Home समाचार सावधान! दिल्ली से पेरिस तक हिंसा के पीछे सीक्रेट ग्लोबल नेटवर्क, जानिए...

सावधान! दिल्ली से पेरिस तक हिंसा के पीछे सीक्रेट ग्लोबल नेटवर्क, जानिए ‘रेड-ग्रीन इकोसिस्टम’ का खतरनाक प्लान

SHARE

कार्नेगी एंडोमेंट के ‘ग्लोबल प्रोटेस्ट ट्रैकर’ के अनुसार, अक्टूबर 2026 में 8 से 13 देशों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन, हिंसा और आगजनी की घटनाएं दर्ज की गईं। शुरुआत में ये प्रदर्शन शिक्षा और महंगाई जैसे आम आदमी के बुनियादी मुद्दों से जुड़े प्रतीत होते थे, लेकिन अब एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मीडिया (विशेष तौर पर फॉक्स न्यूज) की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे इन हिंसक प्रदर्शनों के पीछे एक बड़े वैश्विक नेटवर्क की साजिश है। इस रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली से लेकर पेरिस तक फैले इन आंदोलनों और प्रदर्शनों के बीच एक गहरा ‘सीक्रेट नेटवर्क’ और वैचारिक तालमेल काम कर रहा है।

13 देशों के 101 संगठनों का ‘सीक्रेट ग्लोबल नेटवर्क’
फॉक्स न्यूज डिजिटल की एक विस्तृत खोजी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 13 देशों के 101 संगठन मिलकर एक ‘सीक्रेट ग्लोबल नेटवर्क’ चला रहे हैं। शुरुआती दौर में फ्रांस के छात्र विरोध प्रदर्शनों से जुड़े लगभग 50 संगठनों की पहचान की गई थी, जो बढ़कर 54 और हालिया जांच रिपोर्ट में विभिन्न देशों में फैले 101 संगठनों तक पहुंच गई है। इस सीक्रेट संगठनों को ‘रेड-ग्रीन प्रोटेस्ट इकोसिस्टम’ नाम दिया गया है। इस खुलासे के मुताबिक फ्रांस की सड़कों पर मचे बवाल से लेकर भारत और अन्य मुल्कों में युवाओं के नेतृत्व में होने वाले बड़े आंदोलनों के तार आपस में सीधे जुड़े हुए हैं। यह नेटवर्क स्थानीय मुद्दों और जनआक्रोश को हवा देकर सीमाओं के पार अराजकता फैलाने और उसका दायरा बढ़ाने का काम कर रहा है।


क्या है रेड-ग्रीन प्रोटेस्ट इकोसिस्टम ?
हालिया खुफिया खुलासों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स में ‘रेड-ग्रीन प्रोटेस्ट इकोसिस्टम’ (Red-Green Protest Ecosystem) शब्द का इस्तेमाल दुनिया भर में हो रहे उग्र प्रदर्शनों, दंगों और छात्र आंदोलनों के पीछे सक्रिय एक वैचारिक और सामरिक गठजोड़ को समझाने के लिए किया गया है। इस इकोसिस्टम में मुस्लिम, वामपंथी, समाजवादी संगठन, ट्रेड यूनियनें, छात्र संगठन, एडवोकेसी नेटवर्क और कुछ मीडिया संस्थान सक्रिय रूप से शामिल हैं। आइए जानते हैं, इसमें ‘रेड’ और ‘ग्रीन’ शब्द का इस्तेमाल क्यों किया गया है…

‘रेड’ (लाल): इसका संबंध पारंपरिक रूप से वामपंथी (Left-wing), कम्युनिस्ट, मार्क्सवादी और समाजवादी संगठनों से है। ये समूह पूंजीवादी व्यवस्था के विरोध, आर्थिक असमानता, मजदूरों के अधिकारों और सरकार विरोधी नीतियों को लेकर मुखर रहते हैं।

