7 अक्टूबर 2001 को जब नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री का दायित्व संभाला था, तब राज्य 26 जनवरी 2001 के विनाशकारी भुज भूकंप के मलबे और आंसुओं में डूबा हुआ था। उस अभूतपूर्व मानवीय त्रासदी के बीच उन्होंने न केवल कच्छ को अपने पैरों पर खड़ा किया, बल्कि आपदा प्रबंधन की एक ऐसी वैज्ञानिक और संस्थागत कार्यसंस्कृति की नींव रखी, जिसने बीते 25 वर्षों में भारत की वैश्विक पहचान बदल दी। पूर्ववर्ती सरकारों के दौर में जहां प्राकृतिक आपदाएं बेबसी, व्यापक जनहानि और राहत सामग्री के घोटालों का पर्याय मानी जाती थीं, वहीं नरेंद्र मोदी के विजन ने भारत को ‘आपदा पीड़ित’ देश की छवि से निकालकर दुनिया के सबसे सक्षम ‘जीरो कैजुअल्टी’ और ‘ग्लोबल फर्स्ट रेस्पॉन्डर’ राष्ट्र में तब्दील कर दिया है।
भुज का पुनर्निर्माण: मलबे से निकलकर देश का सबसे तेजी से बढ़ता औद्योगिक हब बना कच्छ
वर्ष 2001 के भूकंप में 13,000 से अधिक नागरिकों की असमय मृत्यु हुई थी और लाखों मकान जमींदोज हो गए थे। पद संभालते ही नरेंद्र मोदी ने पारंपरिक तदर्थ राहत के स्थान पर ‘बिल्ड बैक बेटर’ की दूरगामी नीति लागू की। भूकंप-रोधी टाउन प्लानिंग, वैज्ञानिक पुनर्वास और विशेष टैक्स इंसेंटिव पैकेज के माध्यम से कच्छ को देश के बड़े औद्योगिक और पर्यटन केंद्र में बदल दिया गया। जिस जिले से लोग पलायन कर रहे थे, वहां रिकॉर्ड समय में बड़े सीमेंट, स्टील और टेक्सटाइल प्लांट्स स्थापित हुए और ‘रण उत्सव’ ने वैश्विक पटल पर पहचान बनाई। इस उत्कृष्ट पुनर्निर्माण मॉडल के लिए संयुक्त राष्ट्र ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले गुजरात राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (GSDMA) को प्रतिष्ठित ‘सासाकावा पुरस्कार’ से सम्मानित किया।
फ़्लैशबैक — 15 दिसंबर 2002
यहीं से वंशवादी कांग्रेस के पतन की असली शुरुआत हुई!नरेंद्र दामोदरदास मोदी 🔥
26 जनवरी 2001 — भुज में विनाशकारी भूकंप।
करीब 20,000 मौतें, 1.66 लाख+ घायल, 4 लाख+ इमारतें ध्वस्त।उस समय नरेंद्र मोदी जी, जो तब तक नगरसेवक भी नहीं थे, को पुनर्वास की ज़िम्मेदारी सौंपी गई।
उनकी संगठन क्षमता और सुपर मैनेजमेंट स्किल्स ने सबको चौंका दिया — विश्व बैंक तक प्रभावित हुआ।यहीं से नेतृत्व की पहचान बनी।
7 अक्टूबर 2001 — मोदी जी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।
ध्यान देने वाली बात: वे तब भी विधायक नहीं थे।24 फरवरी 2002 — मोदी जी ने अपना पहला विधानसभा चुनाव जीतकर विधायक बने।
यहीं से शुरू हुआ
प्रदर्शन और विकास का युग।दिसंबर 2002 — मोदी जी के नेतृत्व में बीजेपी ने गुजरात विधानसभा चुनाव लड़ा।
मुख्यमंत्री के रूप में यह उनकी पहली चुनावी परीक्षा थी।12 दिसंबर 2002 —
बीजेपी की ऐतिहासिक जीत:
182 में से 127 सीटें (49.85% वोट शेयर)
कांग्रेस सिमटकर रह गई:
सिर्फ 51 सीटें (39.28% वोट शेयर)15 दिसंबर 2002 —
मोदी जी ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली,
इस बार जनता की कसौटी पर खरा उतरकर।यह सिर्फ मोदी जी की जीत नहीं थी,
यह सुशासन की जीत थी।15 दिसंबर
जनता के विश्वास का प्रतीक है,
और उस यात्रा की शुरुआत है
जिसने भारत की राजनीति की दिशा बदल दी।पहली बार भारत में यह साबित हुआ कि
चुनाव विकास और सुशासन के मॉडल पर भी जीते जा सकते हैं,
और कांग्रेस के तुष्टिकरण मॉडल को इतिहास के कूड़ेदान में फेंका जा सकता है।The Saga Continues… 🇮🇳🔥
— 🇮🇳Jitendra pratap singh🇮🇳 (@jpsin1) December 16, 2025
स्मृति वन और वीर बालक स्मारक: 470 एकड़ में बना यूनेस्को सम्मानित दुनिया का सबसे बड़ा भूकंप संग्रहालय
त्रासदी की पीड़ा को शक्ति और भावी पीढ़ियों के लिए जागरूकता में बदलने की अनूठी मिसाल कच्छ में देखने को मिलती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भुज के भुजियो डूंगर पर 470 एकड़ क्षेत्र में विश्वस्तरीय ‘स्मृति वन भूकंप मेमोरियल एवं संग्रहालय’ का निर्माण कराया। भूकंप में जान गंवाने वाले प्रत्येक नागरिक के नाम पर पौधरोपण किया गया और 50 चेक डैम बनाए गए। इस मेमोरियल को यूनेस्को के प्रतिष्ठित ‘प्रिक्स वर्सेल्स’ द्वारा दुनिया के सबसे खूबसूरत संग्रहालयों की सूची में शामिल किया गया। इसके साथ ही अंजार में 185 स्कूली बच्चों और 20 शिक्षकों की स्मृति में ‘वीर बालक स्मारक’ स्थापित कर यह संदेश दिया गया कि आपदा प्रबंधन केवल राहत तक सीमित नहीं, बल्कि यह जन-संवेदना और निरंतर सतर्कता का राष्ट्रीय संकल्प है।
