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जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजी की घटनाओं में 90 प्रतिशत की कमी, अनुच्छेद 370 हटाने के बाद तेजी से आई गिरावट

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अनुच्छेद-370 और 35ए हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में स्पष्ट तौर पर बदलाव देखने को मिल रहा है। हाल ही में हुए जिला विकास परिषद (डीडीसी) के चुनाव ने साबित कर दिया कि जहां केंद्र शासित प्रदेश में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत हुई हैं, वहीं आतंकियों और पत्थरबाजों की कमर टूटी है। इसी बीच जम्मू-कश्मीर के पुलिस महानिदेशक दिलबाग सिंह ने दावा किया है कि पत्थरबाजी की घटनाओं में 90 प्रतिशत की गिरवाट दर्ज की गई है।

पुलिस महानिदेशक दिलबाग सिंह के मुताबिक 2020 में सिर्फ 255 पथराव की घटनाएं हुईं, जो 2019 की तुलना में 87.13 प्रतिशत कम है। जबकि 2016 की तुलना में 2020 में पत्थरबाजी की घटनाओं में 90 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई है। दिलबाग सिंह ने कहा कि कानून और व्यवस्था की स्थिति नियंत्रण में है। 2021 के लिए हमारा संकल्प जम्मू और कश्मीर में शांति बनाए रखना और स्थिति को नियंत्रित एवं मजबूत करना है।

दिलबाग सिंह के अनुसार, 2019 में पत्थरबाजी की 1,999 घटनाएं हुईं, जिनमें से 1,193 केंद्र द्वारा उस साल अगस्त में जम्मू और कश्मीर की तत्कालीन राज्य की विशेष स्थिति को रद्द करने की घोषणा के बाद हुई थी। वर्ष 2018 में 1,458 और 2017 में 1,412 बार पत्थरबाजी की घटनाएं सामने आईं थीं। जबकि वर्ष 2016 में 2,653 पत्थरबाज़ी के मामलों की सूचना मिली थी।

2016 में सबसे अधिक पत्थरबाजी की घटनाएं हुई, जब आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के एक कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद पूरे कश्मीर में हिंसक विरोध प्रदर्शन शुरू हुए थे। जबकि, 2015 में, जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजी की 730 घटनाएं हुईं थीं। सेना ने बताया था कि नोटबंदी के बाद भी पत्थरबाजी की घटनाओं में भारी कमी आई थी।

गौरतलब है कि घाटी में आतंकियों पर शिकंजा कसने और उग्रवादी घटनाओं में कमी आने के बाद पाकिस्तान परस्त अलगाववादियों ने पत्थर को एक ‘लोकप्रिय’ हथियार का विकल्प बना दिया। पत्थरबाजी का हथियार जम्मू-कश्मीर में 2008 के अमरनाथ-भूमि आंदोलन के बाद से प्रचलित हुआ। इसके बाद से देशभर के कई हिस्सों में समुदाय विशेष ने पत्थरबाजी को अपने विरोध का एक सुलभ जरिया बनाया है। यही नहीं, दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों में पत्थरों का भारी मात्रा में इस्तेमाल किया गया। 

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