भारतीय राजनीति में विपक्षी एकता की सबसे बड़ी चुनौती अब केवल भाजपा से राजनीतिक द्वंद्व करने की रणनीति तक सीमित नहीं रह गई है। क्योंकि इंडिया गठबंधन के भीतर नेतृत्व, राजनीतिक हिस्सेदारी और क्षेत्रीय दलों के हितों को लेकर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। इंडिया गठबंधन के गठन के पीछे उद्देश्य भाजपा के मुकाबले एक मजबूत राष्ट्रीय विकल्प तैयार करना था, लेकिन समय के साथ यह स्पष्ट होता जा रहा है कि विपक्षी दलों के बीच एकजुटता ही नहीं बन पा रही है। अगले लोकसभा चुनाव की छोडिए, अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में भी इंडिया गठबंधन एकजुट होता नजर नहीं आता। क्योंकि तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कषगम ने, पंजाब में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के खिलाफ अभी से ताल ठोंक दी है। डीएमके के साथ आप ने भी तीसरे मोर्चे की राह चुन ली है। ऐसे में यदि बीजू जनता दल (बीजेडी), वाईएसआर कांग्रेस और दूसरे ऐसे दल जो इंडिया गठबंधन में मजबूरी में जुड़े हैं, उनके लिए तीसरा मोर्चा बेहतर विकल्प बन सकता है।
डीएमके ने राष्ट्रीय स्तर पर तीसरा मोर्चा बनाने की पहल की
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक ऐसा होने पर तीसरा मोर्चा भाजपा के लिए तो नहीं, लेकिन राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए एक नई राजनीतिक चुनौती बन सकता है। दरअसल, विपक्षी राजनीति में कांग्रेस की अगुवाई वाले इंडिया ब्लॉक के सामने नई चुनौती उभर रही है। तमिलनाडु की द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) अब कांग्रेस के साथ पुराने रिश्तों को दोबारा मजबूत करने के बजाय राष्ट्रीय स्तर पर एक अलग राजनीतिक मंच बनाने की तैयारी में है। इस पहल से विपक्ष की राजनीति में कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती मिल सकती है। साथ ही, ऐसे क्षेत्रीय दलों को नया विकल्प मिल सकता है, जो भाजपा का समर्थन नहीं करते, लेकिन कांग्रेस की अगुवाई वाले गठबंधन में भी कोई भूमिका नहीं निभाना चाहते हैं।
डीएमके सांसद कनिमोझी की शिवसेना, एनसीपी नेताओं से मुलाकातें
दरअसल, डीएमके को लेकर अटकलें चल रही हैं। इस बीच डीएमके सांसद कनिमोझी ने शिवसेना (उद्धव ठाकरे), एनसीपी (शरदचंद्र पवार) और टीएमसी के नेताओं से मुलाकात की है। बताते हैं कि इसमें भी तीसरा मोर्चा बनाने पर मंथन हुआ है। वहीं, दो दिन पहले हुई डीएमके की बैठक में पार्टी अध्यक्ष एमके स्टालिन ने अपने पत्ते खोल दिए। उन्होंने केंद्र सरकार के विरोध का रास्ता चुना, लेकिन वे कांग्रेस के साथ नहीं जाएंगे, बल्कि अलग होकर तीसरा मोर्चा बनाएंगे। डीएमके और कांग्रेस के रिश्तों में दरार की बड़ी वजह तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद बदला राजनीतिक समीकरण है। मई में कांग्रेस ने अभिनेता विजय की तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) को सरकार बनाने के लिए समर्थन दिया और भविष्य के चुनावों में भी उसके साथ रहने का ऐलान किया। टीवीके अब इंडिया ब्लॉक में शामिल हो चुकी है। इससे डीएमके ने इंडिया ब्लॉक से दूरी बनाकर नया रास्ता चुन लिया है।

बीजेडी, आप और वाईएसआर कांग्रेस आ सकते हैं साथ
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी कठिनाई केवल डीएमके की पहल नहीं, बल्कि विपक्षी राजनीति में अपने नेतृत्व को स्वीकार्य बनाए रखना है। यदि क्षेत्रीय दल कांग्रेस से अलग साझा मंच बनाने लगते हैं, तो संसद में समन्वय, चुनावी गठबंधन और केंद्र सरकार के खिलाफ विपक्ष की एकजुटता कमजोर हो सकती है। कांग्रेस को अपने सहयोगियों को साथ बनाए रखने की चुनौती भी है। उधर तीसरे मोर्चे के लिए बीजेडी, आम आदमी पार्टी और बीआरएस कांग्रेस जैसे दल डीएमके के साथ खड़े हो सकते हैं। इसके अलावा कांग्रेस विरोधी क्षेत्रीय दलों को भी तीसरे मोर्चे के साध सकते हैं। हालांकि, इन चारों दलों ने एक साझा तीसरे मोर्चे में शामिल होकर किसी औपचारिक गठबंधन की घोषणा अभी नहीं की है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि जिन दलों को इंडिया गठबंधन और राहुल गांधी की बचकानी राजनीति रास नहीं आ रही है, उनके लिए तीसरा मोर्चा बेहतर विकल्प बनेगा।

दक्षिण भारत में डीएमके कांग्रेस की गठबंधन राजनीति बदलेगी