गुजरात के कच्छ में स्थित स्मृतिवन को यूनेस्को द्वारा प्रतिवर्ष दिए जाने वाले प्रतिष्ठित ‘Prix Versaillesa award’ से सम्मानित किया गया है।
भूकंप की तबाही से लेकर दुनिया के खूबसूरत संग्रहालयों में शामिल होने वाला स्मृतिवन कच्छ के लोगों औऱ ‘नरेंद्र दामोदर दास मोदी भाई’ के समर्पण की कहानी कह रहा है-
— The Pamphlet (@Pamphlet_in) December 4, 2024
देश का पहला आपदा प्रबंधन कानून: गुजरात के जीएसडीएमए मॉडल ने तैयार की एनडीएमए की राष्ट्रीय नींव
गुजरात से पहले देश में आपदा प्रबंधन का अर्थ केवल घटना घटने के बाद तिरपाल और सूखा राशन बांटने तक सीमित था। नरेंद्र मोदी ने इस सोच को बदलते हुए वर्ष 2003 में देश का पहला राज्य स्तरीय आपदा प्रबंधन कानून पारित कराया और गुजरात राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (GSDMA) की स्थापना की। उन्होंने आपदा से निपटने के लिए राहत-केंद्रित रवैये को बदलकर पूर्व-तैयारी (प्रिपेयर्डनेस) और जोखिम न्यूनीकरण (मिटिगेशन) को मुख्यधारा में शामिल किया। यही गुजरात मॉडल आगे चलकर वर्ष 2005 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और केंद्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम का आधार बना।
आपदा प्रबंधन संशोधन विधेयक: राष्ट्रीय स्तर पर डिजिटल आपदा डेटाबेस और वैधानिक अर्बन अथॉरिटी
वर्ष 2005 के केंद्रीय कानून को समकालीन चुनौतियों के अनुरूप ढालने के लिए मोदी सरकार ने संसद में आपदा प्रबंधन (संशोधन) विधेयक पेश किया। इस नए विधायी ढांचे के तहत राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर एक केंद्रीकृत ‘डिजिटल डिजास्टर डेटाबेस’ स्थापित किया जा रहा है। इसके साथ ही बड़े शहरों में बाढ़ और जलवायु संकट से सीधे निपटने के लिए वैधानिक ‘अर्बन डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी’ (UDMA) के गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ है। यह सुधार देश के इमरजेंसी रिस्पॉन्स सेंटरों को कानूनी शक्ति प्रदान कर आपदा प्रबंधन को संस्थागत सुशासन का अनिवार्य अंग बनाता है।
डैम सेफ्टी एक्ट और राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण: 6,500 से अधिक बड़े बांधों की डिजिटल निगरानी
बांध टूटने या बिना पूर्व चेतावनी भारी जल निकासी से आने वाली मानवनिर्मित बाढ़ पर स्थायी रोक लगाने के लिए मोदी सरकार ने दशकों से लंबित ‘डैम सेफ्टी एक्ट’ को संसद से पारित कराकर लागू किया। इसके तहत राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण (NDSA) का गठन किया गया, जो देश के 6,500 से अधिक बड़े बांधों का नियमित सुरक्षा ऑडिट करता है। सभी प्रमुख बांधों के लिए रियल-टाइम इनफ्लो पूर्वानुमान और इमरजेंसी एक्शन प्लान (EAP) अनिवार्य बनाए गए हैं, जिससे बांधों के निचले रिहाइशी इलाकों को अचानक होने वाले जल प्रलय से सुरक्षा कवच मिला है।
50 साल पुराने बांध, दशकों की अनदेखी, और एक सरकार जिसने कहा, “अब और नहीं।”
मोदी सरकार ने इसे संकट बनने से पहले ही समाधान में बदल दिया, और दुनिया के सबसे बड़े बांध पुनर्वास कार्यक्रमों में से एक DRIP (Dam Rehabilitation and Improvement Programme) को मिशन मोड में आगे बढ़ाया।
बांध सुरक्षा अधिनियम और डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम के जरिए अब इन बांधों को सुरक्षित, आधुनिक और भविष्य के लिए तैयार किया जा रहा है। ये प्रयास भारत की जल सुरक्षा, कृषि और ऊर्जा के भविष्य को सशक्त बना रहे हैं।
क्योंकि मोदी सरकार के लिए विकास सिर्फ नई योजनाएं बनाना नहीं, बल्कि पुरानी जिम्मेदारियां निभाना भी है।
— BJP (@BJP4India) June 5, 2026
15वें वित्त आयोग में 1.6 लाख करोड़ रुपये का आवंटन: पहली बार बना अलग राष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण कोष (NDMF)
