Home चुनावी हलचल बंगाल में चौतरफा घिरने लगीं ममता बनर्जी की सरकार

बंगाल में चौतरफा घिरने लगीं ममता बनर्जी की सरकार

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पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव इस बार भाजपा के अनुकूल परिस्थितियां बन रही है। सत्तारूढ़ तृणमूल सरकार के खिलाफ एंटी इन्कंबेंसी फैक्टर चरम पर है। सरकार में भ्रष्टाचार और महिलाओं के खिलाफ अपराधों में वृद्धि जैसे कई मुद्दे हैं, जिनका टीएमसी के पास कोई जवाब नहीं है। इसके अलावा ममता बनर्जी को चारों मोर्चों पर लड़ाई लड़नी पड़ रही है। एक तरफ कांग्रेस है तो दूसरी ओर लेफ्ट। एक तरफ उसके खिलाफ मुस्लिम वोट बैंक का गठबंधन है और सबसे बड़े मोर्चे पर खुद बीजेपी। ऐसे हालात में पिछली बार की कामयाबी से आगे निकलकर भगवा दल इस बार पश्चिम बंगाल की सरजमीं पर अपना परचम लहराना चाहता है। बीजेपी के थिंक टैंक ने टीएमसी के वोट बैंक को तोड़ने के साथ ही ‘एक्स फैक्टर’ पर भी फोकस किया है। बंगाल में ये एक्स फैक्टर कोई और नहीं, लेफ्ट वोट बैंक है। ये लेफ्ट वोटर अपनी वैचारिक पार्टी के कमजोर होने के बाद से कन्फ्यूज हैं। कभी बंगाल की सत्ता में राज करने वाले ये लेफ्ट के कार्यकर्ता निष्क्रिय से पड़े हैं। बीजेपी की सोच इस वोट बैंक अपने पक्ष में सक्रिय करने की है। जमीन पर यह वामपंथी वोट बैंक भाजपा की तरफ मुड़ा तो, उसे बड़ा फायदा हो सकता है। दूसरी ओर चौतरफा घिर रहीं ममता बनर्जी के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए कबीर-औवेसी का गठबंधन अपना काम कर ही रहा है।राज्य की तरक्की के लिए मूड बदल सकते हैं लेफ्ट वोटर्स
बीजेपी थिंक टैंक ने ममता को उसके गढ़ में घेरने के लिए भवानीपुर विधानसभा में ‘इस बार जय भवानी’ का नारा देकर सुवेंदु अधिकारी को चुनाव मैदान में उतार दिया है। इसके साथ ही बीजेपी ने लेफ्ट के एक-एक छोटे कार्यकर्ता से संपर्क बनाना शुरू कर दिया है। घर-घर लेफ्ट विचारधारा वाले परिवारों से मिलने का सिलसिला चल रहा है। पार्टी के रणनीतिकार मानकर चल रहे हैं कि अगर लेफ्ट के कार्यकर्ता और वोटर बिना शोर किए गए भाजपा को समर्थन देते हैं तो, यह एक्स फैक्टर साबित हो सकता है। लेफ्ट का यह वोट बैंक भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने का दम रखता है। दरअसल कभी लेफ्ट ने पश्चिम बंगाल की सत्ता पर बरसों तक राज किया है। अब लेफ्ट के ऐसे कार्यकर्ता, जो पार्टी से असंतुष्ट या निराश हैं, वे राज्य की तरक्की के लिए मूड बदल सकते हैं। उन्हें पता है कि लेफ्ट जीतने की स्थिति में नहीं है, इसलिए वो अपना वोट जाया न करके भाजपा के पाले में आ सकते हैं।व्यक्ति केंद्रित संपर्क अभियान लेफ्ट वोट बैंक को साधने की रणनीति
बीजेपी की घर-घर संपर्क का अभियान कुछ असर दिखाने लगा है। ऐसे लेफ्ट के नेता, जो सक्रिय राजनीति से दूर चले गए हैं और अब बदले माहौल में कुछ अच्छा फील कर रहे हैं। इनकी पहचान कर भाजपा के कार्यकर्ताओं और बड़े नेताओं को इनसे मिलने के लिए भेजा जा रहा है। लेफ्ट के कार्यकर्ताओं को मोटिवेट कर भाजपा से जोड़कर पार्टी को वोट देने के लिए कहा जा रहा है। जनता के बीच चुनाव प्रचार तो चल ही रहा है, यह व्यक्ति केंद्रित संपर्क लेफ्ट वोट बैंक को साधने के लिए है। पश्चिम बंगाल भाजपा के अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने लेफ्ट विचारधारा को मानने वाले लोगों से अपील की है कि वे भले ही अपनी विचारधारा को मानते रहें, लेकिन राज्य के हित में भाजपा को वोट दीजिए। भाजपा के नेता नारा दे रहे हैं- दिल में रखिए विचारधारा, वोट लेकिन भाजपा को ही। भाजपा की कोशिश विपक्षी वोटों को जहां तक संभव हो, एकजुट करने की है।बंगाल में लेफ्ट का वोट घटता गया, बीजेपी का बढ़ता गया
