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3000 Days of PM Modi: दुनिया का सबसे सस्ता दवाखाना बना भारत, 2030 तक फार्मा निर्यात 70 अरब डॉलर तक पहुंचेगा

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज (12 अगस्त-2022) तीन हजार दिन पूरे कर लिए। वे गैर कांग्रेसी पहले और देश के चौथे प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने पीएम पद पर 3000 दिन पूरे किए हैं। पीएम मोदी के कार्यकाल में भारत ने फार्मा सेक्टर के निर्यात के मोर्चे पर बेहद दमदार प्रदर्शन किया है। अगर कहा जाए कि भारत दुनिया का सस्ता दवाखाना बन रहा है, तो यह कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। यह सब हो रहा है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेरणा से जिन्होंने देश की सत्ता संभालने के बाद कहा था…”मैं देश नहीं झुकने दूंगा।” पीएम मोदी ने 26 मई 2014 में देश सत्ता संभालने के बाद हर सेक्टर के विकास पर जोर दिया है और यही वजह है कि फार्मा सेक्टर ने पिछले आठ साल में निर्यात में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की है।

भारतीय औषधि उद्योग को वैश्विक बाजार में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए समर्थ बनाया
पीएम मोदी कार्यकाल के पिछले 3000 दिनों में इसमें करीब 10 बिलियन अमरीकी डॉलर की उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसमें खास बात यह है कि कोरोना काल में विभिन्न बाधाओं के बावजूद भारतीय फार्मा कंपनियों ने बेहतर प्रदर्शन किया है। भारतीय औषधि उद्योग को वैश्विक बाजार में अग्रणी भूमिका निभाने हेतु समर्थ बनाना और आम उपभोग के लिए अच्छी गुणवत्ताओं वाले औषध उत्पादों का उचित मूल्यों पर देश के अंदर प्रचुर उपलब्धता सुनिश्चित करना केंद्र सरकार का अहम लक्ष्य है जिसे पूरा करने के लिए निरंतर प्रयास जारी हैं।

तीन हजार दिनों में फार्मा निर्यात में 150% से अधिक की वृद्धि

अप्रैल-जून 2013-14 में देश से दवाओं एवं अन्य मेडिकल उत्पादों का निर्यात जहां 15,260 करोड़ रुपये का था वहीं अप्रैल-जून 2022-23 में यह बढ़कर 37,609 करोड़ रुपये हो गए। पिछले 3000 दिनों में निर्यात में 150 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि दर्ज की गई है। यह सब पीएम के देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने एवं देश को दुनिया के मंच पर आगे बढ़ाने की पहल से संभव हो पाया है। फार्मा सेक्टर का यह अब तक का सर्वश्रेष्ठ निर्यात प्रदर्शन है। देश और दुनिया को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने के साथ ही भारतीय फार्मा सेक्टर ने आवश्यक चिकित्सा उपकरणों की आपूर्ति भी निर्बाध रूप से की है। वहीं इस दौरान लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्टेशन जैसी सुविधाओं के लिए केंद्र सरकार की तरफ से काफी सहायता की गई है। इन्हीं कारणों से आज देश का फार्मा सेक्टर इस मुकाम पर पहुंच गया है।वर्ष 2030 तक फार्मा निर्यात 70 अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना

वर्ष 2030 तक फार्मा निर्यात में हर साल कम से कम पांच अरब डॉलर की बढ़ोतरी की उम्मीद की जा रही है। फार्मा एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के मुताबिक गत वित्त वर्ष 2021-22 में भारत का फार्मा निर्यात 24.47 अरब डॉलर का रहा जो वर्ष 2030 तक 70 अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना है।

भारत का फार्मा बाजार 50 अरब डॉलर का

भारत का फार्मा बाजार करीब 50 अरब डॉलर का है। इनमें 22 अरब डॉलर का कारोबार घरेलू स्तर पर होता है। सबसे बड़ी बात है कि भारत सस्ती दवा (जेनेरिक दवा) बनाता है और फिलहाल विश्व की 20 फीसद जेनेरिक दवा का सप्लायर भारत है। दुनिया में लगने वाली 60 फीसद वैक्सीन का सप्लायर भी भारत है। भारत प्रोडक्शन की मात्रा के मामले में दुनिया में तीसरे और मूल्य के हिसाब से 14वें नंबर पर है। ग्लोबल एक्सपोर्ट में फार्मास्यूटिकल्स और दवाओं की हिस्सेदारी 5.92 प्रतिशत है। देश के कुल एक्सपोर्ट में फॉर्मूलेशन और बायोलॉजिकल का हिस्सा 73.31 प्रतिशत है। इसके बाद बल्क ड्रग्स और ड्रग इंटरमीडिएट का हिस्सा है।इन देशों में सबसे अधिक एक्सपोर्ट

