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भारतीय राजनीति से ढल रहा है वंशवादी राजनीति का सूरज, नेहरू-गांधी परिवार ने थोपा था परिवारवाद, जनता का हुआ मोहभंग

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परिवारवाद और वंशवादी राजनीति पर लगातार प्रहार करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय राजनीति के समीकरण को बदल कर रख दिया है। आज देशभर में वंशवाद की राजनीति से जनता का मोहभंग हो रहा है। नेहरू-गांधी परिवार ने अपने 70 सालों के शासन में देश पर परिवारवाद को थोपने का काम किया और अपने को देश का ‘प्रथम परिवार’ के रूप में स्थापित किया। इसका बुरा असर यह हुआ कि कांग्रेस से टूटकर बने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी व तृणमूल कांग्रेस जैसे क्षेत्रीय दलों के साथ ही अन्य क्षेत्रीय पार्टियों ने भी परिवारवाद को अपनी पार्टी में स्थापित किया। केंद्र में नेहरू-गांधी परिवार को ‘प्रथम परिवार’ के रूप में स्थापित करने के क्रम में प्रदेश की राजनीति में भी यह फलती-फूलती रही और वहां भी वंशवादी राजनीति हावी होती चली गई। बिहार में लालू यादव, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह और मायावती, झारखंड में शिबू सोरेन, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, जम्मू-कश्मीर में फारुक अब्दुला और महबूबा मुफ्ती, आंध्र प्रदेश में वाईएसआर रेड्डी, तेलंगाना में केसीआर, महाराष्ट्र में शरद पवार और उद्धव ठाकरे, तमिलनाडु में एम.करुणानिधि आदि। यह फेहरिस्त लंबी है। इन सभी नेताओं ने अपनी पार्टी को कंपनी में बदल दिया और लगातार उनका इस पर कब्जा बना रहा। अगर देश की दो बड़ी पार्टियों कांग्रेस और भाजपा के वर्ष 1998 से अध्यक्ष पद पर आसीन व्यक्ति पर गौर करें तो परिवारवादी राजनीति और बिना परिवारवादी राजनीति का अंतर साफ दिख जाता है। पिछले 24 वर्षों से सोनिया गांधी या राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बने हुए हैं। वहीं भाजपा की बात करें तो कुशाभाउ ठाकरे से लेकर जेपी नड्डा तक 11 अध्यक्ष बने हैं। अगर कांग्रेस अध्यक्ष और उसके प्रधानमंत्री पद की बात की जाए तो आजादी के 70 साल में 53 साल तक इस परिवार का किसी न किसी या फिर दोनों पदों पर कब्जा रहा है।

क्षेत्रीय दलों में परिवारवाद

जम्मू-कश्मीर में मुफ्ती और अब्दुल्ला परिवार राज्य के प्रथम-परिवार बन गए। उत्तर प्रदेश में मुलायम और मायावती परिवार, बिहार में लालू यादव परिवार प्रथम-परिवार बन गए। इसी तरह कर्नाटक में देवगौड़ा परिवार, महाराष्ट्र में ठाकरे एवं पवार परिवार, तमिलनाडु में करुणानिधि परिवार, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी परिवार, तेलंगाना में केसीआर परिवार, आंध्र में नायडू एवं वाइएसआर परिवार ने अपनी-अपनी पार्टियों को पारिवारिक कंपनियों में बदल दिया। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की पार्टियों में ख़त्म होता लोकतंत्र आज देश के लिए सबसे बड़ी चिंताजनक बात है। पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र न होने और परिवारवाद की वजह से भ्रष्टाचार इन पार्टियों की सरकार में चरम पर है। पश्चिम बंगाल में ममता सरकार पर नियुक्तियों के मामले में एक के बाद भ्रष्टाचार के आरोप लगते जा रहे हैं। नियुक्ति में धांधली के कई मामलों में कलकत्ता हाई कोर्ट द्वारा सीबीआइ जांच के आदेश के बाद से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल असहज स्थिति में है। राज्य के पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी इस समय शिक्षक भर्ती घोटाले में जेल में हैं। इसके बाद ममता सरकार के एक और मंत्री पर कोयला घोटाले का आरोप लगा है और सीबीआई ने श्रम मंत्री मलय घटक के ठिकानों पर छापेमारी की है। कोयला घोटाले में ही ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी को ईडी ने तलब किया था। इसी तरह बिहार में लालू यादव के शासनकाल में चारा घोटाला से लेकर तमाम घोटाले सामने आए थे। उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार के दौरान उनके छोटे भाई आनंद कुमार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। क्षेत्रीय दलों में परिवारवाद की बात करें तो देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश ने वंशवादी राजनीति को पिछले विधानसभा चुनाव में नकार दिया था और समूचे देश के लिए एक बड़ा संकेत है। अब इसके बाद पश्चिम बंगाल की बारी है जहां भ्रष्टाचार की वजह से ममता का किला दिनों दिन ढहता जा रहा है। इससे लगता है कि अगले विधानसभा चुनाव में जनता ममता सरकार को उखाड़ फेंकेगी। वहीं बिहार में भी लोग जंगलराज और परिवारवाद त्रस्त आ चुके हैं और अगले विधानसभा चुनाव में राजद का वोट शेयर एवं सीटों की संख्या कम होने की बात कही जा रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में राजद को 23 फीसदी जबकि भाजपा को 19.5 पर्सेंट वोट मिले हैं।

