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पीएम मोदी के विजन का कमाल, भारत को तेल बेचने वाला रूस, इन 5 कारणों से हमसे खरीदने लगा पेट्रोल

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विश्व ऊर्जा राजनीति में शायद ही किसी ने एक दशक पहले कल्पना की होगी कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों में शामिल रूस को भारत से पेट्रोल खरीदना पड़ेगा। लेकिन पीएम नरेन्द्र मोदी की विजनरी नीतियों और आत्मनिर्भर भारत को धरातल पर उतारने के लिए वे लगातार देश की ऊर्जा क्षमताओं में वृद्धि कर रहे हैं। उन्होंने हाल ही में राजस्थान में एक नई रिफाइनरी का शुभारंभ किया है। दरअसल, अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स की हालिया रिपोर्ट भारत की इसी बदलती वैश्विक तस्वीर पेश करती है। रिपोर्ट के अनुसार रूस ने भारत से लगभग 60 हजार टन पेट्रोल खरीदा है और इसके लिए दो बड़े टैंकर रूस की ओर रवाना हो चुके हैं। यह केवल एक व्यापारिक सौदा नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा संतुलन में भारत की बदलती भूमिका का प्रतीक है। जो देश कभी अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर था, वही आज परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पादों का भरोसेमंद निर्यातक बन चुका है।

एक दशक की ऊर्जा नीति, रिफाइनिंग क्षमता और संतुलित विदेश नीति
इस घटनाक्रम को केवल रूस की मजबूरी के रूप में देखना अधूरा विश्लेषण होगा। रूस को यूक्रेन युद्ध के दौरान ड्रोन हमलों के कारण अपनी कई रिफाइनरियों में उत्पादन संबंधी बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। घरेलू बाजार में पेट्रोल की उपलब्धता बनाए रखने के लिए उसे आयात करना पड़ा। लेकिन प्रश्न यह है कि रूस ने भारत को क्यों चुना? इसका उत्तर पीएम मोदी की पिछले एक दशक की ऊर्जा नीति, रिफाइनिंग क्षमता, संतुलित विदेश नीति और रणनीतिक निवेशों में छिपा है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने केवल सस्ता कच्चा तेल खरीदने की नीति नहीं अपनाई, बल्कि उसे मूल्यवर्धित उत्पाद में बदलकर वैश्विक ऊर्जा बाजार में अपनी नई पहचान भी बनाई। यही कारण है कि आज भारत ऊर्जा सुरक्षा का उपभोक्ता भर नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुका है।

आइए, उन अहम कारणों की पड़ताल करते हैं, जिनके चलते भारत को कच्चा तेल बेचने वाला रूस आज हमसे पेट्रोल खरीद रहा है….

