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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बदल रहा ग्रामीण भारत: खेतों से पंचायतों तक, तकनीक खत्म कर रही दूरियां

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भारत के गांवों की तस्वीर अब सिर्फ कच्ची सड़कों और खेतों तक सीमित नहीं रही, बल्कि अब वहां ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (AI) की गूंज सुनाई दे रही है। मोदी राज में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिर्फ बड़े शहरों और कॉरपोरेट दफ्तरों तक सीमित नहीं है। यह धीरे-धीरे गांवों की चौपाल, खेत-खलिहान और पंचायत भवन तक पहुंच चुका है। सरकार इसे एक तकनीक नहीं, बल्कि समावेशी विकास के औजार के तौर पर देख रही है। हाल के वर्षों में डेटा, इंटरनेट कनेक्टिविटी और कंप्यूटिंग क्षमता बढ़ने से एआई का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। भारत में इसे “पब्लिक गुड” यानी सार्वजनिक हित की तकनीक के रूप में विकसित किया जा रहा है। मकसद साफ है—समान अवसर, बेहतर सेवा और अंतिम व्यक्ति तक पहुंच। कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा और शासन- हर क्षेत्र में एआई अब ग्रामीण भारत का नया सारथी बन रहा है।

भारत की एआई रणनीति ‘सभी के लिए एआई’ के विजन पर आधारित है। नीति आयोग ने इसकी नींव जून 2018 में ही रख दी थी। नीति आयोग ने “#AIforAll” विजन के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के लिए राष्ट्रीय रणनीति पेश की थी। इसमें एआई को कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा और शासन जैसे क्षेत्रों में बदलाव लाने वाला टूल बताया गया। खास फोकस ग्रामीण भारत पर रखा गया, जहां बुनियादी सेवाओं की कमी अब भी बड़ी चुनौती है। रणनीति का जोर यह है कि एआई इंसानों की जगह न ले, बल्कि उनकी क्षमता बढ़ाए। किसान, शिक्षक, स्वास्थ्य कार्यकर्ता और पंचायत प्रतिनिधि सभी के लिए एआई एक सहयोगी की तरह काम करे। डिजिटल स्किलिंग और स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी इसी सोच का हिस्सा हैं।

हाल ही में, नवंबर 2025 में लॉन्च हुए ‘इंडिया एआई गवर्नेंस दिशानिर्देश’ ने इस सफर को और सुरक्षित बना दिया है। ये गाइडलाइंस सुनिश्चित करती हैं कि एआई का उपयोग पारदर्शी हो और इसमें किसी भी तरह का भेदभाव न हो। यह ढांचा खास तौर पर ग्रामीण परिवेश और भारतीय जोखिमों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। इन दिशानिर्देशों में सात नैतिक सिद्धांत, छह स्तंभों पर आधारित गवर्नेंस ढांचा और चरणबद्ध कार्ययोजना शामिल है। गोपनीयता, पारदर्शिता और शिकायत निवारण पर विशेष जोर दिया गया है।

ग्रामीण शासन (Governance) में एआई एक बड़ी क्रांति लेकर आया है। ‘सभासार’ (Sabhasar) जैसे एआई टूल अब ग्राम सभा की बैठकों का लेखा-जोखा खुद तैयार कर रहे हैं। यह टूल भाषिणी प्लेटफॉर्म से जुड़ा है, जिससे ऑडियो या वीडियो इनपुट के जरिए 14 भाषाओं में सटीक नोट्स बना सकता है, जिससे कागजी काम का बोझ कम हुआ है।

इतना ही नहीं, ‘ई-ग्राम स्वराज’ और ‘ग्राम मानचित्र’ जैसे प्लेटफॉर्म्स ने पंचायतों को हाई-टेक बना दिया है। वित्त वर्ष 2024-25 तक, देश की 2.53 लाख से अधिक ग्राम पंचायतें इस डिजिटल सिस्टम से जुड़ चुकी हैं। अब नक्शों और डेटा के जरिए गांव के विकास की योजनाएं बनाना और भी आसान हो गया है।