असल में जैसे-जैसे बंगाल में टीएमसी का कद बढ़ने लगा, लेफ्ट का पतन शुरू हो गया। बाद के चुनाव में ‘लाल’ वोटर ‘भगवा’ को मौन समर्थन देने लगे। हालांकि, संख्या कम थी लेकिन फायदा तो हुआ ही। 2014 लोकसभा चुनाव में लेफ्ट का वोट शेयर 30 प्रतिशत के करीब था, जो 2019 में आकर 8 प्रतिशत के करीब रह गया है। भाजपा का वोट शेयर बढ़कर 2019 लोकसभा चुनाव के समय 17 से 40 प्रतिशत पहुंच गया। पिछले विधानसभा चुनाव में हाल यह रहा कि लेफ्ट पार्टी खाता नहीं खोल सकी। वहीं, भाजपा ने टीएमसी को चुनौती देते हुए 77 सीटें निकाल लीं। इससे साफ है विपक्षी वोटर टीएमसी के सामने भाजपा को एक विकल्प के तौर पर देखकर इस पार पूरा गेम बदल सकते हैं।आरजी कर मेडिकल कालेज के रेप-मर्डर कांड ने पूरे देश को झकझोरा
दूसरी ओर पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर सियासी तकरार छिड़ी है, पक्ष विपक्ष एक दूसरे के ऊपर तंज कस रहे हैं। इसी बीच भाजपा ने अपनी नई लिस्ट में आरजी कर मेडिकल कालेज की पीड़िता की मां को टिकट दिया है। तीसरी लिस्ट में भाजपा ने 19 उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा है। इसमें सबसे ज्यादा चौंकाने वाला नाम रत्ना देबनाथ का था। आरजी कर अस्पताल की उस ट्रेनी डॉक्टर की मां हैं, जिनके साथ दुष्कर्म और फिर हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस घटना से पूरे देश की सड़कों पर लोग प्रदर्शन कर रहे थे. इतना ही नहीं, ममता के इस्तीफे की भी मांग हो रही थी। पार्टी ने उत्तर 24 परगना जिले की अहम मानी जाने वाली पानीहाटी सीट से आरजी कर मेडिकल कॉलेज रेप-मर्डर केस की पीड़िता की मां को उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने भावनात्मक और राजनीतिक दांव चला है।आरजी कर पीड़िता की मां को टिकट, महिलाओं की सुरक्षा के लिए लड़ेंगी
बीते दिन आरजी कर पीड़िता की मां ने टिकट मांगा था। उस दौरान उन्होंने ये भी कहा था कि भाजपा से तो मुझे बहुत पहले टिकट के लिए ऑफर मिला था। लेकिन तब मैं दिमागी तौर पर तैयार नहीं थी। अब मैंने अपनी बेटी को इंसाफ दिलाने और इस राज्य की सभी महिलाओं की सुरक्षा के लिए चुनाव लड़ने का फैसला किया है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि CPI(M) मेरी बेटी की मौत का इस्तेमाल राजनीतिक फायदा उठाने के लिए चुपचाप TMC की मदद करके कर रही है। मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार रत्ना देबनाथ ने चुनाव लड़ने के फैसले पर कहा कि यह उनके लिए न्याय की लड़ाई का मंच है। उन्होंने ये भी कहा कि बेटी के इंसाफ के लिए उन्होंने हर जगह दरवाजा खटखटाया, लेकिन उन्हें कहीं भी संतोषजनक परिणाम नहीं मिला। हालांकि अब राजनीति के जरिए वो महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा उठाना चाहती हैं। तीसरी लिस्ट में उनके अलावा पार्टी ने कूचबिहार दक्षिण से रथीन्द्र नाथ बोस, सिंगूर से डॉ. अरूप कुमार दास, मेदिनीपुर से डॉ. शंकर गुच्छैत और कटवा से कृष्णा घोष सहित कई लोगों को भी टिकट दिया है।दरअसल, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए ममता बनर्जी चौतरफा घिरने लगी हैं। लेफ्ट वोटर्स की नाराजगी के अलावा एआईएमआईएम चीफ प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ओवैसी ने पश्चिम बंगाल के चर्चित मुस्लिम नेता हुमायूं कबीर की जनता उन्नयन पार्टी (जेयूपी) के साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे।  एआईएमआईएम और जेयूपी के साथ गठबंधन इसी जटिलता में एक नये आयाम जोड़ना वाला है। यह नया गठबंधन केवल सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि मुस्लिम वोट बैंक की पुनर्संरचना कर परिणामों को प्रभावित करेगा। खासकर उस राज्य में, जहां करीब 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी चुनावी परिणामों पर निर्णायक प्रभाव डालती है, वहां इस नए गठबंधन के दूरगामी राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों के मुताबिक राज्य की सौ से अधिक सीटों पर इस गठबंधन का टीएमसी को नुकसान और भाजपा को फायदा मिलेगा। क्योंकि मुस्लिम वोट बैंक के बिखरने का खामियाजा ममता बनर्जी के उम्मीदवारों को भुगतना पड़ेगा।मुस्लिम वोट बैंक: पश्चिम बंगाल में कई सीटों पर निर्णायक
पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग 30 प्रतिशत मानी जाती है, जो राज्य की करीब 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर सीधे तौर पर प्रभाव डालती है। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण 24 परगना और कुछ हद तक नदिया जैसे जिलों में यह प्रभाव और भी स्पष्ट दिखाई देता है। अब तक यह वोट बैंक काफी हद तक ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के साथ रहा है, जिसने खुद को अल्पसंख्यकों के भरोसेमंद राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित किया। लेकिन मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद का निर्माण करा रहे हुमायूं कबीर को इसी बात पर पार्टी से निकालकर ममता ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है और अपने वोट बैंक को नाराज कर लिया है। हुमायूं कबीर अयोध्या की बाबरी मस्जिद की तर्ज पर पश्चिम बंगाल में मस्जिद बनवा रहे हैं, जिसका नाम भी उन्होंने बाबरी मस्जिद ही रखा है। हुमायूं कबीर और ओवैसी का गठबंधन ममता बनर्जी के इसी स्थिर समीकरण को चुनौती देता नजर आ रहा है।ओवैसी की एंट्री: रणनीतिक सेंधमारी खिलाएगी नया गुल
ओवैसी की राजनीति अक्सर उन राज्यों में प्रभाव डालती रही है, जहां मुस्लिम वोटों का एक बड़ा हिस्सा किसी एक दल के साथ जुड़ा होता है। बंगाल में उनकी एंट्री भी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। एआईएमआईएम की मुस्लिम वोटों में पकड़ मानी जाती है। ऐसे में हुमायूं कबीर से जुड़कर उन्होंने मुस्लिमों की धार्मिक भावना को भी हवा दी है। ओवैसी-कबीर की जोड़ी के चलते मुस्लिम वोटों के बिखराव से कई सीटों पर परिणाम बदल सकता है। अगर मुस्लिम वोटों का छोटा हिस्सा भी टीएमसी से हटकर इस नए गठबंधन की ओर जाता है, तो यह सीधे तौर पर तृणमूल के नुकसान और विपक्ष, खासकर भाजपा, के लिए लाभ का कारण बन सकता है।

हुमायूं कबीर फैक्टर: स्थानीय प्रभाव और असंतोष की राजनीति
हुमायूं कबीर का राजनीतिक महत्व उनके स्थानीय प्रभाव और टीएमसी से अलगाव के कारण बढ़ जाता है। टीएमसी से निष्कासन के बाद उन्होंने जनता उन्नयन पार्टी बनाकर खुद को एक वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में प्रस्तुत किया है। उनका यह दावा कि ममता की टीएमसी में मुस्लिम समुदाय को पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा, एक ऐसी बहस को जन्म देता है जो तृणमूल के पारंपरिक वोट बैंक में असंतोष पैदा कर सकती है। उनके द्वारा बड़ी संख्या में उम्मीदवार उतारना इस बात का संकेत है कि वे केवल प्रतीकात्मक उपस्थिति नहीं, बल्कि वास्तविक चुनावी चुनौती पेश करना चाहते हैं।मुस्लिमों की धार्मिक भावनाएं और बाबरी मस्जिद का मुद्दा
मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद निर्माण जैसे मुद्दों को उठाकर हुमायूं कबीर ने मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाओं को सीधे छूने की कोशिश की है। यह मुद्दा भावनात्मक रूप से कुछ वर्गों को प्रभावित कर सकता है। यह तो तय है कि इसका सियासी चुनाव पर असर जरूर पड़ेगा। लेकिन यह कितना व्यापक असर डालेगा, यह अभी भविष्य के गर्भ में है। बंगाल की राजनीति परंपरागत रूप से धार्मिक मुद्दों पर भी आधारित रही है। एक ओर जहां हिंदू समुदाय की मां दुर्गा में आस्था है, वहीं दूसरे धर्म के लोग मस्जिदों में नमाज अदा करते हैं। यहां सामाजिक समीकरण भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए ऐसे मुद्दे चुनावी विमर्श को प्रभावित जरूर करते हैं।ममता के मुस्लिम वोट बैंक के बंटने का भाजपा को मिलेगा लाभ
पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार मुस्लिम धर्म के आधार पर नया गठबंधन आने से यदि मुस्लिम वोटों में विभाजन होता है, तो इसका सीधा लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिल सकता है। 2021 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने कई सीटों पर कड़ी टक्कर दी थी, लेकिन एकजुट मुस्लिम वोटिंग ने टीएमसी को बढ़त दिलाई। अब अगर यही वोट बैंक विभाजित होता है, तो इस बार के विधानसभा चुनाव में भाजपा को उन सीटों पर बढ़त मिल सकती है जहां वह पहले मामूली अंतर से पीछे रह गई थी। इसके अलावा एंटी एन्कंबेंसी फैक्टर भी ममता बनर्जी की टीएमसी को मुश्किलों में डाल सकता है।बहुकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ता बंगाल का विधानसभा चुनाव
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह नया गठबंधन चुनावी नतीजों को निर्णायक रूप से बदल पाएगा। इसका जवाब कई कारकों पर निर्भर करता है। गठबंधन की संगठनात्मक ताकत, उम्मीदवारों की स्थानीय पकड़, और मतदाताओं का वास्तविक रुझान। अभी तक के संकेत बताते हैं कि यह गठबंधन सीधे सत्ता परिवर्तन का कारण भले न बने, लेकिन कई सीटों पर “स्पॉइलर” की भूमिका निभा सकता है। दरअसल, बड़े तौर पर विधानसभा चुनाव में भाजपा और टीएमसी के बीच सीधी टक्कर है। लेकिन कांग्रेस और लेफ्ट भी अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं। अब ओवैसी-कबीर के गठबंधन के भी आ जाने से मुकाबला बहुकोणीय हो गया है। ओवैसी और हुमायूं कबीर का गठबंधन इस बदलाव का प्रतीक है, जो चुनावी समीकरणों को जटिल बना सकता है। हालांकि अंतिम निर्णय मतदाता ही करेंगे, लेकिन इतना स्पष्ट है कि इस बार का चुनाव टीएमसी को झटका देने वाला हो सकता है।पश्चिम बंगाल सरकार का हिंदू विरोधी चेहरा एक बार फिर एक्सपोज हो गया है। रामनवमी जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व से ठीक पहले पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में भगवान राम की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त किए जाने की घटना ने स्वाभाविक रूप से लोगों की भावनाओं को आहत किया है। किसी भी धर्म, प्रतीक या आस्था से जुड़ी वस्तु पर हमला केवल एक स्थानीय घटना नहीं होती, बल्कि उसका प्रभाव व्यापक सामाजिक मनोविज्ञान पर पड़ता है। बेहद चिंताजनक पहलू यह भी है कि ममता राज का हिंदू विरोधी चेहरा पहली बार उजागर नहीं हुआ है। इससे पहले भी मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए ममता बनर्जी और तृणमूल सरकार कई बार हिंदू आस्था पर हमला कर चुकी हैं। यहां तक कि उन्हें जय श्रीराम के नारे तक पर आपत्ति रही है और अब उनके ही नेता और पूर्व मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम को सिर्फ उत्तर भारत का भगवान घोषित कर दिया है। एक तो पहले ही भगवान राम की मूर्ति का सिर काटने के कृत्य से हिंदू जनमानस आहत है, उस पर सिन्हा की टिप्पणी ने आग में घी का काम किया है। ऐसी घटनाएं और बयानबाजी न केवल धार्मिक संवेदनशीलता को झकझोरती हैं, बल्कि समाज में अविश्वास और तनाव की स्थिति भी पैदा करती हैं। इसलिए इस घटना को केवल एक आपराधिक कृत्य मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा।

राज्य में हिंदू मंदिरों और मूर्तियों पर हमले अब आम बात- सुवेंदु
नंदीग्राम के विधायक और पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने इस घटना की कड़ी निंदा की है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि राज्य में हिंदू मंदिरों और मूर्तियों पर हमले अब आम हो गए हैं। इसके लिए उन्होंने राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार की ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ और प्रशासन की ‘शर्मनाक निष्क्रियता’ को जिम्मेदार ठहराया। घटना के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई, जिसमें राज्य सरकार की नीतियों और प्रशासनिक भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक ही है। असली मुद्दा यह है कि क्या राज्य की कानून-व्यवस्था ऐसी घटनाओं को रोकने और उनके बाद प्रभावी कार्रवाई करने में सक्षम भी है या नहीं।

