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देखिए, पीएम मोदी के खिलाफ सात साल में विरोधियों के सात फॉल्स नैरेटिव

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सफलतापूर्वक पहला कार्यकाल पूरा करने के बाद 30 मई 2019 को दोबारा प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। प्रधानमंत्री पद का दायित्व संभाले अब उन्हें सात साल पूरे हो चुके हैं। इतने दिनों के बाद उनकी सफलता और उपलब्धियों का जयगान तो दुनिया कर ही रही है, लेकिन यह समय उन नैरेटिव्स की विवेचना करने की भी है जो उनके विरोध में गढ़े गए और प्रसारित किए गए। इसका असर ये हुआ कि बेवजह समय का नुकसान हुआ, समय-समय पर भ्रम की स्थिति पैदा हुई और कहीं न कहीं देश की बदनामी भी हुई। वैश्विक महामारी की दूसरी लहर की वजह से आज देश लॉकडाउन, वैक्सीन्स और कोविड जैसे नए नैरेटिव से जूझ रहा है। लेकिन इस पर चर्चा करने से पहले आपको सात साल के उन 7 नैरेटिव्स के बारे में बता रहा हूं जो पीएम मोदी के खिलाफ गढ़े तो गए, लेकिन सारे के सारे झूठे साबित हो चुके हैं।

फॉल्स नैरेटिव के मास्टरमाइंड

आपको सातों नैरेटिव्स के बारे में बताऊं उससे पहले आपके लिए यह जानना जरूरी है कि इन नैरेटिव्स के पीछे आखिर कौन लोग हैं? संक्षेप में कहूं तो मोदी के खिलाफ फॉल्स नैरेटिव बनाने के पीछे आज भी वही लोग हैं जो वर्ष 2014 से पहले किसी भी सूरत में उन्हें देश का प्रधानमंत्री नहीं बनने देना चाहते थे। नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने तो मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर देश की जनता और भारतीय लोकतंत्र तक भला-बुरा कह गए। उन्होंने कहा कि भारत की जनता का यह फैसला उन्हें मंजूर नहीं है। यह वही अमर्त्य सेन है जिन्होंने 23 जुलाई 2013 को कहा था कि वह नरेंद्र मोदी को भारत का प्रधानमंत्री नहीं देखना चाहते। क्योंकि उनके राज में मुसलमान सुरक्षित नहीं है। यह बताना इसलिए आवश्यक है क्योंकि अब जो आप सात नैरेटिव्स के बारे में जानेंगे वे सब इससे जुड़े हैं।          

पहला– असहिष्णुता और अवार्ड वापसी

इन सात सालों में असहिष्णुता को लगातार पीएम मोदी के खिलाफ एक ठोस नैरेटिव बनाने का प्रयास किया गया। इसके लिए जो घटनाएं चुनीं गई वे सभी राज्य सरकार की कानून व्यवस्था से संबंधित थीं। लेकिन उन्हें पीएम मोदी के खिलाफ फॉल्स नैरेटिव के रूप में उपयोग किया गया। इसकी पहली घटना जो घटी थी वह साल 2015 में उत्तर प्रदेश में दादरी में अखलाख नाम के एक शख्स की हत्या हुई थी। फॉल्स नैरेटिव गढ़ने वालों ने इस घटना को भारतीय जनता पार्टी और मोदी सरकार की असहिष्णुता से जोड़ दिया। इतना ही नहीं राजस्थान के अलवर में पहलू खान की हत्या गौ तस्करी मामले में हुई थी, लेकिन इस घटना को भी मोदी के खिलाफ यूज किया गया, जबकि सच्चाई यह थी कि राज्य की कांग्रेस सरकार ने आरोपियों को निचली अदालत से बरी कराने के बाद फिर से इस मामने में मुकदमा शुरू कराया है। साल 2017 में लोकल ट्रेन में सीट को लेकर हुए झगड़े के दौरान जुनैद खान की हत्या हुई थी, लेकिन विरोधियों ने इस घटना को भी अलग रूप दे दिया। इसी प्रकार आमिर खान जैसे लोगों ने अपनी लोकप्रियता और स्टारडम के सहारे पीएम मोदी के खिलाफ फॉल्स नैरेटिव सेट किया।

