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उप्र चुनाव 2027: अखिलेश के पीडीए के पीछे पुराना तुष्टीकरण, आजम खान की चौखट पर सपा की रणनीति

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उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात बिछने से पहले ही समाजवादी पार्टी के आंतरिक अंतर्विरोध खुलकर सतह पर आ गए हैं। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का रामपुर जिला जेल पहुंचकर विभिन्न आपराधिक मामलों में सजायाफ्ता आजम खान से बंद कमरे में मंत्रणा करना सामान्य शिष्टाचार नहीं, बल्कि चुनावी हताशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है। प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों के लिए रणनीति उस चेहरे की चौखट से तय की जा रही है, जो लंबे समय तक विवादित कार्यशैली और समानांतर सत्ता का प्रतीक रहा। यह घटनाक्रम स्पष्ट करता है कि सपा विकास और नए विमर्श के चाहे जितने दावे कर ले, अंततः उसकी चुनावी डोर पुराने बाहुबल और कट्टर वोट बैंक पर ही टिकी हुई है। जनता यह देख रही है कि सपा का शीर्ष नेतृत्व कानून के शासन का सम्मान करने के बजाय बार-बार विवादित चेहरों की शरण में जा रहा है।

416 करोड़ के वित्तीय घपले पर जांच का शिकंजा और अखिलेश की ढाल
हाल ही में प्रवर्तन निदेशालय और जांच एजेंसियों द्वारा जौहर ट्रस्ट में 416 करोड़ रुपये से अधिक के संदेहास्पद वित्तीय अंतर और हेरफेर को लेकर शुरू की गई सख्त कानूनी कार्रवाई ने सपा की बेचैनी बढ़ा दी है। मनी लॉन्ड्रिंग और आपराधिक षड्यंत्र के इस नए मामले के सामने आते ही अखिलेश यादव का सीधे रामपुर जिला जेल पहुंचना साफ संकेत देता है कि सपा आर्थिक अपराधों के साक्ष्यों पर पर्दा डालने और जांच संस्थाओं पर राजनीतिक दबाव बनाने का प्रयास कर रही है। कानून की नजर में गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोपी के समर्थन में खुलकर खड़े होकर सपा नेतृत्व ने यह सिद्ध कर दिया है कि उसके लिए शुचिता और पारदर्शी व्यवस्था कोई महत्व नहीं रखती। सार्वजनिक धन और ट्रस्ट के दुरुपयोग की निष्पक्ष जांच से घबराकर जेल के चक्कर लगाना यह दर्शाता है कि सपा नेतृत्व विकास के एजेंडे से पूरी तरह भटक चुका है। भ्रष्टाचारियों को राजनीतिक संरक्षण देने की यह प्रवृत्ति अब जनता के सामने बेनकाब हो रही है।

आजम की वर्तमान दुर्गति के असली जिम्मेदार खुद अखिलेश: भाजपा का तीखा प्रहार
भाजपा ने इस मुलाकात पर सीधा हमला बोलते हुए स्पष्ट किया है कि आजम खान की इस दुर्गति के मुख्य सूत्रधार खुद अखिलेश यादव हैं। वर्ष 2012 से 2017 के दौरान अखिलेश सरकार के सत्ता संरक्षण और खुली छूट के कारण ही आजम खान ने रामपुर में किसानों और आम नागरिकों की संपत्तियों पर बेखौफ कब्जे किए और जौहर ट्रस्ट के नाम पर समानांतर सत्ता चलाई। सत्ता में रहते हुए अपने वरिष्ठ नेताओं को कानून से ऊपर समझने की छूट देने वाली सपा ने कानूनी संकट आते ही उनसे दूरी बना ली थी। अब जब 2027 का चुनाव नजदीक आया है, तो केवल मुस्लिम वोट बैंक को साधने के लिए अखिलेश यादव फिर से आजम के हमदर्द बनने का चुनावी ढोंग रच रहे हैं। भाजपा प्रवक्ताओं का कहना है कि जब तक सत्ता का स्वार्थ था तब तक मनमानी को बढ़ावा दिया गया और अब कानूनी नतीजों से घिरने पर झूठी हमदर्दी दिखाकर प्रदेश की जनता को गुमराह करने की कोशिश हो रही है।

