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राहुल की ‘संकुचित सोच’ से दो धड़ों में बंटी कांग्रेस, अध्यक्ष पद और पीएम मोदी पर हमले को लेकर मतभेद

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अध्‍यक्ष पद को लेकर कांग्रेस के भीतर की कलह खुलकर सामने आ चुकी है। पार्टी के 23 वरिष्‍ठ नेताओं ने जिस लहजे में अंतरिम अध्‍यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखा। और फिर जिस तेजी से कई मुख्‍यमंत्रियों समेत दिग्‍गज कांग्रेसियों ने सोनिया और राहुल गांधी के नेतृत्‍व में भरोसा जताया, उससे साफ है कि पार्टी में दो गुट बन चुके हैं। कांग्रेस का एक गुट जहां सोनिया गांधी को पूर्णकालिक अध्यक्ष बनाने के पक्ष में है, तो वहीं दूसरा गुट राहुल गांधी को ही अगले अध्‍यक्ष के रूप में देखना चाहता है। उधर प्रियंका गांधी कह चुकी हैं कि कोई गैर गांधी अब पार्टी का मुखिया बनना चाहिए।

सोनिया को पूर्णकालिक अध्यक्ष बनाने की अपील
कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक से कुछ घंटे पहले मध्य प्रदेश के दो पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ने सोनिया गांधी को पूर्णकालिक अध्यक्ष बनने की बात कही। दोनों नेताओं ने एक के बाद एक ट्वीट कर अपना समर्थन जताया। कमलनाथ ने ट्वीट किया, ”सोनिया गांधी के नेतृत्व पर कोई भी सुझाव या आक्षेप बेतुका है। मैं सोनिया गांधी से अपील करता हूं कि वे अध्यक्ष के रूप में कांग्रेस पार्टी को मजबूती प्रदान करें और कांग्रेस का नेतृत्व करें।” 

दिग्विजय सिंह ने कहा कि वह नेहरू-गांधी परिवार के बिना कांग्रेस की कल्पना नहीं कर सकते हैं और पार्टी का एक साधारण कार्यकर्ता किसी और को पार्टी अध्यक्ष के रूप में स्वीकार नहीं करेगा। दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया, “सोनिया गांधी का नेतृत्व सर्वमान्य है। यदि सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ना ही चाहती हैं तो राहुल गांधी को अपनी जिद छोड़कर अध्यक्ष का पद स्वीकार कर लेना चाहिए। देश का आम कांग्रेस कार्यकर्ता और किसी को स्वीकार नहीं करेगा।”

राहुल गांधी की कार्यशैली से शुरू हुई खेमेबंदी
कमलनाथ और दिग्विजय सिंंह के ट्विट से स्पष्ट है कि कांग्रेस के अंदर एक गुट राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाने के पक्ष में नहीं है। इसकी वजह राहुल गांधी की कार्यशैली है। पहली बार जब राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बने, तो उन्होंने जो राजनीतिक शैली और रणनीति अपनाई, उनसे पार्टी के विभिन्न धड़ों के बीच खेमेबंदी का सिलसिला शुरू हुआ। जब उन्होंने 2019 को लोकसभा चुनाव में पार्टी की लगातार दूसरी बार करारी हार के बाद अध्यक्ष पद छोड़ दिया तो यह खेमेबंदी, कलह में बदल गया जो दिन-ब-दिन गहराता चला जा रहा है।

राहुल की ‘संकुचित सोच’ से बुजुर्ग नेताओं में नाराजगी
राहुल गांधी ने कांग्रेस के विभिन्न मुद्दों को जिस तरह हैंडल किया, उससे पार्टी के पुराने चेहरे नाराज हुए और वो राहुल को सोच के धरातल पर बहुत संकुचित मानकर उनके साथ कभी तालमेल नहीं बिठा पाए। ये बुजुर्ग कांग्रेसी मानते हैं कि राहुल गांधी जिस छोटे से समूह पर यकीन करते हैं, वो पार्टी की जरूरतों को नहीं समझते, इसलिए राहुल को उचित सलाह नहीं देते हैं।

पीएम मोदी पर व्यक्तिगत हमले को लेकर मतभेद
मई 2019 में लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद राहुल ने जिस कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में अध्यक्ष पद से इस्तीफे की घोषणा की थी और उसकी एक और मीटिंग इस साल जून में हुई थी। तब कुछ सदस्यों ने राहुल से दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी संभालने का निवेदन किया था। राहुल ने दोनों मौकों पर पार्टी के दिग्गजों को कहा कि वो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर हमला नहीं करना चाहते हैं और वो ऐसा करने से डरते हैं।

पीएम मोदी को निशाना बनाने की रणनीति फेल
राहुल की इन टिप्पणियों से कई नेताओं को आघात पहुंचा और उन्होंने कहा कि मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी के खिलाफ 2014 से ही मिल रही लगातार हार के बावजूद कांग्रेस पार्टी की रणनीति की समीक्षा नहीं की गई है। उन बुजुर्ग नेताओं ने अपने बचाव में कहा कि मोदी पर व्यक्तिगत हमला करने और राफेल जैसे तथाकथित घोटालों को उठाने की रणनीति बुरी तरह नाकाम रही है। वरिष्ठ नेताओं का मत है कि मोदी को हर वक्त निशाना बनाने की जगह मुद्दे के आधार पर घेरने की कोशिश होनी चाहिए।

बुजुर्ग नेताओं की सलाह की अनदेखी 
राहुल गांधी पर वरिष्ठ कांग्रेसियों के सुझाव का कोई असर नहीं हुआ और उन्होंने राफेल और अब कोविड-19 महामारी, आर्थिक मंदी, चीनी अतिक्रमण जैसे मुद्दों पर प्रधानमंत्री मोदी को लगातार निशाना बना रहे हैं। राहुल के आलोचकों का कहना है कि इनमें से एक भी मुद्दा कांग्रेस पार्टी के काम आया हो, इसका कोई प्रमाण अब तक नहीं मिला है। उल्टे ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे प्रमुख नेता ने कांग्रेस छोड़ दी।

उलझन में हैं गांधी परिवार के वफादार
गांधी परिवार के वफादार कुछ वरिष्ठ कांग्रेसियों के लिए बड़े उलझन की स्थिति तब पैदा हो गई जब राहुल ने पिछले साल पार्टी का अध्यक्ष पद छोड़ा। उनका कहना है कि राहुल ने किसी मुद्दे पर चर्चा के लिए उनसे मिलना यह कहते हुए छोड़ दिया कि अब वो पार्टी अध्यक्ष नहीं हैं जबकि असल में ट्विट्स और बयानों को जरिए वो पार्टी का एजेंडा अब भी वही सेट कर रहे हैं। इतना ही नहीं, पार्टी के सांगठनिक ढांचों पर भी राहुल की छाप देखी जा सकती है।

राहुल के वफादारों ने बढ़ाई कांग्रेस की परेशानी
राहुल के प्रति वफादार पार्टी कार्यकर्ता सार्वजनिक तौर पर उन्हें (राहुल को) दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष बनाने की मांग करते रहते हैं। राहुल उन्हें भी नहीं रोकते हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि राहुल गांधी और उनके वफादार नेताओं और कार्यकर्ताओं की गतिविधियों ने पार्टी सदस्यों को गहरे उलझन में डाल दिया है। इसमें कोई शक नहीं कि कांग्रेस के दिग्गज नेताओं को कुछ सूझ नहीं रहा है और वो क्या करें, क्या नहीं, इसका फैसला नहीं कर पा रहे हैं।

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