‘ग्रीन’ (हरा): इस विशेष संदर्भ में ‘ग्रीन’ का प्रयोग पर्यावरणविदों के लिए नहीं, बल्कि कुछ चुनिंदा इस्लामी संगठनों के वैचारिक नेटवर्क को दर्शाने के लिए किया गया है, जो दुनिया के कई देशों में खास मुद्दों पर आंदोलनों के दौरान इन वामपंथी समूहों के साथ तालमेल बिठाते हैं।

रेड-ग्रीन प्रोटेस्ट इकोसिस्टम कैसे काम कर रहा है?
वामपंथी और इस्लामिस्ट गठजोड़ वाले इस नेटवर्क की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें वैचारिक रूप से भिन्न दिखने वाली विचारधाराएं एकसाथ मिलकर काम करती हैं। यह नेटवर्क अलग-अलग देशों के स्थानीय असंतोष को एक मंच पर लाकर उसे अंतरराष्ट्रीय रंग देने की रणनीति अपनाता है। दुनिया के अलग-अलग कोनों में होने वाले विरोध प्रदर्शनों के लिए यह नेटवर्क गुप्त टेलीग्राम ग्रुप्स, विशेष वेबसाइट्स और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल करता है। इसके जरिए पोस्टर, नारे और एजेंडे एक देश से दूसरे देश में तुरंत साझा किए जाते हैं। युवाओं को पूंजीवाद, युद्ध नीतियों, महंगाई और प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ भड़काकर सड़कों पर उतारा जाता है। 

रेड-ग्रीन प्रोटेस्ट इकोसिस्टम का मुख्य एजेंडा क्या है?
खुफिया रिपोर्ट्स और विश्लेषकों के अनुसार, इस ‘रेड-ग्रीन’ गठजोड़ का मुख्य उद्देश्य लोकतांत्रिक सरकारों पर दबाव बनाना और सामाजिक-राजनीतिक अस्थिरता पैदा करना है। पश्चिमी देशों की नीतियों, वैश्विक पूंजीपतियों और सैन्य खर्चों के खिलाफ युवा हड़तालों का आयोजन करना। यदि किसी एक देश (जैसे फ्रांस या भारत) में कोई छात्र आंदोलन या विरोध प्रदर्शन शुरू होता है, तो यह नेटवर्क तुरंत उसे दूसरे देशों में प्रचारित कर, वैचारिक और डिजिटल समर्थन जुटाता है।

33 संगठन युवाओं द्वारा सीधे तौर पर संचालित
13 देशों के 101 संगठनों में से कम से कम 33 संगठन सीधे तौर पर छात्र या युवा समूहों द्वारा संचालित किए जा रहे हैं। युवा पीढ़ी मुख्य रूप से इंस्टाग्राम, टिकटॉक, टेलीग्राम और एक्स जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय रहती है। यह नेटवर्क आकर्षक ग्राफिक्स, छोटे वीडियो और भड़काऊ रील्स के जरिए युवाओं तक अपनी पहुंच बनाता है। विरोध प्रदर्शनों की रणनीति तैयार करने, भड़काने वाले नारे देने और पुलिस या प्रशासन की नजरों से बचने के लिए गुप्त टेलीग्राम चैनलों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है, जिससे युवा आसानी से जुड़ जाते हैं।

