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‘भोर भयो, बिन शोर, मन मोर…’ जीव और प्रकृति के प्रति अनुराग व्यक्त करते हुए पीएम मोदी ने रची कविता

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की व्यस्तता जगजाहिर है, लेकिन इसके बावजूद वे अपने विचार एवं उद्गार समय समय पर सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों के जरिए शेयर करते रहते हैं। उन्होंने एक नई कविता के जरिए जीव और प्रकृति के प्रति अपने अनुराग को सोशल मीडिया पर साझा किया है। इस कविता के माध्यम में पीएम मोदी ने प्रकृति और जीव के साथ शिव के रिश्ते को प्रमुखता से उल्लेखित किया है। उन्होंने कविता में लिखा है कि जीवात्मा ही शिवात्मा यानि हर जीव में शिव विद्यमान है। कविता इस प्रकार: 

भोर भयो, बिन शोर,
मन मोर, भयो विभोर,
रग-रग है रंगा, नीला भूरा श्याम सुहाना,
मनमोहक, मोर निराला।

रंग है, पर राग नहीं,
विराग का विश्वास यही,
न चाह, न वाह, न आह,
गूँजे घर-घर आज भी गान,
जिये तो मुरली के साथ
जाये तो मुरलीधर के ताज।

जीवात्मा ही शिवात्मा,
अंतर्मन की अनंत धारा
मन मंदिर में उजियारा सारा,
बिन वाद-विवाद, संवाद
बिन सुर-स्वर, संदेश
मोर चहकता मौन महकता।

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भोर भयो, बिन शोर, मन मोर, भयो विभोर, रग-रग है रंगा, नीला भूरा श्याम सुहाना, मनमोहक, मोर निराला। रंग है, पर राग नहीं, विराग का विश्वास यही, न चाह, न वाह, न आह, गूँजे घर-घर आज भी गान, जिये तो मुरली के साथ जाये तो मुरलीधर के ताज। जीवात्मा ही शिवात्मा, अंतर्मन की अनंत धारा मन मंदिर में उजियारा सारा, बिन वाद-विवाद, संवाद बिन सुर-स्वर, संदेश मोर चहकता मौन महकता।

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इंस्टाग्राम, ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया पर शेयर इस कविता के साथ एक वीडियो भी शेयर किया है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जमीन पर बैठे हैं और एक मोर को दाना खिला रहे हैं। इसके अलावा लॉन में टहलते वक्त उनके आस-पास मोर दिखाई दे रहे हैं। 

प्रधानमंत्री मोदी पहले भी कई मौकों पर कविता के जरिए प्रकृति के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त कर चुके हैं। इससे पहले उन्होंने तमिलनाडु के प्राचीन शहर महाबलिपुरम में समुद्र किनारे चहलकदमी करते वक्त सौंदर्य और उसमें छिपे जीवन-दर्शन को खोजकर कविता रचने से खुद को रोक नहीं सके थे। तब उन्होंने कविता के माध्यम से अपने विचारों को व्यक्त किया था। 

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