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केरल में वामपंथी और कांग्रेसी मिलीभगत से जारी है पेंशन घोटाला, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई लताड़, कहा- नियुक्ति 2 साल की, पेंशन आजीवन, राज्य के पास बहुत पैसा है क्या ?

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केरल में वामपंथी और कांग्रेसी सरकारों में चले आ रहे पेंशन घोटाले ने वहां के राज्यपाल के साथ ही सुप्रीम कोर्ट को भी हैरान कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (14 मार्च, 2022) को केरल की पिनराई विजयन सरकार को फटकार लगाई। जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर और जस्टिस कृष्ण मुरारी की बेंच ने बताया कि कैसे राज्य 2 साल की सेवा वाले मंत्रियों द्वारा नियुक्त निजी कर्मचारियों के लिए आजीवन पेंशन का भुगतान कर रहा है। वहीं राज्यपाल का कहना है कि राज्य के खजाने का राजनीतिक रूप से बंदरबांट हो रहा है और इस मामले में दोनों प्रमुख पार्टियां (वामपंथी और कांग्रेस) एक-दूसरे से मिली हुई है।  

दरअसल एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति नज़ीर और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी सहित दो न्यायाधीशों की पीठ ने द इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर का हवाला देते हुए केरल की केएसआरटीसी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील वी गिरि से कहा कि आज हमने इंडियन एक्सप्रेस में पढ़ा है कि केरल एकमात्र राज्य हैं जहां लोगों को 2 साल के लिए नियुक्त किया जाता है और उन्हें आजीवन पेंशन दी जाती है। राज्य के पास बहुत पैसा है, यह अधिकारियों को बताएं। वी गिरि ने जवाब दिया कि वह शीर्ष अदालत की चिंताओं से राज्य सरकार को अवगत कराएंगे।

गौरतलब है कि सोमवार को द इंडियन एक्सप्रेस ने केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान के साथ 5 मार्च, 2022 को ऑनलाइन आयोजित आइडिया एक्सचेंज इवेंट में हुई बातचीत पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। जिसमें राज्यपाल आरिफ मुहम्मद खान ने मंत्रियों द्वारा नियुक्त निजी कर्मचारियों के लिए आजीवन पेंशन पर सवाल उठाया था। उन्होंने बताया था कि केरल में एक योजना के अनुसार पेंशन लाभ लेने के लिए पर्सनल गवर्नमेंट स्टाफ को दो साल के बाद इस्तीफा देना पड़ता है ताकि वे पार्टी (सीपीआईएम) के लिए काम करना शुरू कर सकें। इस मामले में विपक्षी दल कांग्रेस की भी मिलीभगत दिखाई दे रही है। सरकार और विपक्ष दोनों ने हाथ मिला लिया है।

राज्यपाल आरिफ मुहम्मद खान के मुताबिक केरल में सरकार बनने के बाद प्रत्येक मंत्री 20 से अधिक लोगों को ‘क्वो टर्मिनस’ के आधार पर नियुक्त करता है, और वे दो साल के बाद पेंशन के हकदार हो जाते हैं। जब सरकार बदलती है, तो सत्तारूढ़ मंत्री द्वारा नियुक्त कर्मचारी अपने पदों से इस्तीफा दे देते हैं और नवनिर्वाचित सरकार के मंत्रियों द्वारा नियुक्त निजी कर्मचारी उनका स्थान ले लेते हैं। इस तरह सिलसिला जारी रहता है। एक कार्यकाल में प्रत्येक मंत्री लगभग 45-50 लोगों को नियुक्त करता है, जो बाद में पार्टी के लिए पूर्णकालिक काम करते हैं। उन्हें सरकार से पेंशन के रूप में वेतन मिलता है। ऐसा देश में कहीं नहीं हो रहा है।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, केरल में मंत्रियों के निजी कर्मचारियों के लिए पेंशन 1994 में तत्कालीन कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ सरकार द्वारा पूर्वव्यापी प्रभाव से पेश की गई थी। इस प्रथा को बाद में सीपीएम के नेतृत्व वाली एलडीएफ और कांग्रेस की नेतृत्व वाली यूडीएफ सरकारों द्वारा अपनाया गया, जो वर्तमान में भी जारी है। केरल सरकार की इस नीति की आलोचना करते हुए राज्यपाल आरिफ मुहम्मद खान ने कहा कि हर दो साल बाद निजी कर्मचारियों को बदल दिया जाता है क्योंकि दो साल के बाद निजी कर्मचारी पेंशन के योग्य हो जाते हैं। इससे जनता के पैसों की लूट हो रही है। यह सत्ता का दुरुपयोग है। ऐसी पेंशन की वजह से राज्य सरकार के खजाने पर सालाना 8 करोड़ से ज्यादा का बोझ पड़ता है। गौरतलब है कि केरल में पेंशन पाने के लिए राज्य सरकार के कर्मचारियों को न्यूनतम 10 साल की नौकरी करना जरूरी है।

 

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