दशकों तक देश में केवल आपदा आने के बाद राहत बांटने के लिए बजट दिया जाता था, आपदा को रोकने या उसके प्रभाव को कम करने के लिए कोई अलग कोष नहीं था। प्रधानमंत्री मोदी की पहल पर 15वें वित्त आयोग ने आपदा प्रबंधन के वित्तपोषण का ऐतिहासिक पुनर्गठन किया। वर्ष 2021 से 2026 की अवधि के लिए राज्य और राष्ट्रीय आपदा मोचन एवं न्यूनीकरण कोष के तहत 1.6 लाख करोड़ रुपये से अधिक का रिकॉर्ड आवंटन किया गया। पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर ‘राष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण कोष’ (NDMF) और राज्यों में ‘राज्य आपदा न्यूनीकरण कोष’ (SDMF) का गठन किया गया, जिससे बांधों की सुरक्षा, भूस्खलन रोकने और तटीय सुरक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए अग्रिम बजट सुनिश्चित हुआ।
एसडीआरएफ का आधुनिकीकरण और अग्रिम केंद्रीय सहायता: राज्यों की त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता का विस्तार
राज्यों को आपदा राहत के लिए केंद्र के वित्तीय चक्कर लगाने की पुरानी परिपाटी को मोदी सरकार ने समाप्त किया। केंद्र सरकार ने राज्य आपदा मोचन कोष (SDRF) में सामान्य राज्यों के लिए 75 प्रतिशत और पूर्वोत्तर व हिमालयी राज्यों के लिए 90 प्रतिशत का केंद्रीय अंशदान बिना किसी विलंब के प्रतिवर्ष दो अग्रिम किस्तों में जारी करने का पारदर्शी नियम बनाया। इसके साथ ही एनडीआरएफ की तर्ज पर सभी राज्यों में समर्पित और सुसज्जित स्टेट डिजास्टर रिस्पॉन्स फोर्स (SDRF) बटालियनों की स्थापना कराई गई, जिससे किसी भी स्थानीय आपात स्थिति में राज्य प्रशासन पहले 15 से 20 मिनट में पूरी ताकत से राहत कार्य शुरू कर सके।
पंचायती राज स्तर तक आपदा प्रबंधन: 81 संवेदनशील जिलों में बॉटम-अप गवर्नेंस मॉडल
आपदा प्रबंधन को राजधानी और जिला मुख्यालयों से निकालकर सीधे ग्राम पंचायतों तक पहुंचाने के लिए 507 करोड़ रुपये से अधिक की राष्ट्रीय परियोजना लागू की गई। 20 राज्यों के 81 अति-संवेदनशील जिलों में ग्राम पंचायतों को स्थानीय स्तर पर आपदा शमन, प्रारंभिक चेतावनी और रेस्क्यू प्लानिंग के वित्तीय व प्रशासनिक अधिकार दिए गए हैं। पंचायत स्तर पर आपदा प्रबंधन समितियों का गठन कर स्थानीय ग्रामीणों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में भागीदार बनाया गया है, जिससे आपदा के समय सबसे निचली प्रशासनिक इकाई स्वतंत्र रूप से तुरंत राहत कार्य शुरू कर पाती है।
नेशनल साइक्लोन रिस्क मिटिगेशन प्रोजेक्ट: 8 तटीय राज्यों में 3,000 से अधिक शेल्टर और अंडरग्राउंड केबलिंग
समुद्र तटीय क्षेत्रों को तूफानों की मार से स्थायी सुरक्षा देने के लिए मोदी सरकार ने ‘नेशनल साइक्लोन रिस्क मिटिगेशन प्रोजेक्ट’ (NCRMP) को मिशन मोड में पूरा किया। ओडिशा, आंध्र प्रदेश, गुजरात, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल सहित 8 प्रमुख तटीय राज्यों में 3,000 से अधिक मजबूत बहुउद्देश्यीय चक्रवात आश्रय स्थलों (MPCS) का निर्माण किया गया। चक्रवातों के दौरान बिजली गुल होने और संचार ठप होने से बचाने के लिए संवेदनशील तटीय शहरों में हजारों किलोमीटर भूमिगत बिजली केबलिंग नेटवर्क बिछाया गया और तटीय बांधों को मजबूत कर समुद्री जल के रिहाइशी इलाकों में प्रवेश को रोका गया।
‘मिष्टी’ योजना से तटीय बायो-शील्ड: 5,400 वर्ग किमी में मैंग्रोव सुरक्षा दीवार से थमी तूफानी लहरें
कंक्रीट के निर्माण के साथ-साथ प्राकृतिक सुरक्षा तंत्र विकसित करने के विजन के तहत मोदी सरकार ने ‘मिष्टी’ (MISHTI) योजना लागू की। इसके जरिए देश के 5,400 वर्ग किलोमीटर से अधिक तटीय क्षेत्रों में मैंग्रोव वनों का सघन रोपण और संरक्षण किया गया। मैंग्रोव वन चक्रवात और सुनामी की विनाशकारी समुद्री लहरों की गति को 60 प्रतिशत तक कम कर देते हैं। इस प्राकृतिक रक्षा दीवार (बायो-शील्ड) ने तटीय कटाव को रोका है और हजारों मछुआरा बस्तियों को तूफानी लहरों के सीधे प्रहार से बचाकर पारिस्थितिकी और मानव सुरक्षा का संतुलन स्थापित किया है।
पहले माना जाता था कि भारत की समुद्री तट रेखा करीब 7000 किमी है लेकिन अब सभी क्रीक वगैरह को मिला कर समुद्री तट रेखा 10,000 किमी से ज्यादा मानी गई है.
इन इलाकों में मैंग्रोव फॉरेस्ट लगाने के लिए ‘मिष्टी’ (MISHTI – Mangrove Initiative for Shoreline Habitats & Tangible) योजना चलाई जा रही है. इसके तहत 540 वर्ग किमी क्षेत्र में 9 तटीय राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों में काम किया जा रहा है.”
#RajyaSabha में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री @byadavbjp का वक्तव्य.
