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आरक्षण पर राहुल कर रहे हैं दोगली राजनीति, 2012 में कांग्रेस सरकार ने ही पदोन्नति में आरक्षण पर लगायी थी रोक

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कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रमोशन में आरक्षण को मौलिक और संवैधानिक अधिकार नहीं मानने साथ ही इसे सरकार का विवेकाधिकार बताए जाने पर कड़ी आपत्ति व्यक्त की है। इस मुद्दे पर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने घड़ियाली आंसू बहाना शुरू कर दिया है। उन्होंने अपनी चिर-परिचित दोगली राजनीति का नजारा पेश करते हुए केंद्र सरकार को आरक्षण विरोधी बता दिया। उन्होंने कहा कि आरएसएस और बीजेपी आरक्षण खत्म करना चाहती है। लेकिन कांग्रेस ऐसा नहीं होने देगी। 

राहुल और मोदी

राहुल गांधी ने आरएसएस और बीजेपी पर साधा निशाना

राहुल गांधी यही पर नहीं रुके। उन्होंने आरएसएस को निशाना बनाते हुए कहा, ‘आरएसएस और बीजेपी चाहे जितने सपने देखें हम आरक्षण खत्म नहीं होने देंगे।’ राहुल ने आरोप लगाया कि संविधान पर हमला हो रहा है। हर संस्था को तोड़ा जा रहा है, संसद में मुझे बोलने नहीं दिया जा रहा है। न्यायपालिका पर दबाव बनाया जा रहा है। देश के मुख्य स्तंभों को तोड़ रहे हैं।’ 

राहुल और भागवत

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर सियासी बवाल

दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार यानी 7 फरवरी, 2020 को अपनी टिप्पणी में कहा कि सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है और इसे लागू करना या न करना राज्य सरकारों के विवेक पर निर्भर करता है। कोर्ट ने कहा कि कोई अदालत एससी और एसटी वर्ग के लोगों को आरक्षण देने के आदेश जारी नहीं कर सकती। सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को विपक्षी नेता आरक्षण पर खतरे के तौर पर देख रहे हैं और इसपर सियासी बवाल शुरू हो गया है।

कांग्रेस नेता

कांग्रेस सरकार ने लगायी थी पदोन्नति में आरक्षण पर रोक

शायद राहुल गांधी को उत्तराखंड के कांग्रेस की हरीश रावत सरकार के उस फैसले की जानकारी नहीं है, या उनके सिपहसलारों ने उन्हें नहीं बताया कि तत्कालीन कांग्रेस की हरीश रावत सरकार ने आरक्षण में पदोन्नति पर रोक की पहल की थी। दरअसल उत्तराखंड की हरीश रावत सरकार ने पांच सितंबर 2012 को शासनादेश जारी कर प्रदेश में पदोन्नति में आरक्षण पर रोक लगा दी थी। हरीश रावत सरकार ने अधिसूचना जारी कर कहा था कि राज्य के सरकारी सेवाओं में सभी पद एससी / एसटी के पदोन्नति में आरक्षण के बिना भरे जाएंगे। 

हरीश रावत

हरीश रावत सरकार के आदेश को कोर्ट में चुनौती  

ऊधमसिंह नगर के रुद्रपुर निवासी ज्ञान चंद्र ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर हरीश रावत सरकार के पांच सितंबर 2012 के शासनादेश को चुनौती दी।  याचिका में इसे संविधान की भावना और सुप्रीम कोर्ट के समय-समय पर दिए फैसले के खिलाफ बताते हुए निरस्त करने की मांग की गई थी।

हरीश रावत

आंकड़े जुटाने में नाकाम रही हरीश रावत सरकार

इससे पहले कोर्ट के आदेश पर एससी-एसटी वर्ग को पदोन्नति में आरक्षण का लाभ देने के लिए हरीश रावत सरकार ने इस वर्ग के पिछड़ेपन से संबंधित आंकड़े जुटाना तय किया था। इसके लिए इरशाद हुसैन कमेटी का गठन किया गया। लेकिन यह काम रावत सरकार नहीं कर पाई।

हरीश रावत और उत्तराखंड हाई कोर्ट

हाईकोर्ट ने हरीश रावत सरकार के फैसले को किया रद्द

1 अप्रैल, 2019 को नैनीताल हाईकोर्ट ने फैसला देते हुए पदोन्नति में आरक्षण पर रोक लगाने वाले हरीश रावत सरकार के आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने कहा कि सरकार चाहे तो इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 16 (4ए) के अंतगर्त कानून बना सकती है। बाद में राज्य सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है।

पदोन्नति में आरक्षण का विवाद नया नहीं है और समय-समय पर कोर्ट और राज्य सरकार इस बारे में अहम कदम उठा चुके हैं।

सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार के फैसले को किया रद्द

सबसे पहले साल 1973 में उत्तर प्रदेश सरकार ने पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था लागू की थी जिसके बाद 1992 में इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को रद्द कर दिया था। साथ ही सभी राज्यों को पांच साल के भीतर इस आरक्षण को खत्म करने के निर्देश दिए थे। फिर दो साल बाद यूपी में मुलायम सरकार ने इस आरक्षण को कोर्ट के अगले आदेश तक के लिए बढ़ा दिया था।

अटल सरकार

केंद्र ने किया संविधान संशोधन

हालांकि इस दिशा में 1995 का साल सबसे अहम रहा और 17 जून 1995 को केंद्र सरकार ने पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए 82वां संविधान संशोधन कर दिया। इस संशोधन के बाद राज्य सरकारों को प्रमोशन में आरक्षण देने का कानून अधिकार हासिल हो गया। इस फैसले के कुछ साल बाद 2002 में केंद्र की एनडीए सरकार ने प्रमोशन में आरक्षण के लिए संविधान में 85वां संशोधन किया और एससी-एसटी आरक्षण के लिए कोटे के साथ वरिष्ठता भी लागू कर दी।

मुलायम सिंह यादव

मुलायम सरकार ने रद्द किया था पदोन्नति में आरक्षण  

उत्तर प्रदेश में 2005 की मुलायम सरकार ने प्रमोशन में आरक्षण की व्यवस्था को ही रद्द कर दिया। फिर दो साल बाद जब राज्य में मायावती की सरकार बनी तो उन्होंने वरिष्ठता की शर्त के साथ पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था को फिर से लागू कर दिया। हालांकि हाई कोर्ट में चुनौती मिलने के बाद 2011 में इस फैसले को रद्द कर दिया गया।

अखिलेश यादव

अखिलेश यादव सरकार ने रद्द किया था प्रमोशन में आरक्षण

साल 2012 में यूपी की अखिलेश यादव सरकार ने प्रमोशन में आरक्षण की व्यवस्था और वरिष्ठता को रद्द कर दिया। साल 2017 में केंद्र सरकार की अपील के बाद सुप्रीम कोर्ट ने नागराज मामले का फैसला संवैधानिक पीठ के हवाले कर दिया। 2018 में इस पीठ का फैसला आने तक सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि प्रमोशन में आरक्षण पर कोई रोक नहीं है और राज्य इसे अपने विवेक के आधार पर लागू कर सकते हैं।

 

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