सरकार ने एआई कोष के रूप में एक राष्ट्रीय भंडार भी तैयार किया है, जिसमें 7,500 से ज्यादा डेटासेट और 273 एआई मॉडल उपलब्ध हैं। डेवलपर्स और संस्थाएं इनका इस्तेमाल कर नई सेवाएं विकसित कर सकती हैं। फरवरी 2026 तक इस प्लेटफॉर्म पर लाखों विजिट दर्ज हो चुके हैं। यह पहल दिखाती है कि डेटा अब सिर्फ सूचना नहीं, बल्कि विकास की नई पूंजी बन चुका है।

ग्रामीण विकास मंत्रालय और आईआईटी दिल्ली के सहयोग से शुरू किया गया ‘भू प्रहरी’ प्लेटफॉर्म मनरेगा के तहत बनी परिसंपत्तियों की निगरानी करता है। सैटेलाइट और ग्राउंड डेटा के जरिए तालाब, जल संरचनाओं और अन्य संपत्तियों की स्थिति पर नजर रखी जा रही है। कृषि क्षेत्र में एआई मौसम पूर्वानुमान और सिंचाई प्रबंधन में मदद कर रहा है। किसान ई-मित्र जैसे वर्चुअल असिस्टेंट सरकारी योजनाओं की जानकारी दे रहे हैं। इससे जोखिम कम हो रहा है और आय सुरक्षा मजबूत हो रही है। ‘राष्ट्रीय कीट निगरानी प्रणाली’ फसलों की सेहत पर नजर रख रही है, जिससे नुकसान कम और पैदावार ज्यादा हो रही है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में मध्य प्रदेश का ‘सुमन सखी’ व्हाट्सएप चैटबॉट एक मिसाल बनकर उभरा है। यह एआई टूल ग्रामीण महिलाओं को गर्भावस्था और नवजात की देखभाल से जुड़ी जानकारी उनकी अपनी भाषा में दे रहा है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच ‘लास्ट माइल’ यानी आखिरी व्यक्ति तक सुनिश्चित हो रही है।

ग्रामीण भारत में सबसे बड़ी बाधा भाषा की रही है। इसे दूर करने के लिए ‘भाषिणी’ (Bhashini) प्लेटफॉर्म वरदान साबित हो रहा है। जुलाई 2022 में शुरू हुआ यह प्लेटफॉर्म अब 36 से अधिक भाषाओं में अनुवाद और वॉयस इंटरफेस प्रदान कर रहा है। जून 2025 में लॉन्च हुआ ‘भारतजेन’ (BharatGen) भारत का पहला सरकारी वित्त पोषित बहुभाषी मॉडल है। यह 22 भारतीय भाषाओं का समर्थन करता है और उन लोगों के लिए मददगार है जो पढ़-लिख नहीं सकते, लेकिन बोलकर अपनी समस्याओं का समाधान चाहते हैं।

एआई का लाभ केवल मुख्यधारा के गांवों तक सीमित नहीं है। ‘आदि वाणी’ (Adi Vaani) के जरिए दूरदराज के जनजातीय समुदायों को उनकी अपनी बोलियों में स्वास्थ्य और शिक्षा की जानकारी दी जा रही है। यह प्लेटफॉर्म न केवल सेवाएं दे रहा है, बल्कि विलुप्त होती जनजातीय भाषाओं को डिजिटल रूप में सहेजने का काम भी कर रहा है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब इंसानों को बदलने के लिए नहीं, बल्कि उनकी क्षमताओं को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल हो रहा है। जैसे-जैसे भारत ‘विकसित भारत@2047’ की ओर बढ़ रहा है, एआई ग्रामीण परिवर्तन का मजबूत आधार बनता दिख रहा है। खेत से लेकर कक्षा तक और पंचायत से लेकर स्वास्थ्य केंद्र तक तकनीक अब गांव की नई ताकत बन रही है।

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