आम आदमी पार्टी (AAP) के संयोजक और दिल्ली के विवादास्पद पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपनी सुविधा की राजनीति के लिए जाने जाते हैं। केजरीवाल ने समय-समय पर कई बड़े संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रबुद्ध व्यक्तियों का इस्तेमाल महज एक सीढ़ी की तरह किया और अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी होते ही उन्हें दरकिनार कर दिया। जिस किसी ने भी उनकी कार्यशैली, तानाशाही रवैये या वैचारिक भटकाव पर सवाल उठाए, केजरीवाल ने उनसे किनारा कर लिया। कई दिग्गज तो ऐसे थे जो पार्टी के भीतर दमघोंटू माहौल और आंतरिक लोकतंत्र की हत्या होते देख खुद ही बाहर निकल गए।
ताजा घटनाक्रम ने ‘आप’ के कुनबे में मचे घमासान को एक बार फिर चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। अब केजरीवाल के बेहद करीबी माने जाने वाले राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने छह अन्य सांसदों के साथ आम आदमी पार्टी को ‘बाय-बाय’ बोल दिया है। इसके साथ ही अब उन दिग्गजों की संख्या 44 पहुंच गई है जिन्होंने या तो केजरीवाल का साथ छोड़ा या जिन्हें अपमानित कर बाहर का रास्ता दिखाया गया। आइए एक नजर डालते हैं उन प्रमुख हस्तियों पर जिन्हें या तो केजरीवाल ने किनारे लगाया है या फिर AAP संयोजक से तंग आकर खुद पार्टी को अलविदा कह चुके हैं…
1. राघव चड्ढा
आम आदमी पार्टी के सबसे युवा और प्रखर चेहरों में से एक। राज्यसभा सांसद और चार्टर्ड अकाउंटेंट राघव पार्टी के वित्तीय और रणनीतिक मामलों की रीढ़ माने जाते थे। पंजाब की ऐतिहासिक जीत में उन्हें ‘मैन ऑफ द मैच’ कहा गया, लेकिन अंततः उन्हें भी सिस्टम से बाहर होना पड़ा।
2. संदीप पाठक
2022 से राज्यसभा सांसद और पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री। आईआईटी दिल्ली के पूर्व प्रोफेसर पाठक को ‘आप’ के राष्ट्रीय विस्तार का चाणक्य माना जाता था। केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद सिपहसालारों में से एक होने के बावजूद उनका मोहभंग होना पार्टी के लिए बड़ा झटका है।
3. स्वाति मालीवाल
दिल्ली महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष और महिलाओं के अधिकारों के लिए सड़क से लेकर संसद तक मुखर रहने वाली स्वाति 2024 में राज्यसभा पहुंची थीं। मुख्यमंत्री आवास पर हुए कथित मारपीट विवाद ने उनके और केजरीवाल के बीच ऐसी खाई खोदी कि रास्ते हमेशा के लिए अलग हो गए।
4. हरभजन सिंह
पूर्व दिग्गज क्रिकेटर। खेल के मैदान से राजनीति की पिच पर आए हरभजन 2022 में राज्यसभा पहुंचे थे। केजरीवाल के निर्णय लेने के एकतरफा तरीके और फीडबैक को नजरअंदाज करने की आदत से वे लंबे समय से असहज थे।
5. राजेंद्र गुप्ता
प्रसिद्ध उद्योगपति और ‘ट्राइडेंट ग्रुप’ के संस्थापक। साल 2007 में पद्म श्री से सम्मानित गुप्ता साल 2025 में पंजाब से राज्यसभा सांसद बने थे। आर्थिक जगत का इतना बड़ा नाम भी केजरीवाल की राजनीति के साथ तालमेल नहीं बिठा सका।
6. विक्रमजीत सिंह साहनी
विख्यात समाजसेवी और उद्योगपति। सन फाउंडेशन के प्रमुख साहनी को मॉरिशस के राष्ट्रपति द्वारा अंतरराष्ट्रीय शांति पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। उन्होंने भी नीतियों और कार्यशैली से तंग आकर इस्तीफा दे दिया है।
7. अशोक मित्तल
लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (LPU) के संस्थापक और जाने-माने शिक्षाविद। शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाने वाले मित्तल ने भी अब आम आदमी पार्टी के कुनबे को अलविदा कह दिया है।
