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कांग्रेस की ‘खूनी सियासत’: मुसलमान ही नहीं, हिंदू और सिखों के रक्त से भी रंगे हैं ‘हाथ’!

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कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और यूपीए सरकार के विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने कबूल किया है कि कांग्रेस के हाथ मुसलमानों के खून से रंगे हुए हैं। उन्होंने कहा कि इस देश में कांग्रेस के राज में ही सबसे ज्यादा और दंगे हुए हैं जिसमें अधिकतर मुसलमानों का कत्लेआम हुआ।

सलमान खुर्शीद ने खुलेआम उस सच को कबूला है जिसे आज तक देश से छिपाया जाता रहा है। सलमान खुर्शीद ने कांग्रेस में रहते हुए जिस साहस के साथ सच को स्वीकार किया इसके लिए उन्हें सलाम। हालांकि उन्होंने अब भी पूरा सच नहीं कहा है, क्योंकि कांग्रेस के हाथ सिर्फ मुसलमानों के ही नहीं, बल्कि हिंदुओं और सिखों के खून से भी रंगे हुए हैं।

सलमान खुर्शीद ने खोल दिया कांग्रेस का कच्चा चिट्ठा
देश के इतिहास में जितने दंगे हुए हैं उसमें कांग्रेस की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। देश के 11 सबसे बड़े दंगों का इतिहास देखें तो इनमें से 10 कांग्रेस के शासन वाले राज्यों में हुए हैं। दरअसल कांग्रेस ने मुसलमानों और अल्पसंख्यकों के भीतर भारतीय जनता पार्टी का डर बिठाकर उसे किस तरह राजनीति में मोहरे की तरह इस्तेमाल किया गया, यह भी हर कोई जानता है। देश के मुसलमान भी इस को अच्छी तरह से जानते हैं, लेकिन अब सलमान खुर्शीद ने इसे अपनी जुबान से कबूल कर लिया है। जाहिर है सवाल उठ रहा है कि क्या इस कबूलनामे के बाद सोनिया गांधी और राहुल गांधी देश से माफी मांगेंगे?

कश्मीर में हिंदुओं के नरसंहार के लिए कांग्रेस जिम्मेदार
1986 में हिंदुओं का नरसंहार किया गया। मंदिरों को तोड़ा गया, हिंदू महिलाओं की इज्जत से खिलवाड़ किया गया। उस समय केंद्र में कांग्रेस की ही सरकार थी, लेकिन उसने जान बूझकर आंखें मूंदे रखी। कांग्रेस ने हिंदुओं के कत्लेआम करने की खुली छूट दे रखी थी। दो हजार से अधिक लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया और 4 लाख 50 हजार से अधिक कश्मीरी हिंदुओं को अपना घर-बार छोड़ना पड़ा। कांग्रेस का हिंदुओं से नफरत इस स्तर पर है कि दंगा करने वालों के खिलाफ मुकदमा तक चलाने में बेरूखी दिखाई। विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं को न तो मुआवजा दिया गया और न ही उन्हें दोबारा कश्मीर में बसाने के लिए कोई नीति ही बनाई गई।

देश में सिखों के नरसंहार की कांग्रेस ने रची थी साजिश
इतिहास गवाह है कि कांग्रेस पार्टी ने सत्ता पर काबिज रहने के लिए हमेशा वोटबैंक, तुष्टिकरण और सांप्रदायिकता को बढ़ाने की राजनीति की है। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्‍या के बाद दिल्‍ली में सिख विरोधी दंगे हुए थे। इसमें पांच हजार से अधिक सिखों को मौत के घाट उतार दिया गया। ये दंगा भी कांग्रेस प्रायोजित था और पार्टी के कद्दावर लीडर जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार सरीखे नेताओं पर दंगे की अगुआई करने के आरोप हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांंधी ने ये कहकर लोगों की भावनाएं भड़काई थीं कि- जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी हिलती है।  हालांकि यह क्रूर सत्य है कि आज तक न तो एक भी दंगाई को सजा हुई और न ही दंगा प्रायोजित करने वालों के विरुद्ध पुख्ता सबूत ही पेश किए जा सके।

बंटवारे के वक्त भी हिंदुओं के नरसंहार में कांग्रेस का हाथ
स्वतंत्रता प्राप्ति के वक्त हुए दंगों में 30 लाख हिंदुओं का कत्ल करवाने की दोषी कांग्रेस ही है। दरअसल कांग्रेस ने सत्ता की कुर्सी पाने के लिए धर्म की आड़ में ये सब किया। कलकत्ता दंगे में ही करीब एक लाख से अधिक हिंदुओं का नरसंहार किया गया। इसके बाद 1948 में हैदराबाद में निजाम की सेना ने हिंदुओं पर जुल्म ढाए गए। हिंदू महिलाओं की अस्मत को तार-तार किया जाता रहा। बावजूद इसके तत्‍कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू मूकदर्शक बनकर देखते रहे, क्‍योंकि इसमें उनका राजनीतिक हित जुड़ा था।

ईसाई मिशनरियों के बढ़ावे में कांग्रेस का हाथ
कांग्रेस ने ईसाई जनसंख्या को बढ़ाने के लिए ईसाई प्रचारकों को सुविधाएं देने के साथ हिंदुओं के विरुद्ध साजिशें भी रची हैं। दक्षिण भारत में बेरोक-टोक ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए ही वेटिकन के इशारे पर शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को साजिश के तहत गिरफ्तार करवाया गया। दरअसल राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल से ही सोनिया गांधी ने पूर्वोत्तर में ईसाई मिशनरियों के फैलने में मदद की जिसने उन क्षेत्रों में आबादी का संतुलन ही बिगाड़ दिया। आज मेघालय में 75 प्रतिशत, मिजोरम में 87 प्रतिशत, नागालैंड में 90 प्रतिशत ईसाई आबादी हो गई है।

कांग्रेस के नेताओं ने देश ही नहीं, दिल भी बांट दिया
कांग्रेस ने न सिर्फ देश को बांटा है, बल्कि धार्मिक आधार पर भेदभाव करने और हिंदुओं को जातियों में बांटकर रखने की भी दोषी है। 1971 में पूर्वी पाकिस्‍तान में लाखों हिंदुओं के कत्‍लेआम और महिलाओं के बलात्कार को इंदिरा गांधी ने ब्‍लैक आउट करा दिया था। मतलब साफ था कि हिंदुओं को एकजुट होने से रोको और मुसलमानों के एकमुश्‍त वोट के बल पर सत्‍ता हासिल करो।

इसी तरह 1969 में अहमदाबाद में भीषण सांप्रदायिक दंगा कांग्रेस के मुख्यमंत्री हितेंद्र भाई देसाई के समय हुआ। इसके बाद 1985, 1987, 1990 और 1992 में अहमदाबाद में भीषण सांप्रदायिक दंगे हुए और इन दंगों के दौरान गुजरात की बागडोर कांग्रेसी मुख्‍यमंत्रियों के हाथ में रही। इसके बावजूद न तो दंगाइयों को सजा मिली और न ही दंगा पीड़ितों को इंसाफ।

 

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