गांधी परिवार: 2014 से लगातार पार्टी कर पराजय का सामना

देश के मौजूदा राजनीतिक हालात में कांग्रेस की स्थिति दिन प्रतिदिन खराब होती जा रही है। साल 2014 से लेकर अब तक देखें तो कांग्रेस और गांधी परिवार ने कई सियासी झटकों का सामना किया है। हालांकि, पार्टी को साल 2018 में तीन राज्यों में जीत मिल गई थी। हाल ही में 5 राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की स्थिति बदतर हुई है। यूपी चुनाव में प्रियंका गांधी वाड्रा के दम भरने के बावजूद पार्टी एक सीट पर सिमट गई। पंजाब की बात करें तो यहां भी पार्टी को आम आदमी पार्टी के हाथों बुरी तरह हार का समाना करना पड़ा। कांग्रेस की स्थिति का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि इस बार यूपी उपचुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया। दिल्ली विधानसभा उपचुनाव राजेंद्र नगर और पंजाब के संगरूर में तो पार्टी की जमानत जब्त हो गई। ये ऐसे दो राज्य हैं, जहां कभी कांग्रेस ने शासन किया है।

मुलायम परिवार: फूट से पार्टी हुई कमजोर

उत्तर प्रदेश की सियासत के दिग्गज खिलाड़ी माने जाने वाले मुलायम सिंह यादव का परिवार इन दिनों सियासी संकट से जूझ रहा है। यूपी के दिग्गज नेता और पिता मुलायम सिंह यादव से कमान हासिल करने के बाद अखिलेश यादव की पार्टी लगातार हार का सामना कर रही है। साल 2014, 2017, 2019 और 2022 में पार्टी लगातार पराजित हुई है। यूपी उपचुनाव में पार्टी ने आजमगढ़ और रामपुर जैसी सीटें गंवा दी। कहा गया कि अखिलेश यहां एक बार भी प्रचार के लिए नहीं पहुंचे। इसके पीछे कहीं न कहीं परिवारवाद का मुद्दा सामने आ रहा है।

बादल परिवार: सत्ता से जमानत जब्त तक

कभी एनडीए के साथ मिलकर पंजाब में शासन करने वाले बादल परिवार के नेतृत्व में शिरोमणि अकाली दल अब संकट से जूझ रहा है। परिवार और पार्टी के मुखिया प्रकाश सिंह बादल ने यहां एक दशक तक मुख्यमंत्री के तौर पर शासन किया। अब हाल ऐसे हुए कि संगरूर उपचुनाव में पार्टी अपनी जमानत भी नहीं बचा पाई। वहीं, विधानसभा चुनाव में विक्रम सिंह मजीठिया समेत कई बड़े नेताओं को हार का सामना करना पड़ा।

