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अरुंधति रॉय ने सरकार के खिलाफ किसानों को भड़काया, फिर नक्सलियों का किया बचाव

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अर्बन नक्सलियों यानि तथाकथित वामपंथी बुद्धिजीवियों को न तो देश के संविधान में विश्वास है और न ही लोकतंत्र में। उन्हें सिर्फ हथियार और आतंक पर भरोसा है। वे अपनी बातों को मनवाने के लिए भोले-भाले आदिवासियों को गुमराह कर सरकार के खिलाफ हथियार उठाने के लिए भड़कते हैं। ऐसा ही 9 जनवरी को बहादुरगढ़ में देखने को मिला, जब विवादित लेखिका अरुंधति रॉय ने एक धरना-प्रदर्शन स्थल पर भारतीय किसान यूनियन के सदस्यों की एक सभा को संबोधित किया और किसानों को भी नक्सलियों की राह पर चलने के लिए भड़काया।

किसानों से बात करते हुए अरुंधति रॉय ने कहा कि मुझे यहां बहुत पहले आना चाहिये था, लेकिन मैं इसलिए नहीं आई कि कहीं सरकार आपका कोई नामकरण न कर दे। कहीं आपको आतंकवादी, नक्सलवादी या माओवादी न करार दे। ऐसा मेरे साथ बहुत पहले कई बार हो चुका है। मैं नहीं चाहती थी कि जो कुछ मुझे कहा जाता रहा है वह आपको भी कहा जाये जैसे कि टुकड़े-टुकड़े गैंग, खान मार्केट गैंग, माओवादी वगैरा। मुझे आशंका थी कि कहीं गोदी मीडिया द्वारा ये नाम आप पर भी न थोप दिए जाए। लेकिन आपका नामकरण तो उन्होंने पहले ही कर दिया है। 

अरुंधति रॉय ने कहा कि पूरा देश ‘किसानों’ को दिल्ली की सीमा पर देख रहा है और उन पर अपनी उम्मीदें टटोल रहा है। किसानों ने उन वास्तविकताओं को जमीन पर लाया है, जिसे उसके जैसे लोग पिछले 20 वर्षों से लिख रहे थे। गौरतलब है कि अरुंधति रॉय वही लेखिका हैं जिन्होंने सशस्त्र आतंकवादियों और नक्सलियों को ‘बंदूकों के साथ गाँधीवाद’ की संज्ञा दी थी।

किसानों को भड़काने की मंशा से अरुंधति रॉय ने कहा कि सरकार किसानोंं के साथ जो भी कर रही है या करने जा रही है, वो ठीक वैसा ही जैसा उन्होंने ‘बस्तर में लड़ने वालों के साथ’ किया। इस दौरान बस्तर के नक्सलियों के कार्यों का बचाव करते हुए अरुंधति रॉय ने कहा कि वे ‘लड़ाई’ लड़ रहे हैं क्योंकि सरकार ने आदिवासियों के जल, जंगल, ज़मीन को छीन लिया और इसे बड़े उद्योगपतियों को दे दिया। वह फिर कहती है कि किसानों के साथ वही खेल खेला जा रहा है।

देश के उद्योगपतियों और मीडिया के खिलाफ भड़काते हुए अरुंधति रॉय ने कहा कि हर चुनाव से पहले ये लोग आपके साथ खड़े होते हैं, आपसे वोट मांगते हैं और चुनाव खत्म होते ही ये जाकर सीधे अम्बानी, अडानी, पतंजलि और बाहर की बड़ी-बड़ी कम्पनियों के साथ जाकर खड़े हो जाते हैं। अकेले अम्बानी के पास 27 मीडिया चैनल हैं। वे भला हमें क्या खबर देंगे और क्या दिखाएंगे ! मीडिया में सिर्फ और सिर्फ कोर्पोरेट का विज्ञापन है। वे हमें ख़बरें नहीं देंगे बल्कि हमें सिर्फ गालियां देंगे और अजीब-अजीब नाम देंगे। अब आप लोगों को भी समझ आ गया है कि आपके आन्दोलन में मीडिया का क्या रोल है। यह बहुत खतरनाक है। ऐसा मीडिया दुनिया में कहीं नहीं है।

अरुंधति रॉय का प्रयास न केवल प्रदर्शन पर बैठे तथाकथित किसानों को अपनी बात मनवाने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार करना है। साथ ही यह सुनिश्चित करना है कि वे सरकार के खिलाफ रहें, बल्कि यह भी है कि वो ‘बेरोजगार बुद्धिजीवियों’ के कहने पर उन नक्सलियों का भी बचाव करें जो राज्य के खिलाफ लड़ रहे हैं और पुलिसकर्मियों की हत्या कर रहे हैं। ये तथाकथित बुद्धिजीवी अपने शब्द जाल और उद्योगपतियों का डर दिखाकर किसानों में भी अपनी पैठ बनाना चाहते हैं। उनके लिए आदिवासी और किसान सिर्फ मोहरा है। वे इनके माध्यम से अपने एजेंडों को लागू करना चहाते हैं, जिसकी प्रेरणा कहीं और से मिलती है।

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