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वर्ल्ड हेल्थ डे विशेष: मोदी सरकार के 4 वर्ष कांग्रेस के 6 दशक पर भारी

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जन स्वास्थ्य को लेकर मोदी सरकार में जैसी चिंता देखी जा रही है, वैसी चिंता देशवासियों ने अपने लिए शायद ही पहले कभी किसी सरकार में देखी हो। यह सरकार प्रत्येक देशवासी के सेहतमंद होने को इसलिए जरूरी मानती है क्योंकि नागरिकों के स्वास्थ्य पर ही देश का भी स्वास्थ्य निर्भर करता है। आइए कुछ खास तथ्यों के साथ जानने की कोशिश करते हैं कि देशवासियों के स्वास्थ्य को लेकर मोदी सरकार और पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के रुख में किस तरह का फर्क नजर आता है।

स्वच्छता के प्रति हमेशा उदासीन थी कांग्रेस

लगभग छह दशक तक सत्ता में रही कांग्रेस हमेशा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के कदमों पर चलकर देश के विकास करने की बात करती रही। लेकिन किस तरह से बापू के कदमों पर चलने की उसकी बात में भी एक राजनीति थी, यह इसी से पता चलता है कि उसने स्वच्छता के प्रति हमेशा एक उदासीनता बरती। देश भर में स्वच्छता को लेकर जागरूकता का व्यापक प्रसार तब जाकर हुआ जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान छेड़ा। गौर करने वाली बात है कि 1947 से लेकर 2014 में मोदी सरकार के सत्ता संभालने तक करीब 67 वर्षों में देश भर के करीब 6.5 करोड़ घरों में शौचालय बने थे, जबकि मोदी सरकार में चार वर्षों से भी कम समय में 6.5 करोड़ घरों में शौचालय के निर्माण कर दिए गए। 

मोदी सरकार के 4 वर्ष कांग्रेस के छह दशक पर भारी

मोदी सरकार के स्वच्छ भारत अभियान में जिस तरह की जनभागीदारी उभरी वह अपने आपमें एक मिसाल है। इसका एक बड़ा और अच्छा नतीजा यह है कि ग्रामीण भारत में स्वच्छता की कवरेज अब 78 प्रतिशत तक जा पहुंची है। करीब चार साल पहले तक यह कवरेज महज 39 प्रतिशत थी। साफ है, मोदी सरकार द्वारा स्वच्छता अभियान के साथ ये संदेश देना प्रभावी रहा है कि स्वच्छता अपने आपमें कई बीमारियों को दूर रखने में सक्षम है।

कांग्रेस के पास न कार्यक्रम था, न नीति

जन स्वास्थ्य से जुड़ी योजनाएं महज एक मंत्रालय की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। कांग्रेस के समय में यही होता रहा कि हेल्थ केयर को अक्सर स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी माना जाता रहा। ऐसे में कारगर योजनाओं का अभाव तो रहा ही, जो भी योजनाएं थीं उन्हें लागू करने के लिए सही प्रक्रिया भी नहीं अपनाई जा सकी। आज स्वास्थ्य से जुड़े सभी अभियान और योजनाएं सफलतापूर्वक आगे बढ़ सकें, इसके लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ स्वच्छता मंत्रालय, आयुष मंत्रालय, रसायन व उर्वरक मंत्रालय, उपभोक्ता मंत्रालय और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के बीच बेहतरीन समन्वय बनाया है।

कांग्रेस बनी रही थी यथास्थिति की पोषक

स्वास्थ्य जैसे मसलों पर भी कांग्रेस यथास्थिति की पोषक बनी रही थी। यही वजह है जो उसे कभी उन गरीब मरीजों को भी राहत देने का ख्याल नहीं आया जो बेहद कीमती मेडिकल उपकरण और महंगी दवाएं खरीदने में सक्षम नहीं थे। इसके ठीक विपरीत मोदी सरकार अपनी नीतियों से उनकी सुध लेने हमेशा आगे आती दिखी है। इसका परिणाम ये है कि जन औषधि स्टोर्स पर सस्ती दरों पर दवाएं उपलब्ध हैं तो हृदय रोगियों को हार्ट स्टेंट अब 85 प्रतिशत तक कीमत पर मिलने लगे हैं। इतना ही नहीं घुटनों के implants की कीमत में भी 50 से 70 प्रतिशत तक की कमी आई है। दरअसल जन स्वास्थ्य को लेकर कांग्रेस जिस रवैये के साथ चलती रही, उसमें योग को जन आंदोलन बनाने या फिर राष्ट्रीय पोषण मिशन और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं की उत्पत्ति के बारे में सोचा ही नहीं जा सकता था।

कांग्रेस सोच ही नहीं सकती थी आयुष्मान भारत जैसी योजना 

पूर्ववर्ती यूपीए सरकार में शायद ही ऐसी कोई योजना कभी सामने आई हो जिसमें देश के हर नागरिक के बेहतर स्वास्थ्य का लक्ष्य केंद्रित रहा हो। जो पहल कांग्रेस अपने छह दशक के शासन में नहीं कर पाई उसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुआई वाली केंद्र सरकार ने अपने कार्यकाल के चौथे ही साल में करके दिखा दिया। हैरानी की बात है कि जन स्वास्थ्य से जुड़े इतने बड़े कार्यक्रम की प्रशंसा की बजाए विरोधी सिर्फ उन वजहों को ढूंढ़ने में जुटे हैं कि कैसे इस योजना पर अमल मुश्किल है। गौर करने वाली बात है कि 22 मार्च को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में सरकार आयुष्मान भारत को मिशन मोड पर चलाने और इसकी निगरानी के लिए आयुष्मान भारत राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा मिशन एजेंसी के गठन का भी फैसला कर चुकी है। योजना पर पहले दो वर्षों में 10,500 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।

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