8. अरुणा रॉय का साथ छोड़ा
अरविंद केजरीवाल की शुरुआती पहचान सामाजिक कार्यकर्ता की थी। मैग्सेसे अवार्ड मिलने के बाद दिसंबर 2006 में उन्होंने ‘पब्लिक कॉज रिसर्च फाउंडेशन’ बनाया। सितंबर 2010 में वे अरुणा रॉय के नेतृत्व वाले ‘नेशनल कैंपेन फॉर पीपल राइट टू इनफॉरमेशन’ की लोकपाल ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष बने। यहीं से केजरीवाल को लोकपाल आंदोलन की शक्ति का अंदाजा हुआ और उन्होंने अरुणा रॉय के स्थापित प्लेटफॉर्म को छोड़कर अन्ना हजारे के साथ नई रणनीति तैयार की।
9. अन्ना हजारे को दिखाया ‘ठेंगा’
अन्ना हजारे के नेतृत्व में हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने पूरे देश को जगा दिया था। लेकिन राजनीतिक लाभ के लिए केजरीवाल ने अन्ना के उसूलों की बलि चढ़ा दी। अन्ना के बार-बार मना करने के बावजूद केजरीवाल ने 26 नवंबर 2012 को राजनीतिक दल का गठन कर लिया। आज अन्ना और केजरीवाल के बीच बातचीत तक बंद है और अन्ना खुलेआम केजरीवाल पर ‘धोखाधड़ी’ का आरोप लगा चुके हैं।
10. शांति भूषण को किया किनारे
पार्टी के संस्थापक और कानूनी जगत के भीष्म पितामह शांति भूषण ने जब केजरीवाल की ‘तानाशाही’ और ‘टिकटों के सौदे’ के खिलाफ आवाज उठाई, तो केजरीवाल ने उन्हें अपना दुश्मन मान लिया। जिस व्यक्ति ने अपनी गाढ़ी कमाई लगाकर पार्टी का आधार तैयार किया, उनके लिए केजरीवाल ने अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करते हुए दरवाजे बंद कर दिए।
11. प्रशांत भूषण भी हुए बाहर
अन्ना आंदोलन के समय भ्रष्टाचार के खिलाफ जो भी दस्तावेजी लड़ाई लड़ी गई, उसके पीछे प्रशांत भूषण का दिमाग था। वे पार्टी के असली ‘थिंक टैंक’ थे। जैसे ही उन्होंने पार्टी के भीतर पारदर्शिता और आंतरिक लोकतंत्र की मांग की, केजरीवाल ने उन्हें सार्वजनिक रूप से बेइज्जत कर बाहर का रास्ता दिखा दिया।
12. योगेन्द्र यादव हुए तानाशाही के शिकार
देश के बेहतरीन चुनावी रणनीतिकारों में शुमार योगेन्द्र यादव ने ‘आप’ को वैचारिक रूप से मजबूत किया। लेकिन जब उन्होंने केजरीवाल की मनमानी पर अंकुश लगाने की कोशिश की, तो केजरीवाल ने उनके लिए अभद्र शब्दों का प्रयोग किया। 28 मार्च 2015 की वह घटना आज भी काला अध्याय है, जब यादव को नेशनल काउंसिल की मीटिंग से बाउंसरों के जरिए घसीटकर बाहर फिंकवा दिया गया था।
13. प्रोफेसर आनन्द कुमार भी हुए बाहर
थिंक टैंक के अहम सदस्य प्रोफेसर कुमार ने जब ‘एक व्यक्ति एक पद’ के लोकतांत्रिक सिद्धांत की बात की, तो केजरीवाल अपना आपा खो बैठे। उन्होंने इस्तीफे का ड्रामा रचकर प्रोफेसर कुमार को पार्टी से निष्कासित कर दिया।
14. किरण बेदी का साथ छूटा
लोकपाल आंदोलन की प्रमुख चेहरा किरण बेदी ने शुरुआत में ही भांप लिया था कि आंदोलन का राजनीतिकरण हो रहा है। उन्होंने केजरीवाल के साथ राजनीति में जाने से साफ इनकार कर दिया और बाद में उनके तानाशाही रवैये की जमकर आलोचना की।
15. स्वामी रामदेव
केजरीवाल ने स्वामी रामदेव का साथ तब तक दिया जब तक उन्हें आंदोलन के लिए भीड़ और संसाधनों की आवश्यकता थी। अपना आधार बनते ही उन्होंने रामदेव से दूरी बना ली क्योंकि केजरीवाल को अपने कद के सामने किसी और का बड़ा होना पसंद नहीं था।
16. जनरल वीके सिंह
अन्ना आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले जनरल वीके सिंह को पार्टी बनने के बाद पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। उपेक्षा से आहत होकर उन्होंने बाद में बीजेपी का दामन थामा।