Gen-Z के नाम पर युवाओं को भड़काने की रणनीति
युवाओं को जेनरेशन-Z (Gen-Z) के नाम पर लामबंद किया जा रहा है।
युवाओं को यह विश्वास दिलाया जाता है कि वे दुनिया के किसी एक कोने में खड़े होकर वैश्विक अन्याय (जैसे युद्ध, असमानता या पुलिस कार्रवाई) के खिलाफ एक बड़ी ऐतिहासिक क्रांति का हिस्सा बन रहे हैं। विरोध प्रदर्शनों या हिंसक झड़पों के दौरान इन युवा समूहों को अक्सर ‘अग्रिम मोर्चे’ पर रखा जाता है। गिरफ्तारी देने, पुलिस बैरिकेड तोड़ने या नारेबाजी करने के लिए छात्रों और युवाओं को आगे किया जाता है, ताकि पर्दे के पीछे बैठे वैचारिक और रणनीतिक संचालक सुरक्षित रहें। सोशल मीडिया पर ‘विद्रोही’ या ‘क्रांतिकारी’ छवि पेश करके युवाओं के मन में यह भावना भरी जाती है कि वे किसी बड़े बदलाव के नायक हैं, जिससे वे बिना परिणामों की परवाह किए आंदोलनों में कूद पड़ते हैं।

देशों की समस्याएं भिन्न, विरोध का तरीका व नैरेटिव समान
जांच में यह भी रेखांकित किया गया है कि अलग-अलग देशों की समस्याएं भले ही भिन्न हों, लेकिन उनके विरोध का तरीका, नैरेटिव और टाइमिंग बिल्कुल एक जैसी नजर आती है। यह पूरा ढांचा किसी सीमा में बंधा नहीं है, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की तरह काम करता है जो दुनिया भर में सरकारों के खिलाफ असंतोष भड़काने और विरोध को खाद-पानी देने के लिए तालमेल बिठाता है। वैश्विक सुरक्षा और आंतरिक शांति के लिहाज से इस रिपोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नई बहस छेड़ दी है।

‘प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल’ ने प्रदर्शनों को एक मंच पर लाया
फॉक्स न्यूज़ की रिपोर्ट में ‘प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल’ की भूमिका पर भी प्रकाश डाला गया है। यह एक अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संगठन है, जिसने 16 अक्टूबर की एक ब्रीफिंग में फ्रांस, स्पेन, भारत और अल्बानिया में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों को एक मंच पर लाने का काम किया। रिपोर्ट में यह सवाल उठाया गया है कि क्या ये उभरते हुए विद्रोह एक संगठित राजनीतिक शक्ति का रूप ले सकते हैं, ताकि उन हालात को बदला जा सके जिनकी वजह से ये विद्रोह पैदा हुए हैं। भारत में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों में चुनाव आयोग के खिलाफ भी प्रदर्शन शामिल हैं, जहां प्रदर्शनकारी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। 

दिल्ली-पेरिस कनेक्शन: ‘इंडियन अलायंस पेरिस’ की भूमिका
फॉक्स न्यूज़ की जांच में ‘इंडियन अलायंस पेरिस’ (IAP) का ज़िक्र है। यह फ्रांस में स्थित छात्रों, शोधकर्ताओं और पेशेवरों का एक संगठन है, जो फ्रांस और भारत के विरोध-प्रदर्शनों के संदेशों को आपस में जोड़ने का काम कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, इस संगठन ने फ्रांस में हो रहे प्रदर्शनों को बढ़ावा दिया है और इनकी तुलना भारत में युवाओं द्वारा किए जा रहे विरोध-प्रदर्शनों से की है। इस संगठन और इससे जुड़े कुछ प्लेटफॉर्म्स ने फ्रांस और भारत (दिल्ली) में हुए युवा विरोध प्रदर्शनों के बीच समानता दिखाते हुए सोशल मीडिया पर पोस्ट शेयर किए थे। फॉक्स न्यूज़ द्वारा उद्धृत एक सोशल मीडिया पोस्ट में, इस संगठन ने दोनों देशों के युवा प्रदर्शनकारियों का समर्थन करते हुए लिखा: “जेन ज़ी (Gen Z) के लिए: फ्रांस में, भारत में, आज के लिए बहुत बढ़िया (Bravo)।” 