ठाकरे परिवार: शिवसेना में बगावत का एक कारण परिवारवाद भी

महाराष्ट्र के राजनीतिक संकट का एक सबक यह भी है कि आने वाले समय में परिवारवादी राजनीतिक दलों के लिए कठिनाई बढ़ने वाली है। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि शिवसेना में बगावत का एक कारण उद्धव ठाकरे की ओर से बेटे आदित्य ठाकरे को अपने वरिष्ठ नेताओं से कहीं अधिक प्राथमिकता देना भी रहा। परिवारवादी पार्टियों के नेताओं का सामंतवादी रवैया और रहन-सहन दूसरी पीढ़ी आते-आते आम लोगों को खटकने लगता है। बात इतनी ही होती तो शायद गनीमत होती, लेकिन मामला उससे आगे चला गया है।

नेहरू-गांधी परिवार ने देश पर थोपा था परिवारवाद

भारतीय राजनीति पर परिवारवाद थोपने का श्रेय नेहरू-गांधी परिवार को जाता है। कांग्रेस में जिस परिवारवाद का बीज गांधी परिवार ने बोया था, वह बीज कांग्रेस का जगह लेनी वाली तमाम क्षेत्रीय पार्टियों में वटवृक्ष बन गया। इस प्रकार परिवारवाद ने योग्‍यता और आंतरिक लोकतंत्र का अपहरण कर लिया। कांग्रेस के नेताओं ने सत्‍ता में बने रहने के लिए एक ही परिवार का गीत गाने में समय बिताया जिसका नतीजा यह हुआ कि देश का विकास प्रभावित हुआ। आजादी के 70 साल बाद देश में साक्षरता कार्यक्रम चल रहा है तो इसका श्रेय इसी चाटुकारी राजनीति को है। इसी तरह शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य, पेयजल, सड़क, बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं आम आदमी की पहुंच से दूर बनी रहीं। पार्टियों को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनाने की जो शुरूआत नेहरू-गांधी परिवार ने की, वह आज भी जारी है, लेकिन जनता ने अब इन्हें नकारने का मन बना लिया है।

परिवारवाद को बढ़ावा देने के लिए कांग्रेस के दिग्गज नेताओं की हुई उपेक्षा

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस में अर्से से एक ही परिवार का कब्जा है। नेहरू से लेकर उनकी पुत्री इंदिरा गांधी, फिर उनके पुत्र राजीव गांधी, फिर उनकी पत्नी सोनिया गांधी और पुत्र राहुल गांधी का परिवार ही कांग्रेस का नीति-नियंता है। सोनिया गांधी लंबे समय से पार्टी की मुखिया हैं। कांग्रेस ने वंशवाद की वजह से कई प्रतिभाशाली दिग्गज नेताओं की उपेक्षा की। सरदार पटेल से लेकर बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय, सुभाष चंद्र बोस और महात्मा गांधी सरीखे दिग्गजों ने कांग्रेस को एक आंदोलन के रूप में चलाया, लेकिन स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस ने उन्हें भुला दिया। इसी तरह स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस की सरकारों में जिस किसी नेता का कद ऊंचा होने लगता उसे बाहर का रास्ता दिखा जाता था।