— SansadTV (@sansad_tv) March 10, 2026
बिपरजॉय से लेकर दाना तक: ‘जीरो कैजुअल्टी’ बना भारत का नया राष्ट्रीय सुरक्षा मानक
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद चक्रवातों और तूफानों से निपटने की कार्यप्रणाली में ऐतिहासिक बदलाव आया। 1999 के ओडिशा सुपर साइक्लोन में जहां 10,000 से अधिक लोगों की दुखद मृत्यु हुई थी, वहीं मोदी सरकार के नेतृत्व में ‘जीरो कैजुअल्टी’ (शून्य जनहानि) को अनिवार्य राष्ट्रीय मानक बनाया गया। गुजरात के तट से टकराए अत्यंत तीव्र चक्रवात ‘बिपरजॉय’ के दौरान सटीक उपग्रह ट्रैकिंग के जरिए रिकॉर्ड 48 घंटों में 1 लाख से अधिक नागरिकों और हजारों मवेशियों को सुरक्षित आश्रय स्थलों में पहुंचाया गया। हालिया चक्रवातों में भी आधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम और त्वरित प्रशासनिक समन्वय के बल पर जनहानि को शून्य के स्तर पर सीमित रखा गया।
#VandeBharat: हिमालय में भूस्खलन और ग्लेशियर झीलों से पैदा होने वाले खतरे के बीच IIT मंडी के शोधकर्ता AI, IoT और सेंसर तकनीक के जरिए आपदा प्रबंधन को मजबूत बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं, लो-कॉस्ट लैंडस्लाइड अर्ली वार्निंग सिस्टम संभावित भूस्खलन से करीब 3 घंटे पहले तक चेतावनी देने में सक्षम है, जबकि इसे भविष्य में 24–48 घंटे पहले अलर्ट देने के लिए विकसित करने के प्रयास जारी हैं
समय रहते चेतावनी, बेहतर तैयारी और त्वरित कार्रवाई से प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती है
#IITMandi #ArtificialIntelligence #EarlyWarningSystem #DisasterManagement #HimachalPradesh #LandslideAlert #ClimateChange #TechnologyForGood #VandeBharatonDD— डीडी न्यूज़ (@DDNewsHindi) October 10, 2026
ड्रोन और एआई से त्वरित क्षति आकलन: कागजी सर्वे खत्म, 72 घंटों में मिला बीमा और मुआवजा
आपदा के बाद पीड़ितों को सरकारी सहायता मिलने में महीनों लगने वाली भ्रष्ट और धीमी व्यवस्था को तकनीक ने बदल दिया है। मोदी सरकार ने आपदा ग्रस्त इलाकों में क्षति आकलन के लिए ड्रोन फ्लीट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग अनिवार्य किया। बाढ़ या तूफान थमते ही ड्रोन कैमरों से क्षतिग्रस्त मकानों, सड़कों और जलमग्न फसलों की 3D मैपिंग की जाती है। एआई आधारित डेटा से बिना किसी मानवीय पक्षपात या बिचौलियों के नुकसान का सटीक आकलन होता है, जिससे प्रधानमंत्री फसल बीमा और राहत सहायता राशि सीधे पीड़ितों के बैंक खातों में 72 घंटों के भीतर पहुंचना संभव हुआ है।
मिशन मौसम और मल्टी-हजार्ड डिसीजन सपोर्ट सिस्टम: ब्लॉक और गांव स्तर पर सटीक पूर्वानुमान
मौसम की सटीक भविष्यवाणी और त्वरित निर्णय लेने के लिए केंद्र सरकार ने 2,000 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ ‘मिशन मौसम’ की शुरुआत की। मौसम विभाग (IMD) और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने मल्टी-हजार्ड अर्ली वार्निंग डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (MHEW-DSS) विकसित किया है। इसके जरिए चक्रवात के लैंडफॉल का दायरा और समय सटीकता से पता चलने से बचाव अभियानों की लागत और समय में भारी कमी आई है। ‘मौसमग्राम’ जैसे हाइपर-लोकल डिजिटल टूल्स के माध्यम से देश भर के किसानों और आम नागरिकों को ब्लॉक व ग्राम पंचायत स्तर पर घंटों पहले सटीक मौसम चेतावनी मिल रही है।
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की ‘डीप ओशन मिशन’ योजना के माध्यम से भारत महासागर की गहराइयों में उतरकर नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। वहीं, मिशन मौसम के जरिए देश में सटीक एवं आधुनिक मौसम पूर्वानुमान प्रणाली को स्मार्ट बनाने के विज़न को साकार किया जा रहा है।
आइए, इस वीडियो के माध्यम से जानें पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की प्रमुख और दूरदर्शी योजनाओं के बारे में …👇🏻
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— MoES GoI (@moesgoi) February 16, 2026
इसरो का भुवन पोर्टल और स्पेस टेक्नोलॉजी: उपग्रहों से रियल-टाइम आपदा मैपिंग और जीपीएस नेविगेशन
आपदा के समय राहत टीमों को सटीक जमीनी जानकारी उपलब्ध कराने के लिए इसरो (ISRO) और राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) का ‘भुवन’ जियो-पोर्टल गेम-चेंजर साबित हुआ है। नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट सपोर्ट प्रोग्राम (NDMSP) के तहत भारत के अर्थ ऑब्जर्वेशन उपग्रह बाढ़, चक्रवात और भूस्खलन के दौरान जलभराव के नक्शे कुछ ही घंटों में तैयार कर देते हैं। इस उपग्रह डेटा से यह स्पष्ट हो जाता है कि कौन सा गांव या सड़क संपर्क से कटा हुआ है, जिससे एनडीआरएफ और वायुसेना के हेलिकॉप्टरों को राहत सामग्री गिराने और लोगों को निकालने के लिए सटीक जीपीएस कोऑर्डिनेट्स मिल जाते हैं।