17. जस्टिस संतोष हेगड़े
जनलोकपाल का ड्राफ्ट तैयार करने वाले जस्टिस हेगड़े केजरीवाल की बेलगाम राजनीतिक महत्वाकांक्षा से इतने आहत हुए कि उन्होंने टीम अन्ना से नाता तोड़ लिया और केजरीवाल के शपथ ग्रहण समारोह तक में नहीं गए।
18. मेधा पाटकर
नर्मदा बचाओ आंदोलन की प्रणेता मेधा पाटकर ने केजरीवाल को ‘भटका हुआ’ नेता करार दिया। केजरीवाल के लिए मेधा जैसे सामाजिक कार्यकर्ता तब तक उपयोगी थे जब तक चुनाव नहीं जीते गए थे।
19. श्री श्री रविशंकर
आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि केजरीवाल ने साबित कर दिया कि वे अन्य भ्रष्ट राजनेताओं से अलग नहीं हैं। उनकी तानाशाही ने करोड़ों लोगों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
20. एडमिरल रामदास
पूर्व नौसेनाध्यक्ष और पार्टी के आंतरिक लोकपाल। जब उन्होंने सिद्धांतों पर अडिग रहकर काम किया, तो केजरीवाल ने उन्हें बिना बताए पद से हटा दिया। एडमिरल ने इसे विश्वासघात करार दिया था।
21. जेएम लिंग्दोह
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जिन्होंने लोकपाल बिल का ढांचा तैयार किया था। पार्टी बनते ही केजरीवाल ने उन्हें ‘यूजलेस’ समझकर त्याग दिया। दरअसल लिंग्दोह जैसे लोगों के रहते केजरीवाल के लिए पार्टी और सरकार में तानाशाही चलाना मुश्किल होता।
22. स्वामी अग्निवेश
आंदोलन के शुरुआती दौर में सक्रिय रहे अग्निवेश को केजरीवाल ने पार्टी बनाने से पहले ही किनारे लगा दिया और अपनी पीआर टीम के जरिए उन्हें ‘कांग्रेस का एजेंट’ तक कहलवाया।
23. अंजलि दमानिया
महाराष्ट्र में ‘आप’ की बड़ी स्तंभ अंजलि दमानिया ने मार्च 2015 में इस्तीफा दिया। वे योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को बाहर करने के लिए रची गई साजिशों से बेहद मर्माहत थीं।
24. मधु भादुड़ी
पूर्व राजनयिक और संस्थापक सदस्य। उन्होंने इस्तीफा देते हुए गंभीर आरोप लगाया कि पार्टी में महिलाओं का कोई सम्मान नहीं है और केजरीवाल का वर्किंग स्टाइल ‘खाप पंचायत’ जैसा है।
25. विनोद कुमार बिन्नी
केजरीवाल की तानाशाही के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद करने वाले पहले नेता। उन्होंने केजरीवाल पर जनता से किए वादों से मुकरने का आरोप लगाया, जिसके इनाम में उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया।
26. मुफ्ती शमून कासमी
कासमी ने केजरीवाल पर अन्ना हजारे का इस्तेमाल करके अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने का आरोप लगाया और सत्ता के प्रति उनकी भूख को खतरनाक बताया।
27. कैप्टन गोपीनाथ
भारत में सस्ती हवाई सेवा शुरू करने वाले गोपीनाथ ने केजरीवाल की कार्यशैली को बेहद बचकाना और दिशाहीन बताते हुए पार्टी छोड़ी।
28. एसपी उदय कुमार
परमाणु विरोधी आंदोलन के नेता उदय कुमार ने आरोप लगाया कि केजरीवाल सिर्फ दिल्ली केंद्रित राजनीति करना चाहते हैं और उन्हें देश के बाकी हिस्सों की परवाह नहीं है।
29. मयंक गांधी
महाराष्ट्र में ‘आप’ को मजबूत करने वाले मयंक गांधी ने केजरीवाल के षड्यंत्रों का कच्चा चिट्ठा अपने ब्लॉग में खोल दिया था, जिसके बाद उन्हें बाहर होना पड़ा।
30. एमएस धीर
दिल्ली विधानसभा के पूर्व स्पीकर। उन्होंने केजरीवाल पर सिखों के प्रति दोहरा रवैया अपनाने और 1984 के पीड़ितों को न्याय न दिलाने का आरोप लगाया।
31. अजित झा
आंतरिक लोकतंत्र के पैरोकार, जिन्हें केजरीवाल की ‘कोर टीम’ ने अपमानित कर बाहर निकाला।