डॉ राजेंद्र प्रसाद को मरणोपरांत भी नहीं दिया सम्मान

राष्ट्रपति पद से मुक्त होने के बाद डॉ राजेंद्र प्रसाद को पटना में कांग्रेस कार्यालय सदाकत आश्रम में रहना पड़ा था। हालात इतने बुरे थे कि उनके लिए टॉयलेट तक की व्यवस्था नहीं दी गई थी। जब सीलन भरे कमरे में रह रहे राजेंद्र बाबू को जय प्रकाश नारायण ने देखा तो उन्होंने कमरे की मरम्मत करवाई थी। सवाल उठता है कि क्या देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री संविधान सभा के पहले अध्यक्ष और पूर्व राष्ट्रपति के लिए एक रहने लायक मकान की व्यवस्था नहीं करवा सकते थे? इसके बाद 1963 में राजेंद्र बाबू का देहांत हो गया। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उनके निधन को प्राथमिकता नहीं दी और जयपुर जाने का कार्यक्रम बना लिया। इतना ही नहीं नेहरू ने राजस्थान के राज्यपाल संपूर्णानंद को भी राजेन्द्र बाबू की अंत्येष्टि में शामिल होने से रोका। दरअसल संपूर्णानंद राजेंद्र बाबू की अंतिम क्रिया में शामिल होने के लिए पटना जाना चाहते थे, लेकिन संपूर्णानंद ने नेहरू से कहा कि ये कैसे मुमकिन है कि देश का प्रधानमंत्री किसी राज्य में आए और उसका राज्यपाल वहां से गायब हो। आखिरकार डॉ संपूर्णालनंद को अपना पटना जाने का कार्यक्रम रद्द करना पड़ा। पंडित नेहरू ने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राधाकृष्णन को भी पटना नहीं जाने की सलाह दी थी। हालांकि डॉ राधाकृष्णन ने नेहरू की बात नहीं मानी और वे राजेन्द्र बाबू के अंतिम संस्कार में भाग लेने पटना पहुंचे। यह प्रकरण साफ करता है कि कांग्रेस पार्टी में बुजुर्गों को सम्मान देने का कैसा गौरवशाली इतिहास रहा है।

नरसिम्हा राव के शव को भी नहीं दे पाए सम्मान

बुजुर्गों के अपमान करने के काले अध्याय में एक अध्याय भूत पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव का भी है। 2004 में उनका देहांत दिल्ली में हुआ था, लेकिन उनके शव को कांग्रेस मुख्यालय में सिर्फ इसलिए नहीं रखने दिया गया क्योंकि उन्हें सोनिया गांधी नापसंद करती थीं। दरअसल दिल्ली हाई कोर्ट की ओर से बोफोर्स मामले को खारिज किए जाने के खिलाफ राव सरकार ने अपील कर दी थी। इससे सोनिया गांधी भड़क गईं थीं। उन्हें लगा था कि नरसिम्हा राव उन्हें जेल भिजवाना चाहते हैं। सोनिया गांधी को इस बात की भी खीझ थी कि बगैर उन्हें जानकारी में लिए बोफोर्स मसले पर सीबीआई से सीधे कैसे डील कर ली गई थी।

सीताराम केसरी को बेइज्जत कर सोनिया गांधी को बनाया अध्यक्ष

कांग्रेस के दिवंगत अध्यक्ष सीताराम केसरी पूरी जिंदगी ईमानदार रहे, लेकिन परिवारवाद की पोषक कांग्रेस के कारण इस दलित नेता को अपमान झेलना पड़ा। दरअसल 1997 में कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन के दौरान ही सोनिया गांधी पहली बार कांग्रेस पार्टी की साधारण सदस्य बनी। उस समय सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष थे। लेकिन सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनने की तीव्र इच्छा जाग गई। कांग्रेस पार्टी पर कब्जा करने की इतनी जल्दी थी कि सीताराम केसरी को बीच कार्यकाल से ही हटाना चाहती थीं, लेकिन सीताराम केसरी अपना पद नहीं छोड़ना चाहते थे। तब दिग्विजय सिंह, अहमद पटेल के साथ अन्य कई वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें अध्यक्ष पद से हटाने की साजिश रची। अध्यक्ष का कार्यकाल पूरा करने से तीन साल पहले ही कांग्रेस ने 80 साल के इस बुजुर्ग दलित नेता का अपमान किया।

