैयार करनी होगी और विपक्षी मतों के संभावित विभाजन की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।

अखिलेश यादव के सामने दोहरी चुनौती

अखिलेश यादव के सामने एक तरफ कांग्रेस के साथ सीट शेयरिंग पर सहमति बनाने का सवाल है, तो दूसरी तरफ अपने सामाजिक गठबंधन और मुस्लिम प्रतिनिधित्व से जुड़े सवालों का जवाब देने की चुनौती भी है। राहुल गांधी की राष्ट्रीय राजनीति और अखिलेश यादव के क्षेत्रीय नेतृत्व के बीच तालमेल इस गठबंधन की एक प्रमुख चुनौती है। 

गठबंधन की असली परीक्षा सीटों के साथ भरोसे की भी

2024 का लोकसभा चुनाव दिखाता है कि दोनों दलों का साझा चुनावी प्रदर्शन महत्वपूर्ण रहा था। वहीं 2017 का विधानसभा चुनाव याद दिलाता है कि गठबंधन की सफलता के लिए सीटों का तालमेल, समय पर तैयारी और स्थानीय स्तर पर समन्वय भी अहम हैं। इमरान मसूद की बयानबाजी और कांग्रेस की बढ़ती दावेदारी ने बातचीत को सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। आखिरकार, 2027 में सपा-कांग्रेस के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किसे कितनी सीटें मिलेंगी। सवाल यह भी है कि राहुल गांधी के राष्ट्रीय अभियान, अखिलेश यादव के क्षेत्रीय संगठन और दोनों दलों के सामाजिक आधार को एक साझा चुनावी रणनीति में कैसे जोड़ा जाए। 

Leave a Reply