परिवारवाद का खुला प्रदर्शन: सजायाफ्ता बेटे के कंधे पर हाथ रखकर जेल में दस्तक
रामपुर जेल में प्रवेश करते समय अखिलेश यादव का आजम खान के बेटे अदीब आजम के कंधे पर हाथ रखकर आगे बढ़ना सपा की मूल राजनीतिक संस्कृति को दर्शाता है। यह दृश्य संकेत था कि सपा में पद, प्रभाव और राजनीतिक विरासत केवल खास परिवारों की तिजोरी तक ही सीमित रहेगी। पार्टी में दशकों से पसीना बहा रहे सामान्य कार्यकर्ताओं और जमीनी पदाधिकारियों को दरकिनार कर आपराधिक मुकदमों में घिरे परिवार के सदस्यों को तरजीह दी जा रही है। जनता के सामने यह साफ हो चुका है कि नए विचारों और लोकतांत्रिक सिद्धांतों का दावा करने वाली सपा अंततः परिवारवादी और बाहुबली सिंडिकेट की चौखट पर ही नतमस्तक होती है। पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र केवल कागजों पर है, जबकि जमीनी हकीकत आज भी परिवार और खास सिंडिकेट के इर्द-गिर्द घूमती है।

रामपुर में सपा की आंतरिक कलह और आजम खेमे के सामने समर्पण
रामपुर की स्थानीय सियासत में सपा इस समय गहरे अंतर्कलह और गुटबाजी से जूझ रही है। वर्तमान सपा सांसद मोहिबुल्लाह नदवी और आजम खान खेमे के बीच की तल्खी किसी से छिपी नहीं है और अब खुलकर सड़कों पर आ चुकी है। दिल्ली में मौलाना के माध्यम से नए चेहरों को पार्टी में शामिल किए जाने पर जेल में बंद आजम खान ने अपनी खुली नाराजगी जताई थी, जिससे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा के दो फाड़ होने का खतरा पैदा हो गया था। अखिलेश यादव की यह जेल यात्रा किसी जनहित या विचारधारा के लिए नहीं, बल्कि अपने ही सांसद को किनारे कर जेल से हुक्म चला रहे पूर्व मंत्री की नाराजगी दूर करने की मजबूरी का नतीजा है। यह घटनाक्रम साबित करता है कि सपा में चुने हुए जनप्रतिनिधियों का कोई सम्मान नहीं है और संगठन की बागडोर आज भी जेल में बंद बाहुबली सिंडिकेट के हाथों में ही गिरवी रखी हुई है।

विवादित जौहर यूनिवर्सिटी में वीआईपी लैंडिंग और आजम को गृह मंत्री बनाने का मंसूबा
अखिलेश यादव का निजी हेलीकॉप्टर सीधे उसी मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के परिसर में बने हेलीपैड पर उतरा, जिसकी जमीनों के अवैध अधिग्रहण और सरकारी धन के दुरुपयोग की जांच जारी है। यह कदम उस अवैध साम्राज्य को राजनीतिक वैधता दिलाने की कोशिश माना जा रहा है। इसके साथ ही सपा के राष्ट्रीय महासचिव शिवपाल सिंह यादव द्वारा सार्वजनिक रूप से यह एलान करना कि 2027 में सरकार बनते ही आजम खान को गृह मंत्री बनाया जाएगा, सपा के मंसूबों को बेनकाब करता है। जिस चेहरे के दौर में पुलिस महकमा लाचार बना रहा और कानून-व्यवस्था ध्वस्त रही, उसी के हाथ में फिर से गृह विभाग और पुलिस तंत्र सौंपने की बात करना यह साबित करता है कि सपा राज्य को पुनः माफिया सिंडिकेट के हवाले करना चाहती है। अराजकता के उस पुराने दौर की वापसी की कल्पना मात्र से प्रदेश के नागरिक आशंकित हैं।