कारण नंबर-1
देश में बीते दशक में रिफाइनिंग क्षमता में क्रांतिकारी विस्तार
पीएम मोदी के विजन ने पिछले एक दशक में भारत की विशाल रिफाइनिंग क्षमता को सबसे बड़ी ताकत बनाया है। आज देश की कुल रिफाइनिंग क्षमता लगभग 260 मिलियन टन प्रति वर्ष (MMTPA) से अधिक है, जो भारत को दुनिया के सबसे बड़े रिफाइनिंग देशों में शामिल करती है। गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा, दक्षिण भारत और अब राजस्थान की आधुनिक रिफाइनरियां केवल घरेलू जरूरतें ही पूरी नहीं करतीं, बल्कि एशिया, यूरोप और अफ्रीका तक पेट्रोल, डीजल और एविएशन फ्यूल का निर्यात करती हैं। मोदी सरकार ने रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाने, बंदरगाहों को आधुनिक बनाने और पेट्रोकेमिकल निवेश को प्रोत्साहित करने पर लगातार जोर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि भारत केवल कच्चा तेल खरीदने वाला देश नहीं रहा, बल्कि उसे उच्च गुणवत्ता वाले पेट्रोलियम उत्पादों में बदलकर वैश्विक बाजार में बेचने वाला प्रमुख खिलाड़ी बन गया। रूस द्वारा भारत से पेट्रोल खरीदना इसी क्षमता की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता है।कारण नंबर-2
विदेश नीति : प्रतिबंधों के बीच भी राष्ट्रीय हित सर्वोपरि
यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर व्यापक आर्थिक प्रतिबंध लगाए। अनेक देशों ने रूसी तेल खरीदना कम कर दिया, लेकिन भारत ने स्पष्ट किया कि उसकी प्राथमिकता अपने नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा है। प्रधानमंत्री मोदी सरकार ने किसी भी वैश्विक दबाव के बजाय राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देते हुए रूस से रियायती दरों पर कच्चे तेल का आयात जारी रखा। भारत ने अमेरिका की तनातनी की भी कोई परवाह नहीं की और साफ संकेत दिए कि उसकी पहली प्राथमिकता देशवासियों का हित है। यही निर्णय बाद में भारत के लिए आर्थिक लाभ का बड़ा स्रोत बना। सस्ते रूसी कच्चे तेल ने भारतीय रिफाइनरियों की लागत घटाई और उन्हें वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाया। भारत ने एक ओर रूस से तेल खरीदा तो दूसरी ओर अमेरिका, यूरोप, पश्चिम एशिया और इंडो-पैसिफिक देशों के साथ भी अपने संबंध मजबूत बनाए। यह बहुध्रुवीय कूटनीति ही भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक शक्ति बनकर उभरी।कारण नंबर-3
नई ऊर्जा इकोनॉमी : ‘क्रूड खरीदो, वैल्यू एडिशन करो’
मोदी सरकार की ऊर्जा रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू केवल तेल आयात नहीं, बल्कि वैल्यू एडिशन रहा। भारत ने सस्ते कच्चे तेल को आधुनिक रिफाइनरियों में परिष्कृत कर पेट्रोल, डीजल, एटीएफ और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों में बदला और फिर उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजार में निर्यात किया। इस रणनीति ने भारतीय कंपनियों को भारी आर्थिक लाभ दिया। परिष्कृत उत्पादों का मूल्य कच्चे तेल की तुलना में कहीं अधिक होता है। परिणामस्वरूप भारत ने ऊर्जा व्यापार में केवल खरीदार नहीं, बल्कि मूल्य सृजित करने वाले देश की भूमिका निभाई। रूस से आयातित कच्चा तेल भारत में परिष्कृत होकर अनेक देशों तक पहुंचा। अब जब रूस की कुछ रिफाइनरियां दबाव में हैं, तो वही रूस भारत से तैयार पेट्रोल खरीद रहा है। यह वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारत की नई स्थिति को दर्शाता है।कारण नंबर-4
देश में संकट के समय भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता बनने की क्षमता
वैश्विक ऊर्जा व्यापार में केवल उत्पादन पर्याप्त नहीं, समय पर आपूर्ति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। रूस की रिफाइनरियों पर यूक्रेन के ड्रोन हमलों के बाद तत्काल पेट्रोल उपलब्ध कराना आसान नहीं था। ऐसे समय भारत ने अपनी मजबूत लॉजिस्टिक व्यवस्था, आधुनिक बंदरगाहों और निर्यात क्षमता के कारण तेजी से आपूर्ति सुनिश्चित की। यही कारण है कि भारत आज केवल एशियाई बाजार तक सीमित नहीं है। भारतीय रिफाइनरियां यूरोप, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका तक पेट्रोलियम उत्पाद भेज रही हैं। वैश्विक संकट के समय विश्वसनीय आपूर्ति श्रृंखला के रूप में भारत की यह प्रतिष्ठा पिछले एक दशक में विकसित हुई है। यह क्षमता अचानक नहीं बनी, बल्कि बंदरगाह विकास, निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की रिफाइनरियों में निवेश तथा व्यापारिक सुधारों का परिणाम है।कारण नंबर-5
रूस का भारत से पेट्रोल खरीदना व्यापक ऊर्जा कूटनीति का प्रतीक
मोदी सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा को केवल तेल खरीदने का विषय नहीं माना। सामरिक पेट्रोलियम भंडार, विविध देशों से ऊर्जा आयात, हरित ऊर्जा में निवेश, प्राकृतिक गैस अवसंरचना, इथेनॉल मिश्रण, सौर ऊर्जा और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में समानांतर निवेश ने भारत की ऊर्जा नीति को बहुआयामी बनाया है। आज भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता होने के साथ-साथ परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पादों का प्रमुख निर्यातक भी है। रूस द्वारा भारत से पेट्रोल खरीदना इस व्यापक रणनीति का प्रतीक है। यह कहना उचित नहीं होगा कि रूस केवल मोदी सरकार की नीतियों के कारण भारत से पेट्रोल खरीद रहा है; तत्काल कारण रूस की घरेलू रिफाइनिंग चुनौतियां हैं। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि यदि भारत ने पिछले एक दशक में अपनी रिफाइनिंग क्षमता, ऊर्जा अवसंरचना और रणनीतिक विदेश नीति को मजबूत नहीं किया होता, तो वह इस अवसर का लाभ उठाने की स्थिति में भी नहीं होता।भारत के ऊर्जा आत्मनिर्भरता से ऊर्जा नेतृत्व की ओर कदम
रूस द्वारा भारत से पेट्रोल खरीदना केवल एक कारोबारी सौदा नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन का संकेत है। कभी भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर था। आज वही भारत मूल्यवर्धित पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात कर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला में निर्णायक भूमिका निभा रहा है। रूस की वर्तमान आवश्यकता परिस्थितिजन्य है, लेकिन भारत की क्षमता दीर्घकालिक रणनीतिक निवेशों का परिणाम है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में अपनाई गई ऊर्जा नीति ने भारत को सस्ते कच्चे तेल का खरीदार भर नहीं रहने दिया, बल्कि उसे आधुनिक रिफाइनिंग, वैश्विक ऊर्जा व्यापार और रणनीतिक कूटनीति का केंद्र बनाया। आने वाले वर्षों में यदि यही गति बनी रहती है, तो भारत केवल “ऊर्जा सुरक्षित राष्ट्र” ही नहीं, बल्कि “ऊर्जा नेतृत्व करने वाली वैश्विक शक्ति” के रूप में भी अपनी पहचान स्थापित कर सकता है।

