Home नरेंद्र मोदी विशेष वो कूटनीतिक चुनौतियां जिन पर पीएम मोदी को मिली जीत

वो कूटनीतिक चुनौतियां जिन पर पीएम मोदी को मिली जीत

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पीएम मोदी के नेतृत्व में जहां भारत उभर रहा है वहीं विश्व बिरादरी में देश की प्रतिष्ठा को नया आयाम मिला है। पड़ोसी देशों से जहां भारत के संबंध मधुर हुए हैं वहीं डोकलाम जैसे मुद्दे पर सशक्त चीन भी चारो खाने चित हो गया है। दूसरी तरफ बार-बार सर्जिकल स्ट्राइक को नकारता पाकिस्तान भारत की कूटनीति के आगे पस्त है। दरअसल पीएम मोदी ने अपने तीन साल के कार्यकाल में कूटनीति के क्षेत्र में कई ऐसे मास्ट्ररस्ट्रोक लगाए हैं जिससे दुश्मन देशों को चुपचाप टकटकी लगाए देखने के सिवा विकल्प नहीं है।

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ब्रिक्स घोषणापत्र में आतंकवाद का जिक्र
चीन में ब्रिक्स सम्मेलन में संयुक्त घोषणापत्र में आतंकवाद पर निशाना साधा गया। इसकी सबसे खास बात तो यह रही कि इस सम्मेलन में कई पाकिस्तानी आतंकी संगठनों पर भी निशाना साधा गया। घोषणापत्र में पाकिस्तानी आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा, हक्कानी नेटवर्क और तहरीक-ए-तालिबान जैसे आतंकी संगठनों का जिक्र किया गया। जैश की निंदा किए जाने वाले इस घोषणापत्र पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भी मंजूरी है। लेकिन ये इतना आसन नहीं था। ज्वाइंट स्टेटमेंट में चीन लगातार कोशिश कर रहा था कि वह आतंकवाद पर कोई बात न हो सके। सम्मेलन से दो दिन पहले चीन ने कहा कि ब्रिक्स सम्मेलन में पाकिस्तान के काउंटर आतंकवाद पर चर्चा करना सही नहीं है। लेकिन पीएम मोदी की कूटनीति में घिरे चीन को भी भारत की बात माननी पड़ी और आतंकवाद का मुद्दा शामिल करना पड़ा।

डोकलाम विवाद में चीन ने खोया ‘सम्मान’
चीन के बारे में अक्सर यह भ्रम पैदा किया जाता रहा है कि चीन एशिया का सबसे ताकतवर देश है। इस मिथ को पश्चिमी दुनिया ने बिना किसी चुनौती के ही मान्यता भी दे दी थी। लेकिन वह यह भूल गया था कि भारत एशिया की न सिर्फ सामरिक बल्कि सांस्कृतिक लिहाज से भी सबसे बड़ा देश है। डोकलाम प्रकरण ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि पीएम मोदी के नेतृत्व में देश को झुकाना नामुमकिन है। जून में जिस तरह चीन की सेना भूटान के डोकलाम को कब्जा करने के इरादे से घुस गई थी उसे पीएम मोदी के साहसिक फैसले से वापस जाना पड़ा। चीन भले यह कह रहा है कि वह अपनी गश्त जारी रखेगा लेकिन यह जानना जरूरी है कि भारत और भूटान की सेना भी वहां गश्त करती है। जाहिर तौर पर डोकलाम प्रकरण में भारत की ये बड़ी सफलता साबित हुई है। 

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आतंकवाद पर अलग-थलग हो गया पाकिस्तान
पीएम मोदी दुनिया के हर मंच से आतंकवाद के विरुद्ध मुखर रहे हैं। उन्होंने आतंकवाद के मसले पर एक के बाद एक हमले बोले और विश्व के अधिकतर देशों को ये समझाने में कामयाब रहे हैं कि दुनिया में अच्छा और बुरा आतंकवाद नहीं होता, बल्कि आतंकवाद सिर्फ आतंकवाद है। आज अमेरिका, रूस, जापान, जर्मनी, यूरोपियन यूनियन और इजरायल जैसे देश भारत के इस पक्ष के साथ खड़े हैं। कश्मीर में हिज्बुल मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठनों पर अमेरिकी रोक और सैयद सलाहुद्दीन जैसे आतंकियों पर बैन भारत के बढ़े हुए प्रभुत्व का ही परिणाम है। दरअसल विश्व के कई देश आतंकवाद और कट्टरपंथ से परेशान हैं जिसे पीएम मोदी ने दुनिया के सामने चुनौती के तौर पर पेश किया है। दुनिया के अधिकतर देश पीएम मोदी के आतंकवाद विरोधी अभियान के साथ हैं।

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आजादी के बाद पहली सर्जिकल स्ट्राइक से कोहराम
27 अगस्त को सूचना के अधिकार (RTI) के माध्यम से जो सूचना बाहर आई उसकी जानकारियों के मुताबिक सैन्य अभियान महानिदेशालय (DGMO) ने जो तथ्य दिये हैं उनसे ये साफ हो गया है 29 सितंबर 2016 को पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में आतंकियों और उनके शिविरों को नेस्तनाबूद करने के लिए जो सर्जिकल स्ट्राइक की गई वो इस तरह की पहली कार्रवाई थी। DGMO के अनुसार उसके पास 29 सितंबर, 2016 से पहले हुई किसी भी सर्जिकल स्ट्राइक का कोई रिकॉर्ड नहीं है। भारतीय सेना के विशेष दस्ते की इस कार्रवाई ने आतंक के पालनहार पाकिस्तान को कहीं का नहीं छोड़ा था। पाकिस्तान दुनिया के सामने मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहा था इसलिए सर्जिकल स्ट्राइक के होने से ही इनकार करता रहा। लेकिन विश्व बिरादरी ने भारत के दावे को सच माना और सर्जिकल स्ट्राइक को जायज भी ठहराया।