भारत टॉप के जिन पांच देशों में फार्मा का एक्सपोर्ट करता है, उनमें अमेरिका, ब्रिटेन, दक्षिण अफ्रीका, रूस और नाइजीरिया शामिल हैं। कॉमर्स मिनिस्ट्री के मुताबिक, वित्त वर्ष 2020-21 में दुनियाभर में फैली कोरोना महामारी के दौरान भारतीय दवाओं और फार्मास्यूटिकल्स ने 18 फीसदी की तेज वृद्धि के साथ 24.4 बिलियन अमरीकी डॉलर का एक्सपोर्ट किया था।

फार्मेसी ऑफ वर्ल्ड बना भारत

याद हो, अप्रैल 2021 में पीएम मोदी ने कहा था, यह दवा उद्योग के प्रयासों का परिणाम है कि आज भारत को ‘फार्मेसी ऑफ वर्ल्ड’ के रूप में जाना जाता है। जी हां, महामारी के दौरान दुनिया भर में 150 से ज्यादा देशों में आवश्यक दवाएं उपलब्ध कराई गईं। तमाम चुनौतियों के बावजूद, भारतीय दवा उद्योग ने निर्यात में जबरदस्त वृद्धि दर्ज की है, जो इसकी क्षमता को दर्शाता है।दुनिया के 206 देशों में भारत करता है दवाओं की सप्‍लाई

फार्मा निर्यातकों के मुताबिक भारत पहले से ही वैश्विक दवाखाना है क्योंकि दुनिया के 206 देशों में किसी न किसी रूप में भारतीय दवा की सप्लाई होती है। लेकिन अब उन देशों में भी भारत की सस्ती दवाएं सप्लाई होंगी जिन्हें भारत की सस्ती दवा पर बहुत भरोसा नहीं था। भारत हेपेटाइटिस बी से लेकर एचआईवी व कैंसर जैसी घातक बीमारियों के लिए दुनिया की दवा के मुकाबले काफी सस्ती दवा बनाता है। हाल ही में यूएई और आस्ट्रेलिया से भारत ने जो व्यापार समझौता किया है, उससे भी भारतीय फार्मा निर्यात को बड़ा लाभ मिलने जा रहा है। आस्ट्रेलिया में भारत अभी सिर्फ 34 करोड़ डॉलर का फार्मा निर्यात करता था जो अब एक अरब डॉलर के स्तर तक जा सकता है क्योंकि भारतीय दवा आस्ट्रेलिया में बिकने वाली दवा के मुकाबले काफी सस्ती है और यह बात आस्ट्रेलिया सरकार को समझ में आ गई है। यूएई के बाजार से भारतीय दवा अफ्रीका के देशों में जाएंगी। दक्षिण अमेरिका के देश भी भारत की सस्ती दवाओं के लिए अपने दरवाजे खोल रहे हैं।

अब रूस भी भारत से दवाएं खरीदेगा

फार्मा एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के चेयरमैन दिनेश दुआ ने बताया कि अब तक भारत से दवा खरीदने में परहेज रखने वाला देश रूस भी अब भारतीय दवा की मांग कर रहा है। क्योंकि रूस को अब अमेरिका व यूरोप से दवा नहीं मिलने वाला है। यूरोपीय संघ, ब्रिटेन व कनाडा के साथ व्यापार समझौता होने से इन देशों के बाजार में भारतीय जेनेरिक दवा की पैठ और बढ़ेगी।पीएलआई स्कीम की घोषणा के बाद 35 एपीआई का उत्पादन शुरू