32. कपिल मिश्रा
पूर्व मंत्री जिन्होंने केजरीवाल के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने की कोशिश की। उन्होंने मुख्यमंत्री पर रिश्वत लेने का सीधा आरोप लगाया और आज वे बीजेपी के साथ खड़े हैं।
33. कुमार विश्वास
संस्थापक सदस्य और आंदोलन की आवाज। केजरीवाल ने उनके बढ़ते प्रभाव से डरकर उन्हें राज्यसभा नहीं भेजा और अपमानित किया। कुमार ने इसे अपनी ‘शहादत’ कहा था।
34. आशुतोष
पूर्व पत्रकार जिन्होंने केजरीवाल के लिए अपना करियर दांव पर लगाया। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी ने उन्हें चुनाव के दौरान अपनी जाति का इस्तेमाल करने के लिए विवश किया।
35. आशीष खेतान
पार्टी के रणनीतिकार और बड़े नेता। साइडलाइन किए जाने और कार्यशैली से परेशान होकर उन्होंने राजनीति को ही अलविदा कह दिया।
36. एच एस फुल्का
सिखों के हक की लड़ाई लड़ने वाले वरिष्ठ वकील। केजरीवाल की कांग्रेस से बढ़ती नजदीकी उन्हें रास नहीं आई और उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
37. शाजिया इल्मी
पत्रकार से नेता बनीं शाजिया ने केजरीवाल पर ‘महिला विरोधी’ होने और तानाशाही चलाने का आरोप लगाते हुए बीजेपी का दामन थाम लिया।
38. डॉ. मुनीश रायजादा
शिकागो (अमेरिका) में रहने वाले और ‘आप’ के पूर्व एनआरआई सह-संयोजक डॉ. मुनीश रायजादा का इस्तीफा केजरीवाल के लिए सबसे बड़ा वैचारिक तमाचा था। डॉ. रायजादा ने केजरीवाल पर ‘सिद्धांतों की हत्या’ का आरोप लगाया। उनका कहना था कि विदेशों में बसे हजारों भारतीयों ने अपनी नौकरियां और करियर दांव पर लगाकर केजरीवाल को करोड़ों का चंदा और समर्थन दिया, लेकिन सत्ता मिलते ही केजरीवाल ने उन्हीं सिद्धांतों को तिलांजलि दे दी जिन पर पार्टी बनी थी।
39. कैलाश गहलोत
केजरीवाल सरकार के सबसे कद्दावर मंत्रियों में से एक ने ‘शीशमहल’ विवाद और यमुना की सफाई न होने जैसे मुद्दों पर सीएम को घेरा और इस्तीफा दे दिया।
40. राजकुमार आनंद
दिल्ली सरकार में समाज कल्याण मंत्री। उन्होंने केजरीवाल के भ्रष्टाचार और पार्टी में दलितों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए ‘आप’ को “भ्रष्टाचार का दलदल” बताया।
41. कर्नल देवेंद्र सहरावत
पूर्व विधायक सहरावत ने पंजाब चुनाव के दौरान टिकट वितरण में भ्रष्टाचार और महिलाओं के शोषण के गंभीर आरोप लगाए थे।
42. पंकज पुष्कर
पूर्व विधायक पंकज पुष्कर को योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के निष्कासन का विरोध करने पर पार्टी के भीतर ही प्रताड़ित और किनारे कर दिया गया।
43. प्रोफेसर रमन
पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे प्रोफेसर रमन को विजन डॉक्यूमेंट तैयार करने के बावजूद सफाई अभियान के तहत बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
44. कर्नल अजय कोठियाल
उत्तराखंड में सीएम चेहरा रहे कोठियाल ने भी केजरीवाल की नीतियों से तंग आकर पार्टी छोड़ी।
अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी आज अपने मूल स्वरूप से कोसों दूर जा चुकी है। इन प्रमुख चेहरों का यह बिखराव साबित करता है कि जो आंदोलन ‘बदलाव’ के नाम पर शुरू हुआ था, वह अब केवल ‘व्यक्ति विशेष’ की सत्ता बचाने का जरिया बनकर रह गया है। केजरीवाल ने आंदोलन और राजनीति में जिन लोगों का साथ लिया उनको अपनी सोच मनवाने के लिए मजबूर करते रहे, जो मजबूर नहीं हुए उन्होंने साथ छोड़ दिया और जो मजबूर हैं आज उनके साथ हैं।