रीजनल लैंडस्लाइड अर्ली वार्निंग सिस्टम: पहाड़ी ढलानों पर 48 घंटे पहले भूस्खलन की चेतावनी
पर्वतीय क्षेत्रों और पश्चिमी घाट में लगातार होने वाले भूस्खलन से जानमाल की सुरक्षा के लिए भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) ने रीजनल लैंडस्लाइड अर्ली वार्निंग सिस्टम (LEWS) का विकास किया है। यह वैज्ञानिक प्रणाली वर्षा की तीव्रता, मिट्टी की संरचना और ढलान के झुकाव का लाइव डेटा जुटाकर 24 से 48 घंटे पहले संभावित भूस्खलन का अलर्ट जारी कर देती है। इस तकनीक के उपयोग से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, केरल और पूर्वोत्तर राज्यों की संवेदनशील बस्तियों और राजमार्गों को समय रहते खाली कराकर बड़ी दुर्घटनाओं को रोका जा रहा है।
सुनामी पूर्व चेतावनी केंद्र (ITEWS): समुद्र में भूकंप के 10 मिनट के भीतर हिंद महासागर को सुरक्षा कवच
वर्ष 2004 की सुनामी त्रासदी के कड़वे अनुभवों को पीछे छोड़ते हुए भारत ने पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय और इनकोइस (INCOIS) के माध्यम से दुनिया का सबसे आधुनिक ‘भारतीय सुनामी पूर्व चेतावनी केंद्र’ (ITEWS) स्थापित किया। गहरे समुद्र में लगे बॉटम प्रेशर रिकॉर्डर्स और टाइड गेज के नेटवर्क से यह प्रणाली समुद्र में भूकंप आने के मात्र 10 मिनट के भीतर सुनामी के खतरे का सटीक विश्लेषण कर एडवाइजरी जारी कर देती है। यूनेस्को ने भारत के इस तकनीकी तंत्र को पूरे हिंद महासागर क्षेत्र के 28 तटीय देशों के लिए नोडल चेतावनी सेवा के रूप में मान्यता दी है, जिससे भारत पूरे क्षेत्र का तटरक्षक बन चुका है।
‘सचेत’ पोर्टल और कॉमन अलर्टिंग प्रोटोकॉल: हर मोबाइल पर सीधा सायरन अलर्ट
आपदा की पूर्व सूचना आम नागरिक तक पहुंचाने के लिए मोदी सरकार ने डिजिटल तकनीक का क्रांतिकारी उपयोग किया। सी-डॉट (C-DOT) और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा विकसित ‘पैन-इंडिया इमरजेंसी अलर्ट सिस्टम’ और ‘सचेत’ पोर्टल ने देश के हर नागरिक को रियल-टाइम सुरक्षा कवच दिया है। किसी भी क्षेत्र में बाढ़, चक्रवात, आंधी या बिजली गिरने जैसी प्राकृतिक आपदा का खतरा मंडराते ही उस भौगोलिक क्षेत्र के सभी एक्टिव मोबाइल फोन पर बिना इंटरनेट के भी तेज सायरन और वाइब्रेशन के साथ स्थानीय भाषा में टेक्स्ट अलर्ट पहुंच जाता है। इस तकनीक ने समय रहते सुरक्षित स्थानों पर जाने का मौका देकर हजारों जानें बचाई हैं।
आपातकालीन इंट्रा-सर्कल रोमिंग और सैटेलाइट कनेक्टिविटी: आपदा में टावर गिरने पर भी चालू रहता है नेटवर्क
प्राकृतिक आपदाओं में सबसे बड़ी चुनौती मोबाइल टावरों का ध्वस्त होना और संचार कट जाना होती थी। मोदी सरकार के दूरसंचार विभाग ने आपदा प्रबंधन के तहत अनिवार्य ‘इंट्रा-सर्कल रोमिंग’ (ICR) व्यवस्था लागू की। इसके तहत चक्रवात या बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में किसी भी एक टेलीकॉम कंपनी का टावर चालू रहने पर सभी कंपनियों के उपभोक्ता अपने आप उस नेटवर्क से जुड़ जाते हैं और बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के इमरजेंसी कॉल और संदेश भेज सकते हैं। साथ ही ग्राउंड नेटवर्क पूरी तरह ठप होने की स्थिति में सैटेलाइट फोन और क्विक-डिप्लॉयमेंट एंटीना यूनिट्स के जरिए तुरंत प्रशासन का संपर्क स्थापित कर दिया जाता है।
आकाशीय बिजली और हीटवेव के विरुद्ध माइक्रो-प्लानिंग: अहमदाबाद मॉडल से दामिनी ऐप तक क्रांति
मौसम के मूक प्रहारों से होने वाले नुकसान को रोकने के लिए नरेंद्र मोदी के गुजरात मॉडल ने देश को नई दिशा दी। वर्ष 2013 में गुजरात के अहमदाबाद में देश का पहला ‘हीट एक्शन प्लान’ (HAP) लागू किया गया था, जिसे अब राष्ट्रीय स्तर पर सैकड़ों शहरों और जिलों में अनिवार्य कर दिया गया है। वहीं आकाशीय बिजली से होने वाली मौतों को रोकने के लिए मौसम विभाग और आईआईटीएम ने ‘दामिनी’ ऐप और अत्याधुनिक डॉप्लर रडार नेटवर्क तैयार किया। यह प्रणाली 20 से 40 वर्ग किलोमीटर के दायरे में बिजली गिरने से 30 मिनट पहले सटीक चेतावनी देती है, जिससे ग्रामीण अंचलों और खेतों में काम कर रहे किसानों को तत्काल सुरक्षित स्थान मिल जाता है।
क्या आप जानते हैं?
हर साल आकाशीय बिजली से सैकड़ों लोगों की जान चली जाती है; लेकिन अब… तकनीक आपकी सुरक्षा कर सकती है!
दामिनी ऐप – बिजली गिरने से 40 मिनट पहले अलर्ट देता है!