दूसरा – रोहित वेमुला की आत्महत्या

17 जनवरी 2016 को हैदराबाद सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में पीएचडी कर रहे एक दलित छात्र रोहित वेमुला ने आत्महत्या कर ली। इस आत्महत्या को इस प्रकार से पेश किया गया कि मोदी राज में दलितों का उत्पीड़न बढ़ गया है। इसलिए छात्र ने आत्महत्या कर ली है। यह घटना जिस राज्य और राज्य सरकार से संबधित है उससे भाजपा या प्रधानमंत्री मोदी का दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। लेकिन इस बहाने देश की सभी यूनिवर्सिटी में फेक नैरेटिव तैयार करके छात्र आंदोलन भड़काने का काम किया गया। लेफ्ट एक्टिविस्ट कविता कृष्णन ने तो सीधे प्रधानमंत्री से सवाल दाग दिया था। इन फॉल्स नैरेटिव बनाने वाले को कौन समझाए कि कानून व्यवस्था का मामला राज्य सरकार का होता है। इस मामले से केंद्र सरकार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी का कोई लेना-देना नहीं है।    

तीसरा – सर्जिकल स्ट्राइक की मंशा पर सवाल

जिस सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक की वजह से पूरी दुनिया में मोदी सरकार, भारतीय सेना और देश का मान बढ़ा, फॉल्स नैरेटिव बनाने वालों ने उसी पर सवाल खड़ा कर दिया। पीएम मोदी के शासन काल में उरी सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयर स्ट्राइक आजाद भारत के इतिहास की बहुत बड़ी घटनाएं हैं। लेकिन देश विरोधियों ने सेना और पीएम मोदी की नीयत पर सवाल खडा़ कर दिया। मोदी विरोध में अंधे हो गए कुछ नेताओं ने तो स्ट्राइक के सबूत दिखाने पर अड़ गए। जो काम दुश्मन को करना चाहिए वह काम देश के भीतर बैठकर फॉल्स नैरेटिव गढ़ने वालों ने कर दिया। बाद में इससे पाकिस्तान ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मदद उठाने का भरसक प्यास किया, लेकिन वह सफिल नहीं हो पाया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने जहा इन स्ट्राइक के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर खून की दलाली करने तक का आरोप लगाया, वहीं कांग्रेस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर स्ट्राइक करने के सबूत तक मांग लिए।

चौथा – क्लीन राफेल सौदे पर भ्रष्टाचारी हमला 

लोकसभा चुनाव से पहले का समय भूल तो नहीं गए। इन राफेल विमानों को लेकर क्या कुछ नहीं किया गया। प्रधानमंत्री मोदी को बदनाम करने के लिए, उन्हें भ्रष्टाचारी साबित करने के लिए झूठ का पहाड़ खड़ा किया गया। और यहां तक कि चौकीदार चोर है जैसे असभ्य नारे गढ़े गए। जबकि सुप्रीम कोर्ट से लेकर फ्रांस की सरकार तक ने इस डील में किसी भी तरह की सौदेबाजी न होने की पुष्टि की। खास बात ये है कि अपने बयानों के दौरान राहुल गांधी कई बार कीमत बदली, सुप्रीम कोर्ट में माफी मांगी, लेकिन फिर भी नैरेटिव क्रिएट करने में लगे रहे। लेकिन आखिरकार जनता की अदालत में सत्य की जीत हुई। राफेल विमान भारत पहुंचकर अब चीन की सीमा पर देश के पराक्र्म को गौरवान्वित कर रहे हैं।

पांचवां – चीन मामले में भारत के खिलाफ माहौल

डोकलाम से गलवान तक एक बात कॉमन है। दोनों जगह चीन को भले ही भारत से मात खानी पड़ी हो, लेकिन भारत के भीतर ऐसा फॉल्स नैरेटिव तैयार करने की कोशिश की गई, जिससे सेना और देश का मनोबल तोड़ने का प्रयास हुआ। इतिहास की किताबों में दर्ज है कि चीन ने किस प्रकार 1962 में भारत की जमीन छीन ली… लेकिन नैरेटिव ऐसा तैयार किया गया मानो सब कुछ मोदी सरकार में हुआ हो। हालांकि देश को बाद में ये पता चला कि सीमा विवाद के कारण आज भारत न केवल चीन को हर प्रकार से जवाब दे रहा है, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के जरिए भी उसे अलग-थलग कर दिया है। यही नहीं पहली बार भारत ने चीन को आर्थिक मोर्चे पर भी जबरदस्त झटका दिया है। 