विपक्ष की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका हमेशा निर्णायक रही है। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में राष्ट्रीय राजनीति का प्रभाव तो है, लेकिन चुनावी मुकाबले का वास्तविक आधार स्थानीय नेतृत्व, क्षेत्रीय मुद्दे और दलों का अपना जनाधार भी होता है। कांग्रेस की चुनौती यह है कि वह राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का नेतृत्व करने की कोशिश करते हुए क्षेत्रीय दलों को यह भरोसा दिला पाए कि उनके राजनीतिक हितों का सम्मान किया जाएगा। यह संतुलन बिगड़ता नजर आ रहा है, इसलिए विपक्षी एकता का दायरा कमजोर पड़ रहा है। तमिलनाडु में डीएमके की भूमिका इस संभावित बदलाव का महत्वपूर्ण पहलू है। डीएमके का इंडिया गठबंधन से अलग होना कोई सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम नहीं है। वह कांग्रेस से दूरी बनाती है या अपनी स्वतंत्र राष्ट्रीय रणनीति तैयार करती है, तो दक्षिण भारत में कांग्रेस की गठबंधन राजनीति जरूर प्रभावित होगी। तमिलनाडु में कांग्रेस का चुनावी प्रदर्शन काफी हद तक सहयोगी दलों के साथ सीटों के बंटवारे और साझा चुनावी रणनीति पर निर्भर करता है। डीएमके से दूरी कांग्रेस को राज्य में कमजोर कर सकती है।
ओडिशा में बीजू जनता दल की भूमिका अलग चुनौती पेश करेगी
ओडिशा में बीजू जनता दल की भूमिका अलग तरह की चुनौती पेश कर सकती है। नवीन पटनायक के नेतृत्व में बीजेडी ने लंबे समय तक अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाए रखी और राष्ट्रीय दलों से दूरी तथा जरूरत के मुताबिक सहयोग की नीति अपनाई। अब बीजेडी किसी नए विपक्षी मंच के साथ आती है, तो उसे कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन से बाहर रहने वाले क्षेत्रीय दलों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। इससे यह संदेश जा सकता है कि क्षेत्रीय दल अपनी ताकत के आधार पर राष्ट्रीय राजनीति में अलग स्थान बनाने की कोशिश कर सकते हैं। ओडिशा में कांग्रेस पहले से ही अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की चुनौती का सामना करती रही है। बीजेडी और कांग्रेस के बीच किसी भी तरह की प्रतिस्पर्धा का लाभ भाजपा को मिल सकता है, खासकर तब जब विपक्षी मत अलग-अलग खेमों में बंट जाएंगे।
आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस की तीसरे मोर्चे की ओर
आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस की संभावित भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। वाईएसआर कांग्रेस की राजनीति राज्य के नेतृत्व, कल्याणकारी योजनाओं, क्षेत्रीय मुद्दों और सत्ता के स्थानीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। यह पार्टी कांग्रेस से अलग तीसरे मोर्चे की दिशा में कदम बढ़ाती है, तो इससे विपक्षी राजनीति में एक और स्वतंत्र धुरी उभर सकती है। कांग्रेस के लिए चुनौती यह होगी कि वह राज्य में अपना संगठन मजबूत करे और क्षेत्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता फिर से स्थापित करे। वहीं, वाईएसआर कांग्रेस के लिए भी राष्ट्रीय स्तर पर किसी मंच से जुड़ने का फैसला राज्य में अपने मतदाताओं और राजनीतिक प्रतिस्पर्धियों के प्रति उसकी अहम रणनीति बन सकेगी।
आप और कांग्रेस की दूरी का पंजाब चुनावों पर होगा खासा असर
आम आदमी पार्टी की भूमिका इस पूरे समीकरण में सबसे अधिक राजनीतिक प्रभाव डाल सकती है, क्योंकि उसका विस्तार केवल एक राज्य तक सीमित नहीं रहा है। दिल्ली और पंजाब में उसकी उपस्थिति के साथ-साथ गुजरात और अन्य राज्यों में भी वह अपना आधार बढ़ाने की कोशिश करती रही है। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के संबंधों में सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों के उदाहरण रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर दोनों भाजपा का विरोध करते हैं, लेकिन राज्यों में सीटों, नेतृत्व और मतदाता आधार को लेकर उनके हित हमेशा टकराते हैं। आम आदमी पार्टी कांग्रेस से अलग होकर तीसरे मोर्चे का हिस्सा बनती है तो इसका असर दिल्ली, पंजाब और गुजरात जैसे राज्यों में स्पष्ट तौर पर दिखाई देगा। दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस को आम आदमी पार्टी से सीधा राजनीतिक मुकाबला करना पड़ सकता है, जबकि गुजरात में दोनों दलों के बीच वोटों का बंटवारा भाजपा को चुनावी लाभ पहुंचा सकता है।
तीसरे मोर्चे की राजनीति से भाजपा के लिए भी नए अवसर
तीसरे मोर्चे की संभावित राजनीति भाजपा के लिए भी नए अवसर लेकर आ सकती है। अवसर इसलिए कि विपक्षी दलों के बीच मतों का बंटवारा कई चुनावों में भाजपा की स्थिति मजबूत कर सकता है। आने वाले विधानसभा चुनावों में इस संभावित राजनीतिक बदलाव का सबसे बड़ा असर विपक्षी वोटों के बंटवारे के रूप में दिखाई दे सकता है। जिन राज्यों में कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों का मतदाता आधार एक-दूसरे से मिलता है, वहां अलग-अलग चुनाव लड़ने से भाजपा को सीधा लाभ मिलेगा। तीसरे मोर्चे की संभावना का प्रभाव हर राज्य में अलग होगा। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के सामने असली चुनौती विपक्षी दलों को भाजपा विरोध के साझा मुद्दे पर एकजुट रखने और कांग्रेस को स्वीकार्य सहयोगी बनाए रखने की होगी। कांग्रेस यदि हर राज्य में नेतृत्व की दावेदारी पर जोर देती है, तो क्षेत्रीय दलों के साथ टकराव बढ़ सकता है।