अभी डाउनलोड करें… और समय रहते सुरक्षित स्थान पर पहुंचें।
याद रखें – एक छोटा सा अलर्ट, आपकी जान बचा सकता है।सतर्क रहें, सुरक्षित रहें 🙏
#DaminiApp @Indiametdept
#LightningAlert #StaySafeIndia— MyGov Hindi (@MyGovHindi) April 8, 2026
वनाग्नि नियंत्रण प्रणाली (FAST 3.0): उपग्रह से 30 मिनट के भीतर बीट गार्ड तक रियल-टाइम अलर्ट
जंगलों और वन्यजीवों को आग की तबाही से बचाने के लिए भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) और अंतरिक्ष विभाग ने मिलकर ‘फॉरेस्ट फायर अलर्ट सिस्टम’ (FAST 3.0) विकसित किया। उपग्रहों (MODIS और SNPP-VIIRS) के माध्यम से देश के जंगलों में आग लगने की थर्मल विसंगति पकड़ते ही ऑटोमेटेड सिस्टम सक्रिय हो जाता है। आग लगने के मात्र 30 मिनट के भीतर संबंधित स्थानीय बीट गार्ड, वन दरोगा और रेंजर के मोबाइल पर सटीक अक्षांश-देशांतर (जीपीएस लोकेशन) के साथ एसएमएस अलर्ट पहुंच जाता है, जिससे वनाग्नि को बड़े दावानल में बदलने से पहले ही बुझाना संभव हो रहा है।
16 बटालियन और 18 हजार जांबाज: एनडीआरएफ में महिला जांबाजों की तैनाती और सीबीआरएन सुरक्षा
राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) को पहले सीमित संसाधनों और लॉजिस्टिक्स की कमी से जूझना पड़ता था। मोदी सरकार ने एनडीआरएफ की क्षमता का विस्तार करते हुए इसे 16 पूर्ण बटालियनों और 18,000 से अधिक समर्पित जवानों का दुनिया का सबसे बड़ा विशेष आपदा बल बना दिया है। स्वतंत्रता के बाद पहली बार एनडीआरएफ में महिला जांबाजों की औपचारिक तैनाती की गई, जिन्होंने बच्चों और महिलाओं के रेस्क्यू में अग्रणी भूमिका निभाई। इसके साथ ही गैस रिसाव, रासायनिक और रेडियोलॉजिकल खतरों से निपटने के लिए विशेष सीबीआरएन (CBRN) इकाइयों का गठन कर देश के औद्योगिक व परमाणु प्रतिष्ठानों को 24 घंटे सुरक्षा कवच दिया गया है।
सिल्क्यारा टनल रेस्क्यू: 41 श्रमिकों को सुरक्षित निकाल रचा दुनिया का सबसे बड़ा भूमिगत बचाव इतिहास
उत्तराखंड के उत्तरकाशी में निर्माणाधीन सिल्क्यारा सुरंग ढहने के बाद 41 श्रमिक मलबे के पीछे फंस गए थे। इस संकट के समय प्रधानमंत्री कार्यालय की सीधी और सतत निगरानी में बहु-एजेंसी अभियान चलाया गया। एनडीआरएफ, भारतीय थलसेना, सीमा सड़क संगठन (BRO), अंतरराष्ट्रीय टनलिंग विशेषज्ञों और देशी रैट-होल माइनर्स के अभूतपूर्व तालमेल से 17 दिनों तक चले इस जटिल मिशन में सभी 41 श्रमिकों को बिना किसी खरोंच के सुरक्षित बाहर निकाला गया। इस बचाव अभियान ने पूरे विश्व को दिखाया कि भारत के लिए अंतिम छोर पर खड़े हर श्रमिक का जीवन अनमोल है और देश के पास दुनिया का सर्वश्रेष्ठ आपदा प्रबंधन सामर्थ्य है।
सिलक्यारा टनल में चल रहे रेस्क्यू ऑपरेशन में बड़ी सफलता मिली है, पाइप पुशिंग का कार्य मलबे के आर-पार हो चुका है। अब श्रमिकों को सुरक्षित बाहर निकालने की तैयारी शुरू कर दी गई है। https://t.co/wCMZrWSRSn
— Pushkar Singh Dhami (@pushkardhami) November 28, 2023
1 लाख से अधिक ‘आपदा मित्र’: 350 संवेदनशील जिलों में तैयार हुई प्रशिक्षित स्थानीय नागरिक सेना
आपदा प्रबंधन को सरकारी तंत्र की सीमाओं से निकालकर आम नागरिकों का जनआंदोलन बनाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने ‘आपदा मित्र’ योजना की शुरुआत की। देश के 350 से अधिक सर्वाधिक आपदा-संवेदनशील जिलों में 1 लाख से अधिक स्थानीय युवाओं और महिलाओं को ‘आपदा मित्र’ व ‘आपदा सखी’ के रूप में प्रशिक्षित किया गया है। इन्हें आपदा के समय प्राथमिक चिकित्सा, बाढ़ में बचाव कार्य और मलबे से सुरक्षित निकालने की पेशेवर ट्रेनिंग के साथ आपातकालीन लाइफ-सेविंग किट प्रदान की गई है। यह स्थानीय नागरिक सेना एनडीआरएफ और सेना के पहुंचने से पहले सबसे महत्वपूर्ण ‘गोल्डन ऑवर’ में पहुंचकर तुरंत राहत कार्य शुरू कर देती है।
आपदा मित्र का साथ
तो क्या डर की बात#MockDrills
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— Akashvani आकाशवाणी (@AkashvaniAIR) May 6, 2025
सशस्त्र बलों का एचएडीआर मिशन: सी-17 और चिनूक हेलिकॉप्टरों से रिकॉर्ड एयरलिफ्ट
आपदा के समय भारतीय थलसेना, नौसेना और वायुसेना को ‘ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस एंड डिजास्टर रिलीफ’ (HADR) के तहत विशेष रणनीतिक भूमिका दी गई है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में बादल फटने व बाढ़ के दौरान वायुसेना के सी-17 ग्लोबमास्टर, सी-130जे सुपर हरक्यूलिस और भारी वजन उठाने वाले चिनूक व एमआई-17 हेलिकॉप्टरों ने दुर्गम घाटियों से लाखों तीर्थयात्रियों और स्थानीय नागरिकों को सुरक्षित एयरलिफ्ट किया। वहीं नौसेना के बड़े युद्धपोत आईएनएस जलाश्व और आईएनएस केसरी फ्लोटिंग अस्पताल और राहत सामग्री के विशाल केंद्रों के रूप में तटीय आपदाओं में तुरंत तैनात किए जाते हैं।