 

दुनिया को तेल बेचने वाले रूस में तेल की कमी कैसे हो गई है?
रूस-यूक्रेन जंग शुरू होने के बाद से यूक्रेन लगातार रूसी ऑयल इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बना रहा है। मार्च 2026 से अब तक रूस की ऑयल रिफाइनरी पर 50 से ज्यादा हमले किए हैं। 4 जुलाई को यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने बताया कि यूक्रेन की सीमा से करीब 850 किमी अंदर रूस के सेंट पीटर्सबर्ग की रिफाइनरी पर ड्रोन अटैक किया है। इस रिफाइनरी से हर साल 1.25 करोड़ टन पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स बनते हैं। 3 जून को भी इस रिफाइनरी पर हमला हुआ था। इसके अलावा 18 जून को मॉस्को के बाहरी इलाकों में स्थित रिफाइनरी पर हमला हुआ। यूक्रेनी मीडिया के मुताबिक, रूस की टॉप-10 रिफाइनरियों में से 8 पर यूक्रेन हमले कर चुका है।

रिफाइनरियों पर हुए हमले से रूस में पेट्रोल की कमी हुई…
• रूस की रिफाइनिंग क्षमता 42.7% तक घटी है। तेल के 60 भंडार बुरी तरह डैमेज हुए हैं। इनमें रूस के 58% पेट्रोलियम उत्पाद यानी पेट्रोल और डीजल वगैरह और 42% कच्चा तेल था।
• न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, पिछले साल जून की तुलना में इस साल रूस का टोटल ऑयल प्रोडक्शन 25% कम हुआ।
• रूस में गैसोलीन, यानी पेट्रोल उत्पादन जो पिछले साल जून में रोजाना 10 लाख बैरल से घटकर इस साल करीब 8.5 लाख प्रति बैरल रह गया है। यानी 17% की गिरावट।
• अगस्त 2025 से अब तक रूस को 13.5 बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ है। रूस के 83 में से 55 से ज्यादा इलाकों में पेट्रोल-डीजल की बिक्री पर पाबंदियां लग चुकी हैं।
• रूस की सरकारी तेल कंपनियों ने अभी फ्यूल प्राइस नहीं बढ़ाए हैं, लेकिन निजी पेट्रोल पंपों पर कीमतें बढ़ गई हैं।
• तेल रिफाइन करने की क्षमता कम होने का असर उन इलाकों में भी है, जहां यूक्रेन ने रिफाइनरी पर अटैक नहीं किया है।
• रूस में साइबेरिया के ओम्स्क इलाके में पूरे साइबेरिया की सबसे बड़ी रिफाइनरी है, लेकिन उस पर कोई हमला नहीं हुआ है। इसके बावजूद यहां लोग सिर्फ 40 लीटर तक पेट्रोल खरीद सकते हैं।
• साइबेरिया के जबायकाल्स्की इलाके में कचरा उठाने वाली कंपनी ने काम बंद कर दिया है। यहां बस सर्विस में कटौती की गई है।
• रूस के शहर इरकुत्स्क में फ्यूल की कमी से पब्लिक ट्रांसपोर्ट महंगा हो गया है। पेट्रोल पंपों के बाहर इतनी लंबी लाइनें लगीं कि लोगों के लिए पोर्टेबल टॉयलेट की व्यवस्था करनी पड़ी।

 

 

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