Home विचार UP बदनाम हुई अखिलेश तेरे लिए …

UP बदनाम हुई अखिलेश तेरे लिए …

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पूरा उत्तर प्रदेश आज शर्मसार है। देश के सबसे बड़े सूबे की 20 करोड़ जनता का सिर अखिलेश यादव ने शर्म से झुका दिया है। पहले तो सिर्फ संदेह था, लेकिन आज जो हरकत अखिलेश यादव ने की है, उससे पूरा यकीन हो गया है कि बाप-बेटे, भाई-भाई, चाचा-भतीजे की लड़ाई सिर्फ और सिर्फ नौटंकी थी, ड्रामा था, पहले से लिखी हुई स्क्रिप्ट थी। पहले तो सिर्फ भ्रष्टाचार, गुंडाराज, भाई भतीजावाद के आरोप लग रहे थे, लेकिन अब तो यूपी को बदनाम करने के भी आरोप लगेंगे।

जरा सोचिए कि अखिलेश यादव पिछले कई महीने से किससे लड़ाई लड़ रहे थे। भ्रष्टाचार से, बिगड़ती कानून व्यवस्था से, विकास की मुहिम से, गुंडाराज से, अपहरण की प्रथा से या फिर किसी और से। उनकी लड़ाई सिर्फ और सिर्फ अपने पिता मुलायम यादव से थी, जिन पर कट्टर और गुंडागर्दी के पर्याय बन चुके मुस्लिमों को टिकट देने के लिए दबाव का आरोप लगा रहे थे। उनकी लड़ाई चाचा शिवपाल यादव से थी, जिनके खिलाफ उन्होंने भ्रष्टाचार करने और भ्रष्टाचारियों को पनाह देने का आरोप मढ़ा था। लेकिन कई महीने की नौटंकी के बाद क्या हुआ। दोनों की लड़ाई चुनाव आयोग तक पहुंची। चैनलों, अखबारों की सुर्खियां बटोरीं।

चुनाव आयोग के बहाने दोनों गुट अपने अपने सूत्रों को खबरें भी पहुंचा रहे थे। लेकिन हुआ क्या अखिलेश के खिलाफ मुलायम ने कोई हलफनामा ही नहीं दिया और पार्टी की कमान सीधे सीधे अपने बेटे को सौंप दी। इसके बाद भी बाप बेटे की नौटंकी नहीं रुकी। अखिलेश यादव ने अगले ही दिन ऐलान कर दिया कि वो अखिलेश के लिए चुनाव प्रचार करेंगे। और अब दो दिन में ही आज उम्मीदवारों की जो लिस्ट अखिलेश ने जारी की है, उसमें उनके कट्टर दुश्मन घोषित किए जा चुके चाचा शिवपाल यादव का भी नाम है। यही नहीं मुलायम ने अखिलेश को उम्मीदवारों की जो लिस्ट सौंपी उसमें से ज्यादातर को अखिलेश ने सीट भी दे दिए हैं। ऐसे में सवाल ये है कि –

क्या अखिलेश यादव ने पारिवारिक लड़ाई का ड्रामा कर उत्तर प्रदेश का अपमान नहीं किया है?

जब चुनाव चिह्न को लेकर झगड़ा ही नहीं था, तो बाप-बेटे चुनाव आयोग के पास क्यों गए?

जब अखिलेश को अपने पिता के साथ ही मिलकर चुनाव लड़ना था तो लड़ाई का ड्रामा क्यों किया?

जब चाचा शिवपाल को भी अपनी ही पार्टी से टिकट देना था, तो इतनी लड़ाई किसलिए?

क्या यूपी में अब साढ़े तीन मुख्यमंत्रियों की स्थिति बदल गई है?

– हरीश चन्द्र बर्णवाल

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