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जम्मू-कश्मीर में 149 साल पुरानी ‘दरबार मूव’ प्रथा का अंत, 200 करोड़ रुपये की बचत से होगा वंचितों का कल्याण

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मोदी राज में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटाने के बाद एक और ऐतिहासिक फैसला लिया गया है। जम्मू-कश्मीर सरकार ने 149 साल पुरानी ‘दरबार मूव’ की प्रथा को खत्म कर दिया है। साथ ही कर्मचारियों को दिए जाने वाले आवास आवंटन को भी रद्द कर दिया है। अफसरों को अगले 3 हफ्ते के अंदर आवास खाली करने का आदेश दिया गया है। इसके तहत 10 हजार कर्मचारियों को सरकार की तरफ से मिले जम्मू या कश्मीर में से किसी एक घर को खाली करना होगा। ये कर्मचारी अब एक जगह पर रहकर कई कामों को ऑनलाइन करेंगे।

उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने 20 जून को कहा था कि प्रशासन ने ई-ऑफिस का काम पूरा कर लिया है, इसलिए सरकारी ऑफिसों के साल में दो बार होने वाले ‘दरबार मूव’ की प्रथा को जारी रखने की कोई जरूरत नहीं है। इस फैसले से राजकोष को हर साल 200 करोड़ रुपये की बचत होगी। उन्होंने कहा था, “अब जम्मू और श्रीनगर के दोनों सचिवालय 12 महीने सामान्य रूप से काम कर सकते हैं। इससे सरकार को प्रति वर्ष 200 करोड़ रुपए की बचत होगी, जिसका उपयोग वंचित वर्गों के कल्याण के लिए किया जाएगा।”

‘दरबार मूव’ के दौरान राजभवन, सिविल सचिवालय, सभी प्रमुख विभागाध्यक्षों के कार्यालय जम्मू और श्रीनगर के बीच सर्दी और गर्मी के मौसम में ट्रांसफर होते रहते थे। ट्रकों में भरकर फाइल और दूसरे सामान भी यहां-वहां होते थे। इसमें पैसे तो खर्च होते ही थे, साथ ही सामानों की टूट-फूट भी होती थी। अब कर्मचारी अपनी नियुक्ति वाले स्थान पर ही रहेंगे और जरूरी कामों को ऑनलाइन करेंगे। जम्मू और श्रीनगर में मुख्यालयों वाले सिविल सचिवालयों में करीब 10 हजार कर्मचारी हैं। 

गौरतलब है कि हर 6 महीने में जम्मू-कश्मीर की राजधानी बदल जाती रही है। गर्मी में श्रीनगर, तो ठंड में जम्मू से सरकार चलती है। राजधानी की यह अदला-बदली ‘दरबार मूव’ कहलाती है। राजधानी बदलने की यह परंपरा 1862 में डोगरा शासक गुलाब सिंह ने शुरू की थी। गुलाब सिंह महाराजा हरि सिंह के पूर्वज थे जिनके समय ही जम्मू-कश्मीर भारत का अंग बना था। सर्दी के मौसम में श्रीनगर में असहनीय ठंड पड़ती है तो गर्मी में जम्मू की गर्मी थोड़ी तकलीफदायक होती है। इसे देखते हुए गुलाब सिंह ने गर्मी के दिनों में श्रीनगर और ठंडी के दिनों में जम्मू को राजधानी बनाना शुरू कर दिया। राजधानी शिफ्ट करने की यह प्रक्रिया जटिल और खर्चीली है, इस वजह से इसका विरोध भी होता रहा है। एक बार राजधानी शिफ्ट होने में करीब 110 करोड़ रुपये खर्च होता था।

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