जेल की कोठरी से उम्मीदवारों के नाम और कांग्रेस से 125 सीटों की रस्साकशी
मुलाकात के दौरान आजम खान ने मुरादाबाद, मेरठ, बिजनौर और रामपुर समेत पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की प्रमुख सीटों के लिए अपने भरोसेमंद दावेदारों के सुझाव अखिलेश यादव को सौंपे हैं। इसके साथ ही विपक्षी गठबंधन में 125 सीटों पर नजर गड़ाए बैठी कांग्रेस को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सीमित रखने और सपा के पुराने सिंडिकेट की सीटें सुरक्षित रखने पर भी जेल से ही शर्तें तय की गईं। आंतरिक लोकतंत्र का दम भरने वाले विपक्षी दलों में टिकट वितरण और सीटों का फैसला किसी लोकतांत्रिक फोरम पर नहीं, बल्कि जेल की सलाखों के पीछे से हो रहा है। कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी का एक सजायाफ्ता नेता की शर्तों के आगे नतमस्तक होना यह दर्शाता है कि सत्ता की लालसा में विपक्ष ने अपने सभी सिद्धांत ताक पर रख दिए हैं। योग्यता और जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा कर जेल से जारी फरमानों पर चुनाव लड़ने की यह तैयारी जनता को रास नहीं आने वाली।

सालभर बाद याद आया दिल का रिश्ता: मुस्लिम धर्मगुरुओं ने भी खोला अवसरवादिता का कच्चा-चिट्ठा
जेल की ड्योढ़ी से बाहर निकलते ही अखिलेश यादव द्वारा इस मुलाकात को ‘दिल का रिश्ता’ बताना और विभिन्न अदालतों से साक्ष्यों के आधार पर सजा पा चुके नेता के साथ ‘अन्याय’ का राग अलापना विशुद्ध चुनावी पाखंड है। ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी सहित प्रमुख धर्मगुरुओं ने सपा की पोल खोलते हुए सवाल उठाया कि पूरे एक साल तक अखिलेश को आजम की सुध क्यों नहीं आई? जब तक चुनाव दूर थे तब तक सपा ने दूरी बनाए रखी और अब 2027 के चुनाव आते ही अचानक सहानुभूति का नाटक शुरू कर दिया गया। स्वतंत्र न्यायपालिका द्वारा ठोस साक्ष्यों के बाद दिए गए फैसलों पर सवाल उठाकर किसी सजायाफ्ता को निर्दोष बताना और वर्ग-विशेष में खुद को पीड़ित दिखाना सपा की पुरानी अवसरवादी सियासत का हिस्सा है। मुस्लिम समाज के प्रबुद्ध वर्ग ने सपा के इस दोहरे चरित्र को पहचान लिया है।

हार की पूर्व-भूमिका: जेल की चौखट से चुनाव आयोग और वोटर लिस्ट पर सवाल
रामपुर जेल से बाहर आते ही अखिलेश यादव ने एक बार फिर स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाओं को कटघरे में खड़ा करने की पुरानी तरकीब अपनाई। उन्होंने चुनाव आयोग पर भाजपा के साथ मिलीभगत का आरोप लगाते हुए मतदाता सूचियों में फर्जीवाड़े का बेबुनियाद दावा किया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब भी सपा को चुनावी मैदान में अपनी पराजय तय दिखने लगती है, वह प्रशासनिक तंत्र और चुनाव आयोग पर लांछन लगाकर पहले से ही हार का बहाना तैयार करने लगती है। एक सजायाफ्ता नेता से मुलाकात के तुरंत बाद देश की सबसे सम्मानित संवैधानिक संस्था की साख पर हमला बोलना यह साबित करता है कि सपा लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के बजाय केवल भ्रम फैलाने की राजनीति में विश्वास रखती है। संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास जताना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के प्रति सपा के गैर-जिम्मेदाराना रवैये को ही उजागर करता है।