राष्ट्रीय स्कूल और अस्पताल सुरक्षा कार्यक्रम: नेशनल बिल्डिंग कोड से सुरक्षित हुआ भविष्य
भुज भूकंप में स्कूलों और अस्पतालों के ढहने की हृदयविदारक घटना को संज्ञान में लेते हुए केंद्र सरकार ने देशभर के शैक्षणिक और चिकित्सा संस्थानों के लिए कड़े सुरक्षा नियम बनाए। एनडीएमए के ‘नेशनल स्कूल सेफ्टी प्रोग्राम’ के तहत लाखों स्कूलों में शिक्षकों और छात्रों को आपदा से निपटने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है और नियमित मॉक ड्रिल अनिवार्य की गई है। इसके साथ ही सभी नए सरकारी भवनों, मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों के निर्माण में नेशनल बिल्डिंग कोड (NBC) के उच्च भूकंप-रोधी और अग्निशामक मानकों को अनिवार्य किया गया है, ताकि आपातकाल में भी अस्पताल पूरी क्षमता से काम करते रहें।
2,500 करोड़ रुपये का अर्बन फ्लडिंग मिशन: मेट्रो शहरों के लिए आईफ्लो और आधुनिक ड्रेनेज नेटवर्क
जलवायु परिवर्तन के कारण प्रमुख शहरों में अचानक होने वाली भारी बारिश और जलभराव की समस्या से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने विशेष ‘शहरी बाढ़ शमन परियोजना’ लागू की। मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद, कोलकाता और अहमदाबाद जैसे प्रमुख महानगरों के लिए 2,500 करोड़ रुपये से अधिक की स्वीकृतियों के साथ आधुनिक स्टॉर्म वॉटर ड्रेनेज सिस्टम और भूमिगत जल निकासी चैनलों का निर्माण किया गया। मुंबई के लिए ‘iFLOWS’ और चेन्नई के लिए ‘CFLOWS’ जैसे अत्याधुनिक वेब-जीआईएस आधारित एकीकृत बाढ़ चेतावनी तंत्र विकसित किए गए, जो तीन दिन पहले ही शहर के वार्ड-वार जलभराव का सटीक पूर्वानुमान जारी कर देते हैं।
हिमालयी क्षेत्रों में जीएलओएफ निगरानी: 100 से अधिक हिमनद झीलों पर सैटेलाइट और स्वचालित सेंसर्स
पर्वतीय राज्यों में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) और आकस्मिक भूस्खलन के बढ़ते खतरों को देखते हुए केंद्र सरकार ने एक विशेष वैज्ञानिक सुरक्षा तंत्र स्थापित किया। इसरो और राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) के माध्यम से हिमालयी क्षेत्र की अत्यंत संवेदनशील 100 से अधिक हिमनद झीलों की उपग्रहों द्वारा चौबीसों घंटे निगरानी शुरू की गई। उच्च तुंगता वाले क्षेत्रों में ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन (AWS) और वॉटर-लेवल सेंसर्स लगाए गए हैं, जो झील का जलस्तर असामान्य रूप से बढ़ते ही निचले घाटियों में स्थित बस्तियों और पनबिजली परियोजनाओं को पहले ही ऑटोमेटेड अलर्ट भेज देते हैं।
आपदा में मूक पशुओं की सुरक्षा: राष्ट्रीय स्तर पर एनिमल डिजास्टर मैनेजमेंट गाइडलाइंस
संवेदनशील शासन की मिसाल पेश करते हुए मोदी सरकार ने आपदा प्रबंधन में पहली बार बेजुबान मवेशियों और वन्यजीवों की सुरक्षा को कानूनी और नीतिगत हिस्सा बनाया। भारत दुनिया के उन गिने-चुने देशों में शामिल हुआ, जिसने औपचारिक रूप से ‘एनिमल डिजास्टर मैनेजमेंट गाइडलाइंस’ लागू कीं। इसके तहत चक्रवात और बाढ़ के समय किसानों के पशुधन के लिए विशेष कैटल शेल्टर्स, पशु चारे के सुरक्षित भंडारण और पशु चिकित्सकों की मोबाइल टीमों की अग्रिम तैनाती को अनिवार्य किया गया। इसने संकट के समय ग्रामीण भारत की सबसे बड़ी आर्थिक पूंजी यानी पशुधन को अकाल मौत से बचाया है।
सुभाष चंद्र बोस आपदा प्रबंधन पुरस्कार: 51 लाख रुपये के सम्मान से जागी जनसेवा और शोध की अलख
आपदा राहत और जोखिम न्यूनीकरण में निस्वार्थ भाव से जुटे रहने वाले बहादुर नायकों और उत्कृष्ट संस्थाओं को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता देने के लिए मोदी सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाया। नेताजी की जयंती (23 जनवरी) पर हर साल ‘सुभाष चंद्र बोस आपदा प्रबंधन पुरस्कार’ प्रदान किया जाता है। इसके तहत उत्कृष्ट कार्य करने वाली संस्था को 51 लाख रुपये का नकद पुरस्कार व प्रमाण पत्र और व्यक्तिगत श्रेणी में 5 लाख रुपये प्रदान किए जाते हैं। इस प्रतिष्ठित सम्मान ने देश भर में जमीनी स्तर पर काम कर रहे गैर-सरकारी संगठनों, वैज्ञानिकों और युवाओं में आपदा प्रबंधन को करियर और सेवा का मुख्य माध्यम बनाने की नई प्रेरणा दी है।
भारत सरकार द्वारा आपदा प्रबन्धन के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए लेफ्टिनेंट कर्नल सीता अशोक शेल्के को व्यक्तिगत श्रेणी और सिक्किम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को संस्थागत श्रेणी में सुभाष चंद्र बोस आपदा प्रबंधन पुरस्कार 2026 के लिए चुना गया है।
#DisasterManagement