प्रणब मुखर्जी की जगह मनमोहन सिंह को बनाया गया था प्रधानमंत्री

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की पुस्तक ”द कोलिशन इयर्स” में कई ऐसी बातें सामने आई हैं जो कांग्रेस पार्टी पर गांधी फैमिली के कब्जे की कहानी कहती हैं। प्रणब मुखर्जी ने अपनी इस पुस्तक में 2 जून, 2012 की बैठक को याद करते हुए अपना संस्मरण लिखा है। उन्होंने लिखा, ”बैठक में सोनिया गांधी से हुई बातचीत से उन्हें ऐसा लगा कि वो मनमोहन सिंह को यूपीए का राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाना चाहती हैं। मैंने सोचा कि अगर वो मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति उम्मीदवार चुनती हैं तो शायद मुझे प्रधानमंत्री के लिए चुनें। मैंने इस तरह की कुछ बातें सुनी थीं कि वो कुछ ऐसा सोच रही हैं। ”द कोलिशन इयर्स” की लॉन्चिंग के अवसर पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने गांधी फैमिली की ‘दादागिरी’ की पोल खोलते हुए कहा, ”प्रणबजी मेरे बहुत ही प्रतिष्ठित सहयोगी थे। इनके (मुखर्जी के) पास यह शिकायत करने के सभी कारण थे कि मेरे प्रधानमंत्री बनने की तुलना में वह इस पद (प्रधानमंत्री) के लिए अधिक योग्य हैं। पर वह इस बात को भी अच्छी तरह से जानते थे कि मेरे पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं था।” जाहिर है प्रणब मुखर्जी और मनमोहन सिंह जैसे कद्दावर नेताओं की ये बात साबित करती है कि पार्टी में एक मात्र सोनिया गांधी की ही चलती थी और वो जो तय करती थीं वही होता था।

देश में परिवारवाद ने संस्थाओं को काफी नुकसान पहुंचाया

देश में योग्यता पर प्रथम-परिवार को हावी रखने के लिए कांग्रेस को और कई चालें चलनी पड़ीं। पार्टी के प्रति प्रतिबद्ध नौकरशाही एवं न्यायपालिका, मैत्रीपूर्ण मीडिया, जातिगत राजनीति और अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के माध्यम से चुनाव जीतने जैसे हथकंडे कांग्रेस के राजनीतिक व्याकरण का हिस्सा बन गए। इस तरह कांग्रेस ने संस्थाओं पर भी हमला किया और उसे भी परिवारवाद के दायरे में लिया। इससे इन संस्थाओं को काफी नुकसान पहुंचा और वे देश के लिए विकास का काम करने की जगह भ्रष्टाचार का अड्डा बन गए। यहां तक सीबीआई और ईडी भी अपने काम सही तरीके से नहीं कर पा रहे थे। निरंतर हार के बाद भी नेहरू-गांधी परिवार पार्टी के शीर्ष पर बना रहा। 2017 में राहुल गांधी ने वैश्विक स्तर पर वंशवाद की राजनीति का खुलकर बचाव किया। उन्होंने कहा कि पूरा भारत राजवंशों पर चलता है और इसमें कोई हर्ज नहीं है।

परिवारवादी राजनीति की प्राथमिकता परिवार हित

परिवारवादी राजनीति की प्राथमिकता परिवार हित है। यहां राष्ट्रहित उपेक्षित होते हैं। चुनाव मुद्दा आधारित न रहकर दोषपूर्ण हो जाते हैं। इसके दोषी परिवारवादी दल ही होते हैं। संविधान सभा में 15 जून, 1949 के दिन पंडित हृदयनाथ कुंजरू ने कहा था कि दोषपूर्ण चुनाव से लोकतंत्र विषाक्त होगा।’ आमजन चुनाव में परिवार आधारित दलों की बढ़ती संख्या से निराश हैं। देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है। सभी स्तरों के सैकड़ों चुनाव हो गए हैं, लेकिन भारतीय जनतंत्र विचारनिष्ठ नहीं हुआ। दलों में आंतरिक लोकतंत्र नहीं बढ़ा। इससे लोकतंत्र की क्षति होती है।

राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र का विकास क्यों नहीं हुआ?

भारतीय राजनीति में व्यापक राजनीतिक सुधारों की आवश्यकता है। राजनीतिक दल हमारे लोकतंत्र का उपकरण हैं। मुख्य रूप से उनके दो कार्य क्षेत्र हैं। पहला विचारधारा के अनुसार आमजनों का राजनीतिक शिक्षण, विचारधारा का प्रचार, जनसंगठन और जन आंदोलन जैसे अभियानों का संचालन। दूसरा संसद और विधानमंडलों में मर्यादित बहसों के माध्यम से राष्ट्रहित का संवर्धन। हमारा दलतंत्र दोनों ही कर्तव्यों में असफल हुआ है। मूलभूत प्रश्न है कि दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र का विकास क्यों नहीं हुआ? राजनीतिक दलों में आजीवन अध्यक्ष क्यों हैं। उनके निधन पर पुत्र और पुत्री ही राष्ट्रीय अध्यक्ष क्यों बनते हैं? पार्टियां प्राइवेट प्रापर्टी क्यों है? ऐसे प्रश्न राष्ट्रीय बेचैनी हैं।