बांग्लादेश से समाप्त हुआ सीमा विवाद का ‘संग्राम’
06 जून, 2015 को पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत और बांग्लादेश ने 41 साल पुराने सीमा विवाद का समाधान कर अपने संबंधों में एक नया अध्याय जोड़ दिया। मोदी और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के बीच विस्तृत वार्ता के बाद दोनों पक्षों ने 22 समझौतों पर हस्ताक्षर किए लेकिन सबसे बड़ा समझौता हुआ सीमा विवाद के हल करने का। ऐतिहासिक भूमि सीमा समझौते में (एलबीए) के दस्तावेजों का आदान प्रदान हुआ, जो 41 साल पुराने सीमा विवाद का समाधान करता है। इसके जरिये एक दूसरे के क्षेत्रों का आदान-प्रदान की प्रक्रिया शुरू की गई। समझौते के तहत 111 सीमावर्ती एन्क्लेव बांग्लादेश को मिलने और बदले में 51 एन्क्लेव भारत का हिस्सा बनने पर समझौता हुआ। पीएम मोदी एक ऐसे सवाल का हल कर लिया है, जो आजादी के समय से लंबित था।

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अफगानिस्तान में भारत की पहल से परेशान पाकिस्तान
बीते अगस्त में ट्रंप प्रशासन ने कहा है कि अमेरिका भारत को एक ऐसे देश के रूप में देखता है जो अफगानिस्तान को स्थिर और सुरक्षित बनाने में मदद दे सकता है और वह इन मुद्दों पर भारत के साथ मिलकर काम करना चाहता है। अमेरिका में अंतर एजेंसी दल ने इस मुद्दे पर चर्चा भी की है और यह इस बात पर ध्यान केंद्रित कर रहा है कि आर्थिक विकास के मुद्दों पर और लोकतांत्रिक विकास को बढ़ावा देने के लिए क्या किया जा सकता है। जाहिर तौर पर अफगानिस्तान में भारत की बढ़ी भूमिका पाकिस्तान को रास नहीं आ रहा है। दरअसल पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान में लगातार आतंकवाद फैलाया जा रहा है जिसे भारत की मदद से अमेरिका रोकना चाहता है। इससे पहले 19 जून को अफगानिस्तान और भारत के बीच हवाई मार्ग से सीधी उड़ान से माल की ढुलाई शुरू हो गई। भारत और अफगानिस्तान के बीच यह हवाई कॉरिडोर पाकिस्तान को बाइपास करता है। हवाई कॉरिडोर दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को बढ़ावा देने के साथ चारों ओर से जमीन से घिरे अफगानिस्तान को भारत के बाजारों तक पहुंच देगा।

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पीएम मोदी ने अंतरिक्ष कूटनीति को दिया नया आयाम
05 मई, 2017 को बंगाल की खाड़ी के तट पर श्रीहरिकोटा से इसरो का ‘नॉटी बॉय’ अपने 11वें मिशन पर जैसे ही निकला भारत ने अतंरिक्ष विज्ञान की दुनिया में एक और मील का पत्थर रख दिया। 235 करोड़ की लागत से बने उपग्रह जीसैट-9 को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया गया, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘सबका साथ-सबका विकास’ को वैश्विक परिवेश के संदर्भ में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इसके साथ ही ये मिशन ‘दक्षिण एशिया उपग्रह’ के तौर पर दक्षिण एशियाई देशों के लिए एक विशेष उपहार है। पड़ोसियों के इस्तेमाल के लिए, उनके द्वारा कुछ खर्च कराए बिना बनाए गए इस संचार उपग्रह के ‘उपहार’ का अंतरिक्ष जगत में कोई और सानी नहीं है। दरअसल फिलहाल जितने भी क्षेत्रीय संघ हैं, वे व्यावसायिक हैं और उनका उद्देश्य लाभ कमाना है। लेकिन भारत ने पड़ोसी देशों के कल्याण के लिए इस सेटेलाइट का निर्माण किया है और उन्हें अमूल्य उपहार दिया है।

हंबनटोटा एयरपोर्ट मिलने से चीन हो जाएगा हैरान!
सामरिक तौर पर अहम हंबनटोटा बंदरगाह का 70 प्रतिशत हिस्सा श्रीलंका ने चीन की फर्म को दे दिया था। लेकिन अब श्रीलंका की सरकार इसी बंदरगाह के पास बने हुए एयरपोर्ट का संचालन भारत को सौंपने पर विचार कर रही है। हंबनटोटा में मताला राजपक्षा इंटरनेशनल एयरपोर्ट काफी समय से घाटे में चल रहा है। इसे चीन ने बनाया था लेकिन घाटे की वजह से कोलंबो अभी तक चीन के एग्जिम बैंक का कर्ज नहीं चुका पाया है। भारत सरकार इस प्रोजेक्ट में 70 प्रतिशत हिस्सेदारी लेने के लिए 205 मिलियन डॉलर का निवेश कर सकती है। इस निवेश से भारत को प्रोजेक्ट में 40 साल के लिए शेयर मिल जाएगा

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