@PMOIndia https://t.co/5JUPYfsZSZ— सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (@MIB_Hindi) January 23, 2026
ग्लोबल फर्स्ट रेस्पॉन्डर: ऑपरेशन दोस्त और ऑपरेशन करुणा से दुनिया का संकटमोचक बना भारत
दशकों तक अंतरराष्ट्रीय आपदाओं में विदेशी सहायता का इंतजार करने वाला भारत आज खुद दुनिया के संकटमोचक देश के रूप में स्थापित हो चुका है। तुर्की और सीरिया में आए प्रलयंकारी भूकंप के दौरान भारत ने ‘ऑपरेशन दोस्त’ चलाकर कुछ ही घंटों के भीतर वायुसेना के सी-17 विमानों से एनडीआरएफ की टीमें, खोजी कुत्ते और 60 पैरा फील्ड अस्पताल तैनात कर दिए, जिसने मलबे से दर्जनों जिंदगियां बचाईं। म्यांमार में मोचा चक्रवात के समय ‘ऑपरेशन करुणा’ और नेपाल भूकंप के समय चलाए गए राहत अभियानों ने सिद्ध किया कि ‘वसुधैव कुटुंबकम’ केवल एक विचार नहीं, बल्कि मोदी सरकार की सक्रिय कार्यशैली है। इसके साथ ही भारत की पहल पर स्थापित ‘सीडीआरआई’ (कौएलिशन फॉर डिजास्टर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर) में आज 40 से अधिक देश शामिल हैं, जो वैश्विक स्तर पर आपदा-रोधी ढांचे का निर्माण कर रहे हैं।
ऑपरेशन दोस्त से जुड़ी पूरी टीम, NDRF हो, आर्मी हो, एयरफोर्स हो या हमारी दूसरी सेवाओं के साथी हों, सभी ने बहुत बेहतरीन काम किया है।
यहां तक कि हमारे बेज़ुबान दोस्तों, Dog squads के सदस्यों ने भी अद्भुत क्षमता का प्रदर्शन किया।
आप सभी पर देश को बहुत गर्व है।
-पीएम @narendramodi https://t.co/atoJC4gUtP
— BJP (@BJP4India) February 20, 2023
सीडीआरआई की ‘आईआरआईएस’ और ‘डीआरआई कनेक्ट’: छोटे द्वीपों के रक्षक से ग्लोबल नॉलेज हब तक भारत
जलवायु परिवर्तन और समुद्र स्तर में वृद्धि का सबसे बड़ा खतरा झेल रहे छोटे द्वीपीय विकासशील देशों (SIDS) के लिए भारत वैश्विक ढाल बनकर उभरा है। कॉप-26 में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा शुरू की गई ‘इंफ्रास्ट्रक्चर फॉर रेजिलिएंट आइलैंड स्टेट्स’ (IRIS) पहल के माध्यम से भारत फिजी, मॉरीशस और समोआ जैसे देशों को चक्रवात-रोधी बुनियादी ढांचा बनाने में सैटेलाइट तकनीक और वित्तीय मदद दे रहा है। इसके साथ ही सीडीआरआई के अंतर्गत शुरू किया गया ‘डीआरआई कनेक्ट’ (DRI Connect) डिजिटल प्लेटफॉर्म दुनिया भर के आपदा विशेषज्ञों, इंजीनियरों और नीति-निर्माताओं को एक सूत्र में जोड़कर आपदा-रोधी पुलों, सड़कों और ऊर्जा ग्रिड के डिजाइन साझा करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा नॉलेज हब बन चुका है।
जी-20 में आपदा प्रबंधन वर्किंग ग्रुप और पीएम मोदी का 10-सूत्रीय वैश्विक एजेंडा
भारत ने अपनी जी-20 अध्यक्षता के दौरान इतिहास रचते हुए पहली बार ‘डिजास्टर रिस्क रिडक्शन वर्किंग ग्रुप’ (DRRWG) का गठन कराया, जिससे दुनिया की शीर्ष 20 अर्थव्यवस्थाओं की नीतिगत प्राथमिकताओं में आपदा प्रबंधन औपचारिक रूप से शामिल हुआ। इससे पहले वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिया गया ’10-सूत्रीय एजेंडा’ आज वैश्विक आपदा जोखिम न्यूनीकरण का मुख्य आधार बन चुका है। इसमें स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाने, महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने, तकनीकी नवाचार और विकास परियोजनाओं में आपदा-रोधी मानकों को अनिवार्य करने का स्पष्ट रोडमैप दिया गया है, जिसे आज संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां अंतरराष्ट्रीय मॉडल मानती हैं।
राहत के नाम पर भ्रष्टाचार बनाम वैज्ञानिक सुरक्षा और डीबीटी की मोदी गारंटी
विपक्षी दलों के शासनकाल में प्राकृतिक आपदाओं को केवल राजनीतिक अवसर, बजट की बंदरबांट और चुनावी वादों तक सीमित रखा जाता था, जहां राहत राशि बिचौलियों की भेंट चढ़ जाती थी। इसके विपरीत, नरेंद्र मोदी के 25 वर्षों के समर्पित नेतृत्व ने आपदा प्रबंधन को तकनीक-आधारित, पारदर्शी और मानवीय गरिमा से युक्त बनाया है। अब सीधे डीबीटी (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) के जरिए बिना किसी दलाली के पीड़ितों के खातों में आर्थिक सहायता पहुंचती है। 2001 में भुज के मलबे से शुरू होकर 2026 में 1.6 लाख करोड़ के वैज्ञानिक बजट, 6,500 बड़े बांधों की डिजिटल निगरानी, पंचायती राज स्तर तक अधिकार, सिल्क्यारा टनल का ऐतिहासिक बचाव, मिष्टी मैंग्रोव बायो-शील्ड, ड्रोन-एआई आधारित क्षति आकलन, मिशन मौसम, लैंडस्लाइड अर्ली वार्निंग, अंतरिक्ष उपग्रह मैपिंग, सुनामी पूर्व चेतावनी, आधुनिक मोबाइल और इंट्रा-सर्कल रोमिंग अलर्ट, 18 हजार जवानों के एनडीआरएफ बल, मूक पशुओं की सुरक्षा और तुर्की-सीरिया से लेकर छोटे द्वीपीय देशों तक फैली वैश्विक मानवीय सहायता तक भारत की यह यात्रा हर नागरिक के जीवन की अमूल्य रक्षा करने वाली ‘मोदी गारंटी’ का सबसे प्रामाणिक साक्ष्य है।