राम केवल उत्तर भारतीयों के देवता, हम काली के भक्त – सिन्हा
नंदीग्राम में प्रभु श्रीराम की मूर्ति का सिर काटने की घटना इसलिए और चिंताजनक हो गई है, क्योंकि टीएमसी सरकार इसकी परवाह करने की बजाए प्रभु श्रीराम का अपना भगवान ही नहीं मानती। भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने जहां इसकी कड़ी निंदा की है, वहीं तृणमूल कांग्रेस के नेता औरे पूर्व मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा के बयान ने आग में घी का काम किया है। सिन्हा ने अपने विवादित बयान में कहा है कि रामचंद्र तो केवल उत्तर भारत के देवता हैं। सिन्हा ने उल्टे भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में रामचंद्र नहीं चलेगा। बंगाल के लोग तो मां काली के भक्त हैं। भाजपा नेताओं ने सिन्हा की बयान की आलोचना करते हुए इसे भगवान श्रीराम का अपमान बताया है। ऐसे में हर स्तर पर मुख्यमंत्री, सरकार और प्रशासन को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि आस्था का सम्मान बना रहे और कानून-व्यवस्था पर लोगों का भरोसा और मजबूत हो।ममता का राज हिंदू विरोधी घटनाओं के लिए रहा है कुख्यात
पश्चिम बंगाल में समय-समय पर धार्मिक स्थलों या प्रतीकों को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। विभिन्न रिपोर्टों में मंदिरों में तोड़फोड़, मूर्तियों को नुकसान पहुंचाने या धार्मिक जुलूसों के दौरान तनाव जैसी घटनाओं का उल्लेख मिलता है। हालांकि इन घटनाओं की प्रकृति और कारण अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि ऐसी घटनाएं सामाजिक सौहार्द के लिए चुनौती बनती हैं। इसलिए इनका समाधान केवल राजनीतिक विमर्श से नहीं, बल्कि सख्त कार्रवाई से ही संभव है। लेकिन ममता सरकार ने अपनी मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के चलते इनमें लापहवाही ही दिखाई है। किसी भी राज्य सरकार की पहली जिम्मेदारी अपने नागरिकों की सुरक्षा और उनके धार्मिक अधिकारों की रक्षा करना होती है। चाहे घटना किसी भी धर्म से जुड़ी हो, प्रशासन को निष्पक्षता और तत्परता के साथ कार्रवाई करनी चाहिए। दोषियों की पहचान, गिरफ्तारी और न्यायिक प्रक्रिया को तेज करना आवश्यक है, ताकि यह संदेश जाए कि ऐसी घटनाओं को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदुत्व विरोध की राजनीति की हदें पार कीं

पश्चिम बंगाल पिछले डेढ़ दशक में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदुत्व विरोध की राजनीति का गवाह रहा है। तृणमूल कांग्रेस सरकार ने अल्पसंख्यकों के लिए खुलकर खजाना खोला है और इसमें राज्य की माली हालत की भी चिंता नहीं की है। अल्पसंख्यकों की राजनीति के लिए ममता सरकार ने सारी सीमाएं ही लांघ ली है और आंखें बंद कर इन पर पैसा लुटाया जा रहा है। इसका अंदाजा इसी एक तथ्य से लगाया जा सकता है कि 2010-11 में राज्य का जो अल्पसंख्यक बजट मात्र 472 करोड़ था, वह आज 5,600 करोड़ को पार कर चुका है। अल्पसंख्यक युवाओं का वोट बैंक पक्का करने के लिए करोड़ों रुपये का ऋण दिया गया है। खास बात यह कि तृणमूल सरकार ने इनसे ऋण वापसी पर कोई फोकस नहीं किया है। इतना ही नहीं इमामों और मुअज्जिनों के लिए मासिक मानदेय में भी कई गुना की वृद्धि की गई है। दूसरी ओर प्रभु श्रीराम के नाम से लेकर हिंदुत्व और सनातन विरोध के कई उदाहरण ममता बनर्जी के हैं। इससे यह शीशे की तरह साफ है कि तृणमूल सरकार ने अल्पसंख्यकों और घुसपैठियों को खूब पाला-पोसा है।

 

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