पीएम मोदी के सत्ता में आने के बाद परिवारवाद का सूरज ढलने लगा

वर्ष 2014 में पीएम मोदी के सत्ता में आने के साथ देश से वंशवाद की राजनीति का सूरज अस्त होना प्रारंभ हो गया है। मोदी के कुशल नेतृत्व, भ्रष्टाचार रहित और जन-केंद्रित शासन ने जाति और तुष्टीकरण की राजनीति पर जीत हासिल करनी शुरू कर दी है। वंशवाद की राजनीति का मुकाबला करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने कई राजनीतिक और शासन संबंधी प्रयोग भी किए हैं। भ्रष्टाचार रोकने के लिए जनकल्याणकारी योजनाओं को जनधन-आधार-मोबाइल से जोड़ा। इंटरनेट मीडिया के जरिये सीधे मतदाताओं तक पहुंचना शुरू कर दिया। आज मोदी ने वंशवाद की राजनीति के पैरोकारों को राजनीति को पूर्णकालिक काम की तरह मानने पर बाध्य कर दिया है। कुल मिलाकर मोदी युग में वंशवाद की राजनीति का अंत भी शुरू हो गया है।

कांग्रेस और भाजपा के 19 वर्षों की तुलना

19 वर्षों में जहां कांग्रेस इंदिरा गांधी की विदेशी बहू सोनिया गांधी के अलावा किसी को नहीं ढूंढ पाई। 1998 के बाद से लगातार सोनिया गांधी निर्विरोध तरीके से कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष बनी रहीं। वहीं दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी की बात करें तो पिछले 19 वर्षों में भाजपा के 9 अध्यक्ष बन चुके हैं। कांग्रेस में जहां आंतरिक लोकतंत्र कहीं दिखाई नहीं देता वहीं भाजपा में हर दो तीन साल में लोकतांत्रिक तरीके से अध्यक्ष बदला जाता रहा है। नीचे दिए गए आंकड़े इसे समझने के लिए काफी हैं।

देश आजाद हुआ या नेहरू-गांधी परिवार का गुलाम बना

नेहरू-गांधी परिवार की स्थिति भारतीय लोकतंत्र का मजाक उड़ाने के लिए काफी है। आजादी के बाद से ही देश की सत्ता और कांग्रेस पार्टी पर इस परिवार का कब्जा रहा है। 69 साल में 48 साल तक इस परिवार ने राज किया, 38 साल सीधे-सीधे और 10 साल तक मनमोहन सरकार की डुगडुगी अपने पास रखी।

परिवार की लगातार तीन पीढ़ियां देश की सत्ता पर काबिज

जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री के पद पर काबिज रहे। जबकि यूपीए सरकार के समय भी सत्ता की कमान सीधे-सीधे राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी के पास रहीं। कांग्रेस की बुरी हार के बाद भी राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष हैं। इसके अलावा राजीव गांधी के भाई संजय गांधी हों या राहुल गांधी की बहन प्रियंका गांधी और उनके पति रॉबर्ट वाड्रा, कांग्रेस पार्टी के भीतर इनके कद का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। अगर वाड्रा पर आरोप भी लगते हैं तो पूरी कांग्रेस पार्टी विधवा विलाप करने लग जाती हैं।

गांधी-नेहरू परिवार के नाम पर चल रही है 600 से ज्यादा सरकारी योजनाएं

एक आरटीआई के जवाब में मिली सूचना के मुताबिक देशभर मं जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नाम पर 600 से ज्यादा योजना, संस्थान, स्थल, म्यूजियम, ट्रॉफी या स्कॉलरशिप हैं। इनके नाम से मोदी सरकार के साढ़े 4 साल और विभिन्न राज्यों की बीजेपी सरकारों के दौर में भी कोई छेड़छाड़ नहीं की गई हैं।

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