ब्रेकथ्रू न्यूज़, भारत-फ्रंस और नेविल रॉय सिंघम का कनेक्शन
फॉक्स न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक ‘ब्रेकथ्रू न्यूज़’ ने फ्रांस और भारत में हुए विरोध प्रदर्शनों को कवर किया, और इन्हें सरकारी नीतियों के खिलाफ चल रहे एक बड़े अंतरराष्ट्रीय आंदोलन के हिस्से के रूप में पेश किया। इसने सोशल मीडिया अभियानों और राजनीतिक संदेशों के जरिए विरोध प्रदर्शनों को और व्यापक बनाने में मदद की। यह कम्युनिस्ट और समाजवादी समूहों से जुड़ा संगठन है, जिसका संबध नेविल रॉय सिंघम से बताया गया है। नेविल रॉय सिंघम एक अमेरिकी व्यवसायी, टेक अरबपति और वामपंथी विचारधारा के समर्थक हैं। फिलहाल सिंघम चीन के शंघाई में रहते हैं। उन पर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के प्रचार तंत्र से जुड़े होने और विभिन्न देशों के वामपंथी संगठनों, कार्यकर्ताओं और मीडिया पोर्टल्स को करोड़ों डॉलर की फंडिंग करने का आरोप है। भारत में उन पर चीनी प्रोपेगेंडा फैलाने के आरोप वाले न्यूज पोर्टल ‘न्यूज़क्लिक’ (NewsClick) को फंडिंग करने का आरोप है, जिसकी जांच भारत की प्रवर्तन निदेशालय (ED) और दिल्ली पुलिस द्वारा की गई है।

विजय प्रसाद का “पेरिस-नई दिल्ली-ब्यूनस आयर्स” और सिंघम कनेक्शन
फॉक्स न्यूज के खुलासों में दिल्ली से लेकर पेरिस तक सक्रिय कथित ‘सीक्रेट नेटवर्क’ की चर्चा के दौरान ‘ट्राइकॉन्टिनेंटल’ (Tricontinental: Institute for Social Research) और इसके कार्यकारी निदेशक विजय प्रसाद का नाम प्रमुखता से सामने आया है। ट्राइकॉन्टिनेंटल एक अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थान है, जो मुख्य रूप से वामपंथी, समाजवादी और वैचारिक मुद्दों पर अध्ययन, लेख और रिपोर्ट प्रकाशित करता है। भारतीय मार्क्सवादी इतिहासकार, लेखक और राजनीतिक विचारक विजय प्रसाद इस संस्था के कार्यकारी निदेशक के रूप में कार्यरत हैं। रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया है कि इस एनजीओ को नेविल रॉय सिंघम द्वारा फंडिंग की जाती है। विजय प्रसाद ने 18 अक्टूबर को ‘X’ (ट्विटर) पर एक पोस्ट में पेरिस, नई दिल्ली और ब्यूनस आयर्स में हो रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच समानताएं बताईं। उन्होंने लिखा: “पेरिस-नई दिल्ली-ब्यूनस आयर्स” और आगे जोड़ा, “गुस्से को अपना समय लेने दें, क्योंकि गुस्सा एक ताकत बन सकता है।”

SFI के निथीश, ट्राइकॉन्टिनेंटल और चीन कनेक्शन
16 अक्टूबर 2026 को स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया – यूनाइटेड किंगडम (SFI-UK) के सदस्यों ने लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग के बाहर एक बड़ा विरोध प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन में यूट्यूबर ध्रुव राठी ने हिस्सा लिया था। एसएफआई जैसे वामपंथी संगठनों और और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन के कथित प्रोपेगेंडा नेटवर्क के बीच की कड़ियों को लेकर कई खुलासे हुए हैं। इसी कड़ी में एसएफआई के केंद्रीय नेतृत्व से जुड़े निथीश नारायणन की भूमिका भी जांच के दायरे में आई है। निथीश नारायणन स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) के उपाध्यक्ष और इसके केंद्रीय सचिवालय के सदस्य हैं।

निथीश नारायणन केवल SFI तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे अंतरराष्ट्रीय संस्थान ‘ट्राइकॉन्टिनेंटल: इंस्टीट्यूट फॉर सोशल रिसर्च’ के एशिया डेस्क से बतौर शोधकर्ता (Researcher) भी जुड़े हुए हैं। निथीश पर आरोप है कि वे नेविल रॉय सिंघम द्वारा फंड किए गए ‘ट्राइकॉन्टिनेंटल’ के ज़रिए चीनी सरकार के साथ काम करते हैं। निथीश नारायणन ने कई बार चीन का दौरा किया है। जांच रिपोर्ट्स में यह आशंका जताई जाती है कि ऐसे दौरों और संवादों के जरिए विदेशी जमीन से भारत विरोधी या पश्चिमी विरोधी नैरेटिव को वैचारिक खाद-पानी मिलता है, जिसका असर घरेलू राजनीति और छात्र आंदोलनों पर भी पड़ता है।

SFI, AISF, AISA, PSU, AISB और CJP कनेक्शन
भारत में, Gen-Z के नेतृत्व वाली ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ ने AISA और SFI जैसे वामपंथी छात्र संगठनों के साथ साझेदारी की है और मतदाता सूचियों तथा पूर्व की परीक्षा अनियमितताओं को लेकर जनता की चिंताओं को हवा देते हुए सड़क पर प्रदर्शन के अवसर तलाशे। 28 जून को, AISA (आइसा) की अध्यक्ष नेहा बोरा सहित तीन कार्यकर्ताओं ने जंतर-मंतर पर 23 दिनों की भूख हड़ताल शुरू की। AISA, CPI(ML) लिबरेशन का छात्र संगठन है। SFI (एसएफआई) और AISF (एआईएसएफ) जुलाई में इसमें शामिल हो गए, और शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा।

सितंबर 2026 में, उन्हीं संगठनों ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। 6 अक्टूबर को, वामपंथी और कम्युनिस्ट छात्र मोर्चों SFI, AISF, AISA, PSU और AISB ने 10 अक्टूबर को CJP (कॉकरोच जनता पार्टी) के विरोध प्रदर्शन में शामिल होने, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के लेकर सड़कों पर प्रदर्शन करने की घोषणा की। जबकि ये समूह भारत में जमीनी स्तर पर प्रदर्शन कर रहे हैं, इन्हें विदेशों से उन समूहों का समर्थन मिला है जो लंबे समय से भारत के हितों के खिलाफ काम करते रहे हैं। ऐसा ही एक समूह ‘इंडियन अलायंस पेरिस’ (IAP) है, जिसने फ्रांस और भारत के प्रदर्शनों के बीच समानताएं बताईं।

‘ग्लोबल कैओस’ का खतरनाक प्लान और आगे की योजनाएं
‘ग्लोबल ‘केओस इंक’ (Chaos Inc) बढ़कर 101 समूहों का हो गया है और ये नए सिरे से प्रदर्शन करने की योजना बना रहे हैं। इस नेटवर्क से जुड़े संगठन केवल स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे अपनी पहुंच को वैश्विक स्तर पर फैला रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इंटरनेशनल यूथ स्ट्राइक नेटवर्क यूरोप और अन्य क्षेत्रों में एक बड़ी समन्वित युवा हड़ताल की योजना बना रहा है। इसके घोषणापत्र में पूंजीवाद, युद्ध, भारी सैन्य खर्च और आर्थिक नीतियों के खिलाफ युवाओं को भड़काने का एजेंडा शामिल है। अभियानों के संचालन के लिए गुप्त टेलीग्राम ग्रुप्स, विशेष वेबसाइट्स और साझा पोस्टर्स का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे दुनिया के एक कोने में बैठे लोग दूसरे देश के आंदोलनों से तुरंत जुड़ सकें।

Leave a Reply