छठा – अनुच्छेद 370 और सीएए पर फेक नैरेटिव

संविधान के अनुच्छेद 370 या फिर सीएए संशोधन की बात हो… दोनों ही मुद्दों पर फॉल्स नैरेटिव बनाया गया कि देश में मुसलमान असुरक्षित हो रहे हैं। देश में मुसलमानों को अलग करने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन अनुच्छेद 370 हटाने के बाद आज जम्मू कश्मीर शांत है, वहां आतंकी घटनाएं नहीं हो रही हैं। पाकिस्तान भी अब रास्ते पर आ गया है। उसने एकतरफा सीजफायर की घोषणा कर रखी है। वहीं दूसरी तरफ सीएए को मुसलमानों से जोड़कर फॉल्स नैरेटिव ये बनाया गया कि उन्हें इस देश से बाहर करने की कोशिश की जा रही है, जबकि इस कानून का सीधा मतलब पड़ोसी देशों के पीड़ित अल्पसंख्यकों से है।

सातवां – कृषि कानूनों को किसान के खिलाफ बताना

संसद में कृषि कानून पास होते ही प्रधानमंत्री के विरोधियों ने इस कानून को किसान के खिलाफ बताना शुरू कर दिया। इस नए कानून की आड़ में किसानों की जमीन हड़प लेने और एमएसपी खत्म देने का फॉल्स नैरेटिव तैयार किया गया। जबकि सच्चाई यह है कि यह कानून किसानों को और अधिकार देता है। वे अपनी फसल जहां चाहे बेच सके, जिससे चाहे एग्रीमेंट कर सके, जब चाहे तब बेच सके। जितना चाहे अनाज रख सके। यह आजादी देश के किसानों को पहले कभी नहीं मिली थी। जो एमएसपी खत्म होने की बात कर रहे थे, उन्हें पता होना चाहिए कि आज हरियाणा और पंजाब में सबसे अधिक एमएसपी सीधे किसानों के खाते में दी गई है।

कोविड काल के वर्तमान फॉल्स नैरेटिव

वैश्विक महामारी कोरोना काल की पहली लहर में जब पीएम ने देश में लॉकडाउन लगाकर देशवासियों की रक्षा की तय यह कह कर आलोचना की गई कि लॉकडाउन एक गलत फैसला था। अब जब कोरोना की दूसरी लहर के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने मांग के अनुरूप राज्य सरकारों को जिम्मेदारी दे दी तो यह कहकर आलोचना शुरू हो गई कि प्रधानमंत्री को देशव्यापी लॉकडॉउन की घोषणा करनी चाहिए थी। इस प्रकार शुरू में वैक्सीन को लेकर देश में भ्रम फैलाया गया, लेकिन उसकी अहमियत समझ में आने के बाद अब देश में यह फॉल्स नैरेटिव सेट किया जा रहा है पीएम मोदी देशवासियों को वैक्सीन लगाने ही नहीं देना चाहते। इस प्रकार के फॉल्स नैरेटिव सेट करने की पीछे की मंशा साफ झलकती है।

फॉल्स नैरेटिव के साथ देश की स्थिति को जानिए

नैरेटिव्स के असर को जानने से पहले देश की वर्तमान स्थिति के बारे में एक कहानी जानिए। एक बार एक नाव बीच नदी में डूब गई, शिकायत राजा तक पहुंची। राजा के दरबार में पेशी हुई। राजा ने नाविक से हर वो संभव सवाल पूछे, जिससे नाव डूब सकती थी। लेकिन नाविक ने कहा कि न तो नाव में छेद था? न सवारी ज्यादा बिठाई। आंधी-तूफान भी नहीं था। मदिरा पान भी नहीं किया था। तो फिर राजा ने पूछा कि आखिर नाव डूबी कैसे। तो नाविक ने बताया कि दरअसल किसी ने नाव के भीतर थूक दिया था। और जब मैंने थूकने पर मना किया तो वह झगड़ा करने लगा और कहा कि थूकने से कोई तुम्हारी नाव डूब तो नहीं जाएगी। हम पैसे देते हैं और तुम हमें उस पार ले जा रहे हो। झगड़ा बढ़ता गया और नाव में दो खेमे हो गए। कुछ लोग मेरे साथ थे, कुछ उग्र लोग उसके साथ हो गए। हालांकि अधिकतर लोग चुपचाप बैठे थे। लेकिन थूकने वाले के साथ खड़े लोगों ने मारपीट शुरू कर दी। महाराज मैंने रोका भी, लेकिन वो नहीं रुके और नाव डूब गई। इस कहानी में डूबने वाली नाव एक देश है, जो थूका जा रहा है वह नैरेटिव है। थूकने के पक्ष में लड़ने वाले सत्ताकांक्षी हैं और चूपचाप बैठने वाली देश की जनता।

 

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