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दिल्ली दंगे में गई दलित की जान, क्यों मौन है CAA के खिलाफ दलितों को भड़काने वाले ?

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दिल्ली दंगे में मरने वाले लोगों का आंकड़ा 40 के पार पहुंच चुका है। इसमें समाज के हर तबके के लोग शामिल है। दंगाइयों ने हमला करने से पहले से यह नहीं देखा कि कौन सवर्ण है और कौन दलित। उनका एक ही मकसद था हिन्दुओं का कत्लेआम। दंगाइयों ने सड़कों पर खड़ी गाड़ियों और घरों को भी नहीं छोड़ा। जहां मौका मिला आग लगाई और खुलेआम सड़कों पर तांडव किया। ऐसे में सवाल उठता है कि नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ दलितों को भड़काने वाले भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर आजाद और प्रकाश अंबेडकर जैसे कथित दलित चिंतक दलितों की मौत पर मौन क्यों हैं ?

दिल्ली में हुए दंगों में जान गंवाने वालों में एक दिनेश कुमार खटीक का नाम भी शामिल है। दिनेश कुमार खटीक के भाई सुरेश ने साफ़ कहा कि उनके भाई की जान इस्लामी कट्टरपंथियों के जिहाद ने ली है। उन्होंने कहा कि 26 फरवरी को मुस्तफाबाद के लोगों ने मेरे भाई को मार डाला। बता दें कि मुस्तफाबाद मुस्लिम बहुल क्षेत्र है।

दिनेश कुमार खटीक के दो बच्चे हैं। एक डेढ़ साल का बेटा है जबकि एक बेटा 7 साल का है। वो अपने दोनों बच्चों के लिए दूध लेने निकले थे और दुकानें बंद होने के कारण वो दूर निकल गए। इसी दौरान वो फैसल फ़ारूक़ के राजधानी स्कूल के बगल से गुजरे। जब वो वहाँ से गुजर रहे थे, तब दंगाई मुस्लिम भीड़ गोलीबारी और पत्थरबाजी के साथ-साथ पेट्रोल बम से भी हमले कर रही थी। तभी दंगाइयों की एक गोली आकर दिनेश के सिर में लगी और उनकी मौत हो गई। 

मृतक दिनेश के घर पर मातम का माहौल है। उनके भाई सुरेश ने कहा कि उनकी सरकार से यही माँग है कि एक-एक मदरसे और मस्जिद की तलाशी ली जाए, ताकि आगे से मुस्लिम दंगाई भीड़ खतरनाक हथियारों को जमा नहीं कर सके। दिनेश के घर पर मौजूद अन्य लोगों ने बताया कि पीड़ित हिन्दुओं के सिर, आँख और गले तक में गोलियां मारी गईं।

जिस दिन दिनेश कुमार खटीक को गोली लगी थी, उस दिन मुस्लिम दंगाइयों ने हालात ऐसे पैदा कर के रखे थे कि उन्हें हॉस्पिटल भी नहीं ले जाया जा सका। बदहवास बूढ़े पिता अपने घर की बालकनी में सुध-बुध खोए से बैठे हुए हैं। उनकी एक ही चिंता है कि अब दिनेश की पत्नी और बच्चों का भरण-पोषण कैसे होगा?


दिनेश की तरह कई और लोग है, जो इस हिंसा के शिकार हुए है। सड़कों के किनारे रेहड़ी लगाने वाले गरीब लोगों को भी नहीं छोड़ा गया। यहां तक कि दलितों के घरों को भी निशाना बनाया गया। दंगाइयों ने उनके घरों को भी आग के हवाले कर दिया। दलित समुदाय के लोग भी अपनी जान बचाकर भागते नजर आए। कई गरीब दलितों का आसियाना उजड़ चुका है। अब उनके सामने भूखमरी की समस्या आ गयी है। ऐसे में उनकी मदद करने कोई दलित नेता सामने नहीं आया है।  

दिल्ली दंगे से पहले 16 फरवरी, 2020 को कांग्रेस शासित राज्य राजस्थान में दलित उत्पीड़न का एक मामला सामने आया। नागौर में चोरी के आरोप में दो दलित युवकों की बेरहमी से पिटाई की गई। दरिंदों ने इस पिटाई का वीडियो भी बनाया। वीडियो जब सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो लोग हैरान रह गए और देश में एक बार फिर दलित उत्पीड़न को लेकर बहस शुरू हो गई। वीडियो में दिखा कि दरिंदो ने दलित युवकों के प्राइवेट पार्ट में पेट्रोल डाला और स्क्रूड्राइवर का भी इस्तेमाल किया। देखिए वीडियो

वीडियो में अमानवीय तस्वीर देखकर किसी का भी खून खौल जाए, लेकिन दलितों के मसीहा और दलित उत्पीड़न पर आवाज बुलंद करने वाले बुद्धिजीवियों के होठ सील गए। जाहिर है यह घटना अगर किसी बीजेपी शासित राज्य में होती तो अब तक विपक्ष और बुद्धिजीवी पानी पी पी कर मोदी सरकार को कोसना शुरू कर देते, लेकिन कांग्रेस शासित राज्य होने की वजह से इस मामले पर सभी ने चुप्पी साध ली है। 

भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर आजाद और असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं को दलितों के वोटों की चिंता है। इसलिए ये लोग अब इसे धर्म और जाति का रूप देने की कोशिश कर रहे हैं और दलितों को भी बीजेपी के खिलाफ खड़ा करना चाहते हैं। असदुद्दीन ओवैसी के भाई अकबरुद्दीन ओवैसी ने तो ये तक कह दिया था कि हमने इस देश पर 800 साल तक शासन किया है और ये लोग हमें देश से निकालना चाहते हैं। ऐसा कहकर ये लोग दलितों और मुस्लिमों को भड़काकर अपना वोट बैंक मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।

सीएए से दलितों को सबसे ज्यादा फायदा मिला है, क्योंकि पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए शरणार्थियों में सबसे अधिक दलित है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में इन दलितों पर भारी अत्याचार और उत्पीड़िन हो रहा था, जिससे मजबूर होकर भारत में शरण लेना पड़ा। जब देश का बंटवारा हुआ, उस समय बाबा साहब अंबेडकर हिंदुस्तान में रुक गए थे। उनके सहयोगी दलित हित चिंतक योगेंद्र नाथ मंडल पाक में रुक गए। वहां दलितों पर दमन चक्र चला। जम कर धर्मांतरण हुआ। बेटियों के साथ अत्याचार हुआ। परेशान होकर मंडल दलितों के साथ भारत आ गए। इसी को लेकर जिन्ना- नेहरू पैक्ट हुआ। जिस पर पाक ने अमल नहीं किया। मोदी सरकार से पहले कांग्रेस की सरकार दलित शरणार्थियों को सिर्फ आश्वासन दे रही थी। उसे अल्पसंख्यक वोटबैंक खिसकने का डर सता रहा था। जब मोदी सरकार ने सीएए को लागू किया, तो कांग्रेस और तमाम विपक्षी दल दलित हित की चिंता किए बिना मुस्लिमों को भड़काना शुरू किया, जिसका नतीजा दिल्ली दंगे के रूप में सामने आया।

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