तुष्टीकरण की पराकाष्ठा: आजम से मिलते ही प्रभु श्रीराम मंदिर और आस्था पर अनर्गल प्रहार
रामपुर जेल के बाहर मीडिया से बात करते हुए अखिलेश यादव ने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघते हुए अयोध्या में प्रभु श्रीराम के मंदिर में ‘चढ़ावा, चंदा और रामधन की चोरी’ जैसा अत्यंत आपत्तिजनक और तथ्यहीन बयान दिया। करोड़ों हिंदुओं की आस्था के केंद्र भव्य राम मंदिर पर इस तरह का प्रहार यह दर्शाता है कि आजम खान से मंत्रणा के तुरंत बाद सपा अपने कट्टर वोट बैंक को साधने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। आस्थावान समाज के धार्मिक प्रतीकों को अपमानित कर राजनीतिक लाभ उठाने की यह कोशिश सपा के उस विभाजनकारी चेहरे को उजागर करती है, जो सत्ता के लिए बहुसंख्यक समाज की आस्था को चोट पहुंचाने से कभी पीछे नहीं हटता। तुष्टीकरण की इस अंधी दौड़ ने यह साबित कर दिया है कि सपा के पास विकास का कोई एजेंडा नहीं है, बल्कि वह केवल धार्मिक भावनाओं को भड़काकर ध्रुवीकरण की फिराक में है।

एनडीए का जमीनी प्रहार: अब सपा के लिए केवल दरी नहीं बिछाएगा मुस्लिम समाज
रामपुर के स्थानीय भाजपा विधायक आकाश सक्सेना और एनडीए सहयोगी ओम प्रकाश राजभर ने इस मुलाकात पर कड़ा रुख अपनाते हुए सपा की वोट बैंक नीति को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश का आम मुस्लिम मतदाता अब सपा की इस राजनीतिक चाल को समझ चुका है और वह सिर्फ चुनावी रैलियों में दरी बिछाने तक सीमित नहीं रहने वाला है। रामपुर में आम नागरिक अब शिक्षा, कौशल और सम्मानजनक आजीविका चाहता है, न कि किसी खास परिवार के कानूनी मुकदमों की ढाल बनना। एनडीए नेताओं का यह प्रहार दर्शाता है कि सपा की तुष्टीकरण आधारित राजनीति की जमीन अब पूरी तरह खिसक चुकी है। आम अवाम अब नेताओं के निजी स्वार्थों और विकास के बीच का अंतर अच्छी तरह समझने लगी है।

पीड़ित दलित-वंचित परिवारों की अनदेखी और घावों पर नमक
रामपुर में जौहर यूनिवर्सिटी और जमीन अधिग्रहण के नाम पर दर्जनों गरीब किसानों, वंचितों तथा वाल्मीकि और दलित परिवारों की जमीनों व मकानों पर जबरन कब्जे के मामले अदालतों में सिद्ध हो चुके हैं। अखिलेश यादव रामपुर जेल में बंद सजायाफ्ता नेता से मिलने तो पहुंचे, लेकिन उन्होंने उन पीड़ित दलित परिवारों की सुध लेना जरूरी नहीं समझा जिनके आशियाने उजाड़े गए थे। यह दोहरा रवैया सीधे तौर पर सवाल खड़ा करता है कि क्या सपा के पीडीए विमर्श में शोषित दलितों और गरीबों के आंसू कोई मायने नहीं रखते? दबंगई के शिकार बने परिवारों को छोड़कर आरोपी के प्रति सहानुभूति जताना पार्टी की वर्ग-विशेष केंद्रित संकीर्ण मानसिकता को पूरी तरह उजागर करता है। जब शोषक के साथ खड़े होकर शोषितों की उपेक्षा की जाती है, तो सामाजिक न्याय के सारे नारे खोखले साबित हो जाते हैं। रामपुर के पीड़ित परिवार आज भी सपा के इस अन्याय को भूले नहीं हैं।

पीडीए के प्रगतिशील मुखौटे के पीछे गैर-यादव ओबीसी और दलितों की उपेक्षा
सपा पिछले कुछ समय से ‘पीडीए’ यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के नारे को आगे रखकर खुद को सर्वसमावेशी दल के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही थी, लेकिन रामपुर जेल में आजम खान के समक्ष नतमस्तक होते ही यह मुखौटा पूरी तरह दरक गया है। कुर्मी, मौर्य, राजभर, निषाद और वाल्मीकि जैसे वर्गों को केवल रैलियों में भीड़ जुटाने तक सीमित रखा गया, जबकि 403 विधानसभा क्षेत्रों के टिकट वितरण और मूल रणनीति का अधिकार एक सजायाफ्ता पुराने चेहरे को सौंप दिया गया। यह कदम पार्टी के निष्ठावान पिछड़े और दलित नेताओं के स्वाभिमान पर सीधा आघात है। इससे स्पष्ट होता है कि सपा का ‘पीडीए’ केवल चुनावी प्रचार का आवरण था, जबकि शीर्ष स्तर पर नीतियां और फैसले आज भी परिवार और पुराने सिंडिकेट के हाथों में ही बंधक बने हुए हैं। आंतरिक निर्णयों में वास्तविक हिस्सेदारी न मिलने से जमीनी कार्यकर्ता स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

मुस्लिम वोटों में बिखराव का डर और ओवैसी पर ‘रावण’ वाला तंज
रामपुर में असदुद्दीन ओवैसी की हालिया सक्रियता और मुस्लिम प्रतिनिधित्व को लेकर उठाए गए तीखे सवालों ने सपा के रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी है। मुस्लिम मतों के संभावित बिखराव से घबराए अखिलेश यादव ने रामपुर पहुंचकर ओवैसी पर ‘वेश बदलकर आने वाले रावण’ जैसी अमर्यादित टिप्पणी कर अपनी हताशा जाहिर की। जब भी कोई अन्य दल मुस्लिम समाज के स्वतंत्र नेतृत्व और वास्तविक अधिकारों की बात करता है, तो सपा उसे तुरंत लांछित करने लगती है। यह डर साफ दिखाता है कि सपा के पास इस वर्ग के लिए कोई सकारात्मक और प्रगतिशील विजन नहीं है, बल्कि वह केवल भय और ध्रुवीकरण के जरिए उन्हें अपना बंधक वोटर बनाए रखना चाहती है। अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती देख मर्यादा खो बैठना और अनर्गल बयानबाजी करना सपा की हताशा का स्पष्ट प्रमाण है।

पसमांदा मुस्लिम बनाम रसूखदार बाहुबली: योजनाओं की तृप्ति बनाम तुष्टीकरण
आजम खान जिस सामंती और रसूखदार राजनीति के प्रतीक रहे हैं, उसने आम और गरीब पसमांदा मुसलमानों को हमेशा हाशिए पर रखा और उन्हें केवल वोट बैंक समझा। वर्ष 2026 में केंद्र और उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार का सौ प्रतिशत तृप्ति (saturation) मॉडल इस वर्ग तक वास्तविक विकास और आत्मनिर्भरता पहुंचा रहा है। प्रधानमंत्री आवास, मुफ्त राशन, उज्ज्वला गैस कनेक्शन और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं का लाभ बिना किसी भेदभाव के आम गरीब मुस्लिम परिवारों तक सीधा पहुंचा है। एक तरफ भाजपा का यह पारदर्शी लाभार्थी मॉडल है जिसने आम पसमांदा समाज को स्वाभिमान और आर्थिक सुरक्षा दी है, वहीं दूसरी तरफ सपा का मॉडल है जो केवल एक रसूखदार परिवार के सियासी रसूख को बचाने के लिए जेल की ड्योढ़ी नाप रहा है। गरीब पसमांदा समाज अब जान चुका है कि उसका सच्चा हितैषी कौन है और कौन उसका केवल चुनावी इस्तेमाल करता रहा है।

रामपुर के बदलते जनमानस की अनदेखी और भयमुक्त विकास का दौर
रामपुर कभी एक परिवार और एक नेता की निजी जागीर माना जाता था, लेकिन रामपुर के मतदाताओं ने हाल के चुनावों में उस वर्चस्व को ध्वस्त कर विकास और शांति का नया मार्ग चुना है। वर्ष 2026 में रामपुर का दस्तकार, पैचवर्क और जरी कारीगर ‘एक जिला एक उत्पाद’ (ODOP) के माध्यम से सीधे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जुड़कर अपनी पहचान बना रहा है। आज का रामपुर मुकदमों, खौफ और प्रशासनिक मनमानी से मुक्त होकर व्यापार, उद्योग और आर्थिक गतिविधियों का नया केंद्र बन चुका है। अखिलेश यादव उसी रामपुर में जाकर पुराने राजनीतिक दबदबे को हवा देने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे वहां का स्थानीय समाज पहले ही पूरी तरह खारिज कर चुका है। रामपुर की शांतिप्रिय जनता अब पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहती और प्रगति के पथ पर आगे बढ़ रही है।

21वीं सदी के युवाओं की आधुनिक आकांक्षाओं से सपा का खुला अलगाव
वर्ष 2026 का युवा मतदाता रोजगार, नवाचार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और स्किल डेवलपमेंट जैसे आधुनिक और प्रगतिशील मुद्दों को अपनी प्राथमिकता मानता है। उत्तर प्रदेश कौशल विकास मिशन (UPSDM) और नई औद्योगिक नीतियों के जरिए आज लाखों युवा आत्मनिर्भर बनकर प्रदेश के विकास में योगदान दे रहे हैं। इस नए और तकनीकी दौर में अखिलेश यादव युवाओं के सामने भविष्य की कोई रूपरेखा रखने के बजाय सत्तर पार के विवादित नेताओं के साथ जेल में चुनावी गोटियां बिछाने में व्यस्त हैं। यह कदम साबित करता है कि सपा 21वीं सदी के पहली बार वोट करने वाले युवाओं और आकांक्षी वर्ग की सोच से पूरी तरह कट चुकी है और आज भी नब्बे के दशक के पुराने घिसे-पिटे फॉर्मूलों में उलझी है। आधुनिक सोच और तकनीक की बात करने वाला युवा अब किसी बाहुबली या तुष्टीकरण आधारित राजनीति के साथ कतई खड़ा नहीं होगा।

पुराने दौर की ओर कभी नहीं लौटेगी उत्तर प्रदेश की जागरूक जनता
उत्तर प्रदेश आज भयमुक्त समाज, सुरक्षित निवेश और त्वरित विकास की दिशा में तेजी से अग्रसर है और देश के अग्रणी राज्यों में अपनी जगह बना चुका है। ऐसे समय में अखिलेश यादव का सजायाफ्ता आजम खान से चुनावी मशविरा करना यह दर्शाता है कि समाजवादी पार्टी के पास 2027 के लिए कोई सकारात्मक, दूरदर्शी और प्रगतिशील दृष्टि नहीं बची है। जनता के सामने एक तरफ सुरक्षा, पारदर्शी शासन और जनहितकारी नीतियों का सुशासन मॉडल है, तो दूसरी तरफ जेलों से चलने वाली जोड़-तोड़, तुष्टीकरण और कानून को ताक पर रखने वाली पुरानी विभाजनकारी राजनीति। प्रदेश की जनता अब जातिवादी समीकरणों और बाहुबल के सिंडिकेट को भली-भांति पहचानती है, इसलिए अतीत के सिंडिकेट को पुनर्जीवित करने का यह दांव 2027 में विफल साबित होना तय माना जा रहा है। उत्तर प्रदेश अब सुशासन और विकास के पथ पर अडिग है और पीछे लौटने का कोई सवाल ही नहीं उठता।

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