दवा के कच्चे माल के उत्पादन के लिए प्रोडक्शन लिंक्‍ड स्कीम (पीएलआई) की घोषणा के बाद 35 एपीआई (एक्टिव फार्मास्युटिकल्स इंग्रिडिएंट्स) का उत्पादन शुरू कर दिया गया है जिनका अब तक भारत चीन से आयात करता था। रसायन व खाद मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक एपीआई उत्पादन में बढ़ोतरी को लेकर पीएलआई स्कीम की घोषणा के बाद 35 उन एपीआई का उत्पादन शुरू हो चुका है जिनका अब तक हम आयात करते थे। पीएलआई स्कीम के तहत 53 एपीआई को उत्पादन के लिए चिन्हित किया गया है और इसके लिए 32 नए प्लांट लगाए गए हैं। भारत हर साल 2.8 अरब डॉलर का एपीआई व अन्य कच्चे माल का आयात चीन से करता है, लेकिन दूसरी तरफ भारत 4.8 अरब डॉलर के एपीआई व दवा के अन्य कच्चे माल का निर्यात भी करता है। आयात होने वाले एपीआई का उत्पादन शुरू होने से निश्चित रूप से भारत पूरी तरह से फार्मा सेक्टर में आत्मनिर्भर हो जाएगा।विश्व के 60% टीके तथा 20% जेनेरिक दवाएं भारत से

अपनी कीमत प्रतिस्पर्धात्मकता और अच्छी गुणवत्ता के कारण सक्षम भारतीय फार्मा कंपनियों ने वैश्विक पहचान बनाई है, जिसमें विश्व के 60% टीके तथा 20% जेनेरिक दवाएं भारत से आती हैं। भारत की फार्मा सफलता गाथा के पीछे हमारी विश्व स्तरीय विनिर्माण उत्कृष्टता, मजबूत बुनियादी ढांचा, लागत-प्रतिस्पर्धात्मकता, प्रशिक्षित मानव पूंजी तथा नवोन्मेष है। भारतीय फार्मास्युटिकल उद्योग का वर्तमान बाजार आकार लगभग 50 बिलियन डॉलर है।भारत ने 97 से अधिक देशों को टीके भेजे

भारत के टीका (वैक्सीन) उद्योग ने अमेरिका तथा यूरोपीय संघ जैसे विकसित देशों के मुकाबले सबसे कम समय में ICMR तथा NIV जैसे भारत के अनुसंधान संस्थानों के सहयोग से स्वदेशी प्रौद्योगिकियों के साथ कोविड टीके का विकास किया है। भारत ने 97 से अधिक देशों को टीकों की 115 मिलियन से अधिक खुराकें उपलब्ध कराईं। व्यापार समझौते के हिस्से के रूप में, भारत ने यूएई तथा ऑस्ट्रेलिया के साथ भी सहयोग समझौतों पर हस्ताक्षर किए जो भारतीय फार्मा उत्पादों को इन बाजारों में अधिक पहुंच उपलब्ध कराएगा।एन-95 मास्क के उत्पादन में भी अव्वल

देश में एन 95 मास्क और पीपीई किट की कोई कमी नहीं है, कोरोना की पहली लहर के दौरान 2020 में सुरक्षात्मक उपकरणों की भारी कमी से जूझने वाले भारत ने अब एन -95 मास्क और पीपीई किट बनाने की क्षमता बढ़ाने में कामयाबी हासिल कर ली है। देश ने एन-95 मास्क के उत्पादन में भी आत्मनिर्भरता हासिल की है। भारत सर्जिकल मास्क, मेडिकल गॉगल्स और पीपीई किट का बड़े पैमाने पर निर्यात भी कर रहा है। उद्योग के विशेषज्ञों के अनुसार, मार्च 2020 में भारत मुश्किल से किसी पीपीई किट का उत्पादन कर रहा था, जिसे कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई में सुरक्षा का पहला मानक माना गया है। वहीं 2021 में भारत एक महीने में एक करोड़ से अधिक इकाइयों का उत्पादन कर रहा था। देश में प्रति माह 20 लाख यूनिट एन -95 मास्क यानी प्रति माह लगभग 2.5 से 3 करोड़ यूनिट का उत्पादन हुआ है।भारत दुनिया में पीपीई किट का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक

यह कोई छोटी बात नहीं है कि भारत कोरोना-काल में फार्मा और मेडिकल सेक्टर की कई वस्तुओं का बड़ा उत्पादक और नया निर्यातक देश बन गया है। भारत दुनिया में पीपीई किट का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक बन गया है, जिसकी दैनिक उत्पादन क्षमता प्रतिदिन पांच लाख से अधिक है। इसी तरह देश में बहुत कम समय में वेंटिलेटर की स्वदेशी उत्पादन क्षमता बढ़कर तीन लाख प्रति वर